Web News

www.upwebnews.com

सोमनाथ स्वाभिमान पर्व, अटूट आस्था के 1000 वर्ष

January 5, 2026

सोमनाथ स्वाभिमान पर्व, अटूट आस्था के 1000 वर्ष

नरेंद्र मोदी, प्रधानमंत्री

सोमनाथ… ये शब्द सुनते ही हमारे मन और हृदय में गर्व और आस्था की भावना भर जाती है। भारत के पश्चिमी तट पर गुजरात में, प्रभास पाटन नाम की जगह पर स्थित Somnath सोमनाथ, भारत की आत्मा का शाश्वत प्रस्तुतिकरण है। द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्रम में भारत के 12 ज्योतिर्लिंगों का उल्लेख है। ज्योतिर्लिंगों का वर्णन इस पंक्ति से शुरू होता है…“सौराष्ट्रे सोमनाथं च…यानि ज्योतिर्लिंगों में सबसे पहले सोमनाथ का उल्लेख आता है। ये इस पवित्र धाम की सभ्यतागत और आध्यात्मिक महत्ता का प्रतीक है।

शास्त्रों में ये भी कहा गया है:

“सोमलिङ्गं नरो दृष्ट्वा सर्वपापैः प्रमुच्यते।
लभते फलं मनोवाञ्छितं मृतः स्वर्गं समाश्रयेत्॥”

अर्थात्, सोमनाथ शिवलिंग के दर्शन से व्यक्ति अपने सभी पापों से मुक्त हो जाता है। मन में जो भी पुण्य कामनाएं होती हैं, वो पूरी होती हैं और मृत्यु के बाद आत्मा स्वर्ग को प्राप्त होती है।

दुर्भाग्यवश, यही सोमनाथ, जो करोड़ों लोगों की श्रद्धा और प्रार्थनाओं का केंद्र था, विदेशी आक्रमणकारियों का निशाना बना, जिनका उद्देश्य विध्वंस था।

वर्ष 2026 सोमनाथ मंदिर के लिए बहुत महत्व रखता है क्योंकि इस महान तीर्थ पर हुए पहले आक्रमण के 1000 वर्ष पूरे हो रहे हैं। जनवरी 1026 में गजनी के महमूद ने इस मंदिर पर बड़ा आक्रमण किया था, इस मंदिर को ध्वस्त कर दिया था। यह आक्रमण आस्था और सभ्यता के एक महान प्रतीक को नष्ट करने के उद्देश्य से किया गया एक हिंसक और बर्बर प्रयास था।

सोमनाथ हमला मानव इतिहास की सबसे बड़ी त्रासदियों में शामिल है। फिर भी, एक हजार वर्ष बाद आज भी यह मंदिर पूरे गौरव के साथ खड़ा है। साल 1026 के बाद समय-समय पर इस मंदिर को उसके पूरे वैभव के साथ पुन:निर्मित करने के प्रयास जारी रहे। मंदिर का वर्तमान स्वरूप 1951 में आकार ले सका। संयोग से 2026 का यही वर्ष सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण के 75 वर्ष पूरे होने का भी वर्ष है। 11 मई 1951 को इस मंदिर का पुनर्निर्माण सम्पन्न हुआ था। तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद की उपस्थिति में हुआ वो समारोह ऐतिहासिक था, जब मंदिर के द्वार दर्शनों के लिए खोले गए थे।

1026 में एक हजार वर्ष पहले सोमनाथ पर हुए पहले आक्रमण, वहां के लोगों के साथ की गई क्रूरता और विध्वंस का वर्णन अनेक ऐतिहासिक स्रोतों में विस्तार से मिलता है। जब इन्हें पढ़ा जाता है तो हृदय कांप उठता है। हर पंक्ति में क्रूरता के निशान मिलते हैं, ये ऐसा दुःख है जिसकी पीड़ा इतने समय बाद भी महसूस होती है।

हम कल्पना कर सकते हैं कि इसका उस दौर में भारत पर और लोगों के मनोबल पर कितना गहरा प्रभाव पड़ा होगा। सोमनाथ मंदिर का आध्यात्मिक महत्व बहुत ज्यादा था। ये बड़ी संख्या में लोगों को अपनी ओर खींचता था। ये एक ऐसे समाज की प्रेरणा था जिसकी आर्थिक क्षमता भी बहुत सशक्त थी। हमारे समुद्री व्यापारी और नाविक इसके वैभव की कथाएं दूर-दूर तक ले जाते थे।

सोमनाथ पर हमले और फिर गुलामी के लंबे कालखंड के बावजूद आज मैं पूरे विश्वास के साथ और गर्व से ये कहना चाहता हूं कि सोमनाथ की गाथा विध्वंस की कहानी नहीं है। ये पिछले 1000 साल से चली आ रही भारत माता की करोड़ों संतानों के स्वाभिमान की गाथा है, ये हम भारत के लोगों की अटूट आस्था की गाथा है।

1026 में शुरू हुई मध्यकालीन बर्बरता ने आगे चलकर दूसरों को भी बार-बार सोमनाथ पर आक्रमण करने के लिए प्रेरित किया। यह हमारे लोगों और हमारी संस्कृति को गुलाम बनाने का प्रयास था। लेकिन हर बार जब मंदिर पर आक्रमण हुआ, तब हमारे पास ऐसे महान पुरुष और महिलाएं भी थीं जिन्होंने उसकी रक्षा के लिए खड़े होकर सर्वोच्च बलिदान दिया। और हर बार, पीढ़ी दर पीढ़ी, हमारी महान सभ्यता के लोगों ने खुद को संभाला, मंदिर को फिर से खड़ा किया और उसे पुनः जीवंत किया।

महमूद गजनवी लूटकर चला गया, लेकिन सोमनाथ के प्रति हमारी भावना को हमसे छीन नहीं सका। सोमनाथ से जुड़ी हमारी आस्था, हमारा विश्वास और प्रबल हुआ। उसकी आत्मा लाखों श्रद्धालुओं की भीतर सांस लेती रही। साल 1026 के हजार साल बाद आज 2026 में भी सोमनाथ मंदिर दुनिया को संदेश दे रहा है, कि मिटाने की मानसिकता रखने वाले खत्म हो जाते हैं, जबकि सोमनाथ मंदिर आज हमारे विश्वास का मजबूत आधार बनकर खड़ा है। वो आज भी हमारी प्रेरणा का स्रोत है, वो आज भी हमारी शक्ति का पुंज है।

ये हमारा सौभाग्य है कि हमने उस धरती पर जीवन पाया है, जिसने देवी अहिल्याबाई होलकर जैसी महान विभूति को जन्म दिया। उन्होंने ये सुनिश्चित करने का पुण्य प्रयास किया कि श्रद्धालु सोमनाथ में पूजा कर सकें।

1890 के दशक में स्वामी विवेकानंद भी सोमनाथ आए थे, वो अनुभव उन्हें भीतर तक आंदोलित कर गया। 1897 में चेन्नई में दिए गए एक व्याख्यान के दौरान उन्होंने अपनी भावना व्यक्त की।

उन्होंने कहा, “दक्षिण भारत के प्राचीन मंदिर और गुजरात के सोमनाथ जैसे मंदिर आपको ज्ञान के अनगिनत पाठ सिखाएंगे। ये आपको किसी भी संख्या में पढ़ी गई पुस्तकों से अधिक हमारी सभ्यता की गहरी समझ देंगे।

इन मंदिरों पर सैकड़ों आक्रमणों के निशान हैं, और सैकड़ों बार इनका पुनर्जागरण हुआ है। ये बार बार नष्ट किए गए, और हर बार अपने ही खंडहरों से फिर खड़े हुए। पहले की तरह सशक्त। पहले की तरह जीवंत। यही राष्ट्रीय मन है, यही राष्ट्रीय जीवन धारा है। इसका अनुसरण आपको गौरव से भर देता है। इसको छोड़ देने का मतलब है, मृत्यु। इससे अलग हो जाने पर विनाश ही होगा।”

ये सर्वविदित है कि आजादी के बाद सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण का पवित्र दायित्व सरदार वल्लभभाई पटेल के सक्षम हाथों में आया। उन्होंने आगे बढ़कर इस दायित्व के लिए कदम बढ़ाया। 1947 में दीवाली के समय उनकी सोमनाथ यात्रा हुई। उस यात्रा के अनुभव ने उन्हें भीतर तक झकझोर दिया, उसी समय उन्होंने घोषणा की कि यहीं सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण होगा। अंततः 11 मई 1951 को सोमनाथ में भव्य मंदिर के द्वार श्रद्धालुओं के लिए खोल दिए गए।

उस अवसर पर तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद उपस्थित थे। महान सरदार साहब इस ऐतिहासिक दिन को देखने के लिए जीवित नहीं थे, लेकिन उनका सपना राष्ट्र के सामने साकार होकर भव्य रूप में उपस्थित था।

तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू इस घटना से अधिक उत्साहित नहीं थे। वो नहीं चाहते थे कि माननीय राष्ट्रपति और मंत्री इस समारोह का हिस्सा बनें। उन्होंने कहा कि इस घटना से भारत की छवि खराब होगी। लेकिन राजेंद्र बाबू अडिग रहे, और फिर जो हुआ, उसने एक नया इतिहास रच दिया।

सोमनाथ मंदिर का कोई भी उल्लेख के.एम. मुंशी जी के योगदानों को याद किए बिना अधूरा है। उन्होंने उस समय सरदार पटेल का प्रभावी रूप से समर्थन किया था। सोमनाथ पर उनका कार्य, विशेष रूप से उनकी पुस्तक ‘सोमनाथ, द श्राइन इटरनल’, अवश्य पढ़ी जानी चाहिए।

जैसा कि मुंशी जी की पुस्तक के शीर्षक से स्पष्ट होता है, हम एक ऐसी सभ्यता हैं जो आत्मा और विचारों की अमरता में अटूट विश्वास रखती है। हम विश्वास करते हैं- नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः। सोमनाथ का भौतिक ढांचा नष्ट हो गया, लेकिन उसकी चेतना अमर रही।

इन्हीं विचारों ने हमें हर कालखंड में, हर परिस्थिति में फिर से उठ खड़े होने, मजबूत बनने और आगे बढ़ने का सामर्थ्य दिया है। इन्हीं मूल्यों और हमारे लोगों के संकल्प की वजह से आज भारत पर दुनिया की नजर है। दुनिया भारत को आशा और विश्वास की दृष्टि से देख रही है। वो हमारे इनोवेटिव युवाओं में निवेश करना चाहती है। हमारी कला, हमारी संस्कृति, हमारा संगीत और हमारे अनेक पर्व आज वैश्विक पहचान बना रहे हैं। योग और आयुर्वेद जैसे विषय पूरी दुनिया में प्रभाव डाल रहे हैं। ये स्वस्थ जीवन को बढ़ावा दे रहे हैं। आज कई वैश्विक चुनौतियों के समाधान के लिए दुनिया भारत की ओर देख रही है।

अनादि काल से सोमनाथ जीवन के हर क्षेत्र के लोगों को जोड़ता आया है। सदियों पहले जैन परंपरा के आदरणीय मुनि कलिकाल सर्वज्ञ हेमचंद्राचार्य यहां आए थे और कहा जाता है कि प्रार्थना के बाद उन्होंने कहा, “भवबीजाङ्कुरजनना रागाद्याः क्षयमुपगता यस्य। अर्थात्, उस परम तत्व को नमन जिसमें सांसारिक बंधनों के बीज नष्ट हो चुके हैं। जिसमें राग और सभी विकार शांत हो गए हैं।

आज भी दादा सोमनाथ के दर्शन से ऐसी ही अनुभूति होती है। मन में एक ठहराव आ जाता है, आत्मा को अंदर तक कुछ स्पर्श करता है, जो अलौकिक है, अव्यक्त है।

1026 के पहले आक्रमण के एक हजार वर्ष बाद 2026 में भी सोमनाथ का समुद्र उसी तीव्रता से गर्जना करता है और तट को स्पर्श करती लहरें उसकी पूरी गाथा सुनाती हैं। उन लहरों की तरह सोमनाथ बार-बार उठता रहा है।

अतीत के आक्रमणकारी आज समय की धूल बन चुके हैं। उनका नाम अब विनाश के प्रतीक के तौर पर लिया जाता है। इतिहास के पन्नों में वे केवल फुटनोट हैं, जबकि सोमनाथ आज भी अपनी आशा बिखेरता हुआ प्रकाशमान खड़ा है। सोमनाथ हमें ये बताता है कि घृणा और कट्टरता में विनाश की विकृत ताकत हो सकती है, लेकिन आस्था में सृजन की शक्ति होती है। करोड़ों श्रद्धालुओं के लिए सोमनाथ आज भी आशा का अनंत नाद है। ये विश्वास का वो स्वर है, जो टूटने के बाद भी उठने की प्रेरणा देता है।

अगर हजार साल पहले खंडित हुआ सोमनाथ मंदिर अपने पूरे वैभव के साथ फिर से खड़ा हो सकता है, तो हम हजार साल पहले का समृद्ध भारत भी बना सकते हैं। आइए, इसी प्रेरणा के साथ हम आगे बढ़ते हैं। एक नए संकल्प के साथ, एक विकसित भारत के निर्माण के लिए। एक ऐसा भारत, जिसका सभ्यतागत ज्ञान हमें विश्व कल्याण के लिए प्रयास करते रहने की प्रेरणा देता है।

जय सोमनाथ !

 

December 31, 2025

हिंदुओं के नरसंहार की भूमि बनता बांग्लादेश 

सेक्युलर दलों  के मुंह पर लगा ताला
लेखकः मृत्युंजय दीक्षित
अगस्त 2024 में बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना को हिंसक प्रदर्शनों के चलते अपना देश छोड़ना पड़ा जिसके बाद बांग्लादेश में हिन्दुओं पर आक्रमण, हत्या और आगजनी की भीषण घटनाएं हुईं क्योंकि हिन्दुओं को उनकी पार्टी का समर्थक माना जाता है। शेख हसीना के देश छोड़ने के बाद मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व में अंतरिम सरकार बनी। यूनुस के आते ही  पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई  बांग्लादेश में सक्रिय हो गई और भारत तथा हिन्दू विरोधी आग भड़काने में जुट गई। दिसंबर 2025 में भारत विरोधी नेता उस्मान हादी की हत्या के बाद यह आग और भड़क गई। अब ईशनिंदा के झूठे आरोप लगाकर हिन्दुओं की हत्याएं की जा रही हैं। हिन्दू घरों में बाहर से ताला लगाकर आग लगाई जा रही है। इन सभी क्रूर आपराधिक घटनाओं को यूनुस सरकार का मौन समर्थन है जिससे हिन्दू जान बचाकर भाग तक नहीं पा रहा है। बांग्लादेश हिंदू समाज के नरसंहार की भूमि बन चुका है।
विभाजन के समय  बांग्लादेश में  हिन्दू जनसँख्या 23 प्रतिशत थी। 1974 की जनगणना में यह घटकर   मात्र 13.5 प्रतिशत रह गई थी और अब मात्र 7.96 प्रतिशत है। हिन्दुओं पर हो रहे धार्मिक अत्याचारों का यही  हाल  रहा तो बांग्लादेश में  हिन्दू  पूरी तरह से लुप्तप्राय हो जाएंगे। विदेश मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार 2022 में अल्पसंख्यकों पर 47 हमले दर्ज किए गए जो 2023 में बढ़कर 302 हो गए और  फिर 2024 में तेजी से बढ़कर 3200 हो गए। दिसंबर माह में ही पहले दीपू चन्द्र दस और फिर अमृत मंडल को भीड़ ने ईशनिंदा के नाम पर बर्बरता से मार डाला। चटगांव मे हिंदू परिवार के घर में आग लगा दी गई। घटनास्थल से एक धमकी भरा नोट मिला जिसमें हिन्दुओं पर इस्लाम विरोधी गतिविधियों का अरोप लगाया गया था और गंभीर परिणाम की चेतावनी दी गई। हादी की मौत का बदला लेने के लिए भीड़ हिन्दुओं  के  खून की प्यासी होकर अनेकानेक हथियारों के साथ  सड़कों पर घूम रही है। बांग्लादेश में प्रतिवर्ष किस न किसी बहाने हिंदू मंदिरों पर हमले हो रहे हैं और अब तक 850 से अधिक हिंदू मंदिरों को ध्वस्त किया जा चुका है। केवल तजा हिंसा में ही अभी तक 200 से अधिक हिन्दुओं की हत्याएं और 170 से अधिक हिंदू महिलाओं  के साथ बलात्कार जैसे जघन्य अपराध हो चुके हैं।
प्राप्त आंकड़ों  के अनुसार  बांग्लादेश में 2022 से 2024 के बीच हिन्दू अल्पसख्यकों पर हमलों के मामले आठ गुना बढ़ गए हैं। बांग्लादेश में हिन्दुओं पर हिसा के मामलों में जिस प्रकार से वृद्धि देखी जा रही है वह केवल तात्कालिक कानून व्यवस्था की समस्या नहीं है अपितु देश की सामाजिक तथा जनसांख्यिकीय संरचना को बदलने के लिए दशकों से किए जा रहे कट्टर इस्लामी राजनीतिक प्रयासों का परिणाम भी है।
बांग्लादेश मे हिंदुओं के साथ हो रही हिंसा की पृष्ठभूमि  बहुत पुरानी है। शेख हसीना की सरकार के समय भी  हमले होते थे, विशेषकर जब हिन्दुओं के पवित्र नवरात्र प्रारंभ होते थे तब ईशनिंदा की झूठी अफवाहें फैलाकर दुर्गा पंडालो पर हमले किए जाते थे और उनमें तोड़ फोड़ की जाती थी। अब अंतर यह आ गया है कि इन घटनाओं  का नियंत्रण  पाक खुफिया एजेंसी आईएसआई व कट्टरपंथी अराजक तत्वों के हाथ में  आ गया है।
बांग्लादेश मे ईशनिंदा कट्टरपंथियों का सबसे बड़ा हथियार बन गया है।आठ ऐसे अवसर रहे हैं जब हिंदुओं पर ईशनिंदा के नाम पर भयानक हमले किए गए।  सुनामगंज में एक फेसबुक पोस्ट के बाद परा हिंदू गांव तबाह कर दिया गया। रंगपुर के गंगाचरा में एक हिंदू युवक पर आरोप लगाने के बाद दंगाइयो ने 22 हिंदू घरों  को ध्वस्त कर दिया। खुलना, बारिशाल, मौलवी बाजार, फरीदपुर, चांदपुर और कुमिल्ला जैसे जिलों मे भी हिंदुओं के साथ भयानक घटनाएं घटी हैं ।
मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार बनने  के बाद से हिन्दुओं की स्थिति दिन प्रतिदिन बदतर होती जा रही है । नोबेल शांति पुरस्कार पाने वाला वास्तव में हिन्दुओं रक्त  का प्यासा हो गया है जो उसमान हादी के अंतिम संस्कार  की जनसभा में कहता है कि “हादी तुम जहां कहीं भी हो हम तुम्हारे हर सपने को अवश्य पूरा करेंगे।“ यह भाषण यूनुस की खतरनाक मंशा का संकेत कर रहा है। बांग्लादेश इस बात का प्रमाण है कि जहां मुस्लिम आबादी बढ़ जाती है वहां पर अन्य अल्पसंख्यक समाज का रहना दूभर हो जाता है। आज बांग्लादेश में मुस्लिम जनसंख्या 91.08 प्रतिशत हो चुकी है और अल्पसंख्यक हिंदू समाज पूरी तरह से असुरक्षित हो गया है।
बांग्लादेश के कट्टरपंथी देश में शरीयत का कानून लागू करना चाहते हैं। वे हिंदू महिलाओं को माथे पर बिंदी न लगाने, साड़ी न पहनने और  बुर्का पहनने को कह रहे हैं  ओैर ऐसा न करने पर बलात्कार तथा परिवार को मारने की घमकियां दे रहें हैं। बांग्लादेश में भारत- बांग्लादेश के मध्य मैत्री को मजबूती प्रदान करने के लिए जिन सांस्कृतिक केन्द्रों की स्थापना की गई थी उन्हें  निशाना बनाया जा रहा है।सांस्कृतिक कार्यक्रम की प्रस्तुति दे रहे कलाकारों पर हमला किया जा रहा है। जगह -जगह हिन्दुओं  का नरसंहार कर अस्तित्व समाप्त करने के पोस्टर लगाए जा रहे हैं।
दुर्भाग्यपूर्ण है कि संयुक्तराष्ट्र महासभा में  उस्मान हादी की मौत पर गहरी चिंता व्यक्त की जाती है किंतु हिन्दू नरसंहार पर चुप्पी साध ली जाती है। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने राष्ट्रपति चुनाव के दौरान, बांग्लादेशी हिन्दुओं  के लिए कहा था कि अगर बाइडेन की जगह उन्हें  चुना गया होता तो आज वहां के हालात ऐसे न होते किंतु ट्रंप अब शांत हैं और अमेरिका से हिंदुओं की हत्याओ की निंदा करने का  कोई बयान अभी तक नहीं आया है। कनाडा की संसद में एक महिला सांसद ने हिंदुओं के पक्ष में आवाज उठाई है, कुछ और देशों  से भी आवाज उठ रही है किंतु वह नाकाफी है। बांग्लादेश में हिन्दुओं के नरसंहार पर दुनिया भर में मानवाधिकार का हल्ला मचाने वालों  ने चुप्पी  साध ली है।

मर्यादा की पुनर्प्रतिष्ठा की वर्षगांठ

लेखकः  प्रणय विक्रम सिंह
आज समय अपने सौभाग्य पर आह्लादित है। आज… भारत की चेतना एक शिखर पर ठहरकर अपने इतिहास को, अपनी मर्यादा को नमन कर रही है।
यह वही मर्यादा है जिसे वाल्मीकि ने राजा के नहीं, मनुष्य राम के चरित्र में देखा। और जिसे तुलसी ने भक्ति नहीं, लोक-मंगल का आधार कहा।
आज प्रभु श्री रामलला के नूतन विग्रह की प्राण-प्रतिष्ठा की द्वितीय वर्षगांठ है।
यह केवल एक वर्ष का पूरा होना नहीं, यह उस संघर्ष का विराम है, जिसे तीन पीढ़ियों ने *’रामकथा’* की तरह जिया।
श्री राम जन्मभूमि मंदिर में श्रीरामलला का विराजमान होना किसी विजय का घोष नहीं, यह सभ्यता का संतुलन है।यह शोर नहीं, यह शांति है।
हमारी दर्जनों पीढ़ियां जिन्होंने प्रश्न नहीं छोड़े, श्रद्धा छोड़ी नहीं। पूज्य साधु-संत जिन्होंने समय से तेज़ कुछ नहीं चाहा और 140 करोड़ देशवासी, जिन्होंने विश्वास को कभी थकने नहीं दिया।
आज…उन सबकी साधना साकार खड़ी है। आज हर रामभक्त के मन में न कोई आक्रोश है, न कोई प्रतिशोध। आज वहां केवल संतोष है.. गहरा, शांत और स्थायी।
यह क्षण बताता है कि सभ्यताएं
शोर से नहीं, संयम से टिकती हैं।यह क्षण बताता है कि धैर्य इतिहास का सबसे स्थायी शिल्पकार है।
क्योंकि आज राम लौटे नहीं हैं…
आज राम प्रतिष्ठित हुए हैं
हमारी संस्कृति में,
हमारी चेतना में,
हमारे संविधान में,
और हमारे भविष्य में।
जब राम प्रतिष्ठित होते हैं,
तो राष्ट्र स्थिर होता है।
यह मंदिर अतीत का स्मारक नहीं, यह भविष्य की नैतिक दिशा है। यह याद दिलाता है कि भारत अपनी आस्था को कानून से और अपने कानून को करुणा से जोड़ना जानता है।
यह केवल
एक वर्षगांठ नहीं
यह उस भारत का साक्ष्य है
जो प्रतीक्षा करना जानता है,
सत्य पर स्थिर रहना जानता है,
और सभ्यता को
आक्रोश नहीं,
राम देता है।
*सियावर रामचन्द्र की जय🚩*

विजय दिवसःक्या व्यर्थ चला गया 4 हजार सैनिकों का बलिदान

समय है 71 की चूक को सुधार लेने का

सर्वेश कुमार सिंह

हम पिछले 54 साल से विजय दिवस मना रहे हैं। हर साल जब 16 दिसम्बर आता है तो पाकिस्तान पर निर्णायक विजय और बांग्लादेश के उदय का पर्व मनाया जाता है। वर्ष 2022 में जब इस विजय के पचास वर्ष हुए तो भारत और बंगलादेश में बडा उत्सव मनाया गया। लेकिन इस बार का विजय दिवस कछ अलग संदेश और मायने रखता है। यह दिन अब इस बात की समीक्षा और सिंहावलोकन को आमंत्रण देता है कि क्या भारत द्वारा 1971 में लिया गया फैसला और करीब 3843 भारतीय सैनिकों का बलिदान व्यर्थ चला गया है? क्या हम सिर्फ इस खुशफहमी में हैं कि हमने पाकिस्तान के दो टुकडे करके पूर्वी सीमा को सदैव के लिए सुरक्षित कर लिया है?

पांच अगस्त 2024 के बाद जो कुछ बंगलादेश में घट रहा है और वहां की काम चलाऊ सरकार यानि कि सलाहकार समूह जैसे फैसले ले रही है। उससे तो यही लगता है कि हम ठगे गए हैं। एक पडोसी पर उनकी ही इस्लामी सेना के अत्याचारों, हत्याओं, बलात्कारों की घटनाओं से तत्कालीन भारत सरकार का मन आहत हुआ था। एक अनुमान के अनुसार पाकिस्तान की सेना ने बंगलादेश में 30 लाख लोगों को अकराण मार डाला था और 3 लाख महिलाओं के साथ दुष्कर्म की घटनाएं हुई थीं। इस अत्याचार और पापकर्मों की चीत्कार भारत के द्रवित मन ने सुनी थी। तत्कालीन भारतीय नेतृत्व ने पूर्वी पाकिस्तान को अपनी इच्छा शक्ति और प्रबल सैन्य शक्ति के बल पर बंगलादेश में बदल दिया था।

जब ढाका में भारतीय सेना के लेफ्टिनेंट जनरल जगजीत सिंह अरोडा पाकिस्तानी सेना के कमांडर जनरल एएके नियाजी से आत्मसर्पण दस्तावेज पर 16 दिसम्बर को हस्ताक्षर करा रहे थे, तब किसी ने नहीं सोचा होगा कि एक दिन ऐसा भी आएगा कि इसी ढाका में एक बार फिर ऐसी सलाहकार सरकार नोबेल पुरस्कार विजेता मो यूनुस के नेतृत्व में आएगी जिसकी सरपरस्ती में भारतीय सेना की जीत के उपलक्ष्य और बंगलादेश की आजादी के प्रतीक उस प्रमिमा को जो इस समर्पण को दर्शाती थी, बंगलादेश के वही अतिवादी जेहादी तोड देंगे जिनके लिए भारतीय सेना ने बलिदान दिये। भारत की जनता ने एक करोड से अधिक बंगलादेशी शरणार्थियों को अपने यहां रखा और उनकी सभी तरह की मदद की। यह स्टेच्यु ढाका में स्थापित था। शेख हसीना की सरकार के पतन के बाद बंगलादेश में जो कुछ हुआ और अभी हो रहा है। इससे भारतीय जन-मन अत्यधिक आहत है। वहां के अल्पसंख्यकों पर जिस तरह हमले हुए हैं और अभी जारी हैं। उन्हें प्रताणित किया जा रहा है। हिन्दू मन्दिरों को तोडा गया है। इस्कान और काली के मन्दिर तो ढाका और चटगांव में एकता और सेवा के प्रतीक बने थे। इन्हें जला दिया गया। इस्कान ढाका के पूर्व सचिव चिन्मयदास को सिर्फ इस लिए गिरफ्तार कर लिया गया क्योंकि उन्होंने अत्याचारों के खिलाफ आवाज बुलंद की। जो वकील उनकी पैरवी के लिए गए उन्हें हमला करके गंभीर रूप से घायल कर दिया गया।

आज समय है कि इस विषय पर विमर्श शुरु हो कि हम अपने पडोसी की पचास साल की तक हर तरह की मदद करते रहे और उसने हमारी भावनाओं की कतई भी कद्र नहीं की और न ही हमारे राष्ट्रीय हितों को कोई तवज्जो दी। इन्ही पचास सालों में बंगलादेश हूजी जैसे आतंकवादी संगठन का जन्मदाता बन गया। जिसने भारत में कई आतंकवादी घटनाओं को अंजाम दिया है। भारत के पूर्वोत्तर के राज्यों में आतंकवादी भेजने के लिए और उनके प्रशिक्षण के लिए लांचिंग पैड बन गया। अब हालत यह है कि बंगलादेशी सेना को प्रशिक्षण देने के लिए पाकिस्तानी सैन्य अधिकारी पहुंच गए हैं। आईएसआ के अधिकारियों का दल पूरे बंगलादेश विशेष रूप से भारतीय सीमा क्षेत्र का भ्रमण कर रहा है। हमारे शत्रु की शरण स्थली अब बंगलादेश बन गया है। अब इस स्थिति में  भारत की नई भूमिका क्या हो। सबसे पहली प्राथमिकता है कि बंगलादेश के अल्पसंख्यक हिन्दू, सिख, जैन, बौद्ध और इसाई समुदायों की जान मान की रक्षा हो, वह कैसे होगी यह विचार भारत सरकार को करना है।

बगलादेश का उद्भव और भारत की भूमिका पर एक टिप्पणी जो करीब दो साल पहले बलोचिस्तान की निर्वासित सरकार की प्रधानमंत्री डा नायला कादरी ने की थी,उसका उल्लेख यहां समीचीन होगा। भारत भ्रमण पर आयी डा कादरी ने एक स्थानीय चैनल को साक्षात्कार देते समय कहा था कि भारत ने 1971 में बडी गलती की थी। उस समय बंगलादेश भारत के कब्जे में था, लाहौर तक भारतीय सेना पहुंच चुकी थी। ऐसे में अलग देश बनाने की बजाय बंगलादेश का भारत में विलय कर लिया जाना चाहिए था। उनकी इस प्रतिक्रिया को उस समय अतिरेक में कही गयी बात माना गया क्योंकि वे पाकिस्तान के खिलाफ बलूचों के संघर्ष को नेतृत्व प्रदान कर रही हैं। उनकी पाकिस्तान से नाराजगी जग जाहिर है। लेकिन, 5 अगस्त 2024 को जो हुआ और उसके बाद हो रहा है उसे देखते हुए लगता है कि डा नायला कादरी की बात सही थी।

भारत में यह विमर्श पहले से चल रहा है कि 71 में लाहौर और बंगलादेश को मिला लिया जाना चाहिए था। पाकिस्तान के 93 हजार सैनिकों को हमने शिमला समझौते में यूं ही क्यों छोड दिया। वे युद्ध बंदी थे उनपर अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय में युद्ध अपराध का मुकदमा दर्ज होना चाहिए था। या फिर हम उनके बदले कुछ और हासिल करते।

अब भारतीय उपमहाद्वीप में नया खतरा जो सामने है वह यह है कि हमारी सीमाएँ एक बार फिर तनावग्रस्त हैं। हम अब यह भी नहीं कह सकते कि हम पूर्वी सीमा पर निश्चिन्त हैं। लेकिन एक अवसर अभी भी है वह यह कि बंगलादेश की निर्वाचित प्रधानमंत्री शेख हसीना भारत में हैं। वे आज भी तकनीकी रूप से बंगलादेश की प्रधानमंत्री हैं उन्होंने त्यागपत्र नही दिया है। बंगलादेश के राष्ट्रपति कह भी चुके हैं कि उनके पास हसीना कोई त्यागपत्र नहीं है। इसलिए हसीना ही बंगलादेश की संवैधानिक सरकार की प्रमुख हैं। उनसे वार्ता और समझौता करके 71 की चूक को सुधार लेना चाहिए। समझौते को मूर्त देने में भारतीय सेना सक्षम है।

(लेखक परिचयः स्वतंत्र पत्रकार, उत्तर प्रदेश राज्य मुख्यालय लखनऊ)

 

 

October 24, 2025

युग पुरुष के रूप में याद किये जाएंगे कल्याण सिंह

Kalyan Singh कल्याण सिंहअयोध्या में विवादित ढांचे के नीचे रखीं भगवान श्रीराम की मूर्तियों को कोई ताकत हटा नहीं सकती है, तो फिर वहां मस्जिद के ढांचे की क्या आवश्यकता है ? हम इस ढांचे को यहां से हटा देना चाहते हैं। दृढ़ता और संकल्प की शक्ति के साथ यह बात कहने का अदम्य साहस कल्याण सिंह में ही था। वह भी तब जब वे उत्तर प्रदेश जैसे विशाल राज्य के मुख्यमंत्री पद पर विराजमान थे। कल्याण सिंह ने यह बात राजधानी के वरिष्ठ पत्रकार स्व. दिलीप अवस्थी से सितंबर 1991 में कही थी। जो समय देश की जानी मानी पत्रिका के राज्य में विशेष संवाददाता थे। उनके यह संकल्प व्यक्त करने के एक साल बाद ही छह दिसम्बर 1992 को वह विवादित ढांचा वहां से हटा दिया गया था। इसका मतलब साफ है कि कल्याण सिंह ने गर्भगृह पर ही श्रीराम मन्दिर निर्माण के लिए परिकल्पना कर ली थी। सफल राजनेता, सफल मुख्यमंत्री, सफल विधायक, सफल पार्टी कार्यकर्ता, सफल शिक्षक और सफल स्वयंसेवक के रूप में 89 साल की जीवन यात्रा पूरी करने के बाद 21 अगस्त 2021 को अनन्त यात्रा पर जाने वाले कल्याण सिंह को युग पुरुष के रूप में याद किया जाएगा।

व्यक्तित्व में जन्मजात दृढ़ता

कल्याण सिंह जिस व्यक्तित्व का नाम है, उसने कभी पीछे मुडकर नहीं देखा। जो तय कर लिया, उसे निभाया और अंत तक निभाया कभी नफा – नुकसान नहीं सोचा। उनके व्यक्तित्व में एक जन्मजात दृढ़ता थी। जिसने उन्हें सफल प्रशासक तो बनाया ही, सफल राजनीतिज्ञ भी साबित किया। अपनी दृढ़ता और सिद्धान्तों पर अडिगता के चलते ही वे भारतीय जनता पार्टी के केन्द्रीय नेतृत्व से टकरा गए थे। झुके नहीं,पार्टी छोड़ी, बगावत की। लेकिन, हमेशा अपनी आत्मा को भाजपा के भीतर ही पाया। इसी का परिणाम था कि दो बार 1999 और 2009 में पार्टी से अलग होने के बाद पुनः पुनः लौटते रहे। और अंत में 2014 में जब लौटे तो फिर कभी भाजपा से दूर नहीं हुए। पार्टी से दूर होने पर भी उन्होंने हमेशा यही इच्छा व्यक्त की कि इस पार्टी में प्राण बसते हैं, मेरी अंतिम इच्छा है कि भाजपा के झण्डे में लिपटकर ही अंतिम यात्रा पूरी हो।

प्रारम्भिक जीवनः संघ प्रवेश

कल्याण सिंह का प्रारम्भिक जीवन बेहद सामान्य परिवार से प्रारम्भ हुआ। उनका जन्म अलीगढ़ जनपद के अतरौली क्षेत्र में मढौली गांव में पांच जनवरी 1932 को हुआ था। पिता का नाम तेजपाल लोधी और माता का नाम सीता देवी था। वे किसान परिवार में जन्मे थे। उनके पिता छोटे काश्तकार थे। शिक्षा के दौरान ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ गए थे। उन्हें उत्तर प्रदेश के पूर्व क्षेत्र प्रचारक स्व. ओमप्रकाश जी ने स्वयंसेवक बनाया था। ओमप्रकाश जी उस समय अतरौली तहसील में तहसील प्रचारक थे। बाद में उन्हें अतरौली का तहसील कार्यवाह बनाया गया था। वे अंत तक ओमप्रकाश जी को अपना आदर्श मानते रहे। भाजपा से दूरी होने के बाद भी वे ओमप्रकाश जी के प्रति अगाध श्रद्धा का भाव रखते थे। कल्याण सिंह ने अपने सार्वजनिक जीवन की शुरुआत एक शिक्षक के रूप में की थी। वे अतरौली के समीप ही स्थित रायपुर में एक जूनियर हाई स्कूल में अध्यापक रहे।

राजनैतिक यात्राः विधायक से मुख्यमंत्री और राज्यपाल तक

संघ की योजना से उन्हें तत्कालीन जनसंघ में काम के लिए भेजा गया । उन्होंने पहला चुनाव जनसंघ के टिकट पर 1962 में लड़ा, लेकिन वह यह चुनाव हार गए। इसके बाद वह 1967 में फिर अतरौली से जनसंघ के ही टिकट पर चुनाव लड़े । इस बार वह जीत गए। इसके बाद उन्होंने 1969,1974,1977 के चुनाव जीते। लेकिन, वे 1980 का विधान सभा हार गए। उन्हें लोकदल प्रत्याशी अनवार अहमद ने हराया। फिर 1985, 1989,1991,1993 और 1996 में चुनाव जीते। इस प्रकार कल्याण सिंह कुल नौ बार विधायक रहे। दो बार विधान सभा का चुनाव हारे। जबकि दो बार सांसद रहे। एक बार 2004 में बुलन्दशहर से और 2009 में एटा से उन्होंने चुनाव जीता। दोनों चुनाव उन्होंने निर्दलीय किन्तु सपा के समर्थन से जीते थे। भारतीय जनता पार्टी से नाराज चल रहे कल्याण सिंह को 2014 में पुनः पार्टी मे वापस लिया गया और उन्हें राजस्थान का राज्यपाल बनाया गया। इसके साथ ही वे कुछ महीनों के लिए हिमाचल प्रदेश के भी राज्यपाल रहे।

भाजपा से बगावत और केन्द्रीय नेतृत्व से टकराव

कल्याण सिंह ने उत्तर प्रदेश में 1999 में हुए सत्ता परिवर्तन से रुष्ट होकर भाजपा छोड़ दी थी। उन्हें हटाकर रामप्रकाश गुप्ता को मुख्यमंत्री बनाया गया था। किन्तु वह नाराज हो गए और उन्होंने राष्ट्रीय क्रांति पार्टी बना ली थी। इस पार्टी से उन्होंने 2002 के विधान सभा चुनाव में अपने प्रत्याशी खड़े कर दिये। इसका परिणाम हुआ कि भाजपा को इस चुनाव में भारी नुकसान हुआ। माना गया कि कल्याण सिंह के लोध और पिछड़े वोट बैंक के कारण भाजपा लगभग 70 सीटों पर चुनाव हारी। यहीं से भाजपा को कल्याण सिंह की राजनीतिक शक्ति का एहसास हुआ। इसके बाद ही उन्हें वापस लाने के प्रयास होने लगे थे। वे 2004 में वापस लौट भी आए, किन्तु फिर बात बिगड़ गई और 2009 में दोबारा बगावत कर दी। लेकिन, पांच साल में ही फिर वापस लौटे।

मन्दिर आंदोलन ने बनाया हिन्दू हृदय सम्राट

श्रीराम जन्मभूमि मन्दिर आंदोलन के अग्रणी नेता के रूप में कल्याण सिंह को इतिहास याद रखेगा। उन्हें युगपुरुष और हिन्दू हृदय सम्राट की उपाधि मन्दिर के लिए सरकार को न्यौछावर कर देने के बाद ही मिली। ढांचा ढहाये जाने पर उन्होंने निहत्थे कारसेवकों पर गोली चलवाने से इनकार कर दिया था। अफसरों को भी कह दिया था कि एक भी गोली नहीं चलनी चाहिए। छह दिसंबर 1992 को अयोध्या मे विवादित ढांचा ढहाये जाने के बाद उन्होंने अपने पद से त्यागपत्र दे दिया था। उन्होंने अपने मुख्य सचिव को बुलाकर इस्तीफा देने से पहले कहा था कि सारी जिम्मेदारी मेरी है, जहां चाहो हस्ताक्षर करा लो ताकि बाद में किसी अधिकारी पर कोई आंच न आये। विवादित ढांचा ढहाये जाने के मुकदमे में कल्याण सिंह अकेले ऐसे नेता हैं जिन्हें एक दिन की सजा हुई थी।

पार्टी के पिछड़ा वर्ग के सशक्त नेता

भारतीय जनता पार्टी और उसकी पूर्ववर्ती पार्टी जनसंघ को सवर्णों की पार्टी माना जाता था। लेकिन, 1980 के दशक के बाद कल्याण सिंह के नेतृत्व में उत्तर प्रदेश में भाजपा से यह पचहान हटी। भाजपा में पिछड़ों का प्रतिनिधित्व बढा और कल्याण सिंह स्वयं पिछड़े वर्ग के सशक्त नेता के रूप में उभरे। मण्डल आयोग की सिफारिशें लागू होने के बाद जब पिछड़ों की राजनीति का उभार हो रहा था। उस समय देश के प्रमुख पिछड़े नेताओं के मुकाबले कल्याण सिंह का कद हमेशा ऊंचा रहा । उन्होंने भाजपा में पिछड़ों को उनका अधिकार दिलाने के लिए भी नेतृत्व के सामने स्पष्ट रूप से मांगें रखीं और उन्हें पूरा कराया। वे जिस जाति लोध राजपूत से आते थे, उसका मध्य उत्तर प्रदेश और पश्चिम में प्रभाव है। तीन दर्जन से अधिक सीटों पर यह जाति निर्णायक मानी जाती है। कल्याण सिंह के नेतृत्व के कारण ही यह जाति भाजपा से जुड़ी हुई है। पिछड़ों के मुद्दे उठाने में भी वे कभी पीछे नहीं रहे। जहां अन्य पिछडे नेताओं की पहचान मात्र उनकी अपनी जाति तक सीमित रही, वहीं कल्याण सिंह ने सभी पिछड़ों का दिल जीता था।

कठोर प्रशासकः अनुशासनप्रिय

कल्याण सिंह कठोर प्रशासक साबित हुए। पहली बार उन्हें जनता पार्टी के समय रामनरेश यादव की सरकार में स्वास्थ्य मंत्री रहने का अवसर मिला था। स्वास्थ्य मंत्री के रूप में ही उन्होंने कठोर प्रशासक की पहचान बना ली थी। चिकित्सकों के तबादलों में उन्होंने कोई सिफारिश नहीं मानी थी। दशकों से एक ही जगह जमें अनेक चिकित्सकों के तबादले करके उन्होंने कठोर प्रशासन और सुशासन का संदेश दिया। मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने प्रदेश में अपराधियों के खिलाफ अभियान चलाया था। अनेक नामी अपराधी उत्तर प्रदेश छोड़कर चले गए थे। कानून व्यवस्था में सुधार हुआ था। परीक्षाओं में नकल रोकने का कानून उनके समय ही बनाया गया था।
नहीं मानी थी नेतृत्व की सलाह
कल्याण सिंह ने अपने जीवन में कभी झुककर समझौता नहीं किया। यही कारण था कि जब 1999 में वह निर्णायक मोड़ आया कि उन्हें मुख्यमंत्री पद छोड़ने को कहा गया था। उसी समय भारतीय जनता पार्टी के केन्द्रीय नेतृत्व ने उन्हें दिल्ली आने को कहा था। उन्हें केन्द्र सरकार में जगह देने का प्रस्ताव किया गया था। माना जाता है कि उन्हें सीधे केन्द्रीय गृहमंत्री बनाने का प्रस्ताव था। लेकिन, उन्होंने यह प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया और पार्टी छोड़ दी। यदि कल्याण सिंह ने यह प्रस्ताव स्वीकार किया होता तो वे देश में भाजपा चेहरे के रूप में उभरते और केन्द्रीय नेतृत्व करते। लेकिन, उन्होंने मुख्यमंत्री पद से हटाये जाने को अपना अपमान माना था और कोई भी पद लेने से इनकार कर दिया था। हालांकि भाजपा ने सभी कटुताओं को भुलाकर कल्याण सिंह को अंतिम वर्षों में यथोचित सम्मान दिया और उनके परिवार के सदस्यों को राजनीतिक रूप से सशक्त बनाने का काम किया है। उनके बेटे को लोकसभा का प्रत्याशी बनाया गया जबकि उनके पोते को विधायक बनाया और योगी आदित्यनाथ के मंत्रिमण्डल में सबसे कम उम्र के मंत्री के रूप में जगह प्रदान करके परिवार का सम्मान बरकरार रखा है। सम्पूर्ण जीवन राजनीति और सिद्धान्तों को समर्पित करने वाले कल्याण सिंह को शत्-शत् नमन।
( उप्रससे )

« Newer Posts