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Agra News जापानी प्रतिनिधिमंडल का आगरा आगमन सैर सपाटे तक ही रहा सीमित

August 20, 2026

Agra News जापानी प्रतिनिधिमंडल का आगरा आगमन सैर सपाटे तक ही रहा सीमित

–जापान के यामानाशी प्रीफेक्चर के गवर्नर के नेतृत्व में उच्चस्तरीय 240 सदस्यीय जापानी प्रतिनिधिमण्डल ने ताज महल का किया दीदार

–दौरे का मुख्य उद्देश्य उत्तर प्रदेश एवं जापान के मध्य औद्योगिक,आर्थिक सहयोग को सुदृढ़ करना

आगरा। जापान के यामानाशी प्रीफेक्चर के मा.गवर्नर कोटारो नागासाकी, उप-गवर्नर जुनिची इशिदेरा
के नेतृत्व में उच्चस्तरीय 240 सदस्यीय जापानी प्रतिनिधिमण्डल ने ताज महल दीदार किया।

उच्च स्तरीय प्रतिनिधिमंडल के फतेहाबाद रोड स्थित होटल जेपी पैलेस पहुंचने पर उत्तर प्रदेश सरकार की तरफ से प्रदेश के पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री मा.श्री जयवीर सिंह जी ने प्रतिनिधिमंडल की आगवानी की।
महानिदेशक पर्यटन डॉ. वेदपति मिश्र, जिलाधिकारी मनीष बंसल , पुलिस कमिश्नर दीपक कुमार अपर आयुक्त राजेश कुमार ने मा.गवर्नर कोटारो नागासाकी के नेतृत्व में 240 सदस्यीय जापानी प्रतिनिधिमंडल का पुष्पगुच्छ देकर, रोली तिलक से भव्य स्वागत किया,

पर्यटन मंत्री व जिलाधिकारी, पुलिस कमिश्नर ने होटल जेपी पैलेस में दोपहर के भोजन के दौरान यामानाशी प्रीफेक्चर के गवर्नर कोटारो नागासाकी, उप-गवर्नर जुनिची इशिदेरा के नेतृत्व में उच्च स्तरीय जापानी प्रतिनिधिमंडल के सदस्यों से मुलाकात की। तत्पश्चात जापानी प्रतिनिधिमंडल ने ताजमहल का अवलोकन किया,प्रतिनिधिमंडल के स्वागत में मार्ग पर ब्रज के लोकनृत्य तथा सांस्कृतिक प्रस्तुति दी गई।
उक्त प्रतिनिधिमंडल का दौरा उत्तर प्रदेश में निवेश, व्यापार और पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए महत्वपूर्ण है।यह प्रतिनिधिमंडल ‘यूपी-जापान इन्वेस्टमेंट मीट’ और बिजनेस कॉन्क्लेव के सिलसिले में भारत आया है, जापानी उद्योगपतियों और निवेशकों के साथ उत्तर प्रदेश में विनिर्माण, स्वच्छ ऊर्जा , तकनीकी सहयोग और रोजगार के अवसरों के नए द्वार खोलेगा।
मा. गवर्नर महोदय कोटारो नागासाकी ने सपत्नीक ताज महल का दीदार किया, ताजमहल को देख कर वह अभिभूत नजर आए।
ताजमहल अवलोकन के बाद मंत्री ने गवर्नर को ताज का मोमेंटो भेंट किया। तत्पश्चात उच्च स्तरीय लखनऊ के लिए प्रस्थान कर गया।

फसल बीमा में लापरवाही पर होगी कड़ी कार्रवाई, बैंक प्रबंधक होंगे जवाबदेह

मथुरा। प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना के प्रभावी क्रियान्वयन, अनुश्रवण एवं किसानों की समस्याओं के समयबद्ध निस्तारण को लेकर जिलाधिकारी चंद्र प्रकाश सिंह की अध्यक्षता में जिला स्तरीय मॉनिटरिंग समिति की बैठक हुई। जिलाधिकारी ने किसानों को योजना का पारदर्शी एवं प्रभावी लाभ दिलाने के निर्देश दिए।

बैठक में सामने आया कि कुछ मामलों में बैंक द्वारा किसान के खाते से फसल बीमा प्रीमियम काट लिया जाता है, लेकिन बीमा पॉलिसी जनरेट नहीं की जाती अथवा प्रीमियम बीमा कंपनी को हस्तांतरित नहीं किया जाता। ऐसे में फसल क्षति होने पर किसान बीमा लाभ से वंचित रह जाता है। कुछ मामलों में प्रीमियम काटने और पॉलिसी जारी होने के बाद भी क्षतिपूर्ति राशि किसी अन्य व्यक्ति के खाते में भेजे जाने की शिकायतें भी सामने आई हैं।

जिलाधिकारी ने स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों की जांच कराई जाएगी। त्रुटि या लापरवाही पाए जाने पर संबंधित बैंक शाखा प्रबंधक की जवाबदेही तय की जाएगी। उन्होंने कहा कि बैंक की लापरवाही के कारण किसी किसान को योजना के लाभ से वंचित नहीं होने दिया जाएगा। जांच के बाद किसान को हुई वास्तविक वित्तीय क्षति की नियमानुसार वसूली संबंधित बैंक शाखा प्रबंधक एवं जिला स्तरीय कॉर्डिनेटर से कराने की कार्रवाई की जाएगी।

जिलाधिकारी ने खरीफ-2026 में गैर-ऋणी किसानों की बीमा पॉलिसियों का समिति गठित कर शत-प्रतिशत स्थलीय सत्यापन कराने के निर्देश भी दिए। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि वास्तविक किसानों का ही बीमा हुआ हो और योजना में किसी प्रकार की अनियमितता न हो।

उन्होंने बैंक शाखा प्रबंधकों, जिला स्तरीय बैंक समन्वयकों, कृषि विभाग तथा बीमा कंपनी के अधिकारियों को निर्देशित किया कि योजना के क्रियान्वयन में पारदर्शिता, जवाबदेही और किसान हित को सर्वोच्च प्राथमिकता दें। लापरवाही अथवा किसान हितों की अनदेखी पाए जाने पर संबंधित के खिलाफ नियमानुसार कठोर कार्रवाई की जाएगी।

खुदाई के दौरान मिली जैन प्रतिमाएं, मंदिर में किया गया स्थापित 

मैनपुरी। कस्बा भोगांव के मोहल्ला ऊपर टीला स्थित एक प्लॉट पर चल रहे निर्माण कार्य के दौरान खुदाई में दो प्राचीन जैन प्रतिमाएं तथा एक चरण पादुका प्राप्त हुई। खबर फैलते ही पूरे क्षेत्र में कौतूहल और श्रद्धा का माहौल बन गया है। बुधवार को जैन धर्म के तेईसवें तीर्थंकर भगवान पार्श्वनाथ का निर्वाण कल्याणक मोक्ष सप्तमी पर्व भी था। श्रद्धालुओं का कहना है कि इस पावन मौके पर जैन धर्म की प्राचीनता और उसकी गहरी जड़ों का एक अद्भुत और अलौकिक दर्शन हुआ है।
नगर निवासी रघुवीर सलूजा ऊपर टीला स्थित अपने प्लाट पर नवीन घर का निर्माण कार्य करा रहे हैं। नींव की खुदाई के लिए मजदूर गहरे गड्ढे खोद रहे थे, इसी दौरान अचानक औजार किसी कठोर वस्तु से टकराए। जब सावधानी से मिट्टी हटाई गई, तो वहां से पाषाण की दो प्रतिमाएं प्राप्त हुईं । दोनों प्रतिमाए लंगभग 6 से 7 इंच की है। एक प्रतिमा पर तीर्थंकर भगवान अजितनाथ का चिन्ह बना हुआ है जबकि दूसरी प्रतिमा पर चिन्ह मिटा हुआ है। प्रतिमा पर निर्ग्रन्थ दिगम्बर भगवंत भी बने हुए हैं। प्रतिमाओं के साथ एक पाषाण की चरण पादुका भी मिली है, जिस पर भगवान के पवित्र चरण उत्कीर्ण हैं। यह जैन परंपरा में अत्यंत पूजनीय मानी जाती है। जैन समाज ने प्रतिमाओं तथा चरण को श्री पार्श्वनाथ दिगम्बर जैन मंदिर में विराजमान कराया है। स्थानीय समाज के डा. मनोज जैन का दावा है कि  भोगांव जो पहले भूमिग्राम नाम से जाना जाता था जैन धर्म की  प्राचीन नगरी रहा है।  पूर्व में जैन राजा द्वारा स्थापित क़िले में जैन मंदिर भी था जो बाद में मुगल शासन में ध्वस्त कर दिया गया था । देर शाम जैन मंदिर में जिनेन्द्र भक्ति का आयोजन किया गया तथा प्रतिमाओं की अर्चना की गई। इस मौके पर नलिन कुमार जैन, राकेश जैन, डा. मयंक जैन, प्रवीण जैन, कुमोद जैन, मल्लू जैन, वैभव जैन, दिव्यांश जैन, शैंकी जैन, आदि मौजूद रहे।

वंदेमातरम् के राष्ट्रभाव से विमुख कांग्रेस

Sarvesh Kumar Singh Senior Journalist, Lucknow Uttar Pradesh

Sarvesh Kumar Singh
Senior Journalist, Lucknow Uttar Pradesh

Posted on 20.08.2026 Time 06.49 PM Article Vandematram by Sarvesh Kumar Singh Editor UP Web News

-सर्वेश कुमार सिंह-

कांग्रेस ने एक बार फिर यह साबित किया है कि वह राष्ट्रीय भावों और भारत के मन को नहीं समझ पा रही है, या जानबूझकर नासमझी का परिचय दे रही है। ऐसा कांग्रेस द्वारा मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति के तहत किया जा रहा है। लेकिन, काग्रेस यह भूल रही है कि वह ऐसा करके राष्ट्र की मुख्यधारा से बाहर होती चली जा रही है। अनेक राज्यों में राजनीति के हासिये पर पहुंच चुकी कांग्रेस अपनी इसी मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति का परिणाम भुगत रही है।

कांग्रेस ने राष्ट्रभाव की उपेक्षा का एक और परिचय दिया है। गत दिवस नई दिल्ली में आयोजित कांग्रेस की राष्ट्रीय कार्यसमिति में वंदेमातरम् को लेकर जो प्रस्ताव पारित हुआ, वह उसकी राजनीतिक अपरिपक्वता और आत्मघाती कदम का परिचायक है। कांग्रेस ने इस प्रस्ताव में कहा है कि पार्टी द्वारा आयोजित कार्यक्रमों में तथा अन्य सार्वजनिक स्थलों पर वंदेमातरम् का केवल वही अंश गाया जाएगा, जोकि कांग्रेस कार्यसमिति ने कोलकाता (कलकत्ता) अधिवेशन में 28 अक्टूबर 1937 को स्वीकृत किया था। यानि कि, वंदेमातरम् के छह अंतरों में से केवल दो ही गाये जाएंगे। इस बैठक की अध्यक्षता कांग्रेस के अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने की। इसमें सोनिया गांधी, राहुल गांधी समेत कांग्रेस के 88 नेता उपस्थित थे।

इसके पहले कांग्रेस अध्यक्ष खडगे और सोनियां गांधी ने 15 अगस्त को पार्टी कार्यालय में ध्वजारोहण और वंदेमातरम् के गायन के दौरान उस समय असहजता प्रकट की थी, जब पूरा वंदेमातरम् बजाया गया। यहां तक कि सोनिया गांधी ने इसे रोकने के लिए भी कहा। राष्ट्रीय भावों के विरोध का कांग्रेस का पुराना इतिहास रहा है। यह पहला अवसर नहीं है जब कांग्रेस ने वंदेमातरम् के साथ अन्याय किया है। कांग्रेस का इतिहास ही वंदेमातरम् के विरोध का रहा है।

कांग्रेस यूं तो एक पार्टी के नाते अपने फैसले लेने के लिए स्वतंत्र है, लेकिन राष्ट्रीय महत्व के विषयों और कानूनी प्रावधानों के अन्तर्गत उसे वे नियम मानने की भी बाध्यता है जोकि संसद द्वारा बनाये गए हैं और जिन्हें राष्ट्रपति द्वारा स्वीकृत करके अधिसूचित किया गया है। वंदेमातरम् के अनिवार्य गायन, पूरे छह अंतरों को गाने या बजाये जाने के लिए सरकार ने “राष्ट्रीय सम्मान, अपमान निवारण (संशोधन) अधिनियम 2026” पारित कराकर कानूनन वंदेमातरम् के विरोध को अपराध घोषित किया है। इसके अंतर्गत वंदेमातरम् का जानबूझ करअपमान करना दंडनीय अपराध होगा। इसमें पूर्ण वंदेमातरम् का गायन भी शामिल है। यह अध्यादेश 29 जुलाई 2026 को राज्य सभा में और 30 जुलाई 2026 को लोक सभा में पारित हुआ है। इसे राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मू ने 12 अगस्त 2026 को स्वीकृति प्रदान कर दी है। इसके बाद यह कानून बन गया है। इसके पहले केन्द्रीय गृह मंत्रालय 28 जनवरी 2026 को एक विस्तृत आदेश जारी कर वंदेमातरम् का प्रोटोकाल जारी कर चुका है। इसके अनुसार सभी सार्वजनिक स्थानों पर जहां तिरंगा फहराया जाएगा अथवा राष्ट्रपति या राज्यपाल, उपराज्यपाल का कार्यक्रम होगा,उसमें राष्ट्रगीत से पहले पूर्ण वंदेमातरम् गाया जाएगा।

संसद द्वारा यह कानून बन जाने के बाद और गृह मंत्रालय के प्रोटोकाल जारी होने पर भी अगर कांग्रेस ने इसे नहीं मानने का दुस्साहस किया है तो यह आपराधिक और गंभीर मामला है। राष्ट्रीय प्रतीक के अपमान और राष्ट्रभाव की उपेक्षा, कानून की अवमानना की श्रेणी में आता है। ऐसा करके कांग्रेस ने गंभीर संवैधानिक संकट खड़ा किया है। क्योंकि कोई भी पार्टी संसद से ऊपर नहीं हो सकती। उसे संसद द्वारा बनाये गए नियमों और कानूनों को मानने की बाध्यता है। लेकिन, कांग्रेस ने ऐसा किया  है।

वंदेमातरम् पर कांग्रेस ने जो फैसला किया है वह कोई आश्चर्य पैदा नहीं करता, क्योंकि कांग्रेस ने वंदेमातरम् के साथ अन्यायपूर्ण व्यवहार पहली बार नहीं किया है। यह कांग्रेस ही थी जिसने 1937 में वंदेमातरम् को खंडित करके राष्ट्रभाव को गहरी चोट पहुंचायी थी। कांग्रेस के एक अलगाववादी मुस्लिम नेता जो इस पार्टी के अध्यक्ष भी रहे उनके विरोध और मांग के चलते वंदेमातरम् के छह में से चार अंतरे हटा दिये गए थे। एक तरह से वंदेमातरम् की आत्मा पर ही कुठाराघात कर दिया गया था।

वंदेमातरम् और कांग्रेस के विरोध का लम्बा इतिहास है। इसके विरोध की शुरुआत 28 दिसम्बर 1923 से एक जनवरी 1924 तक काकीनाडा (आन्ध्र प्रदेश) में हुए राष्ट्रीय अधिवेशन में हुई। यहां पहली बार पार्टी के अध्यक्ष और अधिवेशन के उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता कर रहे मौलाना मोहम्मद अली जौहर ने वंदेमातरम् का विरोध किया था। इस अधिवेशन में पूर्व के अधिवेशनों की भांति ही वंदेमातरम् का गायन होना था। गायन के लिए प्रसिद्ध गायक, संगीतज्ञ पंडित विष्णु दिंगम्बर पुलस्कर को बुलाया गया था। पंडित जी ने जब गायन शुरु किया तो अध्यक्षता कर रहे मौलाना जौहर ने इसे रोकने का आदेश दिया। लेकिन, पुलस्कर जी वंदेमातरम् का गायन करते रहे। इस पर मौलाना मोहम्मद अली जौहर ने सत्र की अध्यक्षता छोड़ दी और मंच से नीचे उतर कर बाहर चले गए। वे मंच पर तभी लौटे जब वंदेमातरम् पूर्ण हो गया। इस विरोध का कांग्रेस पर गहरा असर हुआ। कांग्रेस ने एक समिति बना  दी। इसी समिति की रिपोर्ट को आधार बनाकर 28 अक्टूबर 1937 को कलकत्ता अधिवेशन में वंदेमातरम् को खंडित करने का फैसला कर दिया गया। कल 19 अगस्त 2026 को कांग्रेस ने उसी प्रस्ताव को फिर से स्वीकार करने का फैसला किया है जोकि कलकत्ता अधिवेशन में पारित हुआ था।

वर्तमान में वंदेमातरम को लेकर देश में एक उत्साहपूर्ण वातावरण है। गत 7 नवम्बर 2025 को वंदेमातरम् की रचना को 150 वर्ष पूर्ण हुए तो देश भर में देशभक्ति का ज्वार उठ गया। वंदेमातरम् एक बार फिर अभियान बन गया। इसे अभियान के रूप में जनमानस में फिर से स्थापित करने का श्रेय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को है। उन्होंने ही 31 अक्टूबर 2025 को केवडिया (गुजरात) में सरदार बल्लभ भाई पटेल की जयंती में वंदेमातरम् को याद किया और बताया कि इसके 150 वर्ष पूर्ण  हो रहे हैं। इसे उत्साह पूर्वक मानाया जाएगा। इसे उन्होंने एक अभियान बना दिया और मिशन मोड में कार्य किया। पहले देश भर में शिक्षण संस्थाओं,पार्टी स्तर पर, संसद, विधानसभाओं में वंदेमाततरम् के 150 वर्ष पर कार्यक्रम आयोजित किये। फिर इसे अखण्ड स्वरूप में स्वीकार करने के लिए सरकार के स्तर पर प्रयास शुरु किये गए। ये प्रयास वर्ष 2026 में सफलता पूर्वक फलीभूत  हो गए।

इसी क्रम को आगे बढाते हुए 15 अगस्त 2026 को इस बार के स्वतंत्रता दिवस समारोह में लाल किले से वंदेमातरम् का पहली बार गायन हुआ। पूर्ण और अखंड वंदेमातरम् का गायन पहली बार राष्ट्रीय स्वीकृति प्रदान करने का प्रतीक बन गया। हालांकि इस बार के स्वतंत्रता दिवस समारोह से कांग्रेस के अध्यक्ष और प्रमुख नेताओं सोनिया गांधी, राहुल गांधी ने दूरी बनाये रखी। शायद वे इसीलिए कार्यक्रम में उपस्थित नहीं हुए क्योंकि यहां वंदेमातरम् के सभी छह अंतरों का गायन होना था और कांग्रेस को यह स्वीकार नहीं है।

वंदेमातरम् का विरोध कांग्रेस को बहुत भारी पड़ेगा। यह राष्ट्रीय मन की अस्मिता का प्रतीक है। इसे यह राष्ट्रीय पार्टी नहीं समझ पा रही है। ये पार्टी और विपक्ष आज तक यह नहीं समझ सका कि पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की पराजय और भाजपा के सत्तारूढ़ होने में वंदेमातरम् एक अहम फैक्टर रहा है। लेकिन, कांग्रेस के नेताओं और रणनीतिकारों ने शायद यह तय किया है कि वे इस प्राचीन पार्टी को नेस्तनाबूद करके ही रहेंगे। शायद ईश्वर कांग्रेस के नेताओं को सद्बुद्धि दे, कि वे राष्ट्रीय आंदोलन से उपजी पार्टी को स्थापना काल के भाव से पुनः जोड़ सकें।

लेखक परिचयः स्वतंत्र पत्रकार, लखनऊ,  20 अगस्त 2026

राष्ट्रभक्ति जगाने का मंत्र है वन्देमातरम्

Vandana Sen Writer

डॉ. वन्दना सेन

‘वन्देमातरम्’ केवल दो शब्दों का उद्घोष नहीं है। यह भारत की आत्मा से निकला वह स्वर है, जिसमें मातृभूमि के प्रति श्रद्धा, समर्पण, गौरव और राष्ट्रभक्ति का भाव एक साथ अभिव्यक्त होता है। जिस भूमि ने हमें जन्म दिया, जिसने हमें अन्न, जल, वायु और जीवन प्रदान किया, उसके प्रति सम्मान प्रकट करना प्रत्येक नागरिक का स्वाभाविक और नैतिक कर्तव्य है। इसलिए ‘वन्देमातरम्’ को किसी राजनीतिक दल, विचारधारा के चश्मे से देखना उसके व्यापक राष्ट्रीय अर्थ को सीमित करना होगा।

भारत की स्वतंत्रता-चेतना के इतिहास में ‘वन्देमातरम्’ का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा है। स्वाधीनता आंदोलन के दौर में इसके उद्घोष ने असंख्य भारतीयों के भीतर राष्ट्रभक्ति की ऐसी लौ प्रज्वलित की, जिसने विदेशी शासन के विरुद्ध संघर्ष को नई ऊर्जा प्रदान की। यह केवल गीत नहीं रहा; यह राष्ट्रीय जागरण का मंत्र बन गया था। इसके उच्चारण मात्र से लोगों के भीतर मातृभूमि के प्रति प्रेम और स्वतंत्रता के लिए संघर्ष का संकल्प जाग उठता था। यही कारण है कि ‘वन्देमातरम्’ भारतीय राष्ट्रीय चेतना के इतिहास में एक अमिट अध्याय के रूप में दर्ज है।

आज भी जब ‘वन्देमातरम्’ का स्वर वातावरण में गूँजता है तो उसके साथ देशभाव का उफान दिखाई देता है। विद्यालयों से लेकर सार्वजनिक समारोहों तक और स्वतंत्रता दिवस से लेकर राष्ट्रीय पर्वों तक, इसका उद्घोष लोगों को अपनी जड़ों और अपनी मातृभूमि से जोड़ता है। यह भाव किसी एक समुदाय, वर्ग या राजनीतिक दल की संपत्ति नहीं हो सकता। भारत की विविधता में एकता की जो विराट भावना है, ‘वन्देमातरम्’ उसी भावना का सशक्त प्रतीक है।

विडंबना यह है कि जिस ‘वन्देमातरम्’ को भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान कांग्रेस ने भी स्वीकार किया और जिसके स्वर ने स्वतंत्रता संघर्ष को ऊर्जा दी, आज उसी के प्रति कांग्रेस के कुछ नेताओं की असहजता दिखाई देती है। प्रश्न स्वाभाविक है कि जो राष्ट्रगीत और राष्ट्रभाव कभी स्वतंत्रता संघर्ष के संकल्प का हिस्सा था, उसे आज राजनीतिक विवाद का विषय क्यों बनाया जा रहा है? यदि किसी राष्ट्रीय प्रतीक के प्रति सम्मान व्यक्त करने में संकोच होने लगे, तो यह केवल राजनीतिक मतभेद का विषय नहीं रह जाता, बल्कि राष्ट्रभाव की व्यापक अवधारणा पर प्रश्न खड़ा करता है।

स्वतंत्रता दिवस जैसे राष्ट्रीय पर्व पर नई दिल्ली स्थित कांग्रेस कार्यालय में ‘वन्देमातरम्’ के प्रसंग को लेकर दिखाई देने वाली असहजता ने भी अनेक प्रश्नों को जन्म दिया। राष्ट्रीय पर्वों का उद्देश्य राजनीतिक प्रतिस्पर्धा को तीखा करना नहीं, बल्कि राष्ट्र की सामूहिक चेतना को मजबूत करना होना चाहिए। ऐसे अवसर पर दलगत सीमाएँ पीछे छूटनी चाहिए और भारत की एकता, अखंडता तथा गौरव सर्वोपरि होना चाहिए।

यहाँ एक और महत्वपूर्ण प्रश्न संविधान के संदर्भ में उठता है। यदि ‘वन्देमातरम्’ के सम्मान या उसके उद्घोष को लेकर कोई विधिक व्यवस्था अस्तित्व में आती है, तो उसका पालन करना प्रत्येक नागरिक और संस्था का संवैधानिक दायित्व होगा। संविधान केवल राजनीतिक सुविधा के अनुसार उद्धृत करने की वस्तु नहीं है। संविधान अधिकारों के साथ-साथ कर्तव्यों की भी स्मृति कराता है। इसलिए जो राजनीतिक शक्तियाँ संविधान की रक्षा का दावा करती हैं, उन्हें संविधान की भावना और उसके अनुशासन का समान रूप से सम्मान करना चाहिए।

वस्तुतः राष्ट्रगीत, राष्ट्रगान, राष्ट्रीय ध्वज और राष्ट्रीय प्रतीक किसी दल की राजनीतिक पूँजी नहीं हैं। वे करोड़ों भारतीयों की सामूहिक भावनाओं के प्रतीक हैं। ‘वन्देमातरम्’ के संदर्भ में भी यही दृष्टि अपनाई जानी चाहिए। इसके साथ किसी प्रकार का राजनीतिक लाभ-हानि का गणित जोड़ना उचित नहीं है। राष्ट्रभक्ति को वोट की राजनीति से जोड़ना स्वयं राष्ट्रभाव को संकीर्ण करना है।

भारत की शक्ति उसकी विविधता में निहित है। यहाँ अनेक भाषाएँ हैं, अनेक पंथ और परम्पराएँ हैं, अनेक जीवन-पद्धतियाँ हैं, फिर भी भारत की पहचान एक है। इस एकता को मजबूत करने वाले प्रतीकों और भावनाओं का सम्मान करना आवश्यक है। ‘वन्देमातरम्’ इसी एकता का भावात्मक सूत्र है। यह हमें स्मरण कराता है कि हमारी पहली पहचान हमारी मातृभूमि से है और उसके सम्मान में व्यक्त किया गया स्वर किसी विभाजन का नहीं, बल्कि जुड़ाव का स्वर है।

आज आवश्यकता इस बात की है कि ‘वन्देमातरम्’ को विवाद का विषय बनाने के बजाय उसके ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और राष्ट्रीय महत्व को समझा जाए। यदि इसके उद्घोष से देशभक्ति का ज्वार पहले उठता था, तो आज भी उठ सकता है। यदि इसके स्वर ने स्वतंत्रता सेनानियों में त्याग और बलिदान की भावना जगाई थी, तो आज यह नई पीढ़ी में राष्ट्र के प्रति जिम्मेदारी और कर्तव्यबोध जागृत कर सकता है।

राष्ट्रभक्ति का अर्थ केवल नारे लगाना नहीं, बल्कि देश के प्रति अपने दायित्वों का निर्वहन करना है। किंतु जब कोई नागरिक अपनी मातृभूमि के सम्मान में ‘वन्देमातरम्’ कहता है, तो उसके उस भाव को संदेह की दृष्टि से देखना भी उचित नहीं। राष्ट्र के प्रति श्रद्धा को राजनीति की संकीर्ण सीमाओं में बाँधना भारत की विशाल सांस्कृतिक चेतना के साथ न्याय नहीं होगा।

‘वन्देमातरम्’ इसलिए किसी राजनीतिक दल का विषय नहीं है। यह भारत की पहचान, मातृभूमि के प्रति श्रद्धा और राष्ट्रीय एकता का भावपूर्ण उद्घोष है। इसके स्वर में इतिहास की स्मृति भी है, स्वतंत्रता का संघर्ष भी, बलिदान की गाथा भी और भविष्य के भारत का संकल्प भी। आवश्यकता केवल इतनी है कि हम इसे राजनीति के विवाद से ऊपर उठाकर राष्ट्रभाव की दृष्टि से देखें। जब करोड़ों कंठ एक स्वर में कहते हैं—‘वन्देमातरम्’—तो उसमें केवल शब्द नहीं होते, बल्कि एक राष्ट्र की आत्मा बोलती है।

लेखिका वरिष्ठ स्तंभकार हैं

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