Web News

www.upwebnews.com

हिन्दी पत्रकारिता: ध्येय यात्रा के गौरवशाली 200 वर्ष

May 29, 2026

हिन्दी पत्रकारिता: ध्येय यात्रा के गौरवशाली 200 वर्ष

Article Posted on 29.05.2026, Friday, by Sarvesh Kumar Singh, Hindi Patrakarita Divas

सर्वेश कुमार सिंह
हिंदी पत्रकारिता यात्रा के 200 वर्ष पूर्ण कर रही है। इस यात्रा में हिंदी पत्रकारिता ने न केवल खुद को नित नए आयाम के रूप में गढ़ा बल्कि दायित्व बोध को भी बगैर थके, बगैर रुके निभाया। भाषा,शैली, व्याकरण और साहित्य को इन 200 सालों में उन्नत किया। हिंदी पत्रकारिता ने स्वातंत्र्य पूर्व काल में ध्येयपूर्ण (मिशनरी) भाव से स्वाधीनता की अलख जगाई। समाज में सुधारवादी आंदोलनों के लिए जनजागरण किया। स्त्री शिक्षा, बाल विवाह जैसे मुद्दों पर राष्ट्रीय नेताओं की अपील को स्वर दिया। स्वाधीन भारत में लोकतंत रक्षक की भूमिका में हिंदी पत्रकारिता सबसे आगे खड़ी हुई।
तीस मई 1826 को जब पंडित जुगल किशोर शुक्ल ने कानपुर से कोलकाता जाकर पहला हिंदी साप्ताहिक समाचार पत्र “उदंत मार्तंड” प्रकाशित किया, तो किसी को नहीं मालूम था कि एक दिन हिंदी पत्रकारिता भारत के जन-जन, गांव-गांव, शहर-कस्बों की आवाज बन जाएगी। सूचना और संवाद का ये माध्यम समाज सुधार से लेकर, जन समस्याओं के निराकरण का माध्यम और लोकतंत्र का प्रहरी बन जाएगा।
हिंदी पत्रकारिता को पुष्पित, पल्लवित करने में अनेक महान संपादकों और साहित्यकारों ने न केवल योगदान किया, बल्कि अपने जीवन को भी इस ध्येय के लिए समर्पित कर दिया। ये सफल विकास यात्रा शून्य से शिखर तक जिन संपादकों की मेधा और अथक परिश्रम से आज यश पा रही है, उनमें पंडित जुगल किशोर शुक्ल,भारतेंदु हरिश्चंद्र, दुर्गा प्रसाद मिश्र,बाबू राव विष्णु राव पराड़कर, हजारी प्रसाद द्विवेदी, माखनलाल चतुर्वेदी, गणेश शंकर विद्यार्थी, मुंशी प्रेमचंद्र, हनुमान प्रसाद पोद्दार, पंडित अटल बिहारी वाजपेयी, विद्यानिवास मिश्र, हीरानंद वात्स्यायन अज्ञेय, धर्मवीर भारती, राजेंद्र अवस्थी,रघुवीर सहाय, राजेंद्र यादव, शिवपूजन सहाय, बनारसी दास चतुर्वेदी,महात्मा गांधी, पंडित मदन मोहन मालवीय, प्रताप नारायण मिश्रा, वचनेश त्रिपाठी का स्मरण समीचीन है।
हिंदी पत्रकारिता के उद्भव में जिन नगरों और महानगरों के प्रबुद्ध समाज, व्यवसायियों और राज घरानों का योगदान अग्रणी है, उनमें वाराणसी सबसे महत्वपूर्ण है। कोलकाता, आगरा, कानपुर, लखनऊ, प्रयागराज, गोरखपुर, जबलपुर, मिर्जापुर , मेरठ, बरेली,मुरादाबाद से भी शुरुआती दौर में कई प्रमुख हिंदी पत्र-पत्रिकाएं प्रकाशित हुई। उत्तर प्रदेश में पहला हिंदी दैनिक हिंदुस्तान प्रतापगढ़ जनपद की रियासत काला कांकर से 1885 में राजा रामपाल सिंह ने प्रकाशित किया था। इसके संपादक पंडित मदन मोहन मालवीय थे।
हिंदी के कुछ समाचारपत्र अल्प अवधि तक प्रकाशित हुए, किंतु ये हिंदी पत्रकारिता की नींव बन गए। इनका उल्लेख किए बिना 200 साल की यात्रा का स्मरण और सिंहावलोकन अधूरा है। ये समाचार पत्र और पत्रिकाएं उदंत मार्तंड के प्रकाशन से शुरू होकर अनवरत जारी है। बनारस अखबार, सरस्वती, सुधाकर, बुद्धि प्रकाश, समाचार सुधा वर्षण, प्रजा हितैषी, कविवचन सुधा, हरिश्चंद्र चंद्रिका,,बाल बोधिनी, आनंद कादम्बिनी,ब्राह्मण, भारत मित्र, हिंदुस्तान, नवभारत, अभ्युदय, प्रताप, कर्मवीर, आज, कल्याण, पाञ्चजन्य, राष्ट्रधर्म, वीर अर्जुन, स्वदेश, भास्कर, दैनिक जागरण, अमर उजाला , हंस, विशाल भारत, धर्मयुग, दिनमान, कादम्बिनी, सारिका, अरुण का हिंदी पत्रकारिता में अतुलनीय योगदान है।
आज हिंदी पत्रकारिता के 200 वर्ष पूर्ण होने पर जब हम उदंत मार्तंड का स्मरण कर रहे हैं। तब हमें पिछले 100 का भी स्मरण स्वाभाविक रूप से होता है। सौ वर्ष पूर्व हिंदी पत्रकारिता से जुड़ी दो घटनाएं और हुई जिन्हें याद करने से गौरव की अनुभूति होती है। वर्ष 1926 में यानी ठीक 100 साल पहले गोरखपुर से धार्मिक, आध्यात्मिक, सांस्कृतिक चेतना को जागृत रखने के लिए “कल्याण” पत्रिका का प्रकाशन शुरू हुआ। हालांकि पहला अंक 1926 में मुंबई से निकला, लेकिन 1927 के बाद से इसका प्रकाशन गोरखपुर से हो रहा है। हिंदी की आध्यात्मिक पत्रकारिता का सर्वोत्कृष्ट उदाहरण कल्याण बना हुआ है। इस पत्रिका के 100 वर्ष में लगभग 90 विशिष्ट अंक तथा अनगिनत विशेषांक प्रकाशित हुए है। इन अंकों ने भारत के आध्यात्मिक, पौराणिक, वैदिक ज्ञान को सहेजने का काम किया है। इसके लिए जयदयाल गोयनका और हनुमान प्रसाद पोद्दार की जितनी प्रशंसा की जाय कम ही है। कल्याण भी इस वर्ष अपनी स्थापना के 100 वर्ष पूर्ण कर रहा है।
इसी के साथ ही 1925 में “हिंदी साहित्य सम्मेलन” के तत्वावधान में “प्रथम संपादक सम्मेलन” वृंदावन (मथुरा) में हुआ था। इसे भी 101 साल पूरे हो रहे है। इस सम्मेलन में हिंदी के मूर्धन्य विद्वान और संपादक बाबू राव विष्णु राव पराड़कर जी का ऐतिहासिक भाषण हुआ। वे इस सम्मेलन के अध्यक्ष थे। उन्होंने 100 साल पहले आज की हिंदी पत्रकारिता की “दशा और दिशा” की भविष्यवाणी की थी। भविष्य के संपादकों के प्रबंधकों के प्रभाव में रहने की आशंका भी व्यक्त की थी। जो आज सच साबित हो रही है। इस संपादक सम्मेलन में पराड़कर जी ने बताया था कि “समाचार पत्र के दो मुख्य धर्म है – “एक तो समाज का चित्र खींचना और दूसरा उसे सद उपदेश देना”। हमारा दूसरा कार्य “लोक-शिक्षण हमारा सच्चा धर्म है”। इसी के द्वारा हम देश की और जनता की सच्ची सेवा कर सकते हैं। “हमें अपने पत्रों में सदा सर्व प्रकार से उच्च आदर्श को स्थान देना चाहिए”
आज की हिंदी पत्रकारिता तकनीकी युग में है। तकनीक के अनेक उपायों से सज्जित है। इससे जो मुख्य परिवर्तन हुआ है, वह दो स्तरीय है। एक प्रकाशन की कागज पर निर्भरता कम हुई है। पत्र-पत्रिकाएं डिजिटल स्वरूप में हमारे सामने है। आसानी से उपलब्ध भी है। पहुंच की गति तीव्र हुई है। हमें अब 24 घंटे इंतजार नहीं करना है, बल्कि इंटरनेट से हिंदी समाचार तत्काल मिल रहे है। ये अच्छी स्थिति है,लेकिन चिंताजनक ये है कि इस डिजिटल युग में पत्रिकाओं का युग समाप्तप्राय: हो गया है।
हमारी हिंदी की 200 साल की पत्रकारिता गौरवशाली रही है। इस गौरव को बनाए रखने और इसमें श्रीवृद्धि करने का दायित्व आज की पीढ़ी पर है। हिंदी पत्रकारिता को शब्दों की दृष्टि से समृद्ध करने, भाषा और व्याकरण की शुद्धता को बनाए रखने की आवश्यकता है। साथ ही हिंदी पत्रकारिता की पूंजी विश्वसनीयता है। दायित्वबोध के साथ तथ्यात्मक और निष्पक्ष पत्रकारिता को अपना धर्म बनाकर हम अगली शताब्दियों को और अधिक गौरवशाली बना सकते है।
लेखक परिचय: सर्वेश कुमार सिंह,स्वतंत्र पत्रकार, लखनऊ,
संपर्क E mail : sarveshksingh61@gmail.com
Mob 9140624166

Sarvesh Kumar Singh Senior Journalist, Lucknow Uttar Pradesh

Sarvesh Kumar Singh
Senior Journalist, Lucknow Uttar Pradesh