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यूजीसी के समता संवर्धन विनियम-2026 से उभरता विरोध

January 28, 2026

यूजीसी के समता संवर्धन विनियम-2026 से उभरता विरोध

UGC Regulations 2026

यूजीसी ने जारी किए नए नियम

Posted on : 28.01.2026, Wednesday Time: 03:26 PM, Writer Source:  Prof. Subhash Thaledi, Dehradun
– प्रो. (डॉ.) सुभाष चंद्र थलेडी
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) द्वारा उच्च शिक्षा संस्थानों में समता के संवर्धन हेतु बनाए गए विनियम-2026 ने देशभर में सामान्य वर्ग के छात्रों और अभिभावकों के बीच एक नई और तीखी बहस को जन्म दे दिया है। 13 जनवरी 2026 को अधिसूचित ये नियम 15 जनवरी से लागू भी कर दिए गए। यूजीसी का दावा है कि इन विनियमों का उद्देश्य विश्वविद्यालय परिसरों में भेदभाव का उन्मूलन कर सभी छात्रों को समान अवसर उपलब्ध कराना है। किंतु इनके लागू होते ही सामान्य श्रेणी के छात्रों में असंतोष खुलकर सामने आने लगा है और कई राज्यों में संगठित विरोध के स्वर भी सुनाई दे रहे हैं। इस पूरे विनियम की वैधानिक पृष्ठभूमि में सुप्रीम कोर्ट की भूमिका महत्वपूर्ण रही है। सितंबर 2025 में न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमल्या बागची की पीठ ने उच्च शिक्षा संस्थानों में जातिगत उत्पीड़न और भेदभाव रोकने के लिए प्रभावी नियम बनाने का निर्देश यूजीसी को दिया था। यह आदेश 2019 में दायर उस जनहित याचिका पर आया था, जिसे रोहित वेमुला और पायल ताडवी की माताओं ने दाखिल किया था। याचिका में 2012 के यूजीसी विनियमों के सख्त अनुपालन और ठोस उपायों की मांग की गई थी। इसी न्यायिक निर्देश के आलोक में यूजीसी ने 2012 के पुराने नियमों को निरस्त कर 2026 के नए समता विनियम लागू किए। इनके औचित्य को राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 से भी जोड़ा गया है, जो समता और समावेशन को शैक्षिक नीति की आधारशिला मानती है। विनियमों की प्रस्तावना में धर्म, जाति, लिंग, जन्मस्थान और दिव्यांगता के आधार पर किसी भी प्रकार के भेदभाव के उन्मूलन की बात कही गई है। उद्देश्य के स्तर पर यह सर्वथा स्वीकार्य और आवश्यक है, किंतु समस्या तब उभरती है जब उद्देश्य और परिभाषाओं को साथ रखकर देखा जाता है।
यूजीसी के इस विनियम में जाति-आधारित भेदभाव की परिभाषा को केवल अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग तक सीमित कर दिया गया है। इससे यह संकेत मिलता है कि यह नियामक ढांचा मुख्यतः इन्हीं वर्गों के संरक्षण पर केंद्रित है। यही बिंदु सामान्य श्रेणी के छात्रों में असुरक्षा और भय की भावना को जन्म देता है। आलोचकों का तर्क है कि अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 पहले से ही लागू है। ऐसे में एक अतिरिक्त विनियम, जिसमें झूठी या दुर्भावनापूर्ण शिकायतों के लिए कोई स्पष्ट दंडात्मक प्रावधान नहीं है, एकतरफा व्यवस्था का रूप ले सकता है। सामान्य वर्ग के छात्रों का कहना है कि इससे वे स्वतः ही संदेह के दायरे में आ जाते हैं। मेरठ में मीडिया शिक्षा प्राप्त कर रहे विद्यार्थी नितेश तिवारी और टीना सोम का मानना है कि नई पीढ़ी में जातिगत भावनाएं पहले से ही कमजोर पड़ चुकी हैं, लेकिन ऐसे विनियम नई पीढ़ी को फिर से जातिवादी ढांचे में बाँध सकते हैं। इन विनियमों के तहत प्रत्येक उच्च शिक्षा संस्थान में समान अवसर केंद्र (ईओसी) और समता समिति का गठन अनिवार्य किया गया है। समितियों में अनुसूचित जाति, जनजाति, ओबीसी, दिव्यांग और महिलाओं का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया गया है, किंतु सामान्य श्रेणी के प्रतिनिधित्व को अनिवार्य नहीं बनाया गया। यही वह बिंदु है जिस पर आपत्ति सबसे अधिक मुखर है। सामान्य वर्ग के छात्रों का सवाल है कि जब निर्णय-निर्माण की प्रक्रिया में उनकी भागीदारी सुनिश्चित नहीं है, तो निष्पक्षता की गारंटी कैसे दी जा सकती है। विनियमों में सचल समता स्क्वॉड और 24×7 समता हेल्पलाइन की व्यवस्था भी की गई है। किंतु सामान्य श्रेणी के छात्रों के बीच इसे लेकर भी गहरी चिंता है। गोपनीय शिकायत और त्वरित कार्रवाई के प्रावधान उन्हें सुरक्षा से अधिक भय का वातावरण पैदा करने वाले प्रतीत होते हैं। मात्र एक आरोप से किसी छात्र या शिक्षक की शैक्षणिक और सामाजिक छवि को गंभीर क्षति पहुँच सकती है, भले ही बाद में आरोप निराधार सिद्ध हो जाए। झूठी शिकायतों से निपटने की स्पष्ट व्यवस्था का अभाव इस चिंता को और गहरा करता है।
इस विनियम को लेकर सामान्य वर्ग के छात्रों की आपत्ति मूलतः ‘समता’ की व्याख्या और उसके व्यावहारिक प्रभाव को लेकर है। उनका सवाल है कि ये विनियम वास्तव में सभी के लिए बराबरी सुनिश्चित नहीं करते हैं जिससे शैक्षिक संस्थानों में नए प्रकार के असंतुलन हो जायेगा। सामान्य वर्ग के छात्रों को आशंका है कि भविष्य में शैक्षणिक मूल्यांकन, छात्रावास आवंटन और अनुशासनात्मक कार्रवाइयों जैसे मामलों को भी जातिगत दृष्टि से देखा जाएगा। इससे शिक्षक-छात्र संबंधों में अविश्वास बढ़ सकता है और विश्वविद्यालयों का शैक्षणिक वातावरण प्रभावित हो सकता है।
कुछ शिक्षकों की चिंता शैक्षणिक गुणवत्ता और अकादमिक स्वतंत्रता को लेकर भी है। उनका मानना है कि विश्वविद्यालयों का मूल उद्देश्य ज्ञान, शोध और आलोचनात्मक चिंतन का विकास है। यदि प्रत्येक निर्णय पर निगरानी और दंड का दबाव रहेगा, तो संस्थागत स्वायत्तता प्रभावित होगी। इन नियमों का पालन न करने वाले शैक्षिक संस्थानों की डिग्री कार्यक्रम रोकने या मान्यता समाप्त करने जैसे प्रावधानों को वे प्रशासनिक नियंत्रण के विस्तार के रूप में देखते हैं। वैसे भी संकाय सदस्य पहले से ही अध्यापन-अध्ययन के अतिरिक्त अनेक समितियों के दायित्वों से बोझिल हैं।
यह भी चिंता का विषय है कि आजादी के 78 सालों के बाद भी इस प्रकार के जातिवादी चयनित विनियम बनाने की जरूरत बन रही है। इससे साफ जाहिर होता है कि इन 78 सालों में देश का इस दिशा में कोई विकास नहीं हुआ है। दूसरी ओर हम 2047 तक विकसित भारत का सपना देख रहे हैं। दरअसल यह विनियम शैक्षिक संस्थानों में सभी वर्ग के लिए बनाये जाते तो इसका स्वागत योग्य था। शैक्षिक संस्थानों में आज छात्रों के बीच सबसे अधिक भेदभाव क्षेत्रवाद को लेकर सामने आता है। जातिवादी सोच शैक्षिक संस्थानों से दूर हो रही है लेकिन इस प्रकार के नियमों से जातिवादी भावनाएं प्रबल होना स्वाभाविक है।
कानून विशेषज्ञों का भी कहना है कि यह विनियम ‘चयनित संरक्षण’ की अवधारणा को बढ़ावा देता है। एससी/एसटी कानूनों के दुरुपयोग की बहुत सारी शिकायतें पहले से ही न्यायालयों के सामने आती रही हैं। ऐसे में सामान्य वर्ग के छात्र अपने भविष्य और करियर को लेकर सशंकित हैं। उनका यह भी तर्क है कि यह विनियम संविधान में निहित समानता के अधिकार- अनुच्छेद 14 और 16- की भावना के प्रतिकूल है। इन्हीं आधारों पर कुछ कानूनविदों ने इस विनियम को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती भी दी है। उल्लेखनीय है कि 2012 के यूजीसी समता विनियमों में अन्य पिछड़ा वर्ग शामिल नहीं था, जिसे 2026 में जोड़ा गया है। इससे भी विरोध के स्वर और प्रखर हुए हैं। साथ ही, विनियमों के उल्लंघन पर संस्थानों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई का प्रावधान चिंता को और बढ़ाता है।
सोशल मीडिया पर इन नियमों को लेकर तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं और इससे जुड़े हैशटैग ट्रेंड कर रहे हैं। उत्तर प्रदेश में बरेली के एक वरिष्ठ पीसीएस अधिकारी अलंकार अग्निहोत्री द्वारा विरोधस्वरूप इस्तीफे की खबर ने बहस को और तेज कर दिया है। बढ़ते विरोध के बीच केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने कहा है कि इन विनियमों से किसी के साथ भेदभाव नहीं होने दिया जाएगा। किंतु जब नियम पहले ही लागू हो चुके हों, तो मौखिक आश्वासन पर्याप्त नहीं माने जा सकते।
 कुल मिलाकर, यूजीसी के समता विनियम-2026 उच्च शिक्षा के भविष्य को गहराई से प्रभावित करने वाले हैं। यदि इन्हें केवल कानूनी सख्ती के साथ लागू किया गया, तो असंतोष और बढ़ सकता है। समावेशन तभी टिकाऊ होगा, जब विनियम वास्तव में सभी के लिए संतुलित और न्यायपूर्ण हों। अब असली परीक्षा नीति-निर्माताओं की है कि क्या वे संतुलन की दिशा में कदम उठाएंगे या यह बहस और अधिक टकराव की ओर बढ़ेगी?
Prof. (Dr) Subhash Thaledi

डा. सुभाष थलेड़ी

(लेखक सामयिक विषयों के स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)
#UGCRules

January 27, 2026

अब हिन्दी को बांटने का षडयन्त्र

  विजय कुमार 

सितम्बर हिन्दी के वार्षिक श्राध्द का महीना है। हर संस्था और संस्थान इस महीने में हिन्दी दिवस, सप्ताह या पखवाड़ा मनाते हैं और इसके लिए मिले बजट को खा पी डालते हैं। इस मौसम में कवियों, लेखकों व साहित्यकारों को मंच मिलते हैं और कुछ को लिफाफे भी। इसलिए सब इस दिन की प्रतीक्षा करते हैं और अपने हिस्से का कर्मकांड पूरा कर फिर साल भर के लिए सो जाते हैं।
    पर हिन्दी दिवस (14 सितम्बर) के कर्मकांड के साथ ही कुछ विषयों पर चिंतन भी आवश्यक है। देश में प्राय: भाषा और बोली को लेकर बहस चलती रहती है। कुछ विद्वानों का मत है कि भोजपुरी, बुंदेलखंडी, मैथिली, बज्जिका, मगही, अंगिका, संथाली, अवधी, ब्रज, गढ़वाली, कुमाऊंनी, हिमाचली, डोगरी, हरियाणवी, उर्दू, मारवाड़ी, राजस्थानी, मेवाती, मालवी, छत्ताीसगढ़ी आदि हिन्दी से अलग भाषाएं हैं। इसलिए इन्हें भी भारतीय संविधान में स्थान मिलना चाहिए। इसके लिए वे तरह-तरह के तर्क और कुतर्क देते हैं। भाषा का एक सीधा सा विज्ञान है। बिना अलग व्याकरण के किसी भाषा का अस्तित्व नहीं माना जा सकता। उदाहरण के लिए ‘मैं जा रहा हूं’ का उपरिलिखित बोलियों में अनुवाद करें। एकदम ध्यान में आएगा कि उच्चारण भेद को यदि छोड़ दें, तो प्राय: इसका अनुवाद असंभव है। दूसरी ओर अंग्रेजी में इसका अनुवाद करें, तो प् ंउ हवपदहण् तुरन्त ध्यान में आता है। यही स्थिति मराठी, गुजराती, बंगला, कन्नड़ आदि की है। इसलिए अनुवाद की कसौटी पर किसी भी भाषा और बोली को आसानी से कसा जा सकता है।
    लेकिन इसके बाद भी अनेक विद्वान बोलियों को भाषा बताने और बनाने पर तुले हैं। कृपया वे बताएं कि तुलसीकृत श्रीरामचरितमानस और सूरदास की रचनाओं को को हिन्दी की मानेंगे या नहीं ? यदि इन्हें हिन्दी की बजाय अवधी और ब्रज की मान लें, तो फिर हिन्दी में बचेगा क्या ? ऐसे ही हजारों नये-पुराने भक्त कवियों, लेखकों और साहित्यकारों की रचनाएं हैं। यह सब एक षडयंत्र के अन्तर्गत हो रहा है, जिसे समझना आवश्यक है।यह षडयंत्र भारत में अंग्रेजों द्वारा शुरू किया गया। इसे स्वतंत्रता के बाद कांग्रेसी सरकारों ने पुष्ट किया और अब समाचार एवं साहित्य जगत में जड़ जमाए वामपंथी इसे बढ़ा रहे हैं। अंग्रेजों ने यह समझ लिया था कि भारत को पराधीन बनाये रखने के लिए यहां के हिन्दू समाज की आंतरिक एकता को बल प्रदान करने वाले हर प्रतीक को नष्ट करना होगा। अत: उन्होंने हिन्दू समाज में बाहर से दिखाई देने वाली भाषा, बोली, परम्परा, पूजा-पध्दति, रहन-सहन, खानपान आदि भिन्नताओं को उभारा। फिर इसके आधार पर उन्होंने हिन्दुओं को अनेक वर्गों में बांट दिया।
   इस काम में उनकी चौथी सेना अर्थात चर्च ने भरपूर सहयोग दिया। उन्होंने सेवा कार्यों के नाम पर जो विद्यालय खोले, उसमें तथा अन्य अंग्रेजी विद्यालयों में ऐसे लोग निर्मित हुए, जो लार्ड मेकाले के शब्दों में ‘तन से हिन्दू पर मन से अंग्रेज’ थे। इन्होंने सर्वप्रथम भारत के हिन्दू और मुसलमानों को बांटा। 1857 के स्वाधीनता संग्राम में दोनों ने मिलकर संघर्ष किया था। इसलिए इनके बीच गोहत्या से लेकर श्रीरामजन्मभूमि जैसे इतने विवाद उत्पन्न किये कि उसके कारण 1947 में देश का विभाजन हो गया। इस प्रकार उनका पहला षडयन्त्र (हिन्दुस्थान का बंटवारा) सफल हुआ।1947 में अंग्रेज तो चले गये; पर वे नेहरू के रूप में अपनी औलाद यहां छोड़ गये। नेहरू स्वयं को गर्व से अंतिम ब्रिटिश शासक कहते भी थे। उन्होंने इस षडयन्त्र को आगे बढ़ाते हुए हिन्दुओं को ही बांट दिया। हिन्दुओं के हजारों मत, सम्प्रदाय, पंथ आदि को कहा गया कि यदि वे स्वयं को अलग घोषित करेंगे, तो उन्हें अल्पसंख्यक होने का लाभ मिलेगा। इस भ्रम में हिन्दू समाज की खड्ग भुजा कहलाने वाले खालसा सिख और फिर जैन और बौध्द मत के लोग भी फंस गये। यह प्रक्रिया अंग्रेज ही शुरू कर गये थे। हिन्दू व सिखों को बांटने के लिए मि0 मैकालिफ सिंह और उत्तार-दक्षिण के बीच भेद पैदा करने में मि0 किलमैन और मि0 डेविडसन की भूमिका इतिहास में दर्ज है। ये तीनों आई.सी.एस अधिकारी थे।
  इसके बाद उन्होेंने वनवासियों को अलग किया। उन्हें समझाया कि तुम वायु, आकाश, सूर्य, चंद्रमा, सांप, पेड़, नदी .. अर्थात प्रकृति को पूजते हो, जबकि हिन्दू मूर्तिपूजक है। इसलिए तुम्हारा धर्म हिन्दू नहीं है। भोले वनवासी इस चक्कर में आ गये। फिर हिन्दू समाज के उस वीर वर्ग को फुसलाया, जिसे पराजित होने तथा मुसलमान न बनने के कारण कुछ निकृष्ट काम करने को बाध्य किया गया था। या जो परम्परागत रूप से श्रम आधारित काम करते थे। उन्हें अनुसूचित जाति कहा गया। इसी प्रकार क्षत्रियों के एक बड़े वर्ग को अन्य पिछड़ा वर्ग (ओ.बी.सी) नाम दिया गया। इस प्रकार हिन्दू समाज कितने टुकड़ों में बंट सकता है, इस प्रयास में मेकाले से लेकर नेहरू और विश्वनाथ प्रताप सिंह से लेकर वामपंथी बुध्दिजीवी तक लगे हैं। हिन्दुस्थान और हिन्दुओं को बांटने के बाद अब उनकी दृष्टि हिन्दी पर है। व्यापक अर्थ में संस्कृत मां के गर्भ से जन्मी और भारत में कहीं भी विकसित हुई हर भाषा हिन्दी ही है। ऐसी हर भाषा राष्ट्रभाषा है, चाहे उसका नाम तमिल, तेलुगू, पंजाबी या मराठी कुछ भी हो। यद्यपि रूढ़ अर्थ में इसका अर्थ उत्तार भारत में बोली और पूरे देश में समझी जाने वाली भाषा है। इसलिए राष्ट्रभाषा के साथ ही यह सम्पर्क भाषा भी है। जैसे गरम रोटी को एक बार में ही खाना संभव नहीं है। इसलिए उसके कई टुकड़े किये जाते हैं, फिर उसे ठंडाकर धीरे-धीरे खाते हैं। इसी तरह अब बोलियों को भाषा घोषित कर हिन्दी को तोड़ने का षडयन्त्र चल रहा है।
  अंग्रेजों के मानसपुत्रों और देशद्रोही वामपंथियों के उद्देश्य तो स्पष्ट हैं; पर दुर्भाग्य से हिन्दी के अनेक साहित्यकार भी इस षडयन्त्र के मोहरे बन रहे हैं। उनका लालच केवल इतना है कि यदि इन बोलियों को भाषा मान लिया गया, तो फिर इनके अलग संस्थान बनेंगे। इससे सत्ताा के निकटस्थ कुछ वरिष्ठ साहित्यकारों को महत्वपूर्ण कुर्सियां, लालबत्ताी वाली गाड़ी, वेतन, भत्तो आदि मिलेंगे। कुछ लेखकों को पुरस्कार और मान-सम्मान मिल जाएंगे, कुछ को अपनी पुस्तकों के प्रकाशन के लिए शासकीय सहायता; पर वे यह भूलते हैं कि आज तो उन्हें हिन्दी का साहित्यकार मान कर पूरे देश में सम्मान मिलता है; पर तब वे कुछ जिलों में बोली जाने वाली, निजी व्याकरण्ा से रहित एक बोली (या भाषा) के साहित्यकार रह जाएंगे। साहित्य अकादमी और दिल्ली में जमे उसके पुरोधा भी इस विवाद को बढ़ाने में कम दोषी नहीं हैं।भाषा और बोली के इस विवाद से अनेक राजनेता भी लाभ उठाना चाहते हैं। उन्हें लगता है कि भारत में अनेक राज्यों का निर्माण भाषाई आधार पर हुआ है। यदि आठ-दस जिलों में बोली जाने वाली हमारी बोली को भाषा मान लिया गया, तो इस आधार पर अलग राज्य की मांग और हिंसक आंदोलन होंगे। आजकल गठबंधन राजनीति और दुर्बल केन्द्रीय सरकारों का युग है। ऐसे में हो सकता है कभी केन्द्र सरकार ऐसे संकट में फंस जाए कि उसे अलग राज्य की मांग माननी पडे। यदि ऐसा हो गया, तो फिर अलग सरकार, मंत्री, लालबत्ताी और न जाने क्या-क्या ? एक बार मंत्री बने तो फिर सात पीढ़ियों का प्रबंध करने में कोई देर नहीं लगती।
   बोलियों को भाषा बनाने के षडयन्त्र में कुछ लोग तात्कालिक स्वार्थ के लिए सक्रिय हैं, जबकि राष्ट्रविरोधी हिन्दुस्थान और हिन्दू के बाद अब हिन्दी को टुकड़े-टुकड़े करना चाहते हैं, जिससे उसे ठंडा कर पूरी तरह खाया जा सके। विश्व की कोई समृध्द भाषा ऐसी नहीं है, जिसमें सैकड़ों उपभाषाएं, बोलियां या उपबोलियां न हों। हिन्दी के साथ हो रहे इस षडयन्त्र को देखकर अन्य भारतीय भाषाओं के विद्वानों को खुलकर इसका विरोध करना चाहिए। यदि आज वे चुप रहे, तो हिन्दी की समाप्ति के बाद फिर उन्हीं की बारी है। देश में मुसलमान और अंग्रेजों के आने पर हमारे राजाओं ने यही तो किया था। जब उनके पड़ोसी राज्य को हड़पा गया, तो वे यह सोचकर चुप रहे कि इससे उन्हें क्या फर्क पड़ता है; पर जब उनकी गर्दन दबोची गयी, तो वे बस टुकुर-टुकुर ताकते ही रह गये।
  हिन्दी संस्थानों के मुखियाओं को भी अपना हृदय विशाल करना होगा। इनके द्वारा प्रदत्ता पुरस्कारों की सूची देखकर एकदम ध्यान में आता है कि अधिकांश पुरस्कार राजधानी या दो चार बड़े शहरों के कुछ खास साहित्यकारों में बंट जाते हैं। जिस दल की प्रदेश में सत्ताा हो, उससे सम्बन्धित साहित्यकार चयन समिति में होते हैं और वे अपने निकटस्थ लेखकों को सम्मानित कर देते हैं। इससे पुरस्कारों की गरिमा तो गिर ही रही है, साहित्य में राजनीति भी प्रवेश कर रही है। जो लेखक इस उठापटक से दूर रहते हैं, उनके मन में असंतोष का जन्म होता है, जो कभी-कभी बोलियों की अस्मिता के नाम पर भी प्रकट हो उठता है। इसलिए भाषा संस्थानों को राजनीति से पूरी तरह मुक्त रखकर प्रमुख बोलियों के साहित्य के लिए भी अच्छी राशि वाले निजी व शासकीय पुरस्कार स्थापित होने आवश्यक हैं।भाषा और बोली में चोली-दामन का साथ है। भारत जैसे विविधता वाले देश में ‘तीन कोस पे पानी और चार कोस पे बानी’ बदलने की बात हमारे पूर्वजों ने ठीक ही कही है। जैसे जल से कमल और कमल से जल की शोभा होती है, इसी प्रकार हर बोली अपनी मूल भाषा के सौंदर्य में अभिवृध्दि ही करती है। बोली रूपी जड़ों से कटकर कोई भाषा जीवित नहीं रह सकती। दुर्भाग्य से हिन्दी को उसकी जड़ों से ही काटने का प्रयास हो रहा है। इस षडयन्त्र को समझना और हर स्तर पर उसका विरोध आवश्यक है। बिल्लियों के झगड़े में बंदर द्वारा लाभ उठाने की कहानी प्रसिध्द है। भाषा और बोली के इस विवाद में ऐसा ही लाभ अंग्रेजी उठा रही है।
VIJAY KUMAR, WRITER

विजय कुमार, लेखक, पत्रकार

Vijai Kumar

Writer, Columnist & Auther,

विजय कुमार, संकटमोचन, रामकृष्णपुरम् – 6, नई दिल्ली – 22
e-mail: vijai_juneja@yahoo.com

January 26, 2026

श्रद्धांजलि: मार्क टली सर.. आप बहुत याद आएंगे…..

Mark Tuli, BBC Correspondent India

बीबीसी संवाददाता मार्क टुली (फाइल फोटो, वरिष्ठ पत्रकार रतिभान त्रिपाठी के साथ)

रतिभान त्रिपाठी, वरिष्ठ पत्रकार, राज्य मुख्यालय लखनऊ की फेसबुक वाल से साभार

Ratibhan Tripathi Senior Journalist

पत्रकारिता जगत में दैदीप्यमान नक्षत्र सरीखे पत्रकार और लेखक सर विलियम मार्क टली का रविवार को निधन हो गया। 90 वर्ष के मार्क टली भारत में बीबीसी के लिए काम करने वाले सबसे चर्चित पत्रकार रहे हैं। बीबीसी के लिए यूं तो वह अंग्रेजी में रिपोर्टिंग करते थे लेकिन उनका हिंदी ज्ञान ग़ज़ब का था। उनकी और मेरी पहली मुलाकात स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, जाने-माने पत्रकार व लेखक और पंडित नेहरू व इंदिरा गांधी के करीब रहे पीडी टंडन के प्रयागराज स्थित आवास में हुई थी। संभवतः वह किसी फ्रांसीसी फिल्म निर्माता के साथ टंडन जी से मिलने आए थे। फिल्म निर्माता फिरोज गांधी पर कोई डाॅक्यूमेंट्री बनाने की तैयारी में थे। टंडन जी ने उसी वक्त मुझे भी अपने घर बुलाया था। तब मैं दैनिक जागरण में रिपोर्टिंग करता था। उन्होंने ही मार्क टली से मेरा परिचय कराया था।
अंग्रेज से अंग्रेजी भाषा में बोलने की अपेक्षा की जाती है लेकिन मार्क ने मुझसे हिंदी में बात की, अच्छी हिंदी में बात की। उनके बोल-चाल से लग ही नहीं रहा था कि वह अंग्रेज हैं। उनका उच्चारण विशुद्ध भारतीय था। उनका अंदाज देखकर मुझे बहुत सुखद अनुभूति हुई थी। वह तन से तो अंग्रेज थे लेकिन मन से भारतीय ही थे। ईसाई होते हुए भी वह एक हिंदू की तरह दाहिने हाथ में कलावा बांधते थे।
बातचीत में मार्क ने मुझे अपने जीवन की बहुत सारी बातें बताई थीं और अपना विजिटिंग कार्ड दिया था। मेरा नंबर भी लिया था। बाद में जब वह फिर से प्रयागराज आए तो मुझे फोन किया और जिस होटल में ठहरे थे, वहीं बुलाया। वह किसी रिपोर्टिंग के सिलसिले में ही आए थे। हम लोगों ने घंटों बातचीत की, चाय पी। उसी समय उन्होंने अपने साथ अयोध्या में हुई घटना का जिक्र करते हुए बताया था कि कारसेवकों ने उन्हें किस तरह बंधक बनाया था। फिर प्रशासन ने उन्हें कैसे मुक्त कराया था। पत्रकारिता के लिए उन्हें पहले पद्मश्री और फिर पद्मभूषण सम्मान से भी नवाजा जा चुका है। उन्होंने भारतीय राजनीति समेत अनेक विषयों पर कई महत्वपूर्ण किताबें भी लिखी हैं।
मार्क टली को भारत और भारतीय परंपराओं का अच्छा ज्ञान था। उन्हें भारतीय परंपराओं से लगाव भी कम नहीं था। 1935 में कलकत्ता में जन्मे मार्क टली ने मुलाकात के दौरान बातचीत में मुझसे कहा था कि रतिभान जी, मैं हर हाल में भारत में रहना चाहता हूं। उनकी यह चाहत पूरी भी हुई। आज जब मार्क टली नहीं रहे तो उनकी यादों की बरात सी आ गई। उनके सान्निध्य में बिताए पल, उनकी बातचीत और हंसता मुस्कुराता चेहरा याद आ रहा है। अलविदा मार्क टली सर…आप बहुत याद आएंगे। आपकी पत्रकारिता और भारत के लिए प्रेम सदा याद किया जाएगा।

January 25, 2026

गणतंत्र के 77 वर्ष: उपलब्धियाँ, चुनौतियाँ और भविष्य का संकल्प

 

– डॉ. सत्यवान सौरभ
Satywan Saurabh, Writer

सत्यवान सौरभ, लेखक, स्वतंत्र पत्रकार

भारत का गणतंत्र आज 77 वर्ष का हो चुका है। 26 जनवरी 1950 को लागू हुए संविधान ने एक नई भारत की नींव रखी, जो स्वतंत्रता संग्राम के बलिदानों से प्रेरित थी। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद से हमने अनेक क्षेत्रों में प्रगति की—साहित्य, खेल, कृषि, विज्ञान-प्रौद्योगिकी से लेकर आर्थिक-सैन्य क्षमता तक। विविध संस्कृति को मजबूत करते हुए राष्ट्र ने वैश्विक पटल पर अपनी पहचान बनाई। चंद्रयान मिशनों से अंतरिक्ष विज्ञान में अग्रणी बने, यूपीआई जैसी डिजिटल क्रांति ने भुगतान व्यवस्था बदल दी, जबकि ओलंपिक-एशियाड में पदकों की बौछार ने खेलक्षेत्र में नई ऊंचाइयां छुईं। आज विश्व भारत को चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के रूप में देखता है, जहां सात से आठ प्रतिशत की विकास दर ने गरीबी उन्मूलन में योगदान दिया। लेकिन यह यात्रा सहज नहीं रही। आंतरिक चुनौतियां, सीमापार खतरे और सामाजिक विषमताएं बनी रहीं। गणतंत्र दिवस पर आत्मचिंतन आवश्यक है: हमने क्या पाया, क्या खोया और भविष्य के लिए क्या संकल्प लें?
भारत की पहली और सबसे बड़ी चुनौती थी—विविधता में एकता। महाद्वीप के आकार का यह देश सौ तीस करोड़ से अधिक लोगों, सैकड़ों भाषाओं-बोलियों, विविध धर्मों-संस्कृतियों का मेल था। स्वतंत्रता के समय आशंका थी कि यह एकजुट नहीं रहेगा। विभाजन की त्रासदी ने आशंकाओं को बल दिया, लाखों जानें गईं, लेकिन संविधान ने संघीय ढांचे से एकता सुनिश्चित की। अनुच्छेद एक ने ‘भारत एक अखंड राज्य’ घोषित किया। भाषाई राज्यों का पुनर्गठन, एकीकृत न्यायपालिका और संवैधानिक संस्थाओं ने क्षेत्रीय आकांक्षाओं को मुख्यधारा से जोड़ा। नक्सलवाद, अलगाववाद जैसी चुनौतियों के बावजूद हमने एकता बनाए रखी। पिछले 25 वर्षों में जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाना, पूर्वोत्तर में शांति प्रक्रियाएं इसका प्रमाण हैं। आज ‘एक देश, एक राशन’ जैसी योजनाएं विविधता को शक्ति बना रही हैं। यह उपलब्धि कम नहीं—विश्व के अधिकांश बहुलवादी देश टूट चुके, लेकिन भारत अटल खड़ा है।
दूसरी चुनौती थी—लोकतंत्र को जीवंत बनाना। संविधान ने वयस्क मताधिकार, मौलिक अधिकार, धर्मनिरपेक्षता प्रदान की। संसदीय प्रणाली अपनाई, जो ब्रिटिश मॉडल से प्रेरित किंतु भारतीय आवश्यकताओं के अनुरूप। नेहरू युग से चली आ रही परंपरा में अठारह लोकसभा चुनाव शांतिपूर्ण हुए। न्यायपालिका ने जनहित याचिका के माध्यम से गरीबों के अधिकार स्थापित किए—विशाखा दिशानिर्देशों से महिला सुरक्षा, शिक्षा का अधिकार से शिक्षा का अधिकार। महिला आरक्षण ने पंचायती राज में तैंतीस से पचास प्रतिशत क्रांति लाई, जो राष्ट्रीय स्तर पर विस्तार की प्रतीक्षा कर रहा। सूचना का अधिकार ने पारदर्शिता बढ़ाई, जबकि वस्तु एवं सेवा कर ने आर्थिक एकीकरण किया। चुनौतियां रहीं—आपातकाल जैसे काले अध्याय, लेकिन संस्थाओं ने पुनरुद्धार किया। आज त्रस्तंभ मजबूत हैं: चुनाव आयोग निष्पक्ष, भारतीय रिज़र्व बैंक आर्थिक स्थिरता का प्रहरी। विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र ने साबित किया कि गरीबी और निरक्षरता के बावजूद प्रजातंत्र फल-फूल सकता है।
तीसरी चुनौती थी विकास। 1947 में सकल घरेलू उत्पाद दो लाख तीस हजार करोड़ था, आज चार सौ लाख करोड़ से अधिक। हरित क्रांति ने अन्न भंडार भरे, सफेद क्रांति ने दूध उत्पादन में विश्व रिकॉर्ड बनाया। इसरो के सौ से अधिक उपग्रह मिशन, कोविशील्ड वैक्सीन ने आत्मनिर्भरता दिखाई। डिजिटल भारत ने सौ करोड़ से अधिक आधार कार्ड जोड़े, जबकि स्टार्टअप भारत ने एक लाख से अधिक स्टार्टअप जन्मे। सामाजिक मोर्चे पर राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम ने अस्सी करोड़ को सस्ता अनाज दिया, स्वच्छ भारत ने बारह करोड़ शौचालय बनाए। आयुष्मान भारत ने पचास करोड़ गरीबों को स्वास्थ्य बीमा प्रदान किया। लेकिन असमानता बनी—ऊपर दस प्रतिशत के पास सत्तावन प्रतिशत संपत्ति, जबकि निचले पचास प्रतिशत के पास तीन प्रतिशत। ग्रामीण-शहरी खाई, किसान आत्महत्याएं चिंताजनक। फिर भी, गरीबी रेखा से बाहर पच्चीस करोड़ लोग निकले—यह गर्व का विषय।
गणतंत्र की उपलब्धियां गर्व का कारण हैं, किंतु खोया भी बहुत। भ्रष्टाचार ने जड़ें जमा लीं—दो जी, कोयला आवंटन जैसी घोटालों ने अरबों लूटे। चुनावी बॉन्ड पर सवाल, नोटबंदी के बाद काला धन वापसी असफल। महिला असुरक्षा चरम पर—निर्भया से हाथरस तक बलात्कार की घटनाएं थम नहीं रही। जातिगत हिंसा, दलित अत्याचार जारी। किसान संकट गहरा: न्यूनतम समर्थन मूल्य की मांग, कर्जमाफी नाकाफी। युवा बेरोजगारी तीनों प्रतिशत पर, असंतोष से हिंसा भड़क रही। प्रदूषण घातक, प्रांतीयता का जहर बरकरार। अभिव्यक्ति स्वतंत्रता पर दुरुपयोग। नक्सलवाद, आतंकवाद बने सिरदर्द। ये घाव भारत माता को रक्तरंजित कर रहे।
खोया भले हो, लेकिन हल संभव। भ्रष्टाचार पर प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण ने रिसाव रोका। महिला सुरक्षा हेतु फास्ट-ट्रैक कोर्ट, निर्भया कोष उपयोग बढ़ाएं। किसानों के लिए प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि, किसान उत्पादक संगठन मजबूत करें। रोजगार हेतु कौशल भारत, आत्मनिर्भर तीन से दस करोड़ नौकरियां सृजित संभव। सामाजिक सद्भाव हेतु संविधान जागरण अभियान चलाएं। प्रदूषण पर विद्युत वाहन नीति, नमामि गंगे को गति। पंचायती राज को सशक्त बनाएं—महिला प्रतिनिधित्व से स्थानीय शासन मजबूत। युवाओं को मुख्यधारा जोड़ें। कृत्रिम बुद्धिमत्ता-बिग डेटा से नफरत फैलाव रोका जा सकता। 2047 तक विकसित भारत का सपना साकार करने हेतु एकजुट हों।
गणतंत्र दिवस मात्र परेड-झंडारोहण नहीं, आत्मचिंतन का अवसर। हमने एकता, लोकतंत्र, विकास पाया; भ्रष्टाचार, असमानता खोया। लेकिन युवा शक्ति हमारा हथियार। आशावादी रहें—भारतीय मॉडल अपनाएं। राष्ट्रपिता गांधी, संविधान निर्माता अम्बेडकर के सिद्धांतों पर चलें। गणतंत्र को कंटीली झाड़ियों से निकालें, उज्ज्वल भविष्य बनाएं। जय हिंद, जय भारत!
(डॉ. सत्यवान सौरभ, पीएचडी (राजनीति विज्ञान), एक कवि और सामाजिक विचारक है।)

January 23, 2026

वाइफ स्वैपिंग और हमारे रिश्तों की टूटती नींव: समाज का आईना 

– डॉ. प्रियंका सौरभ
कुछ विषय ऐसे होते हैं जिन पर लिखना आसान नहीं होता। वे केवल शब्दों की नहीं, बल्कि सामाजिक, मानसिक और नैतिक साहस की भी माँग करते हैं। यह विषय भी उन्हीं में से एक है, जहाँ चुनौती केवल प्रस्तुति की नहीं, बल्कि उस सच को सामने लाने की है जिसे समाज अक्सर ढककर रखना चाहता है। संस्कृति की आड़ में या आधुनिकता के नाम पर जिस चुपचाप गिरावट को स्वीकार किया जा रहा है, उस पर प्रश्न उठाना अब ज़रूरी हो गया है। आज जब परिवार की पवित्र संस्था पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं, ‘वाइफ स्वैपिंग’ जैसी प्रवृत्ति न केवल वैवाहिक बंधनों को चुनौती दे रही है, बल्कि पूरे समाज के मूल्यों को झकझोर रही है।
“वाइफ स्वप्पिंग” सुनते ही अधिकतर लोग इसे पश्चिमी संस्कृति या महानगरों तक सीमित मान लेते हैं। यह सोच हमें आत्मसंतोष देती है, लेकिन सच्चाई इससे कहीं अधिक असहज और व्यापक है। क्या यह प्रवृत्ति वास्तव में केवल बड़े शहरों तक सीमित है, या फिर इसकी छाया गाँवों और छोटे कस्बों तक भी पहुँच चुकी है—बस हम उसे देखने से बच रहे हैं? उत्तर प्रदेश, केरल और लद्दाख जैसे क्षेत्रों से सामने आए मामले बताते हैं कि यह समस्या ग्रामीण और शहरी दोनों स्तरों पर मौजूद है।
यह विषय सनसनी फैलाने के लिए नहीं, बल्कि समाज के भीतर बदलते रिश्तों को समझने के लिए ज़रूरी है। यह विवाह संस्था की कमजोर होती नींव, रिश्तों में बढ़ती दरार और आधुनिकता के नाम पर मूल्यों की गलत व्याख्या की ओर ध्यान दिलाता है। यह केवल शारीरिक इच्छा का प्रश्न नहीं, बल्कि असुरक्षा, मानसिक अधूरापन, संवादहीनता और सामाजिक पाखंड का परिणाम भी है। मनोवैज्ञानिक दृष्टि से इसमें भावनात्मक शोषण, ईर्ष्या और विश्वास का पूर्ण विघटन होता है।
इस तरह के संवेदनशील विषय को संतुलित और मर्यादित भाषा में रखना अत्यंत आवश्यक है, ताकि गंभीरता बनी रहे। यह भी सामने आता है कि किस प्रकार सामान्य दिखने वाले परिवार धीरे-धीरे ऐसे कुचक्र में फँस जाते हैं, जहाँ रिश्ते भावनाओं की जगह समझौते और दिखावे का रूप ले लेते हैं। बैंगलोर, हापुड़ जैसे स्थानों से सामने आए मामले इसकी पुष्टि करते हैं।
आज यह मान लेना भूल होगी कि ऐसी प्रवृत्तियाँ केवल महानगरों तक सीमित हैं। सोशल मीडिया और इंटरनेट ने जहाँ स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति के नए रास्ते खोले हैं, वहीं मूल्यों के क्षरण को भी आसान बना दिया है। आभासी दुनिया में “सामान्य” लगने वाली भाषा, व्यवहार और रिश्ते वास्तविक जीवन में परिवारों की नींव हिला रहे हैं। आईटी क्रांति, उपभोक्तावादी संस्कृति और पश्चिमी प्रभाव ने युवा वर्ग में प्रयोग की होड़ बढ़ाई है। आर्थिक असमानता, संयुक्त परिवार का विघटन और महिलाओं की आर्थिक निर्भरता इसे बढ़ावा दे रही हैं। मनोवैज्ञानिक रूप से यह यौन असंतोष, ईर्ष्या और रोमांच की तलाश से उपजता है।
भारतीय संदर्भ में यह पुरुषप्रधान समाज की देन है। पत्नियाँ डर के मारे चुप रहती हैं—तलाक का कलंक, आर्थिक असुरक्षा या परिवार का विघटन। सोशल मीडिया ग्रुप्स ने इसे संगठित रूप दिया है। टियर-2 शहरों में तकनीक-साक्षर युवा इसमें लिप्त हैं। इसके प्रभाव विनाशकारी हैं। वैवाहिक स्तर पर विश्वास टूटता है, ईर्ष्या बढ़ती है, भावनात्मक लगाव नए पार्टनर से हो जाता है। बच्चों पर असर लंबे समय तक रहता है—वे असुरक्षा और रिश्तों की अस्थिरता सीखते हैं। विस्तारित परिवार समर्थन छोड़ देता है। समाज स्तर पर यह नैतिक क्षय और महिलाओं के शोषण को बढ़ावा देता है। भारत में परिवार संरचना बदल रही है, लेकिन यह विकृति नई चुनौतियाँ ला रही है।
यह विमर्श केवल प्रश्न खड़े नहीं करता, बल्कि समाधान की ओर भी संकेत करता है। परिवार स्तर पर खुला संवाद, काउंसलिंग, भावनात्मक अंतरंगता आवश्यक है। समाज स्तर पर स्कूलों में नैतिक शिक्षा, महिलाओं का सशक्तिकरण ज़रूरी है। कानूनी स्तर पर IPC धाराओं का सख्त उपयोग, परिवार परामर्श नीतियाँ बनानी चाहिए।
यह विषय अश्लीलता नहीं, बल्कि समाज का आईना है। यह पाठक को असहज करता है, सोचने पर मजबूर करता है। शायद इसी असहजता में इसका सबसे बड़ा सामाजिक महत्व निहित है—कि हम अपने रिश्तों को पुनः परिभाषित करें। समय है जागने का।
  (डॉ. प्रियंका सौरभ, पीएचडी (राजनीति विज्ञान), कवयित्री एवं सामाजिक चिंतक हैं।)
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