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विश्वविद्यालय, सत्ता और साहित्य की अपमानित गरिमा

January 10, 2026

विश्वविद्यालय, सत्ता और साहित्य की अपमानित गरिमा

Freelance writer

– डॉ. प्रियंका सौरभ
गुरु घासीदास विश्वविद्यालय, बिलासपुर, छत्तीसगढ़ में आयोजित एक साहित्यिक कार्यक्रम के दौरान हिन्दी के वरिष्ठ कथाकार मनोज रूपड़ा के साथ हुआ सार्वजनिक दुर्व्यवहार केवल एक दुर्भाग्यपूर्ण घटना नहीं है, बल्कि यह हमारे समय के अकादमिक और सांस्कृतिक जीवन में गहराते संकट का स्पष्ट संकेत है। किसी आमंत्रित लेखक को मंच पर अपमानित करना और कार्यक्रम से बाहर जाने के लिए कहना उस परंपरा के सर्वथा विपरीत है, जिसमें विश्वविद्यालयों को विचारों के मुक्त आदान–प्रदान, असहमति के सम्मान और रचनात्मक संवाद के केंद्र के रूप में देखा जाता रहा है। यह घटना व्यक्ति-विशेष तक सीमित नहीं है; यह साहित्य, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और बौद्धिक गरिमा पर सीधा आघात है।
विश्वविद्यालयों की ऐतिहासिक भूमिका सत्ता के अनुचर बनने की नहीं रही है। नालंदा और तक्षशिला जैसी प्राचीन ज्ञान-परंपराओं से लेकर आधुनिक विश्वविद्यालयों तक, इन संस्थानों ने सदैव प्रश्न पूछने, तर्क करने और स्थापित धारणाओं को चुनौती देने की संस्कृति को बढ़ावा दिया है। विश्वविद्यालय केवल डिग्री प्रदान करने वाली मशीनें नहीं होते, बल्कि वे समाज की चेतना को दिशा देने वाले केंद्र होते हैं। यहां विचारों की विविधता, मतभेद और बहस को कमजोरी नहीं, बल्कि बौद्धिक शक्ति माना जाता है। ऐसे में जब किसी विश्वविद्यालय के भीतर सत्ता-प्रदर्शन, अहंकार और असहिष्णुता का दृश्य सामने आता है, तो यह केवल एक कार्यक्रम की विफलता नहीं, बल्कि संस्थागत मूल्यों के क्षरण का प्रमाण बन जाता है।
मनोज रूपड़ा समकालीन हिन्दी कथा साहित्य का एक सशक्त और प्रतिष्ठित नाम हैं। उनकी कहानियाँ और उपन्यास सत्ता, समाज और व्यक्ति के जटिल संबंधों को बेबाकी से उजागर करते हैं। वे उन लेखकों में शामिल हैं जिन्होंने साहित्य को केवल सौंदर्य का विषय नहीं, बल्कि सामाजिक हस्तक्षेप का माध्यम माना है। ऐसे लेखक को आमंत्रित करना स्वयं विश्वविद्यालय की बौद्धिक प्रतिबद्धता और खुलेपन का प्रतीक होना चाहिए था। किंतु उनके साथ हुआ व्यवहार यह दर्शाता है कि कहीं न कहीं आलोचनात्मक दृष्टि और स्वतंत्र विचार से असहजता ने विवेक पर विजय पा ली। यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या विश्वविद्यालय अब केवल औपचारिक आयोजनों, प्रशस्ति-पाठों और सत्ता-अनुकूल वक्तव्यों तक सीमित रह जाएंगे?
कुलपति जैसे पद से केवल प्रशासनिक दक्षता की नहीं, बल्कि नैतिक नेतृत्व और अकादमिक संवेदनशीलता की अपेक्षा की जाती है। यह पद संयम, संवाद और समावेशन का प्रतीक होना चाहिए। विश्वविद्यालय का मुखिया यदि आलोचना या असहमति को व्यक्तिगत चुनौती मानने लगे, तो उसका प्रभाव केवल एक कार्यक्रम तक सीमित नहीं रहता। भय का वातावरण धीरे-धीरे पूरे परिसर में फैलने लगता है। शिक्षक खुलकर बोलने से कतराने लगते हैं, विद्यार्थी प्रश्न पूछने से डरने लगते हैं और रचनात्मकता आत्म-सेंसरशिप की भेंट चढ़ जाती है। ऐसी स्थिति में विश्वविद्यालय अपने मूल उद्देश्य से भटक जाता है और ज्ञान का केंद्र होने के बजाय अनुशासन और नियंत्रण का उपकरण बन जाता है।
इस घटना का एक और चिंताजनक पक्ष यह है कि संस्थागत स्तर पर आमंत्रित साहित्यकार के सम्मान की रक्षा के लिए अपेक्षित संवेदनशीलता और दृढ़ता दिखाई नहीं दी। साहित्यिक आयोजनों की सफलता केवल मंच-सज्जा, पोस्टरों और औपचारिक भाषणों से नहीं मापी जाती, बल्कि इस बात से तय होती है कि वहां संवाद कितना खुला, सम्मानजनक और अर्थपूर्ण रहा। जब किसी लेखक का अपमान होता है और संस्था मौन साध लेती है, तो वह मौन भी एक प्रकार की स्वीकृति बन जाता है। यह चुप्पी भविष्य में और अधिक दमनकारी व्यवहारों को प्रोत्साहित करती है और संस्थान की नैतिक विश्वसनीयता को कमजोर करती है।
यह याद दिलाना आवश्यक है कि विश्वविद्यालय किसी व्यक्ति या पदाधिकारी की निजी जागीर नहीं होते। वे सार्वजनिक संसाधनों, करदाताओं के धन और समाज के विश्वास से संचालित होते हैं। यहां लिए गए निर्णय और प्रदर्शित व्यवहार समाज के लिए संदेश का काम करते हैं। यदि विश्वविद्यालयों में सत्ता का मद, व्यक्तिगत अहंकार और असहिष्णुता हावी हो जाए, तो समाज में संवाद की जगह टकराव और भय की संस्कृति पनपने लगती है। यह प्रवृत्ति न केवल साहित्य और शिक्षा के लिए, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए भी घातक है, क्योंकि लोकतंत्र का आधार ही विचारों की बहुलता और असहमति का सम्मान है।
भारतीय लोकतंत्र की आत्मा में साहित्य और बौद्धिक विमर्श की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। आज़ादी की लड़ाई से लेकर सामाजिक सुधार आंदोलनों तक, लेखकों और विचारकों ने सत्ता से सवाल पूछे हैं और समाज को आत्मावलोकन के लिए प्रेरित किया है। यदि आज विश्वविद्यालयों में ही लेखकों और विचारकों को अपमानित किया जाएगा, तो यह उस परंपरा का घोर अपमान होगा जिसने हमें एक जीवंत लोकतांत्रिक समाज बनाया है। यह विडंबना ही है कि जिन संस्थानों से वैचारिक नेतृत्व की अपेक्षा की जाती है, वही यदि असहिष्णुता का उदाहरण प्रस्तुत करने लगें, तो समाज किस दिशा में जाएगा?
इस पूरे घटनाक्रम में यह अवश्य उल्लेखनीय है कि विश्वविद्यालय के कुछ अध्यापकों ने स्थिति को संभालने और सम्मानजनक समाधान खोजने का प्रयास किया। यह दर्शाता है कि संस्थान के भीतर अभी भी विवेक और संवेदनशीलता पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है। किंतु यह भी सत्य है कि जब सत्ता का मद विवेक पर हावी हो जाता है, तब व्यक्तिगत प्रयास अक्सर निष्प्रभावी सिद्ध होते हैं। संस्थागत संस्कृति तभी बदलती है, जब नेतृत्व स्वयं संवाद और आत्मालोचना के लिए तैयार हो।
यह घटना हमें साहित्यकारों और बौद्धिक वर्ग की भूमिका पर भी पुनर्विचार करने के लिए मजबूर करती है। जब किसी लेखक के साथ अन्याय होता है और पूरा साहित्यिक समुदाय मौन साध लेता है, तो यह मौन स्वयं में एक राजनीतिक और नैतिक वक्तव्य बन जाता है। इतिहास साक्षी है कि चुप्पी ने हमेशा सत्ता को मजबूत किया है और प्रतिरोध को कमजोर। यदि आज इस घटना पर स्पष्ट और सामूहिक प्रतिक्रिया नहीं होगी, तो कल किसी और लेखक, किसी और विचार और किसी और मंच पर यही दुहराया जाएगा।
साहित्य का मूल स्वभाव प्रश्नाकुलता और प्रतिरोध का है। वह सत्ता के समक्ष नतमस्तक होने के लिए नहीं, बल्कि उसे आईना दिखाने के लिए पैदा हुआ है। यदि साहित्यकार ही अपने सम्मान और स्वतंत्रता की रक्षा के लिए खड़े नहीं होंगे, तो साहित्य धीरे-धीरे केवल करियर और पुरस्कारों तक सिमट जाएगा। तब वह समाज की आत्मा नहीं, बल्कि व्यवस्था का सजावटी उपकरण बनकर रह जाएगा।
आज आवश्यकता है कि विश्वविद्यालय प्रशासन, शिक्षक, विद्यार्थी और साहित्यिक समाज इस घटना से सबक लें। विश्वविद्यालयों को आत्ममंथन करना होगा कि वे किस प्रकार के अकादमिक वातावरण को बढ़ावा दे रहे हैं। क्या वे संवाद और बहस को प्रोत्साहित कर रहे हैं, या भय और आज्ञाकारिता को? साहित्यिक आयोजनों को केवल औपचारिकता के रूप में नहीं, बल्कि जीवंत वैचारिक मंच के रूप में देखना होगा, जहां असहमति भी सम्मान के साथ व्यक्त की जा सके।
यह घटना शर्मनाक है और इसकी कड़ी निंदा आवश्यक है, लेकिन निंदा से आगे बढ़कर ठोस आत्मालोचना और सुधार की आवश्यकता है। विश्वविद्यालयों को यह सुनिश्चित करना होगा कि भविष्य में किसी भी आमंत्रित लेखक या वक्ता के साथ ऐसा व्यवहार न हो। अकादमिक स्वतंत्रता और गरिमा की रक्षा केवल कागजी नीतियों से नहीं, बल्कि व्यवहार और संस्कृति से होती है।
अंततः प्रश्न केवल मनोज रूपड़ा या किसी एक कार्यक्रम का नहीं है। प्रश्न यह है कि हम किस प्रकार के विश्वविद्यालय और किस प्रकार का समाज बनाना चाहते हैं। यदि हम विचार से डरेंगे, प्रश्न से घबराएंगे और असहमति को अपमान से दबाने की कोशिश करेंगे, तो हम एक जीवंत लोकतंत्र की जगह एक भयग्रस्त समाज की ओर बढ़ेंगे। विश्वविद्यालयों को यह याद रखना होगा कि उनका अस्तित्व सत्ता की कृपा से नहीं, बल्कि ज्ञान, संवाद और स्वतंत्र चेतना से है। यदि यही चेतना कुचल दी गई, तो विश्वविद्यालय केवल इमारतें रह जाएंगे—ज्ञान के नहीं, बल्कि मौन के स्मारक।
-प्रियंका सौरभ
रिसर्च स्कॉलर इन पोलिटिकल साइंस,
कवयित्री, स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार,
उब्बा भवन, आर्यनगर, हिसार (हरियाणा)-127045
(मो.) 7015375570 (वार्ता+वाट्स एप)
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January 5, 2026

सोमनाथ स्वाभिमान पर्व, अटूट आस्था के 1000 वर्ष

नरेंद्र मोदी, प्रधानमंत्री

सोमनाथ… ये शब्द सुनते ही हमारे मन और हृदय में गर्व और आस्था की भावना भर जाती है। भारत के पश्चिमी तट पर गुजरात में, प्रभास पाटन नाम की जगह पर स्थित Somnath सोमनाथ, भारत की आत्मा का शाश्वत प्रस्तुतिकरण है। द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्रम में भारत के 12 ज्योतिर्लिंगों का उल्लेख है। ज्योतिर्लिंगों का वर्णन इस पंक्ति से शुरू होता है…“सौराष्ट्रे सोमनाथं च…यानि ज्योतिर्लिंगों में सबसे पहले सोमनाथ का उल्लेख आता है। ये इस पवित्र धाम की सभ्यतागत और आध्यात्मिक महत्ता का प्रतीक है।

शास्त्रों में ये भी कहा गया है:

“सोमलिङ्गं नरो दृष्ट्वा सर्वपापैः प्रमुच्यते।
लभते फलं मनोवाञ्छितं मृतः स्वर्गं समाश्रयेत्॥”

अर्थात्, सोमनाथ शिवलिंग के दर्शन से व्यक्ति अपने सभी पापों से मुक्त हो जाता है। मन में जो भी पुण्य कामनाएं होती हैं, वो पूरी होती हैं और मृत्यु के बाद आत्मा स्वर्ग को प्राप्त होती है।

दुर्भाग्यवश, यही सोमनाथ, जो करोड़ों लोगों की श्रद्धा और प्रार्थनाओं का केंद्र था, विदेशी आक्रमणकारियों का निशाना बना, जिनका उद्देश्य विध्वंस था।

वर्ष 2026 सोमनाथ मंदिर के लिए बहुत महत्व रखता है क्योंकि इस महान तीर्थ पर हुए पहले आक्रमण के 1000 वर्ष पूरे हो रहे हैं। जनवरी 1026 में गजनी के महमूद ने इस मंदिर पर बड़ा आक्रमण किया था, इस मंदिर को ध्वस्त कर दिया था। यह आक्रमण आस्था और सभ्यता के एक महान प्रतीक को नष्ट करने के उद्देश्य से किया गया एक हिंसक और बर्बर प्रयास था।

सोमनाथ हमला मानव इतिहास की सबसे बड़ी त्रासदियों में शामिल है। फिर भी, एक हजार वर्ष बाद आज भी यह मंदिर पूरे गौरव के साथ खड़ा है। साल 1026 के बाद समय-समय पर इस मंदिर को उसके पूरे वैभव के साथ पुन:निर्मित करने के प्रयास जारी रहे। मंदिर का वर्तमान स्वरूप 1951 में आकार ले सका। संयोग से 2026 का यही वर्ष सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण के 75 वर्ष पूरे होने का भी वर्ष है। 11 मई 1951 को इस मंदिर का पुनर्निर्माण सम्पन्न हुआ था। तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद की उपस्थिति में हुआ वो समारोह ऐतिहासिक था, जब मंदिर के द्वार दर्शनों के लिए खोले गए थे।

1026 में एक हजार वर्ष पहले सोमनाथ पर हुए पहले आक्रमण, वहां के लोगों के साथ की गई क्रूरता और विध्वंस का वर्णन अनेक ऐतिहासिक स्रोतों में विस्तार से मिलता है। जब इन्हें पढ़ा जाता है तो हृदय कांप उठता है। हर पंक्ति में क्रूरता के निशान मिलते हैं, ये ऐसा दुःख है जिसकी पीड़ा इतने समय बाद भी महसूस होती है।

हम कल्पना कर सकते हैं कि इसका उस दौर में भारत पर और लोगों के मनोबल पर कितना गहरा प्रभाव पड़ा होगा। सोमनाथ मंदिर का आध्यात्मिक महत्व बहुत ज्यादा था। ये बड़ी संख्या में लोगों को अपनी ओर खींचता था। ये एक ऐसे समाज की प्रेरणा था जिसकी आर्थिक क्षमता भी बहुत सशक्त थी। हमारे समुद्री व्यापारी और नाविक इसके वैभव की कथाएं दूर-दूर तक ले जाते थे।

सोमनाथ पर हमले और फिर गुलामी के लंबे कालखंड के बावजूद आज मैं पूरे विश्वास के साथ और गर्व से ये कहना चाहता हूं कि सोमनाथ की गाथा विध्वंस की कहानी नहीं है। ये पिछले 1000 साल से चली आ रही भारत माता की करोड़ों संतानों के स्वाभिमान की गाथा है, ये हम भारत के लोगों की अटूट आस्था की गाथा है।

1026 में शुरू हुई मध्यकालीन बर्बरता ने आगे चलकर दूसरों को भी बार-बार सोमनाथ पर आक्रमण करने के लिए प्रेरित किया। यह हमारे लोगों और हमारी संस्कृति को गुलाम बनाने का प्रयास था। लेकिन हर बार जब मंदिर पर आक्रमण हुआ, तब हमारे पास ऐसे महान पुरुष और महिलाएं भी थीं जिन्होंने उसकी रक्षा के लिए खड़े होकर सर्वोच्च बलिदान दिया। और हर बार, पीढ़ी दर पीढ़ी, हमारी महान सभ्यता के लोगों ने खुद को संभाला, मंदिर को फिर से खड़ा किया और उसे पुनः जीवंत किया।

महमूद गजनवी लूटकर चला गया, लेकिन सोमनाथ के प्रति हमारी भावना को हमसे छीन नहीं सका। सोमनाथ से जुड़ी हमारी आस्था, हमारा विश्वास और प्रबल हुआ। उसकी आत्मा लाखों श्रद्धालुओं की भीतर सांस लेती रही। साल 1026 के हजार साल बाद आज 2026 में भी सोमनाथ मंदिर दुनिया को संदेश दे रहा है, कि मिटाने की मानसिकता रखने वाले खत्म हो जाते हैं, जबकि सोमनाथ मंदिर आज हमारे विश्वास का मजबूत आधार बनकर खड़ा है। वो आज भी हमारी प्रेरणा का स्रोत है, वो आज भी हमारी शक्ति का पुंज है।

ये हमारा सौभाग्य है कि हमने उस धरती पर जीवन पाया है, जिसने देवी अहिल्याबाई होलकर जैसी महान विभूति को जन्म दिया। उन्होंने ये सुनिश्चित करने का पुण्य प्रयास किया कि श्रद्धालु सोमनाथ में पूजा कर सकें।

1890 के दशक में स्वामी विवेकानंद भी सोमनाथ आए थे, वो अनुभव उन्हें भीतर तक आंदोलित कर गया। 1897 में चेन्नई में दिए गए एक व्याख्यान के दौरान उन्होंने अपनी भावना व्यक्त की।

उन्होंने कहा, “दक्षिण भारत के प्राचीन मंदिर और गुजरात के सोमनाथ जैसे मंदिर आपको ज्ञान के अनगिनत पाठ सिखाएंगे। ये आपको किसी भी संख्या में पढ़ी गई पुस्तकों से अधिक हमारी सभ्यता की गहरी समझ देंगे।

इन मंदिरों पर सैकड़ों आक्रमणों के निशान हैं, और सैकड़ों बार इनका पुनर्जागरण हुआ है। ये बार बार नष्ट किए गए, और हर बार अपने ही खंडहरों से फिर खड़े हुए। पहले की तरह सशक्त। पहले की तरह जीवंत। यही राष्ट्रीय मन है, यही राष्ट्रीय जीवन धारा है। इसका अनुसरण आपको गौरव से भर देता है। इसको छोड़ देने का मतलब है, मृत्यु। इससे अलग हो जाने पर विनाश ही होगा।”

ये सर्वविदित है कि आजादी के बाद सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण का पवित्र दायित्व सरदार वल्लभभाई पटेल के सक्षम हाथों में आया। उन्होंने आगे बढ़कर इस दायित्व के लिए कदम बढ़ाया। 1947 में दीवाली के समय उनकी सोमनाथ यात्रा हुई। उस यात्रा के अनुभव ने उन्हें भीतर तक झकझोर दिया, उसी समय उन्होंने घोषणा की कि यहीं सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण होगा। अंततः 11 मई 1951 को सोमनाथ में भव्य मंदिर के द्वार श्रद्धालुओं के लिए खोल दिए गए।

उस अवसर पर तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद उपस्थित थे। महान सरदार साहब इस ऐतिहासिक दिन को देखने के लिए जीवित नहीं थे, लेकिन उनका सपना राष्ट्र के सामने साकार होकर भव्य रूप में उपस्थित था।

तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू इस घटना से अधिक उत्साहित नहीं थे। वो नहीं चाहते थे कि माननीय राष्ट्रपति और मंत्री इस समारोह का हिस्सा बनें। उन्होंने कहा कि इस घटना से भारत की छवि खराब होगी। लेकिन राजेंद्र बाबू अडिग रहे, और फिर जो हुआ, उसने एक नया इतिहास रच दिया।

सोमनाथ मंदिर का कोई भी उल्लेख के.एम. मुंशी जी के योगदानों को याद किए बिना अधूरा है। उन्होंने उस समय सरदार पटेल का प्रभावी रूप से समर्थन किया था। सोमनाथ पर उनका कार्य, विशेष रूप से उनकी पुस्तक ‘सोमनाथ, द श्राइन इटरनल’, अवश्य पढ़ी जानी चाहिए।

जैसा कि मुंशी जी की पुस्तक के शीर्षक से स्पष्ट होता है, हम एक ऐसी सभ्यता हैं जो आत्मा और विचारों की अमरता में अटूट विश्वास रखती है। हम विश्वास करते हैं- नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः। सोमनाथ का भौतिक ढांचा नष्ट हो गया, लेकिन उसकी चेतना अमर रही।

इन्हीं विचारों ने हमें हर कालखंड में, हर परिस्थिति में फिर से उठ खड़े होने, मजबूत बनने और आगे बढ़ने का सामर्थ्य दिया है। इन्हीं मूल्यों और हमारे लोगों के संकल्प की वजह से आज भारत पर दुनिया की नजर है। दुनिया भारत को आशा और विश्वास की दृष्टि से देख रही है। वो हमारे इनोवेटिव युवाओं में निवेश करना चाहती है। हमारी कला, हमारी संस्कृति, हमारा संगीत और हमारे अनेक पर्व आज वैश्विक पहचान बना रहे हैं। योग और आयुर्वेद जैसे विषय पूरी दुनिया में प्रभाव डाल रहे हैं। ये स्वस्थ जीवन को बढ़ावा दे रहे हैं। आज कई वैश्विक चुनौतियों के समाधान के लिए दुनिया भारत की ओर देख रही है।

अनादि काल से सोमनाथ जीवन के हर क्षेत्र के लोगों को जोड़ता आया है। सदियों पहले जैन परंपरा के आदरणीय मुनि कलिकाल सर्वज्ञ हेमचंद्राचार्य यहां आए थे और कहा जाता है कि प्रार्थना के बाद उन्होंने कहा, “भवबीजाङ्कुरजनना रागाद्याः क्षयमुपगता यस्य। अर्थात्, उस परम तत्व को नमन जिसमें सांसारिक बंधनों के बीज नष्ट हो चुके हैं। जिसमें राग और सभी विकार शांत हो गए हैं।

आज भी दादा सोमनाथ के दर्शन से ऐसी ही अनुभूति होती है। मन में एक ठहराव आ जाता है, आत्मा को अंदर तक कुछ स्पर्श करता है, जो अलौकिक है, अव्यक्त है।

1026 के पहले आक्रमण के एक हजार वर्ष बाद 2026 में भी सोमनाथ का समुद्र उसी तीव्रता से गर्जना करता है और तट को स्पर्श करती लहरें उसकी पूरी गाथा सुनाती हैं। उन लहरों की तरह सोमनाथ बार-बार उठता रहा है।

अतीत के आक्रमणकारी आज समय की धूल बन चुके हैं। उनका नाम अब विनाश के प्रतीक के तौर पर लिया जाता है। इतिहास के पन्नों में वे केवल फुटनोट हैं, जबकि सोमनाथ आज भी अपनी आशा बिखेरता हुआ प्रकाशमान खड़ा है। सोमनाथ हमें ये बताता है कि घृणा और कट्टरता में विनाश की विकृत ताकत हो सकती है, लेकिन आस्था में सृजन की शक्ति होती है। करोड़ों श्रद्धालुओं के लिए सोमनाथ आज भी आशा का अनंत नाद है। ये विश्वास का वो स्वर है, जो टूटने के बाद भी उठने की प्रेरणा देता है।

अगर हजार साल पहले खंडित हुआ सोमनाथ मंदिर अपने पूरे वैभव के साथ फिर से खड़ा हो सकता है, तो हम हजार साल पहले का समृद्ध भारत भी बना सकते हैं। आइए, इसी प्रेरणा के साथ हम आगे बढ़ते हैं। एक नए संकल्प के साथ, एक विकसित भारत के निर्माण के लिए। एक ऐसा भारत, जिसका सभ्यतागत ज्ञान हमें विश्व कल्याण के लिए प्रयास करते रहने की प्रेरणा देता है।

जय सोमनाथ !

 

October 24, 2025

ताकि, याद रहे विभाजन की विभीषिका

यह फैसला बहुत देर से आया, लेकिन आ गया। यह संतोष की बात है। उन बलिदानियों, त्यागियों और सर्वस्व न्यौछावर करने वालों का स्मरण अब सरकार भी करेगी, जिन्होंने विभाजन की विभीषिका को झेला था। भारत विभाजन के समय एक हिस्से के करीब एक करोड़ लोगों को विस्थापन का दंश झेलना पड़ा था । लगभग 25 लाख लोगों को जानें गंवानी पड़ी थीं। सर्वाधिक अत्याचार उन हिन्दुओं और सिखों पर हुए थे, जोकि पाकिस्तान के हिस्से में गए भू-भाग में रह गए थे। हमें तो 15 अगस्त 1947 को विभाजन की कीमत पर स्वतंत्रता मिल गई थी। किन्तु 14 अगस्त को जो कुछ हुआ , उसे कदापि भुलाया नहीं जा सकता । पाकिस्तान के निर्माण की घोषणा होते ही पश्चिमी और पूर्वी पाकिस्तान दोनों जगहों पर हिन्दुओं और सिखों पर हमले शुरु हो गए थे। उन्हें भगाया गया । वे अपना घर-बार, जमीन-जायदाद सभी कुछ छोड़ कर स्वतंत्र हुए भारत की और भाग रहे थे। लेकिन, उन्हें सम्मानपूर्वक भारत भी नहीं आने दिया जा रहा था। जिहादियों और उन्मादियों ने हिन्दुओं और सिखों से कह दिया था कि जवान बेटियों, बहुओं और महिलाओं को छोड़ कर जाएं। बहुत थोड़ा सा सामान लेकर, सब कुछ छोड़ कर लोग भागे थे। इनके घर मकान कब्जाने की होड़ मच गई थी। हालात इतने खराब थे कि 14 अगस्त से पहले ही लोगों ने हिन्दुओं और सिखों के घरों को चिन्हित करना शुरु कर दिया था, कि ये लोग भागेंगे, तो किस घर में कौन रहेगा। कितने ही सम्पन पंजाबी और सिन्धी परिवारों ने अपने लाखों करोड़ों के कारोबार, दुकानें सब छोड़कर बैलगाडियों का सहारा लिया था । लेकिन, उन्हें रास्ते भर लूटा गया था । उनसे स्त्रियों को छीना गया था । तमाम लोगों ने अपनी और बेटियों की इज्जत बचाने के लिए अपने हाथों ही बेटियों को मार डाला था। ट्रेन भर कर लाशें भेजने की घटना को कैसे भुलाया जा सकता है। पाकिस्तान की नवगठित सरकार के प्रतिनिधि हाथ पर हाथ रखकर और आंखें मूंद कर बैठ गए थे। मुस्लिम लीग और कांग्रेस के उन मुस्लिम नेताओं की जुबानें सिल गई थीं, जोकि भारत विभाजन से पहले यह भरोसा दिला रहे थे कि नए बनने वाले देश पाकिस्तान में हिन्दु और सिखों को पूरी सुरक्षा दी जाएगी। हो रहे अत्याचारों को रोकने की बात तो दूर, ये लोग इनकी निंदा करने को भी तैयार नहीं थे। लार्ड माउंटबेटन ने भारत को उसके भाग्य पर छोड़ दिया था । भारत का नेतृत्व स्वतंत्रता का जश्न मनाने व्यस्त था । विस्थापन का दंश झेल कर भारत आ रहे लोगों की सुधि लेने की किसी को फुरसत नहीं थी। जिसे जहां जगह मिली, वह रहा। सड़कों पर, धर्मशालाओं में, मन्दिरों और गुरुद्वारों में लोगों ने शरण पायी थी। सरकारी स्तर पर किये गए प्रयास नाकाफी थे। विस्थापित होकर आये परिवारों ने मजदूरी की थी, बाजारों में साइकिलों से कपड़ा बेचा था। फेरियां लगाईं थी। जो लाहौर और करांची में लाखों करोड़ों के कारोबार करते थे वे दिहाड़ी मजदूर बन गए थे। बड़े किसानों के खेतों में फसले काट रहे थे। यह दंश झेला उस आबादी ने जो मांग रहे थे आजादी और मिला कभी ना भुला पाने वाला दंश। इतने सब के बाद भी जो लोग पाकिस्तान में रह गए। वे आज तक दंश झेल रहे हैं। पाकिस्तान निर्माण के समय वहां 21 प्रतिशत आबादी हिन्दू और सिखों की थी। आज दो प्रतिशत से भी कम है। कहां गए ये 21 प्रतिशत, कोई है दुनिया में पूछने वाला । या तो जबरन इस्लाम में परिवर्तित कर दिये गए, या मार दिये गए। अथवा उन्हें पाकिस्तान से भागना पड़ा है। कोई दिन ऐसा नहीं होता जब पाकिस्तान में किसी हिन्दू या सिख लड़की का अपहरण और जबरन निकाह ना होता हो। विभाजन की विभीषिका का यह दंश सतत है। अविराम है, यह रुकने वाला नहीं है। जब तक भारत अखंडता के संकल्प को लेकर एक बार फिर खड़ा नहीं होता। हम अखंड भारत दिवस के रूप में 14 अगस्त को मनाते रहे हैं। और, मनाते रहेंगे, क्योंकि यही दिन था , जब हमारा एक बड़ा भू-भाग दो राष्ट्र के सिद्धान्त के आधार पर इस्लामी राष्ट्र के रूप में परिर्वतित हो गया था । अब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 14 अगस्त 2021 को यह घोषणा कर दी है कि ‘देश हर साल विभाजन विभीषिका दिवस के रूप में इस दिन को मनाएगा’। इससे यह सुनिश्चित हो जाएगा कि हमें अब हर साल और हमेशा इस दिन को याद करना है, उन बलिदानियों, त्यागियों का पुण्य स्मरण करना है। श्रद्धांजलि देनी है जिनके कष्टों और असहनीय पीड़ा की कीमत पर हम स्वतंत्र हुए थे। राष्ट्र ने उन लोगों का स्मरण करके कृतज्ञता प्रकट करने का दायित्व 75 साल बाद निभाया है। प्रधानमंत्री जी इस निर्णय के लिए साधुवाद के पात्र हैं।

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