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मकर संक्रांति: पतंगबाज़ी, आनंद, संस्कृति और चेतना

January 13, 2026

मकर संक्रांति: पतंगबाज़ी, आनंद, संस्कृति और चेतना

लेखक, स्वतंत्र पत्रकार

— डॉ. सत्यवान सौरभ
मकर संक्रांति का पर्व भारतीय संस्कृति में केवल एक तिथि नहीं, बल्कि ऋतु परिवर्तन, सामाजिक सहभागिता और लोकजीवन की जीवंत अभिव्यक्ति है। यह वह समय है जब सूर्य दक्षिणायन से उत्तरायण की ओर अग्रसर होता है और प्रकृति के साथ-साथ मानव जीवन में भी नई ऊर्जा का संचार होता है। इस पर्व से जुड़ी पतंगबाज़ी की परंपरा सदियों से चली आ रही है, जिसने समय के साथ स्वयं को केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं रखा, बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक और स्वास्थ्य संबंधी आयामों को भी अपने भीतर समाहित किया है। आज पतंग उड़ाना सिर्फ़ छतों पर खड़े होकर डोर खींचने का खेल नहीं, बल्कि सामूहिक उत्सव, मानसिक प्रसन्नता और शारीरिक सक्रियता का प्रतीक बन चुका है।
पतंग उड़ाने की परंपरा भारत में अत्यंत प्राचीन मानी जाती है। ऐतिहासिक संदर्भों और लोककथाओं में इसके उल्लेख मिलते हैं। कभी यह राजदरबारों में कौशल और रणनीति का प्रतीक रही, तो समय के साथ आम जनजीवन में रच-बस गई। मकर संक्रांति, बसंत पंचमी और अन्य पर्वों पर आसमान का रंग-बिरंगी पतंगों से भर जाना, भारतीय समाज की सामूहिक चेतना और उत्सवधर्मिता को दर्शाता है। हरियाणा, राजस्थान, गुजरात, उत्तर प्रदेश और दिल्ली जैसे राज्यों में यह पर्व केवल परंपरा नहीं, बल्कि एक बड़े सामाजिक आयोजन का रूप ले लेता है।
पतंगबाज़ी का सबसे सुंदर पक्ष उसका सामाजिक स्वरूप है। यह लोगों को घरों से बाहर निकालकर एक-दूसरे से जोड़ती है। छतों के बीच संवाद, बच्चों की खिलखिलाहट, युवाओं की प्रतिस्पर्धा और बुज़ुर्गों की स्मृतियों से उपजी मुस्कान—ये सभी दृश्य इस पर्व को जीवंत बनाते हैं। “वो काटा… वो मारा” की गूंज केवल खेल का उत्साह नहीं, बल्कि सामूहिक सहभागिता की आवाज़ होती है। आज के समय में, जब सामाजिक संवाद सिमटता जा रहा है, ऐसे पर्व मानवीय रिश्तों को सहेजने का अवसर प्रदान करते हैं।
मकर संक्रांति के अवसर पर आयोजित पतंग महोत्सवों और सामूहिक आयोजनों ने इस परंपरा को नए आयाम दिए हैं। कई स्थानों पर स्थानीय प्रशासन, सामाजिक संगठन और स्वयंसेवी संस्थाएँ मिलकर ऐसे कार्यक्रम आयोजित करती हैं, जिनका उद्देश्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि सांस्कृतिक संरक्षण और सामाजिक समरसता को बढ़ावा देना भी होता है। इन आयोजनों में महिलाएँ, बच्चे और बुज़ुर्ग समान रूप से भाग लेते हैं, जिससे यह पर्व किसी एक वर्ग तक सीमित न रहकर समाज के हर हिस्से का उत्सव बन जाता है।
अक्सर पतंगबाज़ी को केवल मौसमी खेल समझ लिया जाता है, लेकिन इसके स्वास्थ्य संबंधी लाभ भी कम नहीं हैं। पतंग उड़ाते समय शरीर के कई अंग सक्रिय रहते हैं। हाथों, कंधों और आँखों का समन्वय होता है, जिससे शारीरिक सक्रियता बनी रहती है। खुले वातावरण में समय बिताने से शरीर को सूर्य की ऊर्जा मिलती है और मानसिक थकान कम होती है। चिकित्सकों और मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि ऐसे सामूहिक और आनंददायक आयोजन तनाव को कम करने में सहायक होते हैं।
मानसिक स्वास्थ्य की दृष्टि से भी पतंग उड़ाना अत्यंत उपयोगी है। खुले आसमान में रंग-बिरंगी पतंगों को उड़ते देखना मन को प्रसन्नता और शांति देता है। यह व्यक्ति को वर्तमान क्षण से जोड़ता है और एक प्रकार के सहज ध्यान का अनुभव कराता है। आज के तेज़ रफ्तार और तनावपूर्ण जीवन में ऐसे अनुभव मानसिक संतुलन बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
बच्चों के लिए पतंगबाज़ी केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि सीखने की प्रक्रिया भी है। इससे उनमें धैर्य, संतुलन, समन्वय और प्रतिस्पर्धा की भावना विकसित होती है। हवा की दिशा को समझना, डोर का सही तनाव बनाए रखना और सही समय पर निर्णय लेना—ये सभी कौशल बच्चों की निर्णय क्षमता को मजबूत करते हैं। साथ ही, जब यह गतिविधि परिवार के साथ मिलकर की जाती है, तो बच्चों में सामाजिक मूल्य और सांस्कृतिक जुड़ाव भी गहराता है।
हालाँकि, जहाँ पतंगबाज़ी आनंद और उत्साह का पर्व है, वहीं इससे जुड़ी सुरक्षा चुनौतियाँ भी सामने आती हैं। बीते वर्षों में चाइनीज़ मांझा और नायलॉन डोर के प्रयोग से कई गंभीर दुर्घटनाएँ हुई हैं। यह न केवल मनुष्यों के लिए, बल्कि पक्षियों और अन्य जीव-जंतुओं के लिए भी घातक सिद्ध हुआ है। सड़क दुर्घटनाएँ, गले में कट लगने की घटनाएँ और पक्षियों की मौत—ये सभी इस परंपरा के विकृत स्वरूप की ओर संकेत करते हैं।
सरकार और प्रशासन द्वारा इस दिशा में नियम बनाए गए हैं, लेकिन केवल नियम पर्याप्त नहीं हैं। समाज में जागरूकता फैलाना और जिम्मेदारी का भाव विकसित करना अत्यंत आवश्यक है। सूती डोर का उपयोग, खुले और सुरक्षित स्थानों का चयन, बच्चों की निगरानी और समय-सीमा का ध्यान—ये सभी कदम पतंगबाज़ी को सुरक्षित बना सकते हैं। यह ज़रूरी है कि उत्सव की खुशी किसी के लिए दुख का कारण न बने।
पर्यावरणीय दृष्टि से भी पतंगबाज़ी पर पुनर्विचार की आवश्यकता है। पतंगों के अवशेष पेड़ों, बिजली के तारों और सड़कों पर फँसकर पर्यावरण के लिए समस्या बन जाते हैं। प्लास्टिक और नायलॉन से बनी पतंगें लंबे समय तक नष्ट नहीं होतीं और जीव-जंतुओं के लिए खतरा पैदा करती हैं। ऐसे में पर्यावरण-अनुकूल पतंगों और प्राकृतिक रंगों के उपयोग को बढ़ावा देना समय की माँग है।
कई सामाजिक संगठन और स्वयंसेवी समूह इस दिशा में सकारात्मक प्रयास कर रहे हैं। वे बच्चों और युवाओं को सुरक्षित और पर्यावरण-संवेदनशील पतंगबाज़ी के लिए प्रेरित कर रहे हैं। स्कूलों और सामाजिक मंचों पर जागरूकता अभियान चलाए जा रहे हैं, ताकि परंपरा और प्रकृति के बीच संतुलन बना रहे।
बदलते समय के साथ पतंगबाज़ी का स्वरूप भी बदल रहा है। अब यह केवल छतों तक सीमित नहीं रही। सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म ने इसे एक वैश्विक पहचान दी है। पतंग महोत्सवों की तस्वीरें और वीडियो दुनिया भर में साझा किए जा रहे हैं। विदेशों में बसे भारतीय समुदाय भी मकर संक्रांति के अवसर पर पतंग उत्सव आयोजित कर अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़े रहते हैं।
यह परिवर्तन दर्शाता है कि परंपराएँ स्थिर नहीं होतीं, वे समय के साथ स्वयं को ढालती हैं। पतंगबाज़ी भी इसी परिवर्तन का उदाहरण है, जहाँ परंपरा, मनोरंजन, स्वास्थ्य और आधुनिकता एक साथ उड़ान भरते हैं। यह पर्व हमें सिखाता है कि आनंद और जिम्मेदारी एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं।
अंततः, मकर संक्रांति और उससे जुड़ी पतंगबाज़ी केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि जीवन को उत्सव की तरह देखने का दृष्टिकोण है। यह हमें सामूहिकता, संतुलन और आनंद का महत्व समझाती है। जब हम परंपरा को समझदारी और जिम्मेदारी के साथ अपनाते हैं, तो वह अतीत की स्मृति भर नहीं रहती, बल्कि वर्तमान और भविष्य की प्रेरणा बन जाती है। आसमान में उड़ती पतंगें हमें यही संदेश देती हैं कि सीमाएँ केवल ज़मीन पर होती हैं, सपनों के लिए आकाश हमेशा खुला रहता है—बस डोर थामने का हुनर और संतुलन बनाए रखने की समझ होनी चाहिए।
  (डॉ. सत्यवान सौरभ, पीएचडी (राजनीति विज्ञान), कवि एवं सामाजिक चिंतक हैं।)
— डॉ. सत्यवान सौरभ
(पी-एच.डी., राजनीति विज्ञान | कवि, लेखक एवं सामाजिक चिंतक)
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Dr. Satywan Saurabh
Research Scholar in Political Science, Delhi University
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January 11, 2026

युवा आदर्श : स्वामी विवेकानंद

12 जनवरी विशेष:
मृत्युंजय दीक्षित
अध्यात्मिक शक्तिपुंज, युवा आदर्श तथा प्रेरक स्वामी विवेकानंद का जन्म कलकत्ता के दत्त परिवार में 12 जनवरी 1863 ईसवी को हुआ था। स्वामी विवेकानंद के बचपन का नाम नरेंद्र नाथ था। स्वामी विवेकानंद के पिता विश्वनाथ दत्त कई गुणों से विभूषित थे। वे अंग्रेजी एवं फारसी भाषाओं में दक्ष थे। स्वामी जी के पिता संगीतप्रेमी भी थे अतः उनकी इच्छा थी कि उनका पुत्र नरेंद्रनाथ भी संगीत की शिक्षा ग्रहण करे। स्वामी विवेकानंद की माता बहुत ही गरिमायी व धार्मिक परंपरा का पालन करने वाली महिला थीं। उन्हें देखकर लगता था कि मानों किसी राजवंश की हों।
बालक नरेंद्र नाथ बचपन में बहुत शरारती थे किन्तु उनमें कोई अशुभ लक्षण नहीं थे। सत्यवादिता उनके जीवन का मेरुदण्ड थी। वे दिन में खेलों में मगन रहते थे और रात्रि में ध्यान लगाने लगे थे। ध्यान के दौरान उन्हें अद्भुत दर्शन प्राप्त होने लगे थे। समय के साथ उनके व्यवहार में परिवर्तन आया और वे बौद्धिक कार्यो को प्राथमिकता देने लगे। पुस्तकों का अध्ययन आरम्भ किया और नियमित रूप से समाचार पत्र और पत्रिकाओं का अध्ययन करने लगे। सार्वजनिक भाषणों में उपस्थित रहने लगे तथा उन भाषणों की समीक्षा करने लगे। वे जो भी सुनते थे उसे अपने मित्रों के बीच वैसा ही सुनाकर सबको आश्चर्यचकित कर देते थे। उनकी पढ़ने की गति भी बहुत तीव्र थी, वे जो भी पढ़ाई करते उन्हें अक्षरशः याद हो जाया करता था। पिता विश्वनाथ ने अपने पुत्र की विद्वता को अपनी ओर खींचने का प्रयास प्रारम्भ किया। वे उसके साथ घंटों ऐसे विषयों पर चर्चा करते जिनमें विचारों की गहराई, सूक्ष्मता और स्वस्थता होती।
बालक नरेंद्र ने ज्ञान के क्षेत्र में बहुत अधिक उन्नति कर ली थी। उन्होने तत्कालीन एंट्रेस की कक्षा तक पढ़ाई के दौरान ही अंग्रेजी और बांग्ला साहित्य के सभी ग्रंथों का अध्ययन कर लिया था। उन्होनें सम्पूर्ण भारतीय इतिहास व हिंदू धर्म का भी गहन अध्ययन कर लिया था। कालेज की पढ़ाई के दौरान सभी शिक्षक उनकी विद्वता को देखकर आश्चर्यचकित हो गये थे। उन्होंने अपने कालेज जीवन के प्रथम दो वर्षों में ही पाश्चात्य तर्कशास्त्र के सभी ग्रंथों का गहन अध्ययन कर लिया था। इन सबके बीच नरेंद्र का दूसरा पक्ष भी था। उनमें आमोद- प्रमोद करने की कला थी ,वे समाजिक वर्गो के प्राण थे। वे मधुर संगीतकार भी थे। सभी के साथ मधुर व्यवहार करते थे। उनके बिना कोई भी आयोजन पूरा नहीं होता था। उनके मन में सत्य को जानने की तीव्र आकांक्षा पनप रही थी।
वर्ष 1881 में नरेंद्र नाथ पहली बार रामकृष्ण परमहंस के सम्पर्क में आये। रामकृष्ण परमहंस पहले ही नरेंद्र को अपना मनोवांछित शिष्य मान चुके थे। प्रारम्भ में नरेन्द्र परमहंस को ईश्वरवादी पुरुष के रूप में मानने को तैयार न थे पर धीरे- धीरे विश्वास जमता गया। रामकृष्ण जी समझ गये थे कि नरेंद्र में एक विशुद्ध चित्त साधक की आत्मा निवास कर रही है अतः उन्होंने नरेन्द्र पर अपने प्रेम की वर्षा करके उन्हें उच्चतम आध्यात्मिक अनुभूति के पथ में परिचालित कर दिया। 1884 में बी. ए. की परीक्षा के दौरान नरेन्द्र के परिवार पर संकट आया, उनके पिता का देहावसान हो गया ।1885 में ही रामकृष्ण को गले का कैंसर हुआ जिसके बाद रामकृष्ण ने उन्हें संयास की दीक्षा दी और उनका नाम स्वामी विवेकानंद हो गया।1886 में स्वामी रामकृष्ण ने महासमाधि ली । वे स्वामी विवेकांनद को ही अपना उत्तराधिकारी घोषित कर गये। 1888 के पहले भाग में स्वामी विवेकानंद मठ से बाहर निकले और तीर्थाटन के लिये निकल पड़े। काशी में उन्होने तैलंगस्वामी तथा भास्करानंद जी के दर्शन किये। वे सभी तीर्थों का भ्रमण करते हुए गोरखपुर पहुंचे। यात्रा में उन्होंने अनुभव किया आम जनता में धर्म के प्रति अनुराग की कमी नहीं है। गोरखपुर में स्वामी जी को पवहारी बाबा का सानिध्य प्राप्त हुआ। फिर वे सभी तीर्थो, नगरों आदि का भ्रमण करते हुए कन्याकुमारी पहुंचे। यहां श्री मंदिर के पास ध्यान लगाने के बाद उन्हें भारतमाता के भावरूप में दर्शन हुए और उसी दिन से उन्होंने भारतमाता के गौरव को स्थापित करने का निर्णय लिया।
स्वामी जी ने 11 सितम्बर 1863 को अमेरिका के शिकागो में आयोजित धर्मसभा में हिंदुत्व की महानता को प्रतिस्थापित करके पूरे विश्व को चौंका दिया। उनके व्याख्यानों को सुनकर पूरा अमेरिका ही उनकी प्रशंसा से मुखरित हो उठा। न्यूयार्क में उन्होंने ज्ञानयोग व राजयोग पर कई व्याख्यान दिये। उनसे प्रभावित होकर हजारों अमेरिकी उनके शिष्य बन गये। उनके लोकप्रिय शिष्यों में भगिनी निवेदिता का नाम भी शामिल है। स्वामी जी ने विदेशों में हिंदू धर्म की पताका फहराने के बाद भारत वापस लौटे।
स्वामी विवेकानंद हमें अपनी आध्यात्मिक शक्ति में विश्वास रखने के लिए प्रेरित करते हैं।वे राष्ट्र निर्माण से पहले मनुष्य निर्माण पर बल देते हैं अतः देश की वर्तमान राजनैतिक एवं सामाजिक समस्याओं के समाधान के लिए देश के युवा वर्ग को स्वामी विवेकानंद के जीवन एवं साहित्य का गहन अध्ययन करना चाहिये। युवा पीढ़ी स्वामी विवेकानंद के विचारों से अवश्य ही लाभान्वित होगी। स्वामी विवेकानंद युवाओं से कहते थे कि बल ही जीवन है और दुर्बलता मृत्यु। युवा वर्ग स्वामी जी के वचनों का अध्ययन कर उनकी उद्देष्य के प्रति निष्ठा, निर्भीकता एवं दीन दुखियों के प्रति गहन प्रेम और चिंता से अत्यंत प्रभावित हुआ है। युवाओं के लिए स्वामी विवेकानंद के अतिरिक्त अन्य कोई अच्छ मित्र, दार्शनिक एवं मार्गदर्शक नहीं हो सकता।
प्रेषकः- मृत्युंजय दीक्षित
फोन नं. -09198571540

January 9, 2026

यज्ञ आवश्यक है

यज्ञ भारतीय संस्कृति का आदि प्रतीक है हमारे धर्म में जितनी महानता यज्ञ को दी गई हैं उतनी और किसी को नहीं दी गई। हमारा कोई भी शुभ-अशुभ धर्म कृत्य यज्ञ के बिना पूर्ण नहीं होता। जन्म से लेकर अन्त्येष्टि तक 16 संस्कार होते हैं इनमें अग्निहोत्र आवश्यक है। जब बालक का जन्म होता है तो उसकी रक्षार्थ सूतक निवृत्ति तक घरों में अखण्ड अग्नि स्थापित रखी जाती है। नामकरण, यज्ञोपवीत, विवाह आदि संस्कारों में भी हवन अवश्य होता है। अन्त में जब शरीर छूटता है तो उसे अग्नि को ही सौंपते हैं। अब लोग मृत्यु के समय चिता जलाकर यों ही शव को भस्म कर देते हैं शास्त्रों में देखा जाय, तो वह भी एक यज्ञ हैं। इसमें वेद मन्त्रों से विधिपूर्वक आहुतियाँ चढ़ाई जाती हैं और शरीर को यज्ञ Yajya भगवान को अर्पण किया जाता है।

सभी साधनाओं में हवन Havan अनिवार्य है। जितने भी पाठ, पुरश्चरण, जप, साधन किये जाते हैं, वे चाहें वेदोक्त हों चाहे तान्त्रिक, हवन उनमें किसी न किसी रूप में अवश्य करना पड़ेगा। गायत्री उपासना में भी हवन आवश्यक है। अनुष्ठान या पुरश्चरण Purascharan में जप से दसवाँ भाग हवन करने का विधान है। परिस्थितिवश दसवाँ भाग आहुतियाँ न दी जा सके तो शताँश (सौ वाँ भाग) आवश्यक है। गायत्री को माता और यज्ञ को पिता माना गया है। इन्हीं दोनों के संयोग से मनुष्य का आध्यात्मिक जन्म होता हैं जिसे ‘द्विजत्व’ कहते हैं। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य को द्विज कहते हैं। द्विज का अर्थ है दूसरा जन्म। जैसे अपने शरीर को जन्म देने वाले माता-पिता की सेवा-पूजन करना मनुष्य का नित्य कर्त्तव्य है उसी प्रकार गायत्री Gayatri माता और यज्ञ पिता की पूजा भी प्रत्येक द्विज का आवश्यक धर्म कर्त्तव्य है।

यज्ञ किसी भी प्रकार घाटे का सौदा नहीं हैं। साधारण रीति से किये हुए हवन में जो धन व्यय होता है वह एक प्रकार से देवताओं की बैंक में जमा हो जाता है और वह सन्तोषजनक ब्याज समेत लौटकर अपने को बड़ी महत्वपूर्ण आवश्यकता के समय पर वापिस मिलता हैं। विधिपूर्वक, शास्त्रीय पद्धति एवं विशिष्ट उपचारों एवं विधानों के साथ किये हुए हवन तो ओर भी महत्वपूर्ण हैं। ऐसे यज्ञ एक प्रकार के दिव्य अस्त्र हैं। दैवी सहायताएं प्राप्त करने के अचूक उपचार हैं। यज्ञ समस्त ऋद्धि-सिद्धियों का पिता है। यज्ञ को वेदों ने ‘कामधुक्’ कहा है वह मनुष्यों के अभावों का पूरा करने वाला और बाधाओं को दूर करने वाला है।

यज्ञ एक महान विद्या है। पांचों तत्वों का यज्ञ में एक वैज्ञानिक संमिश्रण होता है जिससे एक प्रचण्ड दुर्वर्ष शक्ति का आविर्भाव होता है। यज्ञ की इस प्रचण्ड शक्ति को ‘द्वि नासिक , सप्त जिह्वा, उत्तर मुख, कोटि द्वादश मूर्त्या, द्विपञ्चशत्कला युतम’ आदि विशेषणों युक्त कहा गया है। इस रहस्यपूर्ण संकेतों में यह बताया गया है कि यज्ञाग्नि की मूर्धा भौतिक और आध्यात्मिक दोनों हैं। इससे दोनों क्षेत्र सफल बनाये जा सकते हैं। स्थूल और सूक्ष्म प्रकृति यज्ञ की नासिका है उस पर अधिकार प्राप्त किया जा सकता है, सातों प्रकार की संपदाएं यज्ञाग्नि के हाथ हैं, वाममार्ग और दक्षिण मार्ग ये दो मुख हैं। हवा सातों लोक जिह्वाएँ हैं, इन सब लोकों में जो कुछ भी विशेषताएं हैं वे यज्ञाग्नि के मुख में मौजूद हैं। उत्तर ध्रुव का चुम्बकत्व केन्द्र अग्नि मुख है। यज्ञ की 52 कलाएं ऐसी हैं जिनमें से कुछ को प्राप्त करके ही रावण इतना शक्तिशाली हो गया था। यदि यह सभी कलाएं उपलब्ध हो जायें तो मनुष्य साक्षात् अग्नि रूप हो सकता है और विश्व के सभी पदार्थ उसके करतलगत हो सकते हैं। यज्ञ की महिमा अनन्त है। उसका थोड़ा आयोजन भी फलदायक होता है। गायत्री उपासकों के लिए तो यह पिता तुल्य पूजनीय है।

✍️*पं श्रीराम शर्मा आचार्य* ✍️ अखण्ड ज्योति 1954

January 7, 2026

पापों का हरण करती है मोक्षा एकादशी

Article First Published on  01 Dec  2011 

मार्गशीर्ष शुक्लपक्ष की एकदाशी

यूं तो सभी एकादशी मानवजगत को श्रेष्ठ फल देने वाली तथा उसके कष्टों को निवारण करने वाली हैं। कि्तु इसमें भी मोक्षा एकादशी का महत्व सबसे ज्यादा है। यह मार्गशीर्ष माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी है, जोकि मोक्षा एकादशी के नाम से जानी जाती है। इसे गीता जयंती भी कहते हैं। क्योंकि इसी दिन भगवान श्रीकृष्ण ने महाभारत के दौरान कुरुक्षेत्र के मैदान में गीता का प्रवचन किया था। मोक्षा एकादशी के बारे में युधिष्ठिर ने भगवान श्री कृष्ण से शुक्लपक्ष की मोक्षा एकादशी का महात्म पूछा था। इस पर श्रीकृष्ण ने कहा-नृपश्रेष्ठ मार्गशीर्ष मास के शुक्लपक्ष की एकादशी के श्रवण मात्र से वाजपेय यज्ञ का फल मिलता है। इसका नाम है मोक्षा एकादशी यह सब पापों का हरण करने वाली है। राजन् उस दिन यत्नपूर्वक तुलसी की मंजरी तथा धूप दीपादि से भघवान दामोदर का पूजन करना चाहिए। पूर्वोक्त विधि से ही दशमी और एकादशी के नियम का पालन करना चाहिए। मोक्षा एकादशी बड़े बड़े पातकों को नाश करने वाली है। उसदिन रात्रि मे मेरी प्रसंन्नता के लिए नृत्य, गीत और स्तुति के द्वारा जागरण करना चाहिए। जिसके पितर पापवश नीच योनि में पड़े हों। वे इसका पुण्य दान करने से मोक्ष को प्राप्त होते हैं। इसमें तनिक भी संदेह नहीं है। ब्रह्मपुराण के अनुसार मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी का बहुत बड़ा महत्व है। द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण ने इसी दिन अर्जुन को भगवद् गीता का उपदेश दिया था। इसीलिए यह तिथि गीता जयंती के नाम से भी प्रसिद्ध है। इसके बारे में गया है कि शुद्धा, विद्धा और नियम आदि का निर्णय यथापूर्व करने के अनन्तर मार्गशीर्ष शुक्ल दशमी को मध्याह्न में जौ और मूँग की रोटी दाल का एक बार भोजन करके द्वादशी को प्रातः स्नानादि करके उपवास रखें।

भगवान का पूजन करें और रात्रि में जागरण करके द्वादशी को एक बार भोजन करके पारण करें। यह एकादशी मोह का क्षय करनेवाली है। इस कारण इसका नाम मोक्षदा रखा गया है। इसीलिए भगवान श्रीकृष्ण मार्गशीर्ष में आने वाली इस मोक्षदा एकादशी के कारण ही कहते हैं मैं महीनों में मार्गशीर्ष का महीना हूँ। इसके पीछे मूल भाव यह है कि मोक्षदा एकादशी के दिन मानवता को नई दिशा देने वाली गीता का उपदेश हुआ था।

(साभार कल्याण)

January 5, 2026

सोमनाथ स्वाभिमान पर्व, अटूट आस्था के 1000 वर्ष

नरेंद्र मोदी, प्रधानमंत्री

सोमनाथ… ये शब्द सुनते ही हमारे मन और हृदय में गर्व और आस्था की भावना भर जाती है। भारत के पश्चिमी तट पर गुजरात में, प्रभास पाटन नाम की जगह पर स्थित Somnath सोमनाथ, भारत की आत्मा का शाश्वत प्रस्तुतिकरण है। द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्रम में भारत के 12 ज्योतिर्लिंगों का उल्लेख है। ज्योतिर्लिंगों का वर्णन इस पंक्ति से शुरू होता है…“सौराष्ट्रे सोमनाथं च…यानि ज्योतिर्लिंगों में सबसे पहले सोमनाथ का उल्लेख आता है। ये इस पवित्र धाम की सभ्यतागत और आध्यात्मिक महत्ता का प्रतीक है।

शास्त्रों में ये भी कहा गया है:

“सोमलिङ्गं नरो दृष्ट्वा सर्वपापैः प्रमुच्यते।
लभते फलं मनोवाञ्छितं मृतः स्वर्गं समाश्रयेत्॥”

अर्थात्, सोमनाथ शिवलिंग के दर्शन से व्यक्ति अपने सभी पापों से मुक्त हो जाता है। मन में जो भी पुण्य कामनाएं होती हैं, वो पूरी होती हैं और मृत्यु के बाद आत्मा स्वर्ग को प्राप्त होती है।

दुर्भाग्यवश, यही सोमनाथ, जो करोड़ों लोगों की श्रद्धा और प्रार्थनाओं का केंद्र था, विदेशी आक्रमणकारियों का निशाना बना, जिनका उद्देश्य विध्वंस था।

वर्ष 2026 सोमनाथ मंदिर के लिए बहुत महत्व रखता है क्योंकि इस महान तीर्थ पर हुए पहले आक्रमण के 1000 वर्ष पूरे हो रहे हैं। जनवरी 1026 में गजनी के महमूद ने इस मंदिर पर बड़ा आक्रमण किया था, इस मंदिर को ध्वस्त कर दिया था। यह आक्रमण आस्था और सभ्यता के एक महान प्रतीक को नष्ट करने के उद्देश्य से किया गया एक हिंसक और बर्बर प्रयास था।

सोमनाथ हमला मानव इतिहास की सबसे बड़ी त्रासदियों में शामिल है। फिर भी, एक हजार वर्ष बाद आज भी यह मंदिर पूरे गौरव के साथ खड़ा है। साल 1026 के बाद समय-समय पर इस मंदिर को उसके पूरे वैभव के साथ पुन:निर्मित करने के प्रयास जारी रहे। मंदिर का वर्तमान स्वरूप 1951 में आकार ले सका। संयोग से 2026 का यही वर्ष सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण के 75 वर्ष पूरे होने का भी वर्ष है। 11 मई 1951 को इस मंदिर का पुनर्निर्माण सम्पन्न हुआ था। तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद की उपस्थिति में हुआ वो समारोह ऐतिहासिक था, जब मंदिर के द्वार दर्शनों के लिए खोले गए थे।

1026 में एक हजार वर्ष पहले सोमनाथ पर हुए पहले आक्रमण, वहां के लोगों के साथ की गई क्रूरता और विध्वंस का वर्णन अनेक ऐतिहासिक स्रोतों में विस्तार से मिलता है। जब इन्हें पढ़ा जाता है तो हृदय कांप उठता है। हर पंक्ति में क्रूरता के निशान मिलते हैं, ये ऐसा दुःख है जिसकी पीड़ा इतने समय बाद भी महसूस होती है।

हम कल्पना कर सकते हैं कि इसका उस दौर में भारत पर और लोगों के मनोबल पर कितना गहरा प्रभाव पड़ा होगा। सोमनाथ मंदिर का आध्यात्मिक महत्व बहुत ज्यादा था। ये बड़ी संख्या में लोगों को अपनी ओर खींचता था। ये एक ऐसे समाज की प्रेरणा था जिसकी आर्थिक क्षमता भी बहुत सशक्त थी। हमारे समुद्री व्यापारी और नाविक इसके वैभव की कथाएं दूर-दूर तक ले जाते थे।

सोमनाथ पर हमले और फिर गुलामी के लंबे कालखंड के बावजूद आज मैं पूरे विश्वास के साथ और गर्व से ये कहना चाहता हूं कि सोमनाथ की गाथा विध्वंस की कहानी नहीं है। ये पिछले 1000 साल से चली आ रही भारत माता की करोड़ों संतानों के स्वाभिमान की गाथा है, ये हम भारत के लोगों की अटूट आस्था की गाथा है।

1026 में शुरू हुई मध्यकालीन बर्बरता ने आगे चलकर दूसरों को भी बार-बार सोमनाथ पर आक्रमण करने के लिए प्रेरित किया। यह हमारे लोगों और हमारी संस्कृति को गुलाम बनाने का प्रयास था। लेकिन हर बार जब मंदिर पर आक्रमण हुआ, तब हमारे पास ऐसे महान पुरुष और महिलाएं भी थीं जिन्होंने उसकी रक्षा के लिए खड़े होकर सर्वोच्च बलिदान दिया। और हर बार, पीढ़ी दर पीढ़ी, हमारी महान सभ्यता के लोगों ने खुद को संभाला, मंदिर को फिर से खड़ा किया और उसे पुनः जीवंत किया।

महमूद गजनवी लूटकर चला गया, लेकिन सोमनाथ के प्रति हमारी भावना को हमसे छीन नहीं सका। सोमनाथ से जुड़ी हमारी आस्था, हमारा विश्वास और प्रबल हुआ। उसकी आत्मा लाखों श्रद्धालुओं की भीतर सांस लेती रही। साल 1026 के हजार साल बाद आज 2026 में भी सोमनाथ मंदिर दुनिया को संदेश दे रहा है, कि मिटाने की मानसिकता रखने वाले खत्म हो जाते हैं, जबकि सोमनाथ मंदिर आज हमारे विश्वास का मजबूत आधार बनकर खड़ा है। वो आज भी हमारी प्रेरणा का स्रोत है, वो आज भी हमारी शक्ति का पुंज है।

ये हमारा सौभाग्य है कि हमने उस धरती पर जीवन पाया है, जिसने देवी अहिल्याबाई होलकर जैसी महान विभूति को जन्म दिया। उन्होंने ये सुनिश्चित करने का पुण्य प्रयास किया कि श्रद्धालु सोमनाथ में पूजा कर सकें।

1890 के दशक में स्वामी विवेकानंद भी सोमनाथ आए थे, वो अनुभव उन्हें भीतर तक आंदोलित कर गया। 1897 में चेन्नई में दिए गए एक व्याख्यान के दौरान उन्होंने अपनी भावना व्यक्त की।

उन्होंने कहा, “दक्षिण भारत के प्राचीन मंदिर और गुजरात के सोमनाथ जैसे मंदिर आपको ज्ञान के अनगिनत पाठ सिखाएंगे। ये आपको किसी भी संख्या में पढ़ी गई पुस्तकों से अधिक हमारी सभ्यता की गहरी समझ देंगे।

इन मंदिरों पर सैकड़ों आक्रमणों के निशान हैं, और सैकड़ों बार इनका पुनर्जागरण हुआ है। ये बार बार नष्ट किए गए, और हर बार अपने ही खंडहरों से फिर खड़े हुए। पहले की तरह सशक्त। पहले की तरह जीवंत। यही राष्ट्रीय मन है, यही राष्ट्रीय जीवन धारा है। इसका अनुसरण आपको गौरव से भर देता है। इसको छोड़ देने का मतलब है, मृत्यु। इससे अलग हो जाने पर विनाश ही होगा।”

ये सर्वविदित है कि आजादी के बाद सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण का पवित्र दायित्व सरदार वल्लभभाई पटेल के सक्षम हाथों में आया। उन्होंने आगे बढ़कर इस दायित्व के लिए कदम बढ़ाया। 1947 में दीवाली के समय उनकी सोमनाथ यात्रा हुई। उस यात्रा के अनुभव ने उन्हें भीतर तक झकझोर दिया, उसी समय उन्होंने घोषणा की कि यहीं सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण होगा। अंततः 11 मई 1951 को सोमनाथ में भव्य मंदिर के द्वार श्रद्धालुओं के लिए खोल दिए गए।

उस अवसर पर तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद उपस्थित थे। महान सरदार साहब इस ऐतिहासिक दिन को देखने के लिए जीवित नहीं थे, लेकिन उनका सपना राष्ट्र के सामने साकार होकर भव्य रूप में उपस्थित था।

तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू इस घटना से अधिक उत्साहित नहीं थे। वो नहीं चाहते थे कि माननीय राष्ट्रपति और मंत्री इस समारोह का हिस्सा बनें। उन्होंने कहा कि इस घटना से भारत की छवि खराब होगी। लेकिन राजेंद्र बाबू अडिग रहे, और फिर जो हुआ, उसने एक नया इतिहास रच दिया।

सोमनाथ मंदिर का कोई भी उल्लेख के.एम. मुंशी जी के योगदानों को याद किए बिना अधूरा है। उन्होंने उस समय सरदार पटेल का प्रभावी रूप से समर्थन किया था। सोमनाथ पर उनका कार्य, विशेष रूप से उनकी पुस्तक ‘सोमनाथ, द श्राइन इटरनल’, अवश्य पढ़ी जानी चाहिए।

जैसा कि मुंशी जी की पुस्तक के शीर्षक से स्पष्ट होता है, हम एक ऐसी सभ्यता हैं जो आत्मा और विचारों की अमरता में अटूट विश्वास रखती है। हम विश्वास करते हैं- नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः। सोमनाथ का भौतिक ढांचा नष्ट हो गया, लेकिन उसकी चेतना अमर रही।

इन्हीं विचारों ने हमें हर कालखंड में, हर परिस्थिति में फिर से उठ खड़े होने, मजबूत बनने और आगे बढ़ने का सामर्थ्य दिया है। इन्हीं मूल्यों और हमारे लोगों के संकल्प की वजह से आज भारत पर दुनिया की नजर है। दुनिया भारत को आशा और विश्वास की दृष्टि से देख रही है। वो हमारे इनोवेटिव युवाओं में निवेश करना चाहती है। हमारी कला, हमारी संस्कृति, हमारा संगीत और हमारे अनेक पर्व आज वैश्विक पहचान बना रहे हैं। योग और आयुर्वेद जैसे विषय पूरी दुनिया में प्रभाव डाल रहे हैं। ये स्वस्थ जीवन को बढ़ावा दे रहे हैं। आज कई वैश्विक चुनौतियों के समाधान के लिए दुनिया भारत की ओर देख रही है।

अनादि काल से सोमनाथ जीवन के हर क्षेत्र के लोगों को जोड़ता आया है। सदियों पहले जैन परंपरा के आदरणीय मुनि कलिकाल सर्वज्ञ हेमचंद्राचार्य यहां आए थे और कहा जाता है कि प्रार्थना के बाद उन्होंने कहा, “भवबीजाङ्कुरजनना रागाद्याः क्षयमुपगता यस्य। अर्थात्, उस परम तत्व को नमन जिसमें सांसारिक बंधनों के बीज नष्ट हो चुके हैं। जिसमें राग और सभी विकार शांत हो गए हैं।

आज भी दादा सोमनाथ के दर्शन से ऐसी ही अनुभूति होती है। मन में एक ठहराव आ जाता है, आत्मा को अंदर तक कुछ स्पर्श करता है, जो अलौकिक है, अव्यक्त है।

1026 के पहले आक्रमण के एक हजार वर्ष बाद 2026 में भी सोमनाथ का समुद्र उसी तीव्रता से गर्जना करता है और तट को स्पर्श करती लहरें उसकी पूरी गाथा सुनाती हैं। उन लहरों की तरह सोमनाथ बार-बार उठता रहा है।

अतीत के आक्रमणकारी आज समय की धूल बन चुके हैं। उनका नाम अब विनाश के प्रतीक के तौर पर लिया जाता है। इतिहास के पन्नों में वे केवल फुटनोट हैं, जबकि सोमनाथ आज भी अपनी आशा बिखेरता हुआ प्रकाशमान खड़ा है। सोमनाथ हमें ये बताता है कि घृणा और कट्टरता में विनाश की विकृत ताकत हो सकती है, लेकिन आस्था में सृजन की शक्ति होती है। करोड़ों श्रद्धालुओं के लिए सोमनाथ आज भी आशा का अनंत नाद है। ये विश्वास का वो स्वर है, जो टूटने के बाद भी उठने की प्रेरणा देता है।

अगर हजार साल पहले खंडित हुआ सोमनाथ मंदिर अपने पूरे वैभव के साथ फिर से खड़ा हो सकता है, तो हम हजार साल पहले का समृद्ध भारत भी बना सकते हैं। आइए, इसी प्रेरणा के साथ हम आगे बढ़ते हैं। एक नए संकल्प के साथ, एक विकसित भारत के निर्माण के लिए। एक ऐसा भारत, जिसका सभ्यतागत ज्ञान हमें विश्व कल्याण के लिए प्रयास करते रहने की प्रेरणा देता है।

जय सोमनाथ !

 

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