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आर्थिक सहयोग का एक नया युग

January 29, 2026

आर्थिक सहयोग का एक नया युग

भारत -यूरोपियन यूनियन का ऐतिहासिक व्यापार समझौता

Published on 29.01.2026, Thursday, 10:05 PM, Article by Mratunjay Dixit, Lucknow, UP Samachar Sewa

मृत्युंजय दीक्षित
भारत और यूरोपियन यूनियन के मध्य 27 जनवरी 2026 को हुआ ससझौता एक व्यापक बदलाव वाला समझौता है। यह बहु प्रतीक्षित मुक्त व्यापार समझौता बिना किसी दबाव के, लम्बी सहज सरल वार्ताओं के उपरांत यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वान डेर लेयेन और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उपस्थिति में सपंन्न हुआ। इस समझौते से भारत और यूरोप के के मध्य व्यापारिक संबंधों के प्रगाढ़ होने की प्रबल सम्भावना है।
भारत और यूरोपियन यूनियन के साथ हुआ यह समझौता वर्ष 2027 में लागू होगा और तब तक सभी 27 सदस्य देशों की संसद के द्वारा इसका पारण किया जाएगा। यह समझौता कई दृष्टिकोण से अत्यंत महत्वपूर्ण है इससे सर्वाधिक लाभ कृषि व किसानों को होगा क्योंकि डेयरी सेक्टर आदि इससे मुक्त रखा गया है। इससे कपड़ा, चमड़ा व फुटवियर, हस्तशिल्प फर्नीचर आदि क्षेत्रो के लिए नए अवसर खुलेंगे। इलेक्ट्रानिक उत्पादों पर टैरिफ 14 प्रतिशत से घटकर शून्य रह जाएगा जिस कारण विनिर्माण क्षेत्र में तेजी से सहायता प्राप्त होगी। यूरोपीय बाजारों में आसान पहुंच से बिल्ड इन इंडिया आपूर्ति श्रृंखला को मजबूती मिलेगी और भारत तेजी से निर्यात बढ़ाने में सक्षम होगा। रत्न आभूषणों पर भी टैरिफ शून्य हो जाएगा जिस कारण डिजाइन और शुद्धता आधारित आभूषण निर्यात में यूरोपीय बाज़ारों के साथ वैश्विक स्तर पर भारत की बढ़त मजबूत होगी। टैरिफ में कटौती से यूरोपीय बाज़ारों मे पहुंच होगी लागत कम होगी जिससे प्लेन सोने और जड़े हुए आभूषणों की ईयू में मांग बढ़ेगी। यूरोपीय थोक विक्रेता एवं बड़े ब्रांड के साथ गहरे संबंध बनाने और नए आर्डर पाने के अवसर भी मिलेंगे। मुक्त व्यापार समझौता कृषि और समुद्री खाद्य उत्पादों का निर्यात बढ़ाने में सक्षम होगा। किसानों और तटीय इलाकों में रहने वाले लोगों की आय मे वृद्धि होगी। मछली पालन प्रोसेसिंग और लॉजिटिक्स क्षेत्र में नौकरियां बढेंगी। काली मिर्च और इलायची जैसे मसाले यूरोप में बेहतर पहुंच का लाभ उठा सकेंगे।समझौता लागू हो जाने के बाद फार्मा -मेडिकल उपकरणों से भी टैरिफ घटकर शून्य हो जाएगा ।
यह समझौता लागू हो जाने के बाद भारत के 17 राज्यों को इसका प्रत्यक्ष लाभ मिलेगा। इनमें पंजाब, राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना ,पश्चिम बंगाल और असम जैसे राज्यों को बड़ा लाभ होगा। उत्तर प्रदेश को भी इस समझौते का बड़ा लाभ मिलेगा। ऐतिहासिक मुक्त व्यापार समझौते के कारण प्रदेश की ओद्यौगिक क्षमता कृषि उत्पादन और एसएमएमई सेक्टर को नई गति मिलने की सम्भावना है। अभी यूपी से होने वाले कुल निर्यात में यूरोपीय संघ की हिस्सेदारी 9 से 12 प्रतिशत है यानी अभी हर वर्ष 210 हजार करोड़ रु का निर्यात होता है जो आगामी पांच वर्ष में बढ़कर 40 हजार करोड़ रु होने की संभावना व्यक्त की जा रही है। मुक्त व्यापार समझौता लागू हो जाने के बाद भारतीयों के लिए यूरोपीय कारें सस्ती और सुलभ हो जाएंगी।
यह एफटीए मात्र एक रणनीतिक दस्तावेज नहीं अपितु भारत और यूरोपियन यूनियन के लिए बदलते वैश्विक व्यापार वातावरण में आगे बढ़ाने का अवसर देने वाला महत्वपूर्ण पड़ाव है। इस समझौते के धरातल पर उतरने के कारण एक नई आर्थिक क्रांति का उदय होगा। यूरोपियन बाज़ारों में 93 प्रतिशत भारतीय निर्यात को बिना शुल्क प्रवेश प्राप्त होने जा रहा है यह कोई सामान्य बात नहीं है। यही कारण है कि प्रधानंमंत्री नरेंद्र मोदी ने ”मन की बात” में उद्यमियो को गुणवत्ता (क्वालिटी, क्वालिटी और क्वालिटी) का मूल मंत्र दिया है। अब भारतीय उद्यमियों को अपने उत्पादों की गुणवत्ता और उत्पादकता का स्तर उन्नत करना ही होगा।
मुक्त व्यापार समझौता लागू होने के अवसर पर प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि यह हमारे किसानों तथा छोटे उद्योगों की यूरोपीय बाज़ारों तक पहुँच आसान बनाएगा । मैन्युफैक्चरिंग में नए अवसर पैदा करेगा। वैश्विक स्तर पर आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत करेगा। यह सिर्फ व्यापार समझौता नही है यह साझा समृद्धि का नया ब्लू प्रिंट है। बदलती वैश्विक व्यवस्था, बढती भू राजनैतिक अनिश्चितता और अंतरराष्ट्रीय तनावों के बीच भारत और यूरोपीय संघ की यह ऐतिहासिक साझोदारी वैश्विक स्थिरता को मजबूती प्रदान करेगी। स्वाभाविक है कुछ वैश्विक ताकतें इस समझौते से असहज हैं। अमेरिका के टैरिफ वार के बीच भारत ने दुनिया के दूसरे देशों को एक नई राह दिखाई है। यूरोपीय संघ के साथ मुक्त व्यापार समझौता (एफटीए) की सहमति ने भारत के लिए 27 देशों के बाजारों को खोल दिया है। यह समझौता अब तक का सबसे बड़ा और प्रभावी व्यापार समझौता बन गया है। यही कारण है कि इसे मदर ऑफ़ ऑल डील्स कहा जा रहा है।
प्रेषक – मृत्युंजय दीक्षित
फोन नं. – 9198571540

January 28, 2026

उत्तर प्रदेश एसोसिएशन ऑफ जर्नलिस्ट्स (उपज),लोकतंत्र के प्रहरी, पत्रकारों की सशक्त आवाज

AJAY CHAUDHRY, JOURNALIST MEERUT

अजय चौधरी,  उपज प्रदेश उपाध्यक्ष, अध्यक्ष जिला मेरठ

Posted on : 28.01.2026, Wednesday Time: 09:53 PM,  Source:  Ajay Chaudhry
#UPAJ #ASSOCIATION #MEDIA #UP ASSOCIATION OF JOURNALISTS
अजय चौधरी
लोकतंत्र की आत्मा स्वतंत्र और निर्भीक पत्रकारिता में बसती है। जब तक प्रेस स्वतंत्र है, तब तक सत्ता जवाबदेह है और समाज सच से जुड़ा रहता है। पत्रकार केवल समाचारों के संवाहक नहीं होते, वे सत्ता और जनता के बीच वह सेतु हैं, जो सच को सामने लाता है और अन्याय के विरुद्ध आवाज़ उठाता है। ऐसे में पत्रकारों की सुरक्षा, सम्मान और अधिकारों की रक्षा करना केवल किसी संगठन की नहीं, बल्कि पूरे लोकतंत्र की जिम्मेदारी है। इसी दायित्वबोध के साथ उत्तर प्रदेश एसोसिएशन ऑफ जर्नलिस्ट्स (उपज) राज्य में पत्रकारों के हितों के लिए एक सशक्त और प्रतिबद्ध मंच के रूप में कार्य कर रहा है।
उत्तर प्रदेश जैसे विशाल, संवेदनशील और सामाजिक-राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण राज्य में पत्रकारिता करना आसान नहीं है। कम मानदेय, असुरक्षित कार्य परिस्थितियाँ, प्रशासनिक दबाव, उत्पीड़न और कई बार जानलेवा हमले—ये आज पत्रकारों की दैनिक चुनौतियाँ बन चुकी हैं। ऐसे समय में उपज ने पत्रकारों के लिए एक मजबूत ढाल की भूमिका निभाई है। यह संगठन न केवल समस्याओं को उजागर करता है, बल्कि उनके समाधान के लिए संगठित और निरंतर संघर्ष भी करता है।
पत्रकारों की सुरक्षा उपज के एजेंडे का केंद्र बिंदु है। संगठन राज्य में पत्रकार सुरक्षा बिल को लागू कराने के लिए सरकार पर लगातार दबाव बना रहा है। उपज का स्पष्ट और दो-टूक मत है कि बिना कानूनी संरक्षण के निर्भीक पत्रकारिता संभव नहीं है। यदि पत्रकार भय के माहौल में काम करेंगे, तो सच दबेगा और लोकतंत्र कमजोर होगा। इसलिए पत्रकारों को सुरक्षा देना किसी वर्ग विशेष का नहीं, बल्कि समाज और लोकतंत्र के हित का प्रश्न है।
उपज की सबसे बड़ी शक्ति उसकी एकता और एकजुटता है। संगठन ने प्रदेश भर के पत्रकारों को एक साझा मंच पर जोड़ने का कार्य किया है, जहाँ उनकी आवाज़ सुनी जाती है और उनके अधिकारों के लिए सामूहिक संघर्ष किया जाता है। यही कारण है कि आज उपज प्रदेश के सबसे प्रभावशाली और भरोसेमंद पत्रकार संगठनों में गिना जाता है।
व्यावसायिक स्वतंत्रता पत्रकारिता की रीढ़ है। उपज पत्रकारों को बिना किसी भय, दबाव या लालच के अपने कर्तव्यों का निर्वहन करने के लिए प्रेरित करता है। संगठन उन्हें नैतिक, वैचारिक और संगठनात्मक समर्थन प्रदान करता है और यह संदेश देता है कि सत्ता से सवाल पूछना अपराध नहीं, बल्कि पत्रकार का संवैधानिक कर्तव्य है।
आज, जब पत्रकारिता कई स्तरों पर संकट से गुजर रही है—चाहे वह आर्थिक दबाव हो, राजनीतिक हस्तक्षेप हो या बढ़ती असहिष्णुता—ऐसे दौर में उपज जैसी संस्थाओं की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। यह संगठन न केवल पत्रकारों के अधिकारों की रक्षा कर रहा है, बल्कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा की लड़ाई भी मजबूती से लड़ रहा है।
एक सुरक्षित, सम्मानित और स्वतंत्र पत्रकार ही सशक्त लोकतंत्र की आधारशिला होता है। उत्तर प्रदेश एसोसिएशन ऑफ जर्नलिस्ट्स (उपज) उसी आधारशिला को मजबूत करने के संकल्प के साथ निरंतर आगे बढ़ रहा है—पत्रकारों के साथ, पत्रकारों के लिए और लोकतंत्र के हित में है।

यूजीसी के समता संवर्धन विनियम-2026 से उभरता विरोध

UGC Regulations 2026

यूजीसी ने जारी किए नए नियम

Posted on : 28.01.2026, Wednesday Time: 03:26 PM, Writer Source:  Prof. Subhash Thaledi, Dehradun
– प्रो. (डॉ.) सुभाष चंद्र थलेडी
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) द्वारा उच्च शिक्षा संस्थानों में समता के संवर्धन हेतु बनाए गए विनियम-2026 ने देशभर में सामान्य वर्ग के छात्रों और अभिभावकों के बीच एक नई और तीखी बहस को जन्म दे दिया है। 13 जनवरी 2026 को अधिसूचित ये नियम 15 जनवरी से लागू भी कर दिए गए। यूजीसी का दावा है कि इन विनियमों का उद्देश्य विश्वविद्यालय परिसरों में भेदभाव का उन्मूलन कर सभी छात्रों को समान अवसर उपलब्ध कराना है। किंतु इनके लागू होते ही सामान्य श्रेणी के छात्रों में असंतोष खुलकर सामने आने लगा है और कई राज्यों में संगठित विरोध के स्वर भी सुनाई दे रहे हैं। इस पूरे विनियम की वैधानिक पृष्ठभूमि में सुप्रीम कोर्ट की भूमिका महत्वपूर्ण रही है। सितंबर 2025 में न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमल्या बागची की पीठ ने उच्च शिक्षा संस्थानों में जातिगत उत्पीड़न और भेदभाव रोकने के लिए प्रभावी नियम बनाने का निर्देश यूजीसी को दिया था। यह आदेश 2019 में दायर उस जनहित याचिका पर आया था, जिसे रोहित वेमुला और पायल ताडवी की माताओं ने दाखिल किया था। याचिका में 2012 के यूजीसी विनियमों के सख्त अनुपालन और ठोस उपायों की मांग की गई थी। इसी न्यायिक निर्देश के आलोक में यूजीसी ने 2012 के पुराने नियमों को निरस्त कर 2026 के नए समता विनियम लागू किए। इनके औचित्य को राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 से भी जोड़ा गया है, जो समता और समावेशन को शैक्षिक नीति की आधारशिला मानती है। विनियमों की प्रस्तावना में धर्म, जाति, लिंग, जन्मस्थान और दिव्यांगता के आधार पर किसी भी प्रकार के भेदभाव के उन्मूलन की बात कही गई है। उद्देश्य के स्तर पर यह सर्वथा स्वीकार्य और आवश्यक है, किंतु समस्या तब उभरती है जब उद्देश्य और परिभाषाओं को साथ रखकर देखा जाता है।
यूजीसी के इस विनियम में जाति-आधारित भेदभाव की परिभाषा को केवल अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग तक सीमित कर दिया गया है। इससे यह संकेत मिलता है कि यह नियामक ढांचा मुख्यतः इन्हीं वर्गों के संरक्षण पर केंद्रित है। यही बिंदु सामान्य श्रेणी के छात्रों में असुरक्षा और भय की भावना को जन्म देता है। आलोचकों का तर्क है कि अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 पहले से ही लागू है। ऐसे में एक अतिरिक्त विनियम, जिसमें झूठी या दुर्भावनापूर्ण शिकायतों के लिए कोई स्पष्ट दंडात्मक प्रावधान नहीं है, एकतरफा व्यवस्था का रूप ले सकता है। सामान्य वर्ग के छात्रों का कहना है कि इससे वे स्वतः ही संदेह के दायरे में आ जाते हैं। मेरठ में मीडिया शिक्षा प्राप्त कर रहे विद्यार्थी नितेश तिवारी और टीना सोम का मानना है कि नई पीढ़ी में जातिगत भावनाएं पहले से ही कमजोर पड़ चुकी हैं, लेकिन ऐसे विनियम नई पीढ़ी को फिर से जातिवादी ढांचे में बाँध सकते हैं। इन विनियमों के तहत प्रत्येक उच्च शिक्षा संस्थान में समान अवसर केंद्र (ईओसी) और समता समिति का गठन अनिवार्य किया गया है। समितियों में अनुसूचित जाति, जनजाति, ओबीसी, दिव्यांग और महिलाओं का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया गया है, किंतु सामान्य श्रेणी के प्रतिनिधित्व को अनिवार्य नहीं बनाया गया। यही वह बिंदु है जिस पर आपत्ति सबसे अधिक मुखर है। सामान्य वर्ग के छात्रों का सवाल है कि जब निर्णय-निर्माण की प्रक्रिया में उनकी भागीदारी सुनिश्चित नहीं है, तो निष्पक्षता की गारंटी कैसे दी जा सकती है। विनियमों में सचल समता स्क्वॉड और 24×7 समता हेल्पलाइन की व्यवस्था भी की गई है। किंतु सामान्य श्रेणी के छात्रों के बीच इसे लेकर भी गहरी चिंता है। गोपनीय शिकायत और त्वरित कार्रवाई के प्रावधान उन्हें सुरक्षा से अधिक भय का वातावरण पैदा करने वाले प्रतीत होते हैं। मात्र एक आरोप से किसी छात्र या शिक्षक की शैक्षणिक और सामाजिक छवि को गंभीर क्षति पहुँच सकती है, भले ही बाद में आरोप निराधार सिद्ध हो जाए। झूठी शिकायतों से निपटने की स्पष्ट व्यवस्था का अभाव इस चिंता को और गहरा करता है।
इस विनियम को लेकर सामान्य वर्ग के छात्रों की आपत्ति मूलतः ‘समता’ की व्याख्या और उसके व्यावहारिक प्रभाव को लेकर है। उनका सवाल है कि ये विनियम वास्तव में सभी के लिए बराबरी सुनिश्चित नहीं करते हैं जिससे शैक्षिक संस्थानों में नए प्रकार के असंतुलन हो जायेगा। सामान्य वर्ग के छात्रों को आशंका है कि भविष्य में शैक्षणिक मूल्यांकन, छात्रावास आवंटन और अनुशासनात्मक कार्रवाइयों जैसे मामलों को भी जातिगत दृष्टि से देखा जाएगा। इससे शिक्षक-छात्र संबंधों में अविश्वास बढ़ सकता है और विश्वविद्यालयों का शैक्षणिक वातावरण प्रभावित हो सकता है।
कुछ शिक्षकों की चिंता शैक्षणिक गुणवत्ता और अकादमिक स्वतंत्रता को लेकर भी है। उनका मानना है कि विश्वविद्यालयों का मूल उद्देश्य ज्ञान, शोध और आलोचनात्मक चिंतन का विकास है। यदि प्रत्येक निर्णय पर निगरानी और दंड का दबाव रहेगा, तो संस्थागत स्वायत्तता प्रभावित होगी। इन नियमों का पालन न करने वाले शैक्षिक संस्थानों की डिग्री कार्यक्रम रोकने या मान्यता समाप्त करने जैसे प्रावधानों को वे प्रशासनिक नियंत्रण के विस्तार के रूप में देखते हैं। वैसे भी संकाय सदस्य पहले से ही अध्यापन-अध्ययन के अतिरिक्त अनेक समितियों के दायित्वों से बोझिल हैं।
यह भी चिंता का विषय है कि आजादी के 78 सालों के बाद भी इस प्रकार के जातिवादी चयनित विनियम बनाने की जरूरत बन रही है। इससे साफ जाहिर होता है कि इन 78 सालों में देश का इस दिशा में कोई विकास नहीं हुआ है। दूसरी ओर हम 2047 तक विकसित भारत का सपना देख रहे हैं। दरअसल यह विनियम शैक्षिक संस्थानों में सभी वर्ग के लिए बनाये जाते तो इसका स्वागत योग्य था। शैक्षिक संस्थानों में आज छात्रों के बीच सबसे अधिक भेदभाव क्षेत्रवाद को लेकर सामने आता है। जातिवादी सोच शैक्षिक संस्थानों से दूर हो रही है लेकिन इस प्रकार के नियमों से जातिवादी भावनाएं प्रबल होना स्वाभाविक है।
कानून विशेषज्ञों का भी कहना है कि यह विनियम ‘चयनित संरक्षण’ की अवधारणा को बढ़ावा देता है। एससी/एसटी कानूनों के दुरुपयोग की बहुत सारी शिकायतें पहले से ही न्यायालयों के सामने आती रही हैं। ऐसे में सामान्य वर्ग के छात्र अपने भविष्य और करियर को लेकर सशंकित हैं। उनका यह भी तर्क है कि यह विनियम संविधान में निहित समानता के अधिकार- अनुच्छेद 14 और 16- की भावना के प्रतिकूल है। इन्हीं आधारों पर कुछ कानूनविदों ने इस विनियम को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती भी दी है। उल्लेखनीय है कि 2012 के यूजीसी समता विनियमों में अन्य पिछड़ा वर्ग शामिल नहीं था, जिसे 2026 में जोड़ा गया है। इससे भी विरोध के स्वर और प्रखर हुए हैं। साथ ही, विनियमों के उल्लंघन पर संस्थानों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई का प्रावधान चिंता को और बढ़ाता है।
सोशल मीडिया पर इन नियमों को लेकर तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं और इससे जुड़े हैशटैग ट्रेंड कर रहे हैं। उत्तर प्रदेश में बरेली के एक वरिष्ठ पीसीएस अधिकारी अलंकार अग्निहोत्री द्वारा विरोधस्वरूप इस्तीफे की खबर ने बहस को और तेज कर दिया है। बढ़ते विरोध के बीच केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने कहा है कि इन विनियमों से किसी के साथ भेदभाव नहीं होने दिया जाएगा। किंतु जब नियम पहले ही लागू हो चुके हों, तो मौखिक आश्वासन पर्याप्त नहीं माने जा सकते।
 कुल मिलाकर, यूजीसी के समता विनियम-2026 उच्च शिक्षा के भविष्य को गहराई से प्रभावित करने वाले हैं। यदि इन्हें केवल कानूनी सख्ती के साथ लागू किया गया, तो असंतोष और बढ़ सकता है। समावेशन तभी टिकाऊ होगा, जब विनियम वास्तव में सभी के लिए संतुलित और न्यायपूर्ण हों। अब असली परीक्षा नीति-निर्माताओं की है कि क्या वे संतुलन की दिशा में कदम उठाएंगे या यह बहस और अधिक टकराव की ओर बढ़ेगी?
Prof. (Dr) Subhash Thaledi

डा. सुभाष थलेड़ी

(लेखक सामयिक विषयों के स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)
#UGCRules

January 27, 2026

अब हिन्दी को बांटने का षडयन्त्र

  विजय कुमार 

सितम्बर हिन्दी के वार्षिक श्राध्द का महीना है। हर संस्था और संस्थान इस महीने में हिन्दी दिवस, सप्ताह या पखवाड़ा मनाते हैं और इसके लिए मिले बजट को खा पी डालते हैं। इस मौसम में कवियों, लेखकों व साहित्यकारों को मंच मिलते हैं और कुछ को लिफाफे भी। इसलिए सब इस दिन की प्रतीक्षा करते हैं और अपने हिस्से का कर्मकांड पूरा कर फिर साल भर के लिए सो जाते हैं।
    पर हिन्दी दिवस (14 सितम्बर) के कर्मकांड के साथ ही कुछ विषयों पर चिंतन भी आवश्यक है। देश में प्राय: भाषा और बोली को लेकर बहस चलती रहती है। कुछ विद्वानों का मत है कि भोजपुरी, बुंदेलखंडी, मैथिली, बज्जिका, मगही, अंगिका, संथाली, अवधी, ब्रज, गढ़वाली, कुमाऊंनी, हिमाचली, डोगरी, हरियाणवी, उर्दू, मारवाड़ी, राजस्थानी, मेवाती, मालवी, छत्ताीसगढ़ी आदि हिन्दी से अलग भाषाएं हैं। इसलिए इन्हें भी भारतीय संविधान में स्थान मिलना चाहिए। इसके लिए वे तरह-तरह के तर्क और कुतर्क देते हैं। भाषा का एक सीधा सा विज्ञान है। बिना अलग व्याकरण के किसी भाषा का अस्तित्व नहीं माना जा सकता। उदाहरण के लिए ‘मैं जा रहा हूं’ का उपरिलिखित बोलियों में अनुवाद करें। एकदम ध्यान में आएगा कि उच्चारण भेद को यदि छोड़ दें, तो प्राय: इसका अनुवाद असंभव है। दूसरी ओर अंग्रेजी में इसका अनुवाद करें, तो प् ंउ हवपदहण् तुरन्त ध्यान में आता है। यही स्थिति मराठी, गुजराती, बंगला, कन्नड़ आदि की है। इसलिए अनुवाद की कसौटी पर किसी भी भाषा और बोली को आसानी से कसा जा सकता है।
    लेकिन इसके बाद भी अनेक विद्वान बोलियों को भाषा बताने और बनाने पर तुले हैं। कृपया वे बताएं कि तुलसीकृत श्रीरामचरितमानस और सूरदास की रचनाओं को को हिन्दी की मानेंगे या नहीं ? यदि इन्हें हिन्दी की बजाय अवधी और ब्रज की मान लें, तो फिर हिन्दी में बचेगा क्या ? ऐसे ही हजारों नये-पुराने भक्त कवियों, लेखकों और साहित्यकारों की रचनाएं हैं। यह सब एक षडयंत्र के अन्तर्गत हो रहा है, जिसे समझना आवश्यक है।यह षडयंत्र भारत में अंग्रेजों द्वारा शुरू किया गया। इसे स्वतंत्रता के बाद कांग्रेसी सरकारों ने पुष्ट किया और अब समाचार एवं साहित्य जगत में जड़ जमाए वामपंथी इसे बढ़ा रहे हैं। अंग्रेजों ने यह समझ लिया था कि भारत को पराधीन बनाये रखने के लिए यहां के हिन्दू समाज की आंतरिक एकता को बल प्रदान करने वाले हर प्रतीक को नष्ट करना होगा। अत: उन्होंने हिन्दू समाज में बाहर से दिखाई देने वाली भाषा, बोली, परम्परा, पूजा-पध्दति, रहन-सहन, खानपान आदि भिन्नताओं को उभारा। फिर इसके आधार पर उन्होंने हिन्दुओं को अनेक वर्गों में बांट दिया।
   इस काम में उनकी चौथी सेना अर्थात चर्च ने भरपूर सहयोग दिया। उन्होंने सेवा कार्यों के नाम पर जो विद्यालय खोले, उसमें तथा अन्य अंग्रेजी विद्यालयों में ऐसे लोग निर्मित हुए, जो लार्ड मेकाले के शब्दों में ‘तन से हिन्दू पर मन से अंग्रेज’ थे। इन्होंने सर्वप्रथम भारत के हिन्दू और मुसलमानों को बांटा। 1857 के स्वाधीनता संग्राम में दोनों ने मिलकर संघर्ष किया था। इसलिए इनके बीच गोहत्या से लेकर श्रीरामजन्मभूमि जैसे इतने विवाद उत्पन्न किये कि उसके कारण 1947 में देश का विभाजन हो गया। इस प्रकार उनका पहला षडयन्त्र (हिन्दुस्थान का बंटवारा) सफल हुआ।1947 में अंग्रेज तो चले गये; पर वे नेहरू के रूप में अपनी औलाद यहां छोड़ गये। नेहरू स्वयं को गर्व से अंतिम ब्रिटिश शासक कहते भी थे। उन्होंने इस षडयन्त्र को आगे बढ़ाते हुए हिन्दुओं को ही बांट दिया। हिन्दुओं के हजारों मत, सम्प्रदाय, पंथ आदि को कहा गया कि यदि वे स्वयं को अलग घोषित करेंगे, तो उन्हें अल्पसंख्यक होने का लाभ मिलेगा। इस भ्रम में हिन्दू समाज की खड्ग भुजा कहलाने वाले खालसा सिख और फिर जैन और बौध्द मत के लोग भी फंस गये। यह प्रक्रिया अंग्रेज ही शुरू कर गये थे। हिन्दू व सिखों को बांटने के लिए मि0 मैकालिफ सिंह और उत्तार-दक्षिण के बीच भेद पैदा करने में मि0 किलमैन और मि0 डेविडसन की भूमिका इतिहास में दर्ज है। ये तीनों आई.सी.एस अधिकारी थे।
  इसके बाद उन्होेंने वनवासियों को अलग किया। उन्हें समझाया कि तुम वायु, आकाश, सूर्य, चंद्रमा, सांप, पेड़, नदी .. अर्थात प्रकृति को पूजते हो, जबकि हिन्दू मूर्तिपूजक है। इसलिए तुम्हारा धर्म हिन्दू नहीं है। भोले वनवासी इस चक्कर में आ गये। फिर हिन्दू समाज के उस वीर वर्ग को फुसलाया, जिसे पराजित होने तथा मुसलमान न बनने के कारण कुछ निकृष्ट काम करने को बाध्य किया गया था। या जो परम्परागत रूप से श्रम आधारित काम करते थे। उन्हें अनुसूचित जाति कहा गया। इसी प्रकार क्षत्रियों के एक बड़े वर्ग को अन्य पिछड़ा वर्ग (ओ.बी.सी) नाम दिया गया। इस प्रकार हिन्दू समाज कितने टुकड़ों में बंट सकता है, इस प्रयास में मेकाले से लेकर नेहरू और विश्वनाथ प्रताप सिंह से लेकर वामपंथी बुध्दिजीवी तक लगे हैं। हिन्दुस्थान और हिन्दुओं को बांटने के बाद अब उनकी दृष्टि हिन्दी पर है। व्यापक अर्थ में संस्कृत मां के गर्भ से जन्मी और भारत में कहीं भी विकसित हुई हर भाषा हिन्दी ही है। ऐसी हर भाषा राष्ट्रभाषा है, चाहे उसका नाम तमिल, तेलुगू, पंजाबी या मराठी कुछ भी हो। यद्यपि रूढ़ अर्थ में इसका अर्थ उत्तार भारत में बोली और पूरे देश में समझी जाने वाली भाषा है। इसलिए राष्ट्रभाषा के साथ ही यह सम्पर्क भाषा भी है। जैसे गरम रोटी को एक बार में ही खाना संभव नहीं है। इसलिए उसके कई टुकड़े किये जाते हैं, फिर उसे ठंडाकर धीरे-धीरे खाते हैं। इसी तरह अब बोलियों को भाषा घोषित कर हिन्दी को तोड़ने का षडयन्त्र चल रहा है।
  अंग्रेजों के मानसपुत्रों और देशद्रोही वामपंथियों के उद्देश्य तो स्पष्ट हैं; पर दुर्भाग्य से हिन्दी के अनेक साहित्यकार भी इस षडयन्त्र के मोहरे बन रहे हैं। उनका लालच केवल इतना है कि यदि इन बोलियों को भाषा मान लिया गया, तो फिर इनके अलग संस्थान बनेंगे। इससे सत्ताा के निकटस्थ कुछ वरिष्ठ साहित्यकारों को महत्वपूर्ण कुर्सियां, लालबत्ताी वाली गाड़ी, वेतन, भत्तो आदि मिलेंगे। कुछ लेखकों को पुरस्कार और मान-सम्मान मिल जाएंगे, कुछ को अपनी पुस्तकों के प्रकाशन के लिए शासकीय सहायता; पर वे यह भूलते हैं कि आज तो उन्हें हिन्दी का साहित्यकार मान कर पूरे देश में सम्मान मिलता है; पर तब वे कुछ जिलों में बोली जाने वाली, निजी व्याकरण्ा से रहित एक बोली (या भाषा) के साहित्यकार रह जाएंगे। साहित्य अकादमी और दिल्ली में जमे उसके पुरोधा भी इस विवाद को बढ़ाने में कम दोषी नहीं हैं।भाषा और बोली के इस विवाद से अनेक राजनेता भी लाभ उठाना चाहते हैं। उन्हें लगता है कि भारत में अनेक राज्यों का निर्माण भाषाई आधार पर हुआ है। यदि आठ-दस जिलों में बोली जाने वाली हमारी बोली को भाषा मान लिया गया, तो इस आधार पर अलग राज्य की मांग और हिंसक आंदोलन होंगे। आजकल गठबंधन राजनीति और दुर्बल केन्द्रीय सरकारों का युग है। ऐसे में हो सकता है कभी केन्द्र सरकार ऐसे संकट में फंस जाए कि उसे अलग राज्य की मांग माननी पडे। यदि ऐसा हो गया, तो फिर अलग सरकार, मंत्री, लालबत्ताी और न जाने क्या-क्या ? एक बार मंत्री बने तो फिर सात पीढ़ियों का प्रबंध करने में कोई देर नहीं लगती।
   बोलियों को भाषा बनाने के षडयन्त्र में कुछ लोग तात्कालिक स्वार्थ के लिए सक्रिय हैं, जबकि राष्ट्रविरोधी हिन्दुस्थान और हिन्दू के बाद अब हिन्दी को टुकड़े-टुकड़े करना चाहते हैं, जिससे उसे ठंडा कर पूरी तरह खाया जा सके। विश्व की कोई समृध्द भाषा ऐसी नहीं है, जिसमें सैकड़ों उपभाषाएं, बोलियां या उपबोलियां न हों। हिन्दी के साथ हो रहे इस षडयन्त्र को देखकर अन्य भारतीय भाषाओं के विद्वानों को खुलकर इसका विरोध करना चाहिए। यदि आज वे चुप रहे, तो हिन्दी की समाप्ति के बाद फिर उन्हीं की बारी है। देश में मुसलमान और अंग्रेजों के आने पर हमारे राजाओं ने यही तो किया था। जब उनके पड़ोसी राज्य को हड़पा गया, तो वे यह सोचकर चुप रहे कि इससे उन्हें क्या फर्क पड़ता है; पर जब उनकी गर्दन दबोची गयी, तो वे बस टुकुर-टुकुर ताकते ही रह गये।
  हिन्दी संस्थानों के मुखियाओं को भी अपना हृदय विशाल करना होगा। इनके द्वारा प्रदत्ता पुरस्कारों की सूची देखकर एकदम ध्यान में आता है कि अधिकांश पुरस्कार राजधानी या दो चार बड़े शहरों के कुछ खास साहित्यकारों में बंट जाते हैं। जिस दल की प्रदेश में सत्ताा हो, उससे सम्बन्धित साहित्यकार चयन समिति में होते हैं और वे अपने निकटस्थ लेखकों को सम्मानित कर देते हैं। इससे पुरस्कारों की गरिमा तो गिर ही रही है, साहित्य में राजनीति भी प्रवेश कर रही है। जो लेखक इस उठापटक से दूर रहते हैं, उनके मन में असंतोष का जन्म होता है, जो कभी-कभी बोलियों की अस्मिता के नाम पर भी प्रकट हो उठता है। इसलिए भाषा संस्थानों को राजनीति से पूरी तरह मुक्त रखकर प्रमुख बोलियों के साहित्य के लिए भी अच्छी राशि वाले निजी व शासकीय पुरस्कार स्थापित होने आवश्यक हैं।भाषा और बोली में चोली-दामन का साथ है। भारत जैसे विविधता वाले देश में ‘तीन कोस पे पानी और चार कोस पे बानी’ बदलने की बात हमारे पूर्वजों ने ठीक ही कही है। जैसे जल से कमल और कमल से जल की शोभा होती है, इसी प्रकार हर बोली अपनी मूल भाषा के सौंदर्य में अभिवृध्दि ही करती है। बोली रूपी जड़ों से कटकर कोई भाषा जीवित नहीं रह सकती। दुर्भाग्य से हिन्दी को उसकी जड़ों से ही काटने का प्रयास हो रहा है। इस षडयन्त्र को समझना और हर स्तर पर उसका विरोध आवश्यक है। बिल्लियों के झगड़े में बंदर द्वारा लाभ उठाने की कहानी प्रसिध्द है। भाषा और बोली के इस विवाद में ऐसा ही लाभ अंग्रेजी उठा रही है।
VIJAY KUMAR, WRITER

विजय कुमार, लेखक, पत्रकार

Vijai Kumar

Writer, Columnist & Auther,

विजय कुमार, संकटमोचन, रामकृष्णपुरम् – 6, नई दिल्ली – 22
e-mail: vijai_juneja@yahoo.com

January 26, 2026

श्रद्धांजलि: मार्क टली सर.. आप बहुत याद आएंगे…..

Mark Tuli, BBC Correspondent India

बीबीसी संवाददाता मार्क टुली (फाइल फोटो, वरिष्ठ पत्रकार रतिभान त्रिपाठी के साथ)

रतिभान त्रिपाठी, वरिष्ठ पत्रकार, राज्य मुख्यालय लखनऊ की फेसबुक वाल से साभार

Ratibhan Tripathi Senior Journalist

पत्रकारिता जगत में दैदीप्यमान नक्षत्र सरीखे पत्रकार और लेखक सर विलियम मार्क टली का रविवार को निधन हो गया। 90 वर्ष के मार्क टली भारत में बीबीसी के लिए काम करने वाले सबसे चर्चित पत्रकार रहे हैं। बीबीसी के लिए यूं तो वह अंग्रेजी में रिपोर्टिंग करते थे लेकिन उनका हिंदी ज्ञान ग़ज़ब का था। उनकी और मेरी पहली मुलाकात स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, जाने-माने पत्रकार व लेखक और पंडित नेहरू व इंदिरा गांधी के करीब रहे पीडी टंडन के प्रयागराज स्थित आवास में हुई थी। संभवतः वह किसी फ्रांसीसी फिल्म निर्माता के साथ टंडन जी से मिलने आए थे। फिल्म निर्माता फिरोज गांधी पर कोई डाॅक्यूमेंट्री बनाने की तैयारी में थे। टंडन जी ने उसी वक्त मुझे भी अपने घर बुलाया था। तब मैं दैनिक जागरण में रिपोर्टिंग करता था। उन्होंने ही मार्क टली से मेरा परिचय कराया था।
अंग्रेज से अंग्रेजी भाषा में बोलने की अपेक्षा की जाती है लेकिन मार्क ने मुझसे हिंदी में बात की, अच्छी हिंदी में बात की। उनके बोल-चाल से लग ही नहीं रहा था कि वह अंग्रेज हैं। उनका उच्चारण विशुद्ध भारतीय था। उनका अंदाज देखकर मुझे बहुत सुखद अनुभूति हुई थी। वह तन से तो अंग्रेज थे लेकिन मन से भारतीय ही थे। ईसाई होते हुए भी वह एक हिंदू की तरह दाहिने हाथ में कलावा बांधते थे।
बातचीत में मार्क ने मुझे अपने जीवन की बहुत सारी बातें बताई थीं और अपना विजिटिंग कार्ड दिया था। मेरा नंबर भी लिया था। बाद में जब वह फिर से प्रयागराज आए तो मुझे फोन किया और जिस होटल में ठहरे थे, वहीं बुलाया। वह किसी रिपोर्टिंग के सिलसिले में ही आए थे। हम लोगों ने घंटों बातचीत की, चाय पी। उसी समय उन्होंने अपने साथ अयोध्या में हुई घटना का जिक्र करते हुए बताया था कि कारसेवकों ने उन्हें किस तरह बंधक बनाया था। फिर प्रशासन ने उन्हें कैसे मुक्त कराया था। पत्रकारिता के लिए उन्हें पहले पद्मश्री और फिर पद्मभूषण सम्मान से भी नवाजा जा चुका है। उन्होंने भारतीय राजनीति समेत अनेक विषयों पर कई महत्वपूर्ण किताबें भी लिखी हैं।
मार्क टली को भारत और भारतीय परंपराओं का अच्छा ज्ञान था। उन्हें भारतीय परंपराओं से लगाव भी कम नहीं था। 1935 में कलकत्ता में जन्मे मार्क टली ने मुलाकात के दौरान बातचीत में मुझसे कहा था कि रतिभान जी, मैं हर हाल में भारत में रहना चाहता हूं। उनकी यह चाहत पूरी भी हुई। आज जब मार्क टली नहीं रहे तो उनकी यादों की बरात सी आ गई। उनके सान्निध्य में बिताए पल, उनकी बातचीत और हंसता मुस्कुराता चेहरा याद आ रहा है। अलविदा मार्क टली सर…आप बहुत याद आएंगे। आपकी पत्रकारिता और भारत के लिए प्रेम सदा याद किया जाएगा।

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