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विश्वविद्यालय, सत्ता और साहित्य की अपमानित गरिमा

January 10, 2026

विश्वविद्यालय, सत्ता और साहित्य की अपमानित गरिमा

Freelance writer

– डॉ. प्रियंका सौरभ
गुरु घासीदास विश्वविद्यालय, बिलासपुर, छत्तीसगढ़ में आयोजित एक साहित्यिक कार्यक्रम के दौरान हिन्दी के वरिष्ठ कथाकार मनोज रूपड़ा के साथ हुआ सार्वजनिक दुर्व्यवहार केवल एक दुर्भाग्यपूर्ण घटना नहीं है, बल्कि यह हमारे समय के अकादमिक और सांस्कृतिक जीवन में गहराते संकट का स्पष्ट संकेत है। किसी आमंत्रित लेखक को मंच पर अपमानित करना और कार्यक्रम से बाहर जाने के लिए कहना उस परंपरा के सर्वथा विपरीत है, जिसमें विश्वविद्यालयों को विचारों के मुक्त आदान–प्रदान, असहमति के सम्मान और रचनात्मक संवाद के केंद्र के रूप में देखा जाता रहा है। यह घटना व्यक्ति-विशेष तक सीमित नहीं है; यह साहित्य, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और बौद्धिक गरिमा पर सीधा आघात है।
विश्वविद्यालयों की ऐतिहासिक भूमिका सत्ता के अनुचर बनने की नहीं रही है। नालंदा और तक्षशिला जैसी प्राचीन ज्ञान-परंपराओं से लेकर आधुनिक विश्वविद्यालयों तक, इन संस्थानों ने सदैव प्रश्न पूछने, तर्क करने और स्थापित धारणाओं को चुनौती देने की संस्कृति को बढ़ावा दिया है। विश्वविद्यालय केवल डिग्री प्रदान करने वाली मशीनें नहीं होते, बल्कि वे समाज की चेतना को दिशा देने वाले केंद्र होते हैं। यहां विचारों की विविधता, मतभेद और बहस को कमजोरी नहीं, बल्कि बौद्धिक शक्ति माना जाता है। ऐसे में जब किसी विश्वविद्यालय के भीतर सत्ता-प्रदर्शन, अहंकार और असहिष्णुता का दृश्य सामने आता है, तो यह केवल एक कार्यक्रम की विफलता नहीं, बल्कि संस्थागत मूल्यों के क्षरण का प्रमाण बन जाता है।
मनोज रूपड़ा समकालीन हिन्दी कथा साहित्य का एक सशक्त और प्रतिष्ठित नाम हैं। उनकी कहानियाँ और उपन्यास सत्ता, समाज और व्यक्ति के जटिल संबंधों को बेबाकी से उजागर करते हैं। वे उन लेखकों में शामिल हैं जिन्होंने साहित्य को केवल सौंदर्य का विषय नहीं, बल्कि सामाजिक हस्तक्षेप का माध्यम माना है। ऐसे लेखक को आमंत्रित करना स्वयं विश्वविद्यालय की बौद्धिक प्रतिबद्धता और खुलेपन का प्रतीक होना चाहिए था। किंतु उनके साथ हुआ व्यवहार यह दर्शाता है कि कहीं न कहीं आलोचनात्मक दृष्टि और स्वतंत्र विचार से असहजता ने विवेक पर विजय पा ली। यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या विश्वविद्यालय अब केवल औपचारिक आयोजनों, प्रशस्ति-पाठों और सत्ता-अनुकूल वक्तव्यों तक सीमित रह जाएंगे?
कुलपति जैसे पद से केवल प्रशासनिक दक्षता की नहीं, बल्कि नैतिक नेतृत्व और अकादमिक संवेदनशीलता की अपेक्षा की जाती है। यह पद संयम, संवाद और समावेशन का प्रतीक होना चाहिए। विश्वविद्यालय का मुखिया यदि आलोचना या असहमति को व्यक्तिगत चुनौती मानने लगे, तो उसका प्रभाव केवल एक कार्यक्रम तक सीमित नहीं रहता। भय का वातावरण धीरे-धीरे पूरे परिसर में फैलने लगता है। शिक्षक खुलकर बोलने से कतराने लगते हैं, विद्यार्थी प्रश्न पूछने से डरने लगते हैं और रचनात्मकता आत्म-सेंसरशिप की भेंट चढ़ जाती है। ऐसी स्थिति में विश्वविद्यालय अपने मूल उद्देश्य से भटक जाता है और ज्ञान का केंद्र होने के बजाय अनुशासन और नियंत्रण का उपकरण बन जाता है।
इस घटना का एक और चिंताजनक पक्ष यह है कि संस्थागत स्तर पर आमंत्रित साहित्यकार के सम्मान की रक्षा के लिए अपेक्षित संवेदनशीलता और दृढ़ता दिखाई नहीं दी। साहित्यिक आयोजनों की सफलता केवल मंच-सज्जा, पोस्टरों और औपचारिक भाषणों से नहीं मापी जाती, बल्कि इस बात से तय होती है कि वहां संवाद कितना खुला, सम्मानजनक और अर्थपूर्ण रहा। जब किसी लेखक का अपमान होता है और संस्था मौन साध लेती है, तो वह मौन भी एक प्रकार की स्वीकृति बन जाता है। यह चुप्पी भविष्य में और अधिक दमनकारी व्यवहारों को प्रोत्साहित करती है और संस्थान की नैतिक विश्वसनीयता को कमजोर करती है।
यह याद दिलाना आवश्यक है कि विश्वविद्यालय किसी व्यक्ति या पदाधिकारी की निजी जागीर नहीं होते। वे सार्वजनिक संसाधनों, करदाताओं के धन और समाज के विश्वास से संचालित होते हैं। यहां लिए गए निर्णय और प्रदर्शित व्यवहार समाज के लिए संदेश का काम करते हैं। यदि विश्वविद्यालयों में सत्ता का मद, व्यक्तिगत अहंकार और असहिष्णुता हावी हो जाए, तो समाज में संवाद की जगह टकराव और भय की संस्कृति पनपने लगती है। यह प्रवृत्ति न केवल साहित्य और शिक्षा के लिए, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए भी घातक है, क्योंकि लोकतंत्र का आधार ही विचारों की बहुलता और असहमति का सम्मान है।
भारतीय लोकतंत्र की आत्मा में साहित्य और बौद्धिक विमर्श की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। आज़ादी की लड़ाई से लेकर सामाजिक सुधार आंदोलनों तक, लेखकों और विचारकों ने सत्ता से सवाल पूछे हैं और समाज को आत्मावलोकन के लिए प्रेरित किया है। यदि आज विश्वविद्यालयों में ही लेखकों और विचारकों को अपमानित किया जाएगा, तो यह उस परंपरा का घोर अपमान होगा जिसने हमें एक जीवंत लोकतांत्रिक समाज बनाया है। यह विडंबना ही है कि जिन संस्थानों से वैचारिक नेतृत्व की अपेक्षा की जाती है, वही यदि असहिष्णुता का उदाहरण प्रस्तुत करने लगें, तो समाज किस दिशा में जाएगा?
इस पूरे घटनाक्रम में यह अवश्य उल्लेखनीय है कि विश्वविद्यालय के कुछ अध्यापकों ने स्थिति को संभालने और सम्मानजनक समाधान खोजने का प्रयास किया। यह दर्शाता है कि संस्थान के भीतर अभी भी विवेक और संवेदनशीलता पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है। किंतु यह भी सत्य है कि जब सत्ता का मद विवेक पर हावी हो जाता है, तब व्यक्तिगत प्रयास अक्सर निष्प्रभावी सिद्ध होते हैं। संस्थागत संस्कृति तभी बदलती है, जब नेतृत्व स्वयं संवाद और आत्मालोचना के लिए तैयार हो।
यह घटना हमें साहित्यकारों और बौद्धिक वर्ग की भूमिका पर भी पुनर्विचार करने के लिए मजबूर करती है। जब किसी लेखक के साथ अन्याय होता है और पूरा साहित्यिक समुदाय मौन साध लेता है, तो यह मौन स्वयं में एक राजनीतिक और नैतिक वक्तव्य बन जाता है। इतिहास साक्षी है कि चुप्पी ने हमेशा सत्ता को मजबूत किया है और प्रतिरोध को कमजोर। यदि आज इस घटना पर स्पष्ट और सामूहिक प्रतिक्रिया नहीं होगी, तो कल किसी और लेखक, किसी और विचार और किसी और मंच पर यही दुहराया जाएगा।
साहित्य का मूल स्वभाव प्रश्नाकुलता और प्रतिरोध का है। वह सत्ता के समक्ष नतमस्तक होने के लिए नहीं, बल्कि उसे आईना दिखाने के लिए पैदा हुआ है। यदि साहित्यकार ही अपने सम्मान और स्वतंत्रता की रक्षा के लिए खड़े नहीं होंगे, तो साहित्य धीरे-धीरे केवल करियर और पुरस्कारों तक सिमट जाएगा। तब वह समाज की आत्मा नहीं, बल्कि व्यवस्था का सजावटी उपकरण बनकर रह जाएगा।
आज आवश्यकता है कि विश्वविद्यालय प्रशासन, शिक्षक, विद्यार्थी और साहित्यिक समाज इस घटना से सबक लें। विश्वविद्यालयों को आत्ममंथन करना होगा कि वे किस प्रकार के अकादमिक वातावरण को बढ़ावा दे रहे हैं। क्या वे संवाद और बहस को प्रोत्साहित कर रहे हैं, या भय और आज्ञाकारिता को? साहित्यिक आयोजनों को केवल औपचारिकता के रूप में नहीं, बल्कि जीवंत वैचारिक मंच के रूप में देखना होगा, जहां असहमति भी सम्मान के साथ व्यक्त की जा सके।
यह घटना शर्मनाक है और इसकी कड़ी निंदा आवश्यक है, लेकिन निंदा से आगे बढ़कर ठोस आत्मालोचना और सुधार की आवश्यकता है। विश्वविद्यालयों को यह सुनिश्चित करना होगा कि भविष्य में किसी भी आमंत्रित लेखक या वक्ता के साथ ऐसा व्यवहार न हो। अकादमिक स्वतंत्रता और गरिमा की रक्षा केवल कागजी नीतियों से नहीं, बल्कि व्यवहार और संस्कृति से होती है।
अंततः प्रश्न केवल मनोज रूपड़ा या किसी एक कार्यक्रम का नहीं है। प्रश्न यह है कि हम किस प्रकार के विश्वविद्यालय और किस प्रकार का समाज बनाना चाहते हैं। यदि हम विचार से डरेंगे, प्रश्न से घबराएंगे और असहमति को अपमान से दबाने की कोशिश करेंगे, तो हम एक जीवंत लोकतंत्र की जगह एक भयग्रस्त समाज की ओर बढ़ेंगे। विश्वविद्यालयों को यह याद रखना होगा कि उनका अस्तित्व सत्ता की कृपा से नहीं, बल्कि ज्ञान, संवाद और स्वतंत्र चेतना से है। यदि यही चेतना कुचल दी गई, तो विश्वविद्यालय केवल इमारतें रह जाएंगे—ज्ञान के नहीं, बल्कि मौन के स्मारक।
-प्रियंका सौरभ
रिसर्च स्कॉलर इन पोलिटिकल साइंस,
कवयित्री, स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार,
उब्बा भवन, आर्यनगर, हिसार (हरियाणा)-127045
(मो.) 7015375570 (वार्ता+वाट्स एप)
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अनुमान से दो गुने श्रद्धालु आये पौष पूर्णिमा स्नान परः योगी आदित्यनाथ

प्रयागराज, 10 जनवरी 2026, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने आज प्रयागराज भ्रमण के दौरान कहा कि उन्हें पावन त्रिवेणी में दर्शन और स्नान करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है। विगत वर्ष इस समय प्रयागराज महाकुम्भ आयोजन की अन्तिम तैयारियां युद्धस्तर पर थीं। तब वह 10 जनवरी, 2025 को प्रयागराज में मेले के अंतिम तैयारियां देखने यहां आये थे। इस वर्ष का माघ मेला पूरी भव्यता के साथ पौष पूर्णिमा 03 जनवरी, 2026 से प्रारम्भ हो गया है। यह आयोजन आगामी 15 फरवरी तक चलेगा। अनुमान किया गया था कि पौष पूर्णिमा पर 10 से 15 लाख श्रद्धालु आएंगे, लेकिन पौष पूर्णिमा पर 31 लाख से अधिक श्रद्धालुओं ने माँ गंगा, माँ यमुना तथा माँ सरस्वती की पावन त्रिवेणी पर आकर भगवान वेणी माधव, बड़े हनुमान जी व अक्षयवट के असीम सान्निध्य में सकुशल स्नान और यहां से आशीर्वाद लेकर प्रस्थान किया। कल्पवासी एक महीने के कल्पवास के लिए वर्तमान में अपनी साधना में तल्लीन हैं।

मीडिया से बातचीत करते हुए मुख्यमंत्री  ने कहा कि आज उन्हें भगवान रामानन्दाचार्य जी के 726वें पावन जयन्ती कार्यक्रम में भाग लेने का अवसर प्राप्त हुआ। प्रयागराज का सौभाग्य है कि यह अनेक पूज्य ऋषि-मुनियों की पावन धरा है। द्वादश माधव के साथ-साथ त्रिवेणी की पावन धरा को महर्षि भारद्वाज, महर्षि याज्ञवल्क्य और अन्य पूज्य महर्षियों व सिद्ध संतों का सान्निध्य प्राप्त हुआ है। 726 वर्ष पूर्व इसी पावन धरा पर जगद्गुरु रामानन्दाचार्य जी का जन्म हुआ था। आज उनके पावन जन्मोत्सव कार्यक्रम के साथ ही माघ मेले की तैयारियों की समीक्षा की गयी। यहां आगामी 14 व 15 जनवरी को मकर संक्रान्ति स्नान तथा आगामी 18 जनवरी को मौनी अमावस्या का मुख्य स्नान होगा। इसके उपरान्त 23 जनवरी को बसंत पंचमी और फिर माघ पूर्णिमा के साथ ही 15 फरवरी को महाशिवरात्रि का स्नान यहां पर सम्पन्न होगा। यह सभी माघ मेले के कार्यक्रम का हिस्सा होंगे।

मुख्यमंत्री ने कहा कि माघ मेले के सम्पूर्ण आयोजन के लिए प्रशासन, पुलिस और सम्बन्धित विभागों ने समस्त तैयारियां की हैं। पूर्व की तुलना में घाटों की लम्बाई बढ़ायी गयी है। स्वच्छता का विशेष ध्यान रखा गया है। भीषण शीत लहरी से बचाव के लिए आवश्यक उपाय किए गए हैं। पब्लिक एड्रेस सिस्टम के साथ ही मेले से जुड़े हुए ‘मेला सेवा ऐप’ का भी शुभारम्भ किया गया है। किसी भी कल्पवासी, सन्त तथा श्रद्धालु को यदि कोई सेवा लेनी हो, या उन्हें किसी प्रकार की समस्या हो तो वह इस मोबाइल ऐप के माध्यम से जानकारी प्राप्त कर सेवाओं का उपयोग कर सकते हैं तथा प्रशासन के समक्ष अपनी बात रख सकते हैं। यहां पर इस मोबाइल ऐप का बेहतर उपयोग किया जा रहा है।
मुख्यमंत्री जी ने कहा कि आपसी समन्वय तथा तत्परता के साथ प्रशासन ने पौष पूर्णिमा के स्नान को भव्यता व संवाद के साथ सबके सहयोग से सकुशल सम्पन्न कराया। आगामी सभी पांच स्नान भी उसी पवित्रता, संवाद और समन्वय के साथ सकुशल सम्पन्न होंगे। इसी मुद्दे पर आज यहां पर चर्चा की गयी है। आयोजन को सकुशल सम्पन्न कराने के लिए प्रशासन पूरी तत्परता के साथ लगा हुआ है। सभी लोग मिलकर इस कार्यक्रम को सकुशल सम्पन्न कराएंगे।

 

January 9, 2026

धामी सरकार बनवाएगी देहरादून में नया प्रेस क्लब भवन

देहरादून, 09 जनवरी 2026, मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने घोषणा की है कि उत्तरांचल प्रेस क्लब का नया और आधुनिक सुविधा सम्पन्न प्रेस क्लब बनाया जाएगा। यह घोषणा उन्हें आज उत्तरांचल प्रेस क्लब की नई कार्यकारिणी के शपथ ग्रहण समारोह में की।

श्री धामी ने कहा कि नये भवन का निर्माण कार्य शीघ्र शुरु किया जाएगा। इसके लिए मसूरी देहरादून विकास प्राधिकरण (एमडीडीए) को कार्यदायी संस्था बनाया गया है। उन्होंने बताया कि उत्तरांचल प्रेस क्लब को माडल प्रेस क्लब बनाया जाएगा। इसकी स्वीकृति कैबिनेट की बैठक में हो चुकी है। उन्होने कहा कि डिजिटल युग मे सोशल मीडिया के माध्यम से फैल रहीं फेक न्यूज और भ्रामक सूचनाओं के बीच पत्रकारों की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है। निष्पक्ष, तथ्यात्मक और जिम्मेदार पत्रकारिता ही समाज को भ्रम से बचा सकती है।

पत्रकार पेंशन योजना का बजट बढाकर 5 से किया 10 करोड़

मुख्यमंत्री धामी ने बताया कि पत्रकारों की पेंशन योजना का बजट भी बढ़ा दिया गया है। इसे पांच करोड़ से बढ़ाकर 10 करोड़ कर दिया गया है।

समारोह में नवनिर्वाचित अध्यक्ष अजय सिंह राणा, वरिष्ठ उपाध्यक्ष गजेन्द्र सिंह नेगी, कनिष्ठ उपाध्यक्ष सोबन सिंह गुसाईं, महामंत्री योगेश सेमवाल, संयुक्त मंत्री सिवेश शर्मा, मीना नेगी, कोषाध्यक्ष मनीष डंगवाल को मुख्यमंत्री धामी ने शपथ ग्रहण करायी। समारोह में मेयर सौरभ थपलियाल, भाजपा नेता डा देवेन्द्र भसीन, महानिदेशक जनसम्पर्क विभाग बंशीधर तिवारी मौजूद थे।

अंकिता भंडारी हत्याकाण्ड में सीबीआई जांच की संस्तुति

 

देहरादून, 09 जनवरी 2026, मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने अंकिता भंडारी हत्याकाण्ड में सीबीआई जांच की संस्तुति कर दी है। उन्होंने आज अपनी संस्तुति रिपोर्ट केन्द्र सरकार को भेज दी है। अब केन्द्र सरकार इस पर निर्णय लेकर सीबीआई को भेजेगी।

अंकिता भंडारी हत्याकाण्ड पर पिछले करीब 20 दिन से घमासान मचा हुआ है। पूरे उत्तराखंड में इस मामले की नए सिरे से गूंज हो रही है। लोगों की जनभावनाओं और अंकिता भंडारी के माता पिता की इच्छा पर प्रदेश सरकार ने फैसला ले लिया है। हालांकि अभी दो दिन पहले ही जब अंकिता के माता पिता से मुख्यमंत्री धामी मिले थे तो उन्होंने आश्वासन दे दिया था कि वे जो चाहें वही फैसला होगा। तभी से लगने लगा था कि मुख्यमंत्री मामले की सीबीआई जांच की संस्तुति की मन बना चुके हैं।

मामला पिछली 24 जनवरी से चर्चा से एक बार फिर चर्चा में आया था। जब हरिद्वार के ज्वालापुर के पूर्व विधायक सुरेश राठौर की स्वयं को पत्नी बताने वाली उर्मिला सनावर ने आडियो जारी कर कहा था कि अंकिता की हत्या में दो वीआईपी भी इंवाल्व हैं। इसके बाद से ही इस मामले ने तूल पकड़ लिया था। बाद में उर्मिला सनावर ने दो वरिष्ठ नेताओं के नाम भी जारी किये।

उधर पर्वतीय क्षेत्र की जनता की भावना को देखते हुए कांग्रेस ने इस मामले में राजनीति शुरु कर दी। उसे लगा कि यह प्रदेश सरकार और भाजपा को घेरने का बड़ा मुद्दा है। इसीलिए कांग्रेस ने आंदोलन शुरु कर दिया। पहले देहरादून में मार्च निकाला और फिर बंद का आह्वान कर दिया। हालांकि सरकार ने आनन फानन में एक एसआईटी की गठन कर दिया था। किन्तु इससे मामला शांत नहीं हो रहा था और सीबीआई जांच का दवाब बढ़ता चला जा रहा था।

ज्ञातव्य है अंकिता भंडारी ऋषिकेश के वनन्तरा रिजार्ट में रिसेप्शनिस्ट थी। 18 सितम्बर 2022 को उसकी हत्या कर दी गई थी। उसका शव एक हफ्ते बाद एक नहर से बरामद हुआ था। मामले में रिजोर्ट के मालिक समेत तीन लोगों को गिरफ्तार किया गया था। उन्हें निचली अदालत ने आजीवन कारावास की सजा सुनाई है।

फ्रीलांस इंफ्लुएंसर्स और यू ट्यूबर्स को दूरदर्शन पर मिलेगा मौका, आमदनी में होगी 90 प्रतिशत तक हिस्सेदारी

नई दिल्ली, 09 जनवरी 2026, फ्रीलांस इंफ्लुएंसर्स, यू ट्यूबर्स और कंटेंट क्रिएटर्स को प्रसार भारती बड़ा मौका लेकर आ रही है। प्रसार भारती के प्लेटफार्म और दूरदर्शन पर इंफ्लुएंसर्स कार्नर शुरु होगा। इसमें देशभर के अच्छ कंटेट एकत्रित करने और स्टोरी बनाने वाले स्वतंत्र इंफ्लुएंसर्स को दूरदर्शन 30 मिनट का प्राइम टाइम प्रदान करेगा। इस टाइम में कंटेट जारी किया जाएगा।

जानकारी के अनुसार प्रसार भारती ने वर्ष 2026 के लिए यह क्रांतिकारी कदम उठाया है। इस साल प्रसार भारती के अधीन कार्य कर रहे दूरदर्शन और आकाशवाणी पर इन स्वतंत्र इंफ्लूएंसर्स को अपनी प्रतिभा दिखाने का मौका मिलेगा। ये इँफ्लुएंसर्स अभी तक अपने स्तर से कंटेट एकत्रित करके उन्हें सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर ही प्रसारित कर रहे थे। इतना ही नहीं प्रसार भारती इंफ्लुएंसर्स कार्नर के 30 मिनट के प्राइम टाइम में मिलने वाले विज्ञापन राजस्व में से 90 प्रतिशत फ्रीलांसर्स को ही दे देगी। शेष 10 प्रतिशत धनराशि दूरदर्शन के पास रहेगी।

कंटेंट का चयन एक निर्धारित प्रक्रिया के तहत प्रसार भारती की विशेषज्ञ टीम करेगी। यह टीम कंटेंट को स्वीकृत करेगी। इसके बाद ही प्रसार भारती के प्लेटफार्म जैसे दूरदर्शन, आकाशवाणी, वेब पोर्टल पर सामग्री जारी होगी। इस फैसले से जहां कंटेंट क्रिएटर्स और इंफ्लुएंसर्स को प्रतिभा दिखाने के साथ साथ आर्थिक स्रोत भी उपलब्ध होगा, वहीं दूरदर्शन की लोकप्रियता और बढ़ेगी।

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