प्रहार पर प्रहार जो करते है रात-दिन, आजादी में तुम्हारा, क्या योगदान है?
कितने ही भुलाए गए, कितने छिपाए गए,अनगिनत का समाया, इसमें प्राण दान है।
एक रीति-नीति से बद्ध ,सत्ता के करीबी थे जो,इतिहास ने उनका ही गाया गुणगान है।
हुंकार से हिल गईं,अंग्रेजी शासन की चूलें, उनको उग्रवादी कह,जाने क्यों बुलाया गया।
खून और पसीना जिनका, आजादी में है शामिल, ऐसे महापुरुषों को मेरा प्रणाम है।
मेरी स्वरचित ये पंक्तियां उद्घाटित करती है कि भारत की आजादी में अनेकानेक लोगों का योगदान है।कतिपय को इतिहास के पन्नों में उनके कार्य और बलिदान के अनुरूप उचित स्थान नहीं मिल पाया तो इसका कदापि ये अर्थ नहीं है कि वे वन्दनीय, स्मरणीय व स्तुत्य नहीं है। ऐसे ही महापुरुष हैं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रथम सरसंघचालक केशवराव बलिराम हेडगेवार। जिनके विषय में देश के कुछ दल और लोग कहते हैं कि देश की आजादी में संघ का कोई योगदान नहीं रहा। वास्तव में ऐसे लोग डॉ. हेडगेवार द्वारा आजादी हेतु किए गए संघर्ष को नकारकर देश में नकारात्मकता का वातावरण पैदा कर संघ के प्रति दुर्भावना जाग्रत करना चाहते हैं। आजादी के इस कालखंड के इतिहास का अवलोकन करने पर हमें ज्ञात होता हैं कि चाहेंं खिलाफत आंदोलन हो या असहयोग और नमक सत्याग्रह, सभी में डॉक्टर हेडगेवार जी ने अपने स्वयंसेवकों के साथ सक्रिय रूप से भाग लिया और जेल भी गए। “होनहार बिरवान के होत चिकने पात” कहावत के अनुसार डॉक्टर हेडगेवार जी में बचपन से ही राष्ट्रभक्ति और ब्रिटिश शासन के प्रति विद्रोह की भावना कूट-कूट कर भरी हुई थी। इसे उनकी बचपन की दो घटनाएं रेखांकित करती हैं। प्रथम क्वीन विक्टोरिया की जयंती पर स्कूल में बांटी गई मिठाइयों को फेंक देना क्योंकि उनके मन में यह बात घर कर गई थी कि हम उनकी जयंती पर मिठाई क्यों खाएं? जिन्होंने हमें गुलाम बना रखा है और दूसरी घटना स्कूल में ब्रिटिश इंस्पेक्टर के आने पर उन्होंने सहपाठियों के साथ “वंदे मातरम” का उद्घोष किया जिसके कारण उनका स्कूल से निष्कासन हुआ। डॉक्टर साहब लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक की राष्ट्रभक्ति और हिंदू संस्कृति की विचारधारा से प्रभावित थे इसलिए उन्होंने 1910 में चिकित्सा शिक्षा के लिए कोलकाता जाने का निर्णय लिया जो उसे समय क्रांतिकारी गतिविधियों का केंद्र था और वे क्रांतिकारी संस्था अनुशीलन समिति से जुड़े और क्रांतिकारी प्रशिक्षण प्राप्त किया। 1916 में नागपुर लौटने पर वे कांग्रेस से जुड़कर विदर्भ प्रांतीय कांग्रेस के सचिव बने और 1920 के नागपुर कांग्रेस अधिवेशन में उन्होंने पूर्ण स्वराज का प्रस्ताव रखा जो उस समय पारित नहीं हुआ लेकिन यह प्रस्ताव कांग्रेस ने 9 साल बाद वर्ष 1929 के लाहौर अधिवेशन में पारित किया जिसके पारित होने पर डॉक्टर हेडगेवार ने तब संघ की सभी शाखों में कांग्रेस का अभिनंदन करने और 26 जनवरी 1930 को तिरंगा फहराने का निर्देश दिया। 1921 में महात्मा गांधी के नेतृत्व में चले असहयोग आंदोलन में डॉक्टर हेडगेवार जी ने सक्रिय भागीदारी निभाई और “स्वतंत्रता मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है” जैसे नारे लगाने और भड़काऊ भाषणों के लिए उन्हें गिरफ्तार किया गया तथा 19 अगस्त 1921 से 11 जुलाई 1922 तक 1 साल जेल में रहे। जेल से रिहाई के बाद 12 जुलाई 1922 को मोतीलाल नेहरू, राजगोपालाचारी जैसे अनेक नेताओं की उपस्थिति में डॉक्टर साहब का भव्य स्वागत किया गया। 1925 में आरएसएस की स्थापना के बाद भी डॉक्टर साहब ने स्वतंत्रता संग्राम से दूरी नहीं बनाई बल्कि 1930 में गांधी जी के नमक सत्याग्रह के समांतर चले “जंगल सत्याग्रह” में सरसंघचालक पद से त्यागपत्र देकर सक्रिय भूमिका का निर्वहन किया और वन कानूनों का उल्लंघन करने के कारण 11 साथियों के साथ गिरफ्तार हुए और 9 महीने जेल में रहे ।यह मध्य प्रांत का सबसे सफलतम सत्याग्रह माना जाता है।महात्मा गांधी जी ने 8 अगस्त 1942 को गोवलिया टैंक मैदान ,मुंबई पर आयोजित कांग्रेस अधिवेशन में “अंग्रेजों भारत छोड़ो” का नारा दिया जिससे महाराष्ट्र के अमरावती, वर्धा चंद्रपुर में विशेष आंदोलन हुए जिसका नेतृत्व संघ के अधिकारी दादा नायक बाबूराव, अण्णाजी ने किया और गोली लगने पर संघ के स्वयंसेवक बालाजी रायपुरकर का बलिदान हुआ। डॉ. हेडगेवार जी ने स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाने के साथ-साथ 1925 को विजयादशमी के दिन हिंदू समाज को संगठित करने और उसके चरित्र निर्माण के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की क्योंकि उनका मानना था कि असंगठित समाज स्वतंत्रता को बनाए रखने में अक्षम है। शायद यही बात कुछ विशिष्ट विचारधारा वाले दलों के लोगों को अच्छी नहीं लगती है और वे डॉक्टर हेडगेवार जी के आजादी में योगदान को नकारते हैं जबकि डॉक्टर साहब बहुआयामी व्यक्तित्व के धनी थे। वे पहले क्रांतिकारी,फिर कांग्रेसी कार्यकर्ता और अंत में समाज सुधारक बने जो उनकी राष्ट्रभक्ति का द्योतक है। स्वतंत्रता आंदोलन में उनकी सक्रिय भागीदारी तथा स्वतंत्रता के बाद राष्ट्र को मजबूत रखने हेतु आरएसएस की स्थापना उनकी दूरगामी राष्ट्रवादी सोच का परिणाम है जिसके लिए वे वन्दनीय व अभिनन्दनीय हैं और उनका समग्र योगदान इतिहास में उचित स्थान पाने का हकदार है।
डॉ.चन्द्रप्रकाश शर्मा, वरिष्ठ साहित्यकार निवास -नसीराबाद (प्रकाश इण्टर कालेज),मिलक, रामपुर (उ.प्र.)-244701 मोबाइल -8273463656

