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महिलाओं को आरक्षण से वंचित रखने का जिम्मेदार कौन?

April 19, 2026

महिलाओं को आरक्षण से वंचित रखने का जिम्मेदार कौन?

Women Reservation in Parliament

Posted on 19.04.2026, Time 10.16 AM Sunday, Indian women reservation bill in Parliament, Article by Sarvesh Kumar Singh, Senior Journalist, Lucknow

Sarvesh Kumar Singh Senior Journalist, Lucknow Uttar Pradesh

Sarvesh Kumar Singh
Senior Journalist, Lucknow Uttar Pradesh

सर्वेश कुमार सिंह

लोकसभा में कल महिला आरक्षण बिल गिर गया। यानी कि 29 के लोकसभा चुनाव में महिलाओं को 33% आरक्षण मिलने की उम्मीद एक तरह से धूमिल हो गई है या यह सपना टूट गया है? इसके लिए कौन जिम्मेदार है? क्या सत्ता पक्ष की रणनीति कमजोर रही या इस बिल के गिरने से और महिला आरक्षण की उम्मीद को पूरा करने में क्या विपक्ष की भूमिका नकारात्मक रही? क्या इसके लिए विपक्ष जिम्मेदार है?

यह कई प्रश्न जनता के सामने है। सवाल यह है कि महिला आरक्षण के लिए जब लगभग तीन दशक से मांगे उठती रही। सत्ता पक्ष या विपक्ष बदलते रहे। लेकिन ये मांग स्थिर रही। चाहे कांग्रेस सत्ता में रही हो या एनडीए की सरकार भाजपा की सरकार सत्ता में रही हो या यह दोनों विपक्ष में रहे हो महिला आरक्षण के मुद्दे पर लगभग एक मत थे लेकिन उसके बावजूद पिछले तीन दशक में महिला आरक्षण महिलाओं को 33% आरक्षण नहीं मिल सका। एक प्रयास नरेंद्र मोदी की सरकार ने 2023 में किया और नारी बंधन अधिनियम 2023 सरकार लेके आई जिसका आशय है कि सभी लोकसभा राज्यसभा विधानसभाओं में महिलाओं को 33% आरक्षण सुनिश्चित किया जाएगा। लेकिन उसके साथ ही शर्त यह थी कि यह नए परिसीमन के बाद होगा। ऐसा संवैधानिक आवश्यकता भी थी। तो सरकार ने अब यह प्रयास किया एक विशेष सत्र सत्र तो चल ही रहा है बजट सत्र। उसमें विशेष चर्चा के लिए दो दिन का समय निर्धारित हुआ 16 और 17 अप्रैल का कि इसमें नारी शक्ति वंदन अधिनियम को लागू करने के लिए जो प्रावधान है और जो संविधान संशोधन है वो किए जाएंगे और आरक्षण 2029 में लागू हो जाएगा। लेकिन वो प्रयास सफल नहीं हुआ। इसके लिए सरकार तीन विधेयक लेकर आई। दो दिन की चर्चा हुई। पहले दिन चर्चा हुई और उसके बाद विधेयक प्रस्तुत हुए। पहला जो विधेयक था जो सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण था ये था 131वा संशोधन विधेयक।

इसके अनुसार लोकसभा में सदस्यों की संख्या वर्तमान 543 से बढ़ाकर 850 किया जाना था। यानी कि इसके लिए विधेयक प्रस्तुत किया कि संसद में सदस्यों की संख्या को विस्तारित कर दिया जाए और उसके बाद फिर 33% आरक्षण उनको दिया जाएगा। यह विधेयक था। इसके साथ ही दो और सहायक विधेयक थे जिसमें एक दूसरा विधेयक है कि परिसीमन के लिए अनुमति संसद से ली जाए और परिसीमन आयोग बनाया जाए। वह लोकसभा क्षेत्रों का परिसीमन करें उसी 850 के अनुसार ताकि महिलाओं को उसमें आरक्षण दिया जा सके। 33% आरक्षण किया जा सके। जो तीसरा विधेयक था यह था केंद्र शासित प्रदेशों में भी परिसीमन करना और सीटों में वृद्धि करना। इसके लिए था। लेकिन जो पहला विधेयक था वही कल लोकसभा में मतदान के दौरान गिर गया। इसके पक्ष में 298 वोट पड़े और विपक्ष में 230 वोट पड़े। जबकि आवश्यकता 342 की थी। 54 मत कम रह गए जिसके कारण यह विधेयक गिर गया। जब यह विधेयक गिर गया तो सरकार ने जो बाकी दो विधेयक थे उनको भी वापस ले लिया। उनको प्रस्तुत ही नहीं किया। यह तो कल की प्रक्रिया रही। लेकिन अब इस पर एक नई बहस शुरू हो गई है कि आखिर ऐसे क्या कारण थे कि कांग्रेस और इंडिया गठबंधन के दूसरे दल इस बात पर आमादा थे कि यह विधेयक पारित ना हो।

विपक्षी दल बात तो करते हैं महिला आरक्षण की कि महिला आरक्षण मिलना चाहिए। हम हर हाल में तैयार हैं। लेकिन जब बिल आया तो बिल गिरा दिया। उनके तर्क क्या है? पहला तर्क है कि दक्षिण भारत के राज्यों के साथ इस बिल से अन्याय हो जाएगा। यानी कि जो परिसीमन होना है यह परिसीमन 2011 की जनसंख्या के आधार पर होना है। यानी 2011 में जो जनगणना हुई थी उसको आधार बनाकर परिसीमन हुआ। दक्षिण के राज्यों की चिंता यह है कि उनके यहां जनसंख्या का अनुपात लगातार घट रहा है। आबादी कम हो रही है और उत्तर भारत के राज्यों में आबादी का घनत्व बढ़ता चला जा रहा है। ऐसे में जब आबादी के आधार पर परिसीमन होगा तो दक्षिण के राज्यों में लोकसभा क्षेत्रों की संख्या वर्तमान से भी कम हो जाएगी। बढ़ने बढ़ेगी तो नहीं बढ़ने से भी और कम हो जाएगी। और उत्तर भारत में लगभग दो गुनी हो जाएगी। यह आशंका दक्षिण के राज्यों की है।

पूर्वोत्तर के राज्यों की भी ऐसी ही आशंकाएं हैं क्योंकि वहां भी आबादी का घनत्व नहीं है। उत्तराखंड में भी कमोबेश ऐसी ही स्थिति है। हिमाचल में भी ऐसी ही स्थिति है। ये एक बड़ी आशंका है। तो इसे विपक्ष ने आधार बना लिया। हालांकि इसका समाधान कल जब यह विधेयक पेश हुआ उससे पहले चर्चा का जवाब देते हुए गृह मंत्री अमित शाह ने बड़ा साफ कहा कि हम दक्षिण की इन चिंताओं से वाकिफ हैं और हम उनके साथ अन्याय नहीं होने देंगे। उन्होंने कहा कि हम हर हाल में जनसंख्या भले ही कम हो दक्षिण के राज्यों में 50% सीटें बढ़ा देंगे। यह आश्वासन उन्होंने दिया। बल्कि उन्होंने तो यह कहा कि अभी एक घंटे में समर्थन अगर देने को तैयार हो विपक्ष तो मैं एक घंटे में ही नया विधेयक प्रस्तुत कर दूंगा और 50% संख्या हम दक्षिण के राज्यों की बढ़ा देंगे। लेकिन कांग्रेस इस पर नहीं मानी और जो उनके सहयोगी दल है वो भी नहीं माने

अंतत यह विधेयक गिर गया। कांग्रेस की जो दूसरी मांग है या उनका जो पक्ष है वह यह है कि इस आरक्षण को क्यों ना वर्तमान संख्या पर ही लागू कर दिया जाए। जो वर्तमान 543 की लोकसभा संख्या है उसमें सरकार आरक्षण क्यों नहीं देना चाहती वो तो साधारण बहुमत से भी हो जाएगा। हालांकि जो संविधान संशोधन था उसके लिए दो तिहाई बहुमत की जरूरत थी और वो दो तिहाई नहीं मिला तो गिर गया। लेकिन कांग्रेस ये भी कहती है कि इसमें शशि थरूर ने भी बड़ी साफ बात कही कि वर्तमान पर क्यों नहीं देते? इसे शशि थरूर ने कहा कि महिला आरक्षण को केंद्र सरकार ने एक कांटों से लिपटी हुई लिपटे हुए तोहफे के रूप में प्रस्तुत किया है। यानी कि बहुत जटिल बना दिया है। लेकिन दूसरी तरफ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री अमित शाह, राजनाथ सिंह ने इसके पक्ष में तर्क दिए और कहा कि यह आवश्यक है कि हम पहले इसका परिसीमन करें। सदस्यों की संख्या बढ़ाएं और ताकि कोई भी समुदाय और कोई भी वर्ग इससे प्रभावित ना हो और विस्तारित संसद में ही इसको आरक्षण को दिया जाए। लेकिन अब इस विधेयक के गिरने के बाद जो स्थिति है वो यह बन गई है कि अब 2029 के लोकसभा चुनाव में तो आरक्षण लागू नहीं हो पाया। क्योंकि अभी अब अगर यह नई जनसंख्या के आधार पर होगा तो जो जनगणना चल रही है जनगणना 2026 के परिणाम 2027 के अंत तक आएंगे। हो सकता है 2028 भी हो जाए। उसके बाद फिर विधेयक आएगा और परसीमन के लिए विधेयक पारित होगा। परसीमन होगा। परसीमन आयोग बनेगा। परसीमन आयोग के लिए समय चाहिए। पूरे देश में जगह-जगह जाकर उनको मीटिंग करनी पड़ेगी। उसमें भी कम से कम एक साल डेढ़ साल का समय चाहिए। तब तक लोकसभा चुनाव हो चुका होगा और 2029 में यह लोकसभा चुनाव में महिला आरक्षण लागू नहीं हो पाएगा। एक तरह से यह सपना 2029 के लिए तो टूट गया। अब कांग्रेस यह भी कह रही है कि यह पूरा मुद्दा जो है चुनाव से संबंधित है।

भाजपा चुनाव में इसका लाभ लेना चाहती थी। इसलिए उसने यह विधेयक पेश किया। यह बात भी सही है कि सत्तारूढ़ दल ने जब यह विधेयक पेश किया तो उसने उतना होमवर्क नहीं किया जितना वो पहले करती थी और यह पहला विधेयक है जो नरेंद्र मोदी सरकार का गिरा है तो क्या केंद्र सरकार ने इस पूरे विधेयक को पेश करने से पहले पूरी प्रक्रिया और विपक्षी दलों के साथ और कुछ ऐसे दलों के साथ जो इंडिया गठबंधन का हिस्सा नहीं है उनके उनके साथ बातचीत नहीं की और वो पूरी तैयारी रणनीति क्यों नहीं बनी जो ये विधेयक पारित हो जाता कुछ भी हो, लेकिन ये एक कष्टकारी विषय है कि एक अच्छे उद्देश्य के लिए लाया गया विधेयक गिर गया। अब यह फैसला जनता के हाथ में है कि महिला आरक्षण को रोके जाने के दोषी जनता विपक्ष को मानेगी या सत्तारूढ़ दल की कमजोर रणनीति को मानेगी यह जनता के हाथ में है।

जनता इसका निर्णय करेगी। इस पर चिंतन होगा। लेकिन महिला आरक्षण बिल पास होना चाहिए था। हालांकि मांग तो यह थी कि महिलाओं को 50% आरक्षण दिया जाए। लेकिन 33% मिला तो 33% भी संतुष्ट करने वाला है। 33% अभी की जो संख्या है लोकसभा में या संसद में वो 14% महिलाएं ही हैं कुल संख्या की तो 33% होंगी। ये भी एक उपलब्धि होगी। लेकिन अब ये 2029 के चुनाव के बाद ही प्रक्रिया पूरी होगी। या सरकार अगर कोई ऐसा विधेयक ले आती है कि जो वर्तमान सदस्य संख्या पर ही लागू कर दिया जाए तब भले ही 2029 में आरक्षण मिल जाए। विपक्ष का एक वर्ग जिसमें समाजवादी पार्टी मुख्य रूप से है। इनका कहना यह है कि ये जो आरक्षण बिल मिले महिलाओं को वो आरक्षण के अंदर आरक्षण के साथ मिले। यानी कि महिला आरक्षण में भी ओबीसी आरक्षण लागू किया जाए। कई दलों ने तो धार्मिक आरक्षण की मांग कर दी। लेकिन कल गृह मंत्री अमित शाह ने बहुत साफ कहा कि किसी भी हालत में धार्मिक आरक्षण देश में किसी भी स्थिति में कहीं भी स्वीकार नहीं है और वो लागू नहीं किया जाएगा। ओबीसी आरक्षण को भी सरकार ने कहा कि हम ओबीसी जनसंख्या की गणना जरूर कराएंगे। जनगणना ओबीसी की होगी। लेकिन उन्होंने कहा कि जो महिला आरक्षण है उसमें एससी एसटी को आरक्षण मिलेगा और एससी एसटी की सीटें बढ़गी।

अब सरकार ने एक नया अपना पक्ष प्रस्तुत किया है विपक्ष को कटघरे में खड़ा करने के लिए। अमित शाह ने कल कहा कि विपक्ष ने एससी एसटी के सदस्यों की संख्या को बढ़ने से रोक दिया है। एससी एसटी के साथ अन्याय किया है। महिलाओं के साथ अन्याय किया है। इसका जवाब जनता उनको देगी। महिलाएं उनको देंगी। देखते हैं आने वाले चुनाव में क्या इसका कोई असर होता है या जनता में किस तरह का जनमत बनता है। जनता विपक्ष को कड़कड़े में खड़ा करती है या सत्तारूढ़ दल को ही कट में खड़ा कर देगी कि आपने इतना जटिल इस पूरी प्रक्रिया को क्यों बना दिया है।

The Women’s Reservation Bill collapsed in the Lok Sabha yesterday. That is, has the hope of getting 33 per cent reservation for women in the 29th Lok Sabha elections been dashed in a way or has this dream been broken? Who’s responsible for this? Has the ruling party’s strategy been weak or has the opposition played a negative role in the fall of this bill and in fulfilling the hope of women’s reservation? Is the opposition responsible for this?