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जॉब्स के लिए केवल डिग्री इंपोर्टेंट नहींः कॉर्पोरेट एक्सपर्ट दीप्ति वर्मा

January 31, 2026

जॉब्स के लिए केवल डिग्री इंपोर्टेंट नहींः कॉर्पोरेट एक्सपर्ट दीप्ति वर्मा

  • तीर्थंकर महावीर यूनिवर्सिटी Teerthankar Mahveer University (TMU) के सीटीएलडी CTLD की ओर से करियर टॉक्स- पाथवेज़ टु सक्सेस Career talks : pathwayes to success में एवीपीएन AVPN  की टैलेंट एक्विज़िशन लीडर सुश्री दीप्ति वर्मा ने स्टुडेंट्स को साझा किए तमाम टिप्स
Career talks in TMU Moradabad by Deepti Verma

स्टूडेंट्स के साथ कैरियर टाक के बाद सुश्री दीप्ति वर्मा का टीएमयू में हुआ सम्मान

Posted & Published on 31.01.2026, Saturday Time: 18.39, TMU Moradabad

मुरादाबाद, 31 जनवरी 2026, एवीपीएन की टैलेंट एक्विज़िशन लीडर सुश्री दीप्ति वर्मा ने कॉ कॉर्पोरेट भर्ती प्रक्रिया की वास्तविकताओं पर प्रकाश डालते हुए कहा, चयन केवल अंकों या डिग्री पर आधारित नहीं होता, बल्कि अभ्यर्थी के व्यावहारिक कौशल, सोचने की क्षमता, संवाद शैली और संगठनात्मक संस्कृति के साथ सामंजस्य पर भी निर्भर करता है। एचआर प्रोफेशनल्स उम्मीदवार को केवल डिग्री होल्डर के रूप में नहीं, बल्कि एक सम्भावनाशील पेशेवर के रूप में देखते हैं। उन्होंने स्टुडेंट्स से कहा, प्रारंभिक स्क्रीनिंग से लेकर अंतिम चयन तक, रिज़्यूमे प्रस्तुति, इंटरव्यू के दौरान आत्मविश्वास, बॉडी लैंग्वेज, और प्रश्नों के प्रति दृष्टिकोण का विशेष महत्व होता है।  सुश्री दीप्ति वर्मा ने छात्रों को सलाह दी कि वे कॉलेज जीवन के दौरान ही इंटर्नशिप, लाइव प्रोजेक्ट्स, स्वयंसेवी कार्य, टीमवर्क और लीडरशिप अवसरों को गंभीरता से लें, क्योंकि ये अनुभव साक्षात्कार के समय उम्मीदवार को दूसरों से अलग पहचान दिलाते हैं। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि आज के कॉर्पाेरेट जगत में एडैप्टेबिलिटी, डिजिटल अवेयरनेस और निरंतर सीखने की इच्छा सबसे बड़ी ताकत मानी जाती है। अंत में सुश्री दीप्ति वर्मा ने विद्यार्थियों को प्रेरित करते हुए कहा कि करियर एक दौड़ नहीं, बल्कि एक दीर्घकालिक यात्रा है, जिसमें सही दिशा, धैर्य और निरंतर प्रयास से ही सफलता प्राप्त की जा सकती है। एक्सपर्ट सेशन में सीसीएसआईटी, टिमिट, लॉ, एग्रीकल्चर, फार्मेसी आदि कॉलेजों के छात्रों की मौजूदगी में सवाल-जबाव का दौर भी चला।

 

 

सुश्री वर्मा तीर्थंकर महावीर यूनिवर्सिटी, मुरादाबाद के सेंटर फॉर टीचिंग, लर्निंग एंड डवलपमेंट- सीटीएलडी की ओर से करियर टॉक्स- पाथवेज़ टु सक्सेस पर आयोजित विशेषज्ञ सत्र में बतौर मुख्य वक्ता बोल रहीं थीं। विशेषज्ञ सत्र का विषय कॉर्पोरेट रेडिनेस और शीर्षक हाउ एचआर एक्चुली हायर्सः द सिक्रेट सेलेक्शन टिप्स रहा। इससे पूर्व मुख्य वक्ता सुश्री दीप्ति वर्मा, फैकल्टी ऑफ इंजीनियरिंग के डीन प्रो. आरके द्विवेदी, सीटीएलडी के डायरेक्टर प्रो. पंकज कुमार सिंह आदि ने मां सरस्वती के समक्ष दीप प्रज्जवलित करके एक्सपर्ट सेशन का शुभारम्भ किया। डीन प्रो. द्विवेदी ने स्टुडेंट्स से कहा, जॉब्स के लिए वर्तमान समय में केवल तकनीकी ज्ञान पर्याप्त नहीं है। स्टुडेंट्स को संचार कौशल, सकारात्मक दृष्टिकोण, कार्यस्थल पर अनुकूलन क्षमता तथा नैतिक मूल्यों की समझ विद्यार्थियों को कॉर्पाेरेट जगत में सफल बनाती है। सीटीएलडी केे प्रो. पंकज कुमार सिंह बोले, कैरियर टॉक्स श्रृंखला का मकसद कक्षा में अर्जित ज्ञान और उद्योग की व्यावहारिक अपेक्षाओं के बीच की दूरी को कम करना है। उन्होंने सीटीएलडी की ओर से भविष्य में भी ऐसे उद्योग-संवाद आधारित कार्यक्रमों के आयोजन की प्रतिबद्धता दोहराई। डॉ. जैस्मिन स्टीफन ने संयोजक, जबकि श्री प्रदीप पंवार ने सह-समन्वयक की भूमिका निभाई। संचालन सुश्री अन्वेषा सिसोदिया ने किया। कार्यक्रम में श्रीमती मणि सारस्वत आदि की उल्लेखनीय मौजूदगी रही। अंत में डॉ. दिलीप दत्त वार्ष्णेय ने धन्यवाद ज्ञापित किया।

भारतीय न्याय शास्त्र और यूजीसी नियमों पर रोक

प्राचीन न्याय शास्त्र के आलोक में सुप्रीम कोर्ट Supreme Court द्वारा यूजीसी पर रोक का औचित्य

Dr Chandra Prakash Sharma, Milak Rampur

डा चंद्रप्रकाश शर्मा

Article Posted & Published on : 31.01.2026, Saturday , Time: 10.11 AM By Chandra Prakash Sharma

सर्वोच्च न्यायालय Supreme Court द्वारा 29 जनवरी 2026 को विश्वविद्यालय अनुदान आयोग UGC के  “समता विनियम 2026” पर रोक यूजीसी के उन नियमों पर लगाई गई है जो उच्च शिक्षा संस्थानों Higher education Institution में जाति आधारित भेदभाव को रोकने के उद्देश्य बनाए गए थे।  उन्हें अस्पष्ट , दुरुपयोग की संभावना वाला और विभाजनकारी माना गया। 13 जनवरी 2026 को यूजीसी के इक्विटी रेगुलेशंस 2026 Equity regulations को अधिसूचित किया गया । यह नियम उच्च शिक्षा में समानता को बढ़ावा देने के लिए था जिसमें इक्वल ऑपर्च्युनिटी सेंटर्स और कैंपस स्तरीय समितियां का गठन शामिल था।  लेकिन विवादास्पद रेगुलेशन 3(सी) ने जाति आधारित भेदभाव को केवल अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग तक केंद्रित कर दिया और सामान्य वर्ग को इससे बाहर रखा गया जिसके कारण पूरे देश में अनेक प्रदर्शन , राजनीतिक प्रतिक्रियाएं और याचिकाएं दाखिल हुई जिसके फल स्वरुप मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत Chief Justice of India Justice Surykant और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची Justice Joymalya Bagchi की पीठ ने नियमों को पूर्णतः अस्पष्ट और दुरुपयोग की संभावना वाला बताया।साथ ही पुराने 2012 नियमों को जारी रखने का आदेश दिया।

सर्वोच्च न्यायालय का स्थगन आदेश प्राचीन न्यायशास्त्र के सिद्धांतों पर कितना खरा है, इसकी समालोचना व विश्लेषण समय की आवश्यकता है। प्राचीन भारतीय न्यायशास्त्र का मूल Vedas वेदों, Upnishad उपनिषदों और Dharm Sutra धर्मसूत्रों में सन्निहित है जिसका व्यावहारिक रूप Smritiya स्मृतियों में दृष्टिगोचर होता है। लगभग 200 ईसा पूर्व की Manu Smrati मनुस्मृति जो राजनीतिक रूप से काफी विवादित है, न्याय को धर्म का प्रतिबिंब मानती है जबकि Yagvalkya Smrati याज्ञवल्क्य स्मृति अधिक वैज्ञानिक और व्यावहारिक है क्योंकि यह व्यवहार अर्थात कानून, आचार अर्थात नैतिकता और प्रायश्चित यानी दंड के प्रावधानों से सम्प्रक्त है। लगभग 300 ईसा पश्चात की Narad Smrati नारद स्मृति विशेष रूप से फॉरेंसिक कानून पर आधारित है जिसमें अदालतों, गवाहों और दंड की प्रक्रिया का वर्णन है। मनुस्मृति के अध्याय 8 में राजा को न्याय करते समय पक्षपात रहित होना चाहिए,” राजा न्याय में पक्षपात न करें चाहे वह मित्र हो या शत्रु” यहां न्याय को धर्म रक्षक माना गया है। नारद स्मृति पूरी तरह कानूनी है जिसमें 18 शीर्षकों में न्याय प्रक्रिया का वर्णन है जिसमें झूठी शिकायतों के लिए दंड का प्रावधान है। प्राचीन शास्त्रों में न्याय के सिद्धांतों में,एक स्पष्टता-कानून अस्पष्ट न हो, दूसरी निष्पक्षता- सबके लिए समान, तीसरा सामाजिक सद्भाव- कानून समाज को एकजुट रखने वाले हों और चौथा राज धर्म- न्यायाधीश निडर और निष्पक्षहो, का समावेश था। सुप्रीम कोर्ट का स्थगनादेश प्राचीन सिद्धांतों के भी पूर्णता अनुरूप है। प्राचीन न्याय शास्त्रों के प्रथम सिद्धांत स्पष्टता के दृष्टिगत मनुस्मृति और याज्ञवल्क्य में ही अस्पष्ट कानून को दुरुपयोग का माध्यम माना गया है यूजीसी नियमों में रेगुलेशन 3(सी) को कोर्ट ने पूर्णता “वाग” बताया जो झूठी शिकायतों को बढ़ावा दे सकता है। नारद स्मृति में झूठी शिकायतों के लिए दंड का प्रावधान है जो यहां अनुपस्थित था।न्यायालय ने कहा कि ऐसे नियम व्यक्तिगत बदले की भावना से प्रयुक्त हो सकते हैं जो प्राचीन शास्त्रों के अनुसार न्याय की आत्मा के विरुद्ध है। यूजीसी का नियम प्राचीन न्याय शास्त्रों के द्वितीय निष्पक्षता और समानता के सिद्धांत के विपरीत है।कोर्ट ने भी अनुच्छेद 14 का उल्लेख करते हुए कहा की यह नियम केवल कुछ वर्गों को सुरक्षा देता हैं तथा सामान्य वर्ग को बाहर रखकर समानता के नियम का उल्लंघन करता है जो भेदभावपूर्ण है और समाज को विभाजित करने वाला है जबकि मनुस्मृति के अध्याय 8 के श्लोक 124 में न्याय में सबके लिए समान दंड का प्रावधान है। नारद स्मृति के अनुसार यह कानून की विफलता है। प्राचीन शास्त्रों ने सामाजिक सद्भाव व एकता को न्याय का तीसरा प्रमुख सिद्धांत माना है जो मुख्य न्यायाधीश के कथन में ध्वनित होता है कि 75 वर्षों की स्वतंत्रता के बाद भी ऐसे नियम समाज को पीछे धकेलते हैं क्योंकि इन नियमों के बाद देश में बड़े स्तर पर प्रदर्शन हुए और लोगों में कटुता की भावना दृष्टिगोचर हुई। मुख्य न्यायाधीश का वक्तव्य याज्ञवल्क्य के उदार दृष्टिकोण से मेल खाता है। न्यायालय ने अनुच्छेद 142 (Article 142) का उपयोग कर अंतिम आदेश दिया जो प्राचीन राजधर्म से मेल खाता है जहां राजा निडर होकर न्याय करता था क्योंकि मनुस्मृति के अनुसार “राजा बिना भय या पक्षपात के निर्णय ले।” कोर्ट ने पुराने 2012 के नियमों को जारी रखा जो स्पष्ट और निष्पक्ष हैं, यह प्राचीन शास्त्रों की परंपरा का भी पालन है। भारत के उच्चतम न्यायालय द्वारा यूजीसी नियमों पर लगाई गई रोक वर्तमान विधि नियमों के साथ प्राचीन न्याय शास्त्रों की दृष्टि से भी पूर्णता औचित्य पूर्ण है क्योंकि यह स्पष्टतः,निष्पक्षता और सामाजिक एकता के सिद्धांतों पर आधारित है जिसका मनुस्मृति, याज्ञवल्क्य,नारद स्मृति में भी उल्लेख है। इससे स्पष्ट होता है कि हमें नियम बनाते समय प्राचीन सिद्धांतों का भी अवलोकन कर उनसे भी प्रेरणा लेनी चाहिए ताकि नियम अधिक स्पष्ट ,प्रभावी और सर्वमान्य बन सकें। लेखक: डॉ.चन्द्रप्रकाश शर्मा,पूर्व सलाहकार हिन्दी, अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय, भारत सरकार निवास -नसीराबाद,मिलक, रामपुर (उ.प्र.)-243701 मोबाइल -8273463656

January 28, 2026

यूजीसी के समता संवर्धन विनियम-2026 से उभरता विरोध

UGC Regulations 2026

यूजीसी ने जारी किए नए नियम

Posted on : 28.01.2026, Wednesday Time: 03:26 PM, Writer Source:  Prof. Subhash Thaledi, Dehradun
– प्रो. (डॉ.) सुभाष चंद्र थलेडी
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) द्वारा उच्च शिक्षा संस्थानों में समता के संवर्धन हेतु बनाए गए विनियम-2026 ने देशभर में सामान्य वर्ग के छात्रों और अभिभावकों के बीच एक नई और तीखी बहस को जन्म दे दिया है। 13 जनवरी 2026 को अधिसूचित ये नियम 15 जनवरी से लागू भी कर दिए गए। यूजीसी का दावा है कि इन विनियमों का उद्देश्य विश्वविद्यालय परिसरों में भेदभाव का उन्मूलन कर सभी छात्रों को समान अवसर उपलब्ध कराना है। किंतु इनके लागू होते ही सामान्य श्रेणी के छात्रों में असंतोष खुलकर सामने आने लगा है और कई राज्यों में संगठित विरोध के स्वर भी सुनाई दे रहे हैं। इस पूरे विनियम की वैधानिक पृष्ठभूमि में सुप्रीम कोर्ट की भूमिका महत्वपूर्ण रही है। सितंबर 2025 में न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमल्या बागची की पीठ ने उच्च शिक्षा संस्थानों में जातिगत उत्पीड़न और भेदभाव रोकने के लिए प्रभावी नियम बनाने का निर्देश यूजीसी को दिया था। यह आदेश 2019 में दायर उस जनहित याचिका पर आया था, जिसे रोहित वेमुला और पायल ताडवी की माताओं ने दाखिल किया था। याचिका में 2012 के यूजीसी विनियमों के सख्त अनुपालन और ठोस उपायों की मांग की गई थी। इसी न्यायिक निर्देश के आलोक में यूजीसी ने 2012 के पुराने नियमों को निरस्त कर 2026 के नए समता विनियम लागू किए। इनके औचित्य को राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 से भी जोड़ा गया है, जो समता और समावेशन को शैक्षिक नीति की आधारशिला मानती है। विनियमों की प्रस्तावना में धर्म, जाति, लिंग, जन्मस्थान और दिव्यांगता के आधार पर किसी भी प्रकार के भेदभाव के उन्मूलन की बात कही गई है। उद्देश्य के स्तर पर यह सर्वथा स्वीकार्य और आवश्यक है, किंतु समस्या तब उभरती है जब उद्देश्य और परिभाषाओं को साथ रखकर देखा जाता है।
यूजीसी के इस विनियम में जाति-आधारित भेदभाव की परिभाषा को केवल अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग तक सीमित कर दिया गया है। इससे यह संकेत मिलता है कि यह नियामक ढांचा मुख्यतः इन्हीं वर्गों के संरक्षण पर केंद्रित है। यही बिंदु सामान्य श्रेणी के छात्रों में असुरक्षा और भय की भावना को जन्म देता है। आलोचकों का तर्क है कि अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 पहले से ही लागू है। ऐसे में एक अतिरिक्त विनियम, जिसमें झूठी या दुर्भावनापूर्ण शिकायतों के लिए कोई स्पष्ट दंडात्मक प्रावधान नहीं है, एकतरफा व्यवस्था का रूप ले सकता है। सामान्य वर्ग के छात्रों का कहना है कि इससे वे स्वतः ही संदेह के दायरे में आ जाते हैं। मेरठ में मीडिया शिक्षा प्राप्त कर रहे विद्यार्थी नितेश तिवारी और टीना सोम का मानना है कि नई पीढ़ी में जातिगत भावनाएं पहले से ही कमजोर पड़ चुकी हैं, लेकिन ऐसे विनियम नई पीढ़ी को फिर से जातिवादी ढांचे में बाँध सकते हैं। इन विनियमों के तहत प्रत्येक उच्च शिक्षा संस्थान में समान अवसर केंद्र (ईओसी) और समता समिति का गठन अनिवार्य किया गया है। समितियों में अनुसूचित जाति, जनजाति, ओबीसी, दिव्यांग और महिलाओं का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया गया है, किंतु सामान्य श्रेणी के प्रतिनिधित्व को अनिवार्य नहीं बनाया गया। यही वह बिंदु है जिस पर आपत्ति सबसे अधिक मुखर है। सामान्य वर्ग के छात्रों का सवाल है कि जब निर्णय-निर्माण की प्रक्रिया में उनकी भागीदारी सुनिश्चित नहीं है, तो निष्पक्षता की गारंटी कैसे दी जा सकती है। विनियमों में सचल समता स्क्वॉड और 24×7 समता हेल्पलाइन की व्यवस्था भी की गई है। किंतु सामान्य श्रेणी के छात्रों के बीच इसे लेकर भी गहरी चिंता है। गोपनीय शिकायत और त्वरित कार्रवाई के प्रावधान उन्हें सुरक्षा से अधिक भय का वातावरण पैदा करने वाले प्रतीत होते हैं। मात्र एक आरोप से किसी छात्र या शिक्षक की शैक्षणिक और सामाजिक छवि को गंभीर क्षति पहुँच सकती है, भले ही बाद में आरोप निराधार सिद्ध हो जाए। झूठी शिकायतों से निपटने की स्पष्ट व्यवस्था का अभाव इस चिंता को और गहरा करता है।
इस विनियम को लेकर सामान्य वर्ग के छात्रों की आपत्ति मूलतः ‘समता’ की व्याख्या और उसके व्यावहारिक प्रभाव को लेकर है। उनका सवाल है कि ये विनियम वास्तव में सभी के लिए बराबरी सुनिश्चित नहीं करते हैं जिससे शैक्षिक संस्थानों में नए प्रकार के असंतुलन हो जायेगा। सामान्य वर्ग के छात्रों को आशंका है कि भविष्य में शैक्षणिक मूल्यांकन, छात्रावास आवंटन और अनुशासनात्मक कार्रवाइयों जैसे मामलों को भी जातिगत दृष्टि से देखा जाएगा। इससे शिक्षक-छात्र संबंधों में अविश्वास बढ़ सकता है और विश्वविद्यालयों का शैक्षणिक वातावरण प्रभावित हो सकता है।
कुछ शिक्षकों की चिंता शैक्षणिक गुणवत्ता और अकादमिक स्वतंत्रता को लेकर भी है। उनका मानना है कि विश्वविद्यालयों का मूल उद्देश्य ज्ञान, शोध और आलोचनात्मक चिंतन का विकास है। यदि प्रत्येक निर्णय पर निगरानी और दंड का दबाव रहेगा, तो संस्थागत स्वायत्तता प्रभावित होगी। इन नियमों का पालन न करने वाले शैक्षिक संस्थानों की डिग्री कार्यक्रम रोकने या मान्यता समाप्त करने जैसे प्रावधानों को वे प्रशासनिक नियंत्रण के विस्तार के रूप में देखते हैं। वैसे भी संकाय सदस्य पहले से ही अध्यापन-अध्ययन के अतिरिक्त अनेक समितियों के दायित्वों से बोझिल हैं।
यह भी चिंता का विषय है कि आजादी के 78 सालों के बाद भी इस प्रकार के जातिवादी चयनित विनियम बनाने की जरूरत बन रही है। इससे साफ जाहिर होता है कि इन 78 सालों में देश का इस दिशा में कोई विकास नहीं हुआ है। दूसरी ओर हम 2047 तक विकसित भारत का सपना देख रहे हैं। दरअसल यह विनियम शैक्षिक संस्थानों में सभी वर्ग के लिए बनाये जाते तो इसका स्वागत योग्य था। शैक्षिक संस्थानों में आज छात्रों के बीच सबसे अधिक भेदभाव क्षेत्रवाद को लेकर सामने आता है। जातिवादी सोच शैक्षिक संस्थानों से दूर हो रही है लेकिन इस प्रकार के नियमों से जातिवादी भावनाएं प्रबल होना स्वाभाविक है।
कानून विशेषज्ञों का भी कहना है कि यह विनियम ‘चयनित संरक्षण’ की अवधारणा को बढ़ावा देता है। एससी/एसटी कानूनों के दुरुपयोग की बहुत सारी शिकायतें पहले से ही न्यायालयों के सामने आती रही हैं। ऐसे में सामान्य वर्ग के छात्र अपने भविष्य और करियर को लेकर सशंकित हैं। उनका यह भी तर्क है कि यह विनियम संविधान में निहित समानता के अधिकार- अनुच्छेद 14 और 16- की भावना के प्रतिकूल है। इन्हीं आधारों पर कुछ कानूनविदों ने इस विनियम को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती भी दी है। उल्लेखनीय है कि 2012 के यूजीसी समता विनियमों में अन्य पिछड़ा वर्ग शामिल नहीं था, जिसे 2026 में जोड़ा गया है। इससे भी विरोध के स्वर और प्रखर हुए हैं। साथ ही, विनियमों के उल्लंघन पर संस्थानों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई का प्रावधान चिंता को और बढ़ाता है।
सोशल मीडिया पर इन नियमों को लेकर तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं और इससे जुड़े हैशटैग ट्रेंड कर रहे हैं। उत्तर प्रदेश में बरेली के एक वरिष्ठ पीसीएस अधिकारी अलंकार अग्निहोत्री द्वारा विरोधस्वरूप इस्तीफे की खबर ने बहस को और तेज कर दिया है। बढ़ते विरोध के बीच केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने कहा है कि इन विनियमों से किसी के साथ भेदभाव नहीं होने दिया जाएगा। किंतु जब नियम पहले ही लागू हो चुके हों, तो मौखिक आश्वासन पर्याप्त नहीं माने जा सकते।
 कुल मिलाकर, यूजीसी के समता विनियम-2026 उच्च शिक्षा के भविष्य को गहराई से प्रभावित करने वाले हैं। यदि इन्हें केवल कानूनी सख्ती के साथ लागू किया गया, तो असंतोष और बढ़ सकता है। समावेशन तभी टिकाऊ होगा, जब विनियम वास्तव में सभी के लिए संतुलित और न्यायपूर्ण हों। अब असली परीक्षा नीति-निर्माताओं की है कि क्या वे संतुलन की दिशा में कदम उठाएंगे या यह बहस और अधिक टकराव की ओर बढ़ेगी?
Prof. (Dr) Subhash Thaledi

डा. सुभाष थलेड़ी

(लेखक सामयिक विषयों के स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)
#UGCRules

January 27, 2026

यूजीसी विनियम, 2026 का उद्देश्य महत्वपूर्ण, परंतु विनियमों में स्पष्टता और संतुलन आवश्यक : अभाविप।

    UGC Regulations 2026यूजीसी ने जारी किए नए नियम

नई दिल्ली, 27 जनवरी 2026, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा जारी अधिसूचना “विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (उच्च शिक्षा संस्थानों में समता के संवर्धन हेतु) विनियम, 2026” का उद्देश्य महत्वपूर्ण है, परंतु इन विनियमों में स्पष्टता और संतुलन अत्यंत आवश्यक है।अभाविप मानती है कि यूजीसी तथा सभी शैक्षणिक संस्थानों को लोकतंत्र में अंतर्निहित भावना को अक्षुण्ण रखना चाहिए, जहाँ प्रत्येक नागरिक के पास समान अधिकार हों और भारत भेदभाव मुक्त तथा समता युक्त बने।

अभाविप सदैव ही शैक्षिक परिसरों में सकारात्मक और समतायुक्त परिवेश बनाने की दिशा में कार्य करती रही है और लोकतांत्रिक मूल्यों के संवर्धन की पक्षधर रही है। आगामी वर्षों में ‘विकसित भारत’ की संकल्पना को सिद्ध करने के लिए हम सभी को सामूहिक प्रयास करने की आवश्यकता है। यूजीसी के इस समता संबंधी विनियम के कुछ प्रावधानों और शब्दावली को लेकर समाज, विद्यार्थियों एवं अभिभावकों के बीच जो अस्पष्टता और भ्रांतियाँ उत्पन्न हो रही हैं, इनपर यूजीसी को त्वरित संज्ञान लेते हुए तत्काल कार्यवाही करनी चाहिए ताकि किसी भी प्रकार की विभाजनकारी स्थिति उत्पन्न न हो सके। ध्यातव्य हो, यह विषय वर्तमान में न्यायालय में विचाराधीन है अतः अभाविप मानती है कि यूजीसी को इस संदर्भ में अपना पक्ष स्पष्ट करते हुए न्यायालय में शीघ्र हलफनामा दाखिल करना चाहिए।

अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के राष्ट्रीय महामंत्री डॉ. वीरेंद्र सिंह सोलंकी ने कहा कि, “शैक्षणिक परिसरों में सौहार्द एवं समानता सुनिश्चित किया जाना अनिवार्य है, जिसके लिए अभाविप ने सदैव प्रयास किए हैं। शैक्षणिक परिसरों में सभी वर्गों के लिए सामाजिक समानता होनी चाहिए तथा परिसरों में किसी भी प्रकार के भेदभावों के लिए कोई स्थान नहीं हैं। इस विनियम को लेकर विद्यार्थियों, अभिभावकों एवं हितधारकों के मध्य भ्रांतियाँ व्याप्त हैं, जिन पर यूजीसी को सभी हितधारकों से संवाद करते हुए संबंधित भ्रांतियों को दूर करने हेतु तत्काल स्पष्टीकरण देना चाहिए। लोकतांत्रिक मूल्यों को सुदृढ़ करने तथा सभी विद्यार्थियों के लिए भेदभाव-मुक्त वातावरण सुनिश्चित करने हेतु समाज के सभी वर्गों के सामूहिक प्रयास आवश्यक हैं।

Letter ABVP

ये हैं यूजीसी के नए नियम

UGC Regulations 2026

    यूजीसी ने जारी किए नए नियम

1881254_UGC-Promotion-of-Equity-in-HEIs-Regulations-2026(1)

नियम पढ़ने के लिए लिंक पर दो बार क्लिक करें

University Grants commission UGC Rules

यूजीसी रूल

नई दिल्ली, 27 जनवरी 2016, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग University Grants commission UGC ने 13 जनवरी को अधिसूचित नियमों को 14 जनवरी को जारी के दिया।

🖇️Read the UGC Regulations: ugc.gov.in/pdfnews/188125…

 

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