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संपादकीय: अप्रकाशित पुस्तक पर चर्चा का औचित्य

February 3, 2026

संपादकीय: अप्रकाशित पुस्तक पर चर्चा का औचित्य

Leader of opposition Rahul Gandhi

लोकसभा में नेता विरोधी दल राहुल गांधी

Posted on : 03.02.2926 Tuesday, Time: 07.09 AM, Editorial by Sarvesh Kumar Singh, UP Web News, Un Published book of General Manoj Mukund Nanrvanee, #The Four Stars of Destiny 

संस्मरण पुस्तक “फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी” जिसके लेखक पूर्व थलसेनाध्यक्ष जनरल मनोज मुकुंद नरवने है। अभी तक प्रकाशित नहीं हुई है। हालांकि इस किताब की चर्चा खूब है। इस पर एक पत्रिका में टिप्पणी भी प्रकाशित हो चुकी है। पुस्तक प्रकाशन के लिए प्रकाशक के पास है। लेकिन रक्षा मंत्रालय से अनुमति लंबित होने के कारण अप्रकाशित है। ताजा उल्लेख इस किताब का इसलिए है कि इसके कुछ अंश जो अगस्त 2020 के लद्दाख क्षेत्र में चीन के साथ हुई हिंसक झड़प से जुड़े हैं और घुसपैठ के बारे में हैं, इनकी चर्चा नेता विरोधी दल राहुल गांधी सोमवार को लोकसभा में करना चाहते थे। उन्हें अध्यक्ष ने रोक दिया। उन्होंने जब एक पत्रिका में पुस्तक पर प्रकाशित टिप्पणी का उल्लेख करते हुए चीनी घुसपैठ की बात को उठाने की कोशिश की तो सरकार की ओर से विरोध हुआ। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिड़ला ने भी नियमों का हवाला देकर उन्हें बोलने की अनुमति नहीं दी। अन्ततः लोकसभा की कार्यवाही स्थगित कर दी गई।

अब प्रश्न ये उठता है कि क्या किसी ऐसी किताब जो अभी प्रकाशित ही नहीं हुई है। उसके विवरण पर लोकसभा में चर्चा करना उचित है? क्योंकि मामला राष्ट्रीय सुरक्षा और सीमा विवाद से जुड़ा है। इसका प्रभाव पड़ोसी देश के साथ राजनीतिक, कूटनीतिक, व्यापारिक संबंधों से भी है। और इन सबसे ज्यादा सेना के मनोबल से जुड़ा है। ऐसी स्थिति में क्या राहुल गांधी को राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मू के अभिभाषण पर चर्चा के बजाय, किसी संवेदनशील मुद्दे को उठाना चाहिए था।

जब तक जनरल मनोज मुकुंद नरवने की पुस्तक को प्रकाशन हेतु रक्षा मंत्रालय समीक्षा के बाद अनुमति न दे, और जब तक किताब प्रकाशित न हो जाए, तब तक इस मुद्दे को संसद में उठाना कतई भी उचित नहीं है। यहां तक कि इसपर सोशल मीडिया में भी चर्चा नहीं होनी चाहिए।

देश की आंतरिक, बाहरी और सीमा सुरक्षा पर देश का जनमत और दृष्टिकोण भी वही होना चाहिए, जो हमारी सेना, सरकार का अधिकृत मत हो। अगस्त 2020 में जब गलवान और दोकलम में चीनी सेना से हिंसक झड़प हुई तो जनरल नरवाने भारत के थलसेनाध्यक्ष थे। निश्चित रूप से उनके पास आम जन से अधिक सूचनाएं होंगी। रणनीति भी उनकी होगी, और सीमा सुरक्षा की पहली जिम्मेवारी भी उन्हीं की थी। ऐसे में एक दायित्वधारी को पद से हटने के बाद सूचनाओं को सार्वजनिक करने में सावधानी बरतनी चाहिए। आजादी के बाद से अभी तक के सभी सेनाध्यक्ष अगर सब कुछ सार्वजनिक करते तो देश में बहुत बड़े विभ्रम की स्थिति उत्पन्न हो गई होती। यही बात नेता विरोधी दल को भी समझनी चाहिए। उनसे राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रश्न पर जिम्मेदारी की अपेक्षा की जाती है।

 

 

January 31, 2026

भारतीय न्याय शास्त्र और यूजीसी नियमों पर रोक

प्राचीन न्याय शास्त्र के आलोक में सुप्रीम कोर्ट Supreme Court द्वारा यूजीसी पर रोक का औचित्य

Dr Chandra Prakash Sharma, Milak Rampur

डा चंद्रप्रकाश शर्मा

Article Posted & Published on : 31.01.2026, Saturday , Time: 10.11 AM By Chandra Prakash Sharma

सर्वोच्च न्यायालय Supreme Court द्वारा 29 जनवरी 2026 को विश्वविद्यालय अनुदान आयोग UGC के  “समता विनियम 2026” पर रोक यूजीसी के उन नियमों पर लगाई गई है जो उच्च शिक्षा संस्थानों Higher education Institution में जाति आधारित भेदभाव को रोकने के उद्देश्य बनाए गए थे।  उन्हें अस्पष्ट , दुरुपयोग की संभावना वाला और विभाजनकारी माना गया। 13 जनवरी 2026 को यूजीसी के इक्विटी रेगुलेशंस 2026 Equity regulations को अधिसूचित किया गया । यह नियम उच्च शिक्षा में समानता को बढ़ावा देने के लिए था जिसमें इक्वल ऑपर्च्युनिटी सेंटर्स और कैंपस स्तरीय समितियां का गठन शामिल था।  लेकिन विवादास्पद रेगुलेशन 3(सी) ने जाति आधारित भेदभाव को केवल अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग तक केंद्रित कर दिया और सामान्य वर्ग को इससे बाहर रखा गया जिसके कारण पूरे देश में अनेक प्रदर्शन , राजनीतिक प्रतिक्रियाएं और याचिकाएं दाखिल हुई जिसके फल स्वरुप मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत Chief Justice of India Justice Surykant और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची Justice Joymalya Bagchi की पीठ ने नियमों को पूर्णतः अस्पष्ट और दुरुपयोग की संभावना वाला बताया।साथ ही पुराने 2012 नियमों को जारी रखने का आदेश दिया।

सर्वोच्च न्यायालय का स्थगन आदेश प्राचीन न्यायशास्त्र के सिद्धांतों पर कितना खरा है, इसकी समालोचना व विश्लेषण समय की आवश्यकता है। प्राचीन भारतीय न्यायशास्त्र का मूल Vedas वेदों, Upnishad उपनिषदों और Dharm Sutra धर्मसूत्रों में सन्निहित है जिसका व्यावहारिक रूप Smritiya स्मृतियों में दृष्टिगोचर होता है। लगभग 200 ईसा पूर्व की Manu Smrati मनुस्मृति जो राजनीतिक रूप से काफी विवादित है, न्याय को धर्म का प्रतिबिंब मानती है जबकि Yagvalkya Smrati याज्ञवल्क्य स्मृति अधिक वैज्ञानिक और व्यावहारिक है क्योंकि यह व्यवहार अर्थात कानून, आचार अर्थात नैतिकता और प्रायश्चित यानी दंड के प्रावधानों से सम्प्रक्त है। लगभग 300 ईसा पश्चात की Narad Smrati नारद स्मृति विशेष रूप से फॉरेंसिक कानून पर आधारित है जिसमें अदालतों, गवाहों और दंड की प्रक्रिया का वर्णन है। मनुस्मृति के अध्याय 8 में राजा को न्याय करते समय पक्षपात रहित होना चाहिए,” राजा न्याय में पक्षपात न करें चाहे वह मित्र हो या शत्रु” यहां न्याय को धर्म रक्षक माना गया है। नारद स्मृति पूरी तरह कानूनी है जिसमें 18 शीर्षकों में न्याय प्रक्रिया का वर्णन है जिसमें झूठी शिकायतों के लिए दंड का प्रावधान है। प्राचीन शास्त्रों में न्याय के सिद्धांतों में,एक स्पष्टता-कानून अस्पष्ट न हो, दूसरी निष्पक्षता- सबके लिए समान, तीसरा सामाजिक सद्भाव- कानून समाज को एकजुट रखने वाले हों और चौथा राज धर्म- न्यायाधीश निडर और निष्पक्षहो, का समावेश था। सुप्रीम कोर्ट का स्थगनादेश प्राचीन सिद्धांतों के भी पूर्णता अनुरूप है। प्राचीन न्याय शास्त्रों के प्रथम सिद्धांत स्पष्टता के दृष्टिगत मनुस्मृति और याज्ञवल्क्य में ही अस्पष्ट कानून को दुरुपयोग का माध्यम माना गया है यूजीसी नियमों में रेगुलेशन 3(सी) को कोर्ट ने पूर्णता “वाग” बताया जो झूठी शिकायतों को बढ़ावा दे सकता है। नारद स्मृति में झूठी शिकायतों के लिए दंड का प्रावधान है जो यहां अनुपस्थित था।न्यायालय ने कहा कि ऐसे नियम व्यक्तिगत बदले की भावना से प्रयुक्त हो सकते हैं जो प्राचीन शास्त्रों के अनुसार न्याय की आत्मा के विरुद्ध है। यूजीसी का नियम प्राचीन न्याय शास्त्रों के द्वितीय निष्पक्षता और समानता के सिद्धांत के विपरीत है।कोर्ट ने भी अनुच्छेद 14 का उल्लेख करते हुए कहा की यह नियम केवल कुछ वर्गों को सुरक्षा देता हैं तथा सामान्य वर्ग को बाहर रखकर समानता के नियम का उल्लंघन करता है जो भेदभावपूर्ण है और समाज को विभाजित करने वाला है जबकि मनुस्मृति के अध्याय 8 के श्लोक 124 में न्याय में सबके लिए समान दंड का प्रावधान है। नारद स्मृति के अनुसार यह कानून की विफलता है। प्राचीन शास्त्रों ने सामाजिक सद्भाव व एकता को न्याय का तीसरा प्रमुख सिद्धांत माना है जो मुख्य न्यायाधीश के कथन में ध्वनित होता है कि 75 वर्षों की स्वतंत्रता के बाद भी ऐसे नियम समाज को पीछे धकेलते हैं क्योंकि इन नियमों के बाद देश में बड़े स्तर पर प्रदर्शन हुए और लोगों में कटुता की भावना दृष्टिगोचर हुई। मुख्य न्यायाधीश का वक्तव्य याज्ञवल्क्य के उदार दृष्टिकोण से मेल खाता है। न्यायालय ने अनुच्छेद 142 (Article 142) का उपयोग कर अंतिम आदेश दिया जो प्राचीन राजधर्म से मेल खाता है जहां राजा निडर होकर न्याय करता था क्योंकि मनुस्मृति के अनुसार “राजा बिना भय या पक्षपात के निर्णय ले।” कोर्ट ने पुराने 2012 के नियमों को जारी रखा जो स्पष्ट और निष्पक्ष हैं, यह प्राचीन शास्त्रों की परंपरा का भी पालन है। भारत के उच्चतम न्यायालय द्वारा यूजीसी नियमों पर लगाई गई रोक वर्तमान विधि नियमों के साथ प्राचीन न्याय शास्त्रों की दृष्टि से भी पूर्णता औचित्य पूर्ण है क्योंकि यह स्पष्टतः,निष्पक्षता और सामाजिक एकता के सिद्धांतों पर आधारित है जिसका मनुस्मृति, याज्ञवल्क्य,नारद स्मृति में भी उल्लेख है। इससे स्पष्ट होता है कि हमें नियम बनाते समय प्राचीन सिद्धांतों का भी अवलोकन कर उनसे भी प्रेरणा लेनी चाहिए ताकि नियम अधिक स्पष्ट ,प्रभावी और सर्वमान्य बन सकें। लेखक: डॉ.चन्द्रप्रकाश शर्मा,पूर्व सलाहकार हिन्दी, अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय, भारत सरकार निवास -नसीराबाद,मिलक, रामपुर (उ.प्र.)-243701 मोबाइल -8273463656

January 28, 2026

गो रक्षा का संकल्प

सम्पादकीय
सर्वेश कुमार सिंह
First Publised on : 06 November 2016 Time: 22:11   Tags: Editorial, Sarvesh Kumar Singh
सात नवम्बर को ही इस साल •ाी गोपाष्टमी है। यह गो रक्षा के संकल्प का दिन है। इस दिन पचास साल पहले भी गोपाष्टमी थी। गाय के प्राणों की रक्षा के लिए इस दिन दिल्ली में संसद •ावन पर विशाल प्रदर्शन हुआ था। एक लाख से अधिक एकत्रित हुए संतों पर तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने गोली चलवा दी थी। अनेकों साधू और गो भक्त मारे गए थे। स्वतंत्र भारत के इतिहास में यह संत शक्ति का अभी तक का सबसे बड़ा प्रदर्शन था। देश भर के साधू पुरी के शंकराचार्य निरंजनदेव तीर्थ और प्रभुदत्त ब्रह्मचारी, स्वामी करपात्री जी तथा सुशील मुनि के नेतृत्व में सात नवम्बर को संसद भवन पर एकत्रित हुए थे। संत समाज ने मांग की थी कि गो हत्या निषेध के लिए केन्द्रीय कानून बनाया जाए। संतों के बलिदान के पचास पूरे होने के बाद भी यह मांग ज्यों की त्यों बरकरार है। बल्कि गो हत्या पहले की तुलना में और अधिक बढ़ गई है। यांत्रिक कत्लखाने खोलकर निरीह गो वंश की हत्या की जा रही है। दस राज्यों में गो हत्या रोकने के लिए कोई कानून नहीं है। कुछ राज्यों ने पूर्ण तो कुछ ने आशिंक रूप से गो हत्या पर प्रतिबंध लगा है। केन्द्र सरकार को संविधान की भावना के अनुरूप केन्द्रीय कानून बनाकर देशभर में गो हत्या रोकनी चाहिए। संविधान का अनुच्छेद-48 स्पष्ट कहता है कि गो हत्या निषेध के उपाय किये जाएं। अनुच्छेद में कहा गया है ‘राज्य कृषि और पशुपालन को आधुनिक और वैज्ञानिक प्रणालियों से संगठित करने का प्रयास करेगा और विशिष्टत: गायों और बछड़ों तथा अन्य दुधारु और वाहक पशुओं की नस्लों के परीरक्षण और सुधार के लिए और उनकी हत्या का प्रतिषेध करने के लिए कदम उठाएगा।’ गो हत्या रोकने के लिए केन्द्रीय कानून बनाने के अलावा यह भी आवश्यक है कि देश से गो मांस का निर्यात पूर्णत: प्रतिबंधित किया जाए, सामूदायिक चारागाह का विकास हो तथा इनसे अवैध कब्जे हटाए जाएं। राष्ट्रीय चारा नीति बने और कृषि नीति में पशुधन के समुचित संरक्षण के प्रावधान जोड़े जाएं। विदेश से आने वाले दूध पाउडर, बटर आयल के आयात पर रोक लगाई जाए। गो पालन पर किसानों को अनुदान प्रदान किया जाए। यह अनुदान किसानों को भारत सरकार द्वारा हाल ही में लगाए गए किसान सेस टैक्स से दिया जा सकता है। केन्द्र की वर्तमान भाजपा सरकार के पास स्पष्ट बहुमत है। वह यह काम कर सकती है। यदि केन्द्र सरकार संतों के बलिदान के पचास साल पूरे होने के अवसर पर गो हत्या निषेध का केन्द्रीय कानून बनाती है तो यह बलिदानी संतों को सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
Sarvesh Kumar Singh Senior Journalist, Lucknow Uttar Pradesh

Sarvesh Kumar Singh
Senior Journalist, Lucknow Uttar Pradesh

सर्वेश कुमार सिंह, स्वतंत्र पत्रकार

January 4, 2026

इस्लामी एजेण्डे पर ममदानी

न्यूयार्क के मेयर जोहरान ममदानी के कुरान पर हाथ रखकर शपथ लेने के एक दिन बाद ही उनका इस्लामी एजेण्डा उजागर हो गया है। ममदानी ने दिल्ली हिंसा के आरोपी उमर खालिद से सहानुभूति दिखाकर और उसके लिए कुछ करने की मंशा जाहिर करके अपने सेकुलर चेहरे से नकाब हटा दिया है। ममदानी अमेरिका के सबसे बड़े शहर के पहले मुसलमान मेयर बनने के बाद भारत के अलगवादी और दिल्ली हिंसा के आरोपी उमर खालिद के पिता सैयद कासिम रसूल से 9 दिसम्बर को मिले थे। इस दौरान उन्होंने उमर के विचारों का समर्थन करते हुए एक पत्र लिखा था। यह पत्र मेयर पद की शपथ लेने के दिन ही वायरल हुआ है। मेयर ममदानी का हस्तलिखित ये पत्र जिसमें खालिद की तारीफ की गई है, बनो ज्योत्सना लाहिड़ी ने जारी किया है जोकि उमर की साथी है।  पत्र से जाहिर होता है कि मेयर का चुनाव जीतने के तुरंत बाद  वे अब पूरी तरह से एक मुसलमान नेता के तौर पर अपने एजेण्डे पर आ गए हैं। उनकी इस हरकत ने जहां वैश्विक इस्लामी सोच को उजागर किया है, वहीं उन भारतवंशी न्यूयार्कवासियों की भी आंखें खोल दी हैं, जिन्होंने मेयर के चुनाव में ममदानी का इसलिए समर्थन किया था, क्योंकि वे भारतीय मूल के मुसलमान हैं। वे उनमें एक अच्छे नेक, सच्चे, सेकुलर मुसलमान की छवि देख रहे थे। यदि भारतवंशी हिन्दू और सिखों ने न्यूयार्क मेयर के चुनाव में ममदानी का समर्थन नहीं किया होता तो वे इस अमरीकी सबसे बड़े शहर के मेयर शायद नहीं बनते। भारतवंशियों को सबसे पहला झटका तब लगा जब ममदानी ने एक जनवरी को कुरान पर हाथ रखकर शपथ ली। दूसरा झटका अगले ही दिन लगा, जब ममदानी का  दिल्ली हिंसा के मास्टरमाइंड जेल में बंद जवाहरलाल विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र उमर खालिद को सहानुभूति में लिखा पत्र वायरल हुआ। बनो ज्योत्सना लाहिड़ी ने एक्स पर पोस्ट किया है। उमर खालिद का समर्थन सिर्फ इसलिए किया गया है क्योंकि वह मुसलमान है। ममदानी को इससे कोई मतलब नहीं है कि दिल्ली के जिन दंगों में वह आरोपी है, उनमें 53 लोग मारे गए थे और 700 से अधिक घायल हुए थे। इन दंगों में एक आईबी अधिकारी अंकित शर्मा की भी हत्या हुई थी। इतने बड़े दंगे के आरोपी का समर्थन और उससे सहानुभूति व्यक्त करने का सिर्फ एक मात्र कारण वैश्विक इस्लामी एडेण्डा है। यह एजेण्डा हर स्तर पर चलाया जा रहा है चाहे वह पाकिस्तान हो, बंगलादेश हो, यूरोप या अमेरिका। इनका एकमात्र उद्देश्य इस्लामी वर्चस्व कायम करना है चाहे वह कैसे भी हो, वोट से हो या बुलेट से। बस इस्लामी राज्य कायम होने चाहिए। लेकिन, भारत के सेकुलर बने बहुसंख्यक आज भी इस एजेण्डे को समझने को तैयार नहीं हैं। वे इससे अपनी आंखें मूंदे हैं। आसन्न खतरे का भी कोई एहसास उन्हें नहीं है। जरूरत ऐसे छद्म सेकुलर ममदानियों से सावधान रहने की है। वे चाहे अमेरिका, यूरोप में हों या भारत में हों। उन्हें उनकी अपनी भाषा में ही उत्तर समझ में आता है।

October 24, 2025

ताकि, याद रहे विभाजन की विभीषिका

यह फैसला बहुत देर से आया, लेकिन आ गया। यह संतोष की बात है। उन बलिदानियों, त्यागियों और सर्वस्व न्यौछावर करने वालों का स्मरण अब सरकार भी करेगी, जिन्होंने विभाजन की विभीषिका को झेला था। भारत विभाजन के समय एक हिस्से के करीब एक करोड़ लोगों को विस्थापन का दंश झेलना पड़ा था । लगभग 25 लाख लोगों को जानें गंवानी पड़ी थीं। सर्वाधिक अत्याचार उन हिन्दुओं और सिखों पर हुए थे, जोकि पाकिस्तान के हिस्से में गए भू-भाग में रह गए थे। हमें तो 15 अगस्त 1947 को विभाजन की कीमत पर स्वतंत्रता मिल गई थी। किन्तु 14 अगस्त को जो कुछ हुआ , उसे कदापि भुलाया नहीं जा सकता । पाकिस्तान के निर्माण की घोषणा होते ही पश्चिमी और पूर्वी पाकिस्तान दोनों जगहों पर हिन्दुओं और सिखों पर हमले शुरु हो गए थे। उन्हें भगाया गया । वे अपना घर-बार, जमीन-जायदाद सभी कुछ छोड़ कर स्वतंत्र हुए भारत की और भाग रहे थे। लेकिन, उन्हें सम्मानपूर्वक भारत भी नहीं आने दिया जा रहा था। जिहादियों और उन्मादियों ने हिन्दुओं और सिखों से कह दिया था कि जवान बेटियों, बहुओं और महिलाओं को छोड़ कर जाएं। बहुत थोड़ा सा सामान लेकर, सब कुछ छोड़ कर लोग भागे थे। इनके घर मकान कब्जाने की होड़ मच गई थी। हालात इतने खराब थे कि 14 अगस्त से पहले ही लोगों ने हिन्दुओं और सिखों के घरों को चिन्हित करना शुरु कर दिया था, कि ये लोग भागेंगे, तो किस घर में कौन रहेगा। कितने ही सम्पन पंजाबी और सिन्धी परिवारों ने अपने लाखों करोड़ों के कारोबार, दुकानें सब छोड़कर बैलगाडियों का सहारा लिया था । लेकिन, उन्हें रास्ते भर लूटा गया था । उनसे स्त्रियों को छीना गया था । तमाम लोगों ने अपनी और बेटियों की इज्जत बचाने के लिए अपने हाथों ही बेटियों को मार डाला था। ट्रेन भर कर लाशें भेजने की घटना को कैसे भुलाया जा सकता है। पाकिस्तान की नवगठित सरकार के प्रतिनिधि हाथ पर हाथ रखकर और आंखें मूंद कर बैठ गए थे। मुस्लिम लीग और कांग्रेस के उन मुस्लिम नेताओं की जुबानें सिल गई थीं, जोकि भारत विभाजन से पहले यह भरोसा दिला रहे थे कि नए बनने वाले देश पाकिस्तान में हिन्दु और सिखों को पूरी सुरक्षा दी जाएगी। हो रहे अत्याचारों को रोकने की बात तो दूर, ये लोग इनकी निंदा करने को भी तैयार नहीं थे। लार्ड माउंटबेटन ने भारत को उसके भाग्य पर छोड़ दिया था । भारत का नेतृत्व स्वतंत्रता का जश्न मनाने व्यस्त था । विस्थापन का दंश झेल कर भारत आ रहे लोगों की सुधि लेने की किसी को फुरसत नहीं थी। जिसे जहां जगह मिली, वह रहा। सड़कों पर, धर्मशालाओं में, मन्दिरों और गुरुद्वारों में लोगों ने शरण पायी थी। सरकारी स्तर पर किये गए प्रयास नाकाफी थे। विस्थापित होकर आये परिवारों ने मजदूरी की थी, बाजारों में साइकिलों से कपड़ा बेचा था। फेरियां लगाईं थी। जो लाहौर और करांची में लाखों करोड़ों के कारोबार करते थे वे दिहाड़ी मजदूर बन गए थे। बड़े किसानों के खेतों में फसले काट रहे थे। यह दंश झेला उस आबादी ने जो मांग रहे थे आजादी और मिला कभी ना भुला पाने वाला दंश। इतने सब के बाद भी जो लोग पाकिस्तान में रह गए। वे आज तक दंश झेल रहे हैं। पाकिस्तान निर्माण के समय वहां 21 प्रतिशत आबादी हिन्दू और सिखों की थी। आज दो प्रतिशत से भी कम है। कहां गए ये 21 प्रतिशत, कोई है दुनिया में पूछने वाला । या तो जबरन इस्लाम में परिवर्तित कर दिये गए, या मार दिये गए। अथवा उन्हें पाकिस्तान से भागना पड़ा है। कोई दिन ऐसा नहीं होता जब पाकिस्तान में किसी हिन्दू या सिख लड़की का अपहरण और जबरन निकाह ना होता हो। विभाजन की विभीषिका का यह दंश सतत है। अविराम है, यह रुकने वाला नहीं है। जब तक भारत अखंडता के संकल्प को लेकर एक बार फिर खड़ा नहीं होता। हम अखंड भारत दिवस के रूप में 14 अगस्त को मनाते रहे हैं। और, मनाते रहेंगे, क्योंकि यही दिन था , जब हमारा एक बड़ा भू-भाग दो राष्ट्र के सिद्धान्त के आधार पर इस्लामी राष्ट्र के रूप में परिर्वतित हो गया था । अब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 14 अगस्त 2021 को यह घोषणा कर दी है कि ‘देश हर साल विभाजन विभीषिका दिवस के रूप में इस दिन को मनाएगा’। इससे यह सुनिश्चित हो जाएगा कि हमें अब हर साल और हमेशा इस दिन को याद करना है, उन बलिदानियों, त्यागियों का पुण्य स्मरण करना है। श्रद्धांजलि देनी है जिनके कष्टों और असहनीय पीड़ा की कीमत पर हम स्वतंत्र हुए थे। राष्ट्र ने उन लोगों का स्मरण करके कृतज्ञता प्रकट करने का दायित्व 75 साल बाद निभाया है। प्रधानमंत्री जी इस निर्णय के लिए साधुवाद के पात्र हैं।