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मैनपुरी: पहले फाँसी की सजा सुनाई फिर कर दिया बरी

January 16, 2026

मैनपुरी: पहले फाँसी की सजा सुनाई फिर कर दिया बरी

सोबरन सिंह प्रजापति

पिता पर था मां-बेटी की हत्या का आरोप
-2017 में अपर जिला जज ने सुनाई थी फांसी की सजा
-सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर दोबारा हुई मुकदमे की सुनवाई
मैनपुरी, 16 जनवरी 2026, थाना करहल क्षेत्र के गांव रूपपुर में 11 साल पहले मां-बेटी की हत्या करने के आरोपी पिता सोबरन सिंह प्रजापति को संदेह का लाभ देते हुए स्पेशल जज एससी-एसटी एक्ट जयप्रकाश ने बरी कर दिया है। उसको 2017 में अपर जिला जज ने फांसी की सजा सुनाई थी। सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर मुकदमे की दोबारा सुनवाई करने के बाद सोबरन सिंह को आरोप साबित नहीं होने पर बरी कर दिया गया है।
रूपपुर में 29 जून 2014 की रात को ममता और उसकी बेटी सपना की हत्या कर दी गई थी। 30 जून को ममता के फुफुेरे भाई रजनेश निवासी नगला पजाबा थाना कोतवाली ने ममता के पति सोबरन सिंह के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराई थी। पुलिस ने सोबरन को पकड़कर जेल भेज दिया था। पुलिस द्वारा जांच कर भेजी गई चार्जशीट के बाद मुकदमे की सुनवाई करके तत्कालीन अपर जिला जज प्रथम गुरुप्रीत सिंह बाबा ने सोबरन सिंह को एक मार्च 2017 को फांसी की सजा सुनाकर 25000 रुपये का जुर्माना लगाया था।
सोबरन सिंह द्वारा हाई कोर्ट इलाहाबाद में इसके खिलाफ अपील की गई। हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति ओमप्रकाश और संजय अग्रवाल की खंडपीठ ने अपील की सुनवाई करने के बाद एक अक्तूबर 2018 को अपील खारिज करके अपर जिला जज द्वारा सुनाई गई फांसी की सजा की पुष्टि की। लेकिन 25000 रुपये का जुर्माना खत्म कर दिया। सोबरन सिंह ने हाई कोर्ट के आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की। सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति विक्रम नाथ, संजय करोल, संदीप मेहता की खंडपीठ ने अपील मंजूर करके 4 फरवरी 2025 को मुकदमे की नए सिरे से दोबारा सुनवाई करने के आदेश दिए।
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद स्पेशल जज एससी-एसटी एक्ट जयप्रकाश के न्यायालय में मुकदमे की दोबारा सुनवाई हुई। सुनवाई के दौरान सोबरन के पुत्र अंकुश की गवाही को न्यायालय ने अविश्वसनीय माना, इसी आधार पर संदेह का लाभ देते हुए सोबरन को बरी कर दिया गया। 2026 में 11 साल बाद जेल से बाहर आया।
पुत्री ने दी थी पिता के खिलाफ गवाही
मैनपुरी। पत्नी और पुत्री की हत्या करने का आरोपी सोबरन सिंह फांसी की सजा होने से बरी तक होने तक बेचैन रहा। जेल में उसने दिन-रात गुमसुम रहकर गुजारे। वर्ष 2017 में फांसी की सजा होने के बाद उसको मैनपुरी जेल से फतेहगढ़ सेंट्रल जेल भेजा गया था। वर्ष 2025 में मुकदमे की सुनवाई दोबारा शुरू होने पर उसको फतेहगढ़ सेंट्रल जेल से मैनपुरी जेल लाया गया।
घटना के बाद सोबरन सिंह के परिजन ने उससे दूरी बना ली थी। पहले हुई सुनवाई में सोबरन की पुत्री पूनम ने पिता के खिलाफ गवाही दी थी। उस समय अंकुश की गवाही नहीं कराई गई थी। दोबारा हुई सुनवाई में पूनम ने पिता के खिलाफ गवाही नहीं दी। अब पूनम की भी शादी हो चुकी है। उसकी एक बच्ची भी है। दोबारा हुई सुनवाई के दौरान हर तारीख पर सोबरन को जेल से न्यायालय में लाया गया। हर तारीख पर उसके चेहरे पर बेचैनी साफ नजर आती रही।
सोबरन सिंह के जेल में होने के कारण दोबारा मुकदमे की सुनवाई के दौरान उनके भाई पन्नालाल और बहनोई हरीशंकर ने न्यायालय में पैरवी की। हर तारीख पर दोनों लोग न्यायालय पहुंचते और सोबरन को दिलासा देते। एक बार हो चुकी फांसी की सजा के कारण सोबरन दहशत में ही रहा। मुकदमे में फैसले वाले दिन जब उसको जेल से न्यायालय लाया गया, तब भी उसके चेहरे पर बेचैनी साफ नजर आई। स्पेशल जज एससी-एसटी एक्ट जयप्रकाश ने जब उसको बरी करने का फैसला सुनाया तो उसकी आंखों में आंसू आ गए।
पूरी घटना पर एक नजर
मैनपुरी। थाना करहल के गांव रूपपुर में ममता और सपना के शव सोबरन सिंह प्रजापति के भाई पन्नालाल के मकान की छत पर 30 जून 2014 की सुबह पड़े मिले थे। जानकारी होने पर गांव पहुंचे ममता के फुफुेरे भाई रजनेश ने ही पुलिस को सूचना दी थी। मौके पर सोबरन के बच्चे पूनम, अंजली, अंकुश, सुमित मिले थे। बच्चों द्वारा बताई गई कहानी के आधार पर ही रजनेश ने अपनी ममेरी बहिन ममता तथा भांजी सपना की हत्या करने की रिपोर्ट सोबरन के खिलाफ लिखाई थी।
कोर्ट ने बालक की गवाही मानी अविश्वसनीय
मैनपुरी। स्पेशल जज एससी-एसटी एक्ट जयप्रकाश के न्यायालय में सोबरन के पुत्र के रूप में अंकुश की गवाही कराई गई। सोबरन ने अंकुश को अपना पुत्र मानने से ही मना कर दिया। बताया कि अंकुश नाम की उसकी पुत्री थी, जिसकी मृत्यु हो चुकी है। अंकुश की घटना के समय उम्र लगभग तीन साल थी। गवाही के समय उसकी उम्र लगभग 14 साल है। उनके द्वारा दी गई स्पष्ट गवाही को न्यायाधीश ने अविश्वसनीय माना है। आदेश में लिखा है कि घटना के समय लगभग तीन साल का बालक मानव स्वभाव के अनुसार घटना के बारे में इतनी सूक्ष्मता से गवाही नहीं दे सकता है। बालक की गवाही को अविश्वसनीय मानते हुए सोबरन सिंह को संदेह का लाभ देकर बरी किया गया है। अन्य गवाह अपनी गवाही में घटना को साबित नहीं कर सके हैं।