
*समय है 71 की चूक को सुधार लेने का
सर्वेश कुमार सिंह
हम पिछले 54 साल से विजय दिवस मना रहे हैं। हर साल जब 16 दिसम्बर आता है तो पाकिस्तान पर निर्णायक विजय और बांग्लादेश के उदय का पर्व मनाया जाता है। वर्ष 2022 में जब इस विजय के पचास वर्ष हुए तो भारत और बंगलादेश में बडा उत्सव मनाया गया। लेकिन इस बार का विजय दिवस कछ अलग संदेश और मायने रखता है। यह दिन अब इस बात की समीक्षा और सिंहावलोकन को आमंत्रण देता है कि क्या भारत द्वारा 1971 में लिया गया फैसला और करीब 3843 भारतीय सैनिकों का बलिदान व्यर्थ चला गया है? क्या हम सिर्फ इस खुशफहमी में हैं कि हमने पाकिस्तान के दो टुकडे करके पूर्वी सीमा को सदैव के लिए सुरक्षित कर लिया है?
पांच अगस्त 2024 के बाद जो कुछ बंगलादेश में घट रहा है और वहां की काम चलाऊ सरकार यानि कि सलाहकार समूह जैसे फैसले ले रही है। उससे तो यही लगता है कि हम ठगे गए हैं। एक पडोसी पर उनकी ही इस्लामी सेना के अत्याचारों, हत्याओं, बलात्कारों की घटनाओं से तत्कालीन भारत सरकार का मन आहत हुआ था। एक अनुमान के अनुसार पाकिस्तान की सेना ने बंगलादेश में 30 लाख लोगों को अकराण मार डाला था और 3 लाख महिलाओं के साथ दुष्कर्म की घटनाएं हुई थीं। इस अत्याचार और पापकर्मों की चीत्कार भारत के द्रवित मन ने सुनी थी। तत्कालीन भारतीय नेतृत्व ने पूर्वी पाकिस्तान को अपनी इच्छा शक्ति और प्रबल सैन्य शक्ति के बल पर बंगलादेश में बदल दिया था।
जब ढाका में भारतीय सेना के लेफ्टिनेंट जनरल जगजीत सिंह अरोडा पाकिस्तानी सेना के कमांडर जनरल एएके नियाजी से आत्मसर्पण दस्तावेज पर 16 दिसम्बर को हस्ताक्षर करा रहे थे, तब किसी ने नहीं सोचा होगा कि एक दिन ऐसा भी आएगा कि इसी ढाका में एक बार फिर ऐसी सलाहकार सरकार नोबेल पुरस्कार विजेता मो यूनुस के नेतृत्व में आएगी जिसकी सरपरस्ती में भारतीय सेना की जीत के उपलक्ष्य और बंगलादेश की आजादी के प्रतीक उस प्रमिमा को जो इस समर्पण को दर्शाती थी, बंगलादेश के वही अतिवादी जेहादी तोड देंगे जिनके लिए भारतीय सेना ने बलिदान दिये। भारत की जनता ने एक करोड से अधिक बंगलादेशी शरणार्थियों को अपने यहां रखा और उनकी सभी तरह की मदद की। यह स्टेच्यु ढाका में स्थापित था। शेख हसीना की सरकार के पतन के बाद बंगलादेश में जो कुछ हुआ और अभी हो रहा है। इससे भारतीय जन-मन अत्यधिक आहत है। वहां के अल्पसंख्यकों पर जिस तरह हमले हुए हैं और अभी जारी हैं। उन्हें प्रताणित किया जा रहा है। हिन्दू मन्दिरों को तोडा गया है। इस्कान और काली के मन्दिर तो ढाका और चटगांव में एकता और सेवा के प्रतीक बने थे। इन्हें जला दिया गया। इस्कान ढाका के पूर्व सचिव चिन्मयदास को सिर्फ इस लिए गिरफ्तार कर लिया गया क्योंकि उन्होंने अत्याचारों के खिलाफ आवाज बुलंद की। जो वकील उनकी पैरवी के लिए गए उन्हें हमला करके गंभीर रूप से घायल कर दिया गया।
आज समय है कि इस विषय पर विमर्श शुरु हो कि हम अपने पडोसी की पचास साल की तक हर तरह की मदद करते रहे और उसने हमारी भावनाओं की कतई भी कद्र नहीं की और न ही हमारे राष्ट्रीय हितों को कोई तवज्जो दी। इन्ही पचास सालों में बंगलादेश हूजी जैसे आतंकवादी संगठन का जन्मदाता बन गया। जिसने भारत में कई आतंकवादी घटनाओं को अंजाम दिया है। भारत के पूर्वोत्तर के राज्यों में आतंकवादी भेजने के लिए और उनके प्रशिक्षण के लिए लांचिंग पैड बन गया। अब हालत यह है कि बंगलादेशी सेना को प्रशिक्षण देने के लिए पाकिस्तानी सैन्य अधिकारी पहुंच गए हैं। आईएसआ के अधिकारियों का दल पूरे बंगलादेश विशेष रूप से भारतीय सीमा क्षेत्र का भ्रमण कर रहा है। हमारे शत्रु की शरण स्थली अब बंगलादेश बन गया है। अब इस स्थिति में भारत की नई भूमिका क्या हो। सबसे पहली प्राथमिकता है कि बंगलादेश के अल्पसंख्यक हिन्दू, सिख, जैन, बौद्ध और इसाई समुदायों की जान मान की रक्षा हो, वह कैसे होगी यह विचार भारत सरकार को करना है।
बगलादेश का उद्भव और भारत की भूमिका पर एक टिप्पणी जो करीब दो साल पहले बलोचिस्तान की निर्वासित सरकार की प्रधानमंत्री डा नायला कादरी ने की थी,उसका उल्लेख यहां समीचीन होगा। भारत भ्रमण पर आयी डा कादरी ने एक स्थानीय चैनल को साक्षात्कार देते समय कहा था कि भारत ने 1971 में बडी गलती की थी। उस समय बंगलादेश भारत के कब्जे में था, लाहौर तक भारतीय सेना पहुंच चुकी थी। ऐसे में अलग देश बनाने की बजाय बंगलादेश का भारत में विलय कर लिया जाना चाहिए था। उनकी इस प्रतिक्रिया को उस समय अतिरेक में कही गयी बात माना गया क्योंकि वे पाकिस्तान के खिलाफ बलूचों के संघर्ष को नेतृत्व प्रदान कर रही हैं। उनकी पाकिस्तान से नाराजगी जग जाहिर है। लेकिन, 5 अगस्त 2024 को जो हुआ और उसके बाद हो रहा है उसे देखते हुए लगता है कि डा नायला कादरी की बात सही थी।
भारत में यह विमर्श पहले से चल रहा है कि 71 में लाहौर और बंगलादेश को मिला लिया जाना चाहिए था। पाकिस्तान के 93 हजार सैनिकों को हमने शिमला समझौते में यूं ही क्यों छोड दिया। वे युद्ध बंदी थे उनपर अन्तर्राष्ट्रीय न्यायालय में युद्ध अपराध का मुकदमा दर्ज होना चाहिए था। या फिर हम उनके बदले कुछ और हासिल करते।
अब भारतीय उपमहाद्वीप में नया खतरा जो सामने है वह यह है कि हमारी सीमाएँ एक बार फिर तनावग्रस्त हैं। हम अब यह भी नहीं कह सकते कि हम पूर्वी सीमा पर निश्चिन्त हैं। लेकिन एक अवसर अभी भी है वह यह कि बंगलादेश की निर्वाचित प्रधानमंत्री शेख हसीना भारत में हैं। वे आज भी तकनीकी रूप से बंगलादेश की प्रधानमंत्री हैं उन्होंने त्यागपत्र नही दिया है। बंगलादेश के राष्ट्रपति कह भी चुके हैं कि उनके पास हसीना कोई त्यागपत्र नहीं है। इसलिए हसीना ही बंगलादेश की संवैधानिक सरकार की प्रमुख हैं। उनसे वार्ता और समझौता करके 71 की चूक को सुधार लेना चाहिए। समझौते को मूर्त देने में भारतीय सेना सक्षम है।
(लेखक परिचयः स्वतंत्र पत्रकार, उत्तर प्रदेश राज्य मुख्यालय लखनऊ)
Kalyan Singh कल्याण सिंहअयोध्या में विवादित ढांचे के नीचे रखीं भगवान श्रीराम की मूर्तियों को कोई ताकत हटा नहीं सकती है, तो फिर वहां मस्जिद के ढांचे की क्या आवश्यकता है ? हम इस ढांचे को यहां से हटा देना चाहते हैं। दृढ़ता और संकल्प की शक्ति के साथ यह बात कहने का अदम्य साहस कल्याण सिंह में ही था। वह भी तब जब वे उत्तर प्रदेश जैसे विशाल राज्य के मुख्यमंत्री पद पर विराजमान थे। कल्याण सिंह ने यह बात राजधानी के वरिष्ठ पत्रकार स्व. दिलीप अवस्थी से सितंबर 1991 में कही थी। जो समय देश की जानी मानी पत्रिका के राज्य में विशेष संवाददाता थे। उनके यह संकल्प व्यक्त करने के एक साल बाद ही छह दिसम्बर 1992 को वह विवादित ढांचा वहां से हटा दिया गया था। इसका मतलब साफ है कि कल्याण सिंह ने गर्भगृह पर ही श्रीराम मन्दिर निर्माण के लिए परिकल्पना कर ली थी। सफल राजनेता, सफल मुख्यमंत्री, सफल विधायक, सफल पार्टी कार्यकर्ता, सफल शिक्षक और सफल स्वयंसेवक के रूप में 89 साल की जीवन यात्रा पूरी करने के बाद 21 अगस्त 2021 को अनन्त यात्रा पर जाने वाले कल्याण सिंह को युग पुरुष के रूप में याद किया जाएगा।
कल्याण सिंह जिस व्यक्तित्व का नाम है, उसने कभी पीछे मुडकर नहीं देखा। जो तय कर लिया, उसे निभाया और अंत तक निभाया कभी नफा – नुकसान नहीं सोचा। उनके व्यक्तित्व में एक जन्मजात दृढ़ता थी। जिसने उन्हें सफल प्रशासक तो बनाया ही, सफल राजनीतिज्ञ भी साबित किया। अपनी दृढ़ता और सिद्धान्तों पर अडिगता के चलते ही वे भारतीय जनता पार्टी के केन्द्रीय नेतृत्व से टकरा गए थे। झुके नहीं,पार्टी छोड़ी, बगावत की। लेकिन, हमेशा अपनी आत्मा को भाजपा के भीतर ही पाया। इसी का परिणाम था कि दो बार 1999 और 2009 में पार्टी से अलग होने के बाद पुनः पुनः लौटते रहे। और अंत में 2014 में जब लौटे तो फिर कभी भाजपा से दूर नहीं हुए। पार्टी से दूर होने पर भी उन्होंने हमेशा यही इच्छा व्यक्त की कि इस पार्टी में प्राण बसते हैं, मेरी अंतिम इच्छा है कि भाजपा के झण्डे में लिपटकर ही अंतिम यात्रा पूरी हो।
कल्याण सिंह का प्रारम्भिक जीवन बेहद सामान्य परिवार से प्रारम्भ हुआ। उनका जन्म अलीगढ़ जनपद के अतरौली क्षेत्र में मढौली गांव में पांच जनवरी 1932 को हुआ था। पिता का नाम तेजपाल लोधी और माता का नाम सीता देवी था। वे किसान परिवार में जन्मे थे। उनके पिता छोटे काश्तकार थे। शिक्षा के दौरान ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ गए थे। उन्हें उत्तर प्रदेश के पूर्व क्षेत्र प्रचारक स्व. ओमप्रकाश जी ने स्वयंसेवक बनाया था। ओमप्रकाश जी उस समय अतरौली तहसील में तहसील प्रचारक थे। बाद में उन्हें अतरौली का तहसील कार्यवाह बनाया गया था। वे अंत तक ओमप्रकाश जी को अपना आदर्श मानते रहे। भाजपा से दूरी होने के बाद भी वे ओमप्रकाश जी के प्रति अगाध श्रद्धा का भाव रखते थे। कल्याण सिंह ने अपने सार्वजनिक जीवन की शुरुआत एक शिक्षक के रूप में की थी। वे अतरौली के समीप ही स्थित रायपुर में एक जूनियर हाई स्कूल में अध्यापक रहे।
संघ की योजना से उन्हें तत्कालीन जनसंघ में काम के लिए भेजा गया । उन्होंने पहला चुनाव जनसंघ के टिकट पर 1962 में लड़ा, लेकिन वह यह चुनाव हार गए। इसके बाद वह 1967 में फिर अतरौली से जनसंघ के ही टिकट पर चुनाव लड़े । इस बार वह जीत गए। इसके बाद उन्होंने 1969,1974,1977 के चुनाव जीते। लेकिन, वे 1980 का विधान सभा हार गए। उन्हें लोकदल प्रत्याशी अनवार अहमद ने हराया। फिर 1985, 1989,1991,1993 और 1996 में चुनाव जीते। इस प्रकार कल्याण सिंह कुल नौ बार विधायक रहे। दो बार विधान सभा का चुनाव हारे। जबकि दो बार सांसद रहे। एक बार 2004 में बुलन्दशहर से और 2009 में एटा से उन्होंने चुनाव जीता। दोनों चुनाव उन्होंने निर्दलीय किन्तु सपा के समर्थन से जीते थे। भारतीय जनता पार्टी से नाराज चल रहे कल्याण सिंह को 2014 में पुनः पार्टी मे वापस लिया गया और उन्हें राजस्थान का राज्यपाल बनाया गया। इसके साथ ही वे कुछ महीनों के लिए हिमाचल प्रदेश के भी राज्यपाल रहे।
कल्याण सिंह ने उत्तर प्रदेश में 1999 में हुए सत्ता परिवर्तन से रुष्ट होकर भाजपा छोड़ दी थी। उन्हें हटाकर रामप्रकाश गुप्ता को मुख्यमंत्री बनाया गया था। किन्तु वह नाराज हो गए और उन्होंने राष्ट्रीय क्रांति पार्टी बना ली थी। इस पार्टी से उन्होंने 2002 के विधान सभा चुनाव में अपने प्रत्याशी खड़े कर दिये। इसका परिणाम हुआ कि भाजपा को इस चुनाव में भारी नुकसान हुआ। माना गया कि कल्याण सिंह के लोध और पिछड़े वोट बैंक के कारण भाजपा लगभग 70 सीटों पर चुनाव हारी। यहीं से भाजपा को कल्याण सिंह की राजनीतिक शक्ति का एहसास हुआ। इसके बाद ही उन्हें वापस लाने के प्रयास होने लगे थे। वे 2004 में वापस लौट भी आए, किन्तु फिर बात बिगड़ गई और 2009 में दोबारा बगावत कर दी। लेकिन, पांच साल में ही फिर वापस लौटे।
श्रीराम जन्मभूमि मन्दिर आंदोलन के अग्रणी नेता के रूप में कल्याण सिंह को इतिहास याद रखेगा। उन्हें युगपुरुष और हिन्दू हृदय सम्राट की उपाधि मन्दिर के लिए सरकार को न्यौछावर कर देने के बाद ही मिली। ढांचा ढहाये जाने पर उन्होंने निहत्थे कारसेवकों पर गोली चलवाने से इनकार कर दिया था। अफसरों को भी कह दिया था कि एक भी गोली नहीं चलनी चाहिए। छह दिसंबर 1992 को अयोध्या मे विवादित ढांचा ढहाये जाने के बाद उन्होंने अपने पद से त्यागपत्र दे दिया था। उन्होंने अपने मुख्य सचिव को बुलाकर इस्तीफा देने से पहले कहा था कि सारी जिम्मेदारी मेरी है, जहां चाहो हस्ताक्षर करा लो ताकि बाद में किसी अधिकारी पर कोई आंच न आये। विवादित ढांचा ढहाये जाने के मुकदमे में कल्याण सिंह अकेले ऐसे नेता हैं जिन्हें एक दिन की सजा हुई थी।
भारतीय जनता पार्टी और उसकी पूर्ववर्ती पार्टी जनसंघ को सवर्णों की पार्टी माना जाता था। लेकिन, 1980 के दशक के बाद कल्याण सिंह के नेतृत्व में उत्तर प्रदेश में भाजपा से यह पचहान हटी। भाजपा में पिछड़ों का प्रतिनिधित्व बढा और कल्याण सिंह स्वयं पिछड़े वर्ग के सशक्त नेता के रूप में उभरे। मण्डल आयोग की सिफारिशें लागू होने के बाद जब पिछड़ों की राजनीति का उभार हो रहा था। उस समय देश के प्रमुख पिछड़े नेताओं के मुकाबले कल्याण सिंह का कद हमेशा ऊंचा रहा । उन्होंने भाजपा में पिछड़ों को उनका अधिकार दिलाने के लिए भी नेतृत्व के सामने स्पष्ट रूप से मांगें रखीं और उन्हें पूरा कराया। वे जिस जाति लोध राजपूत से आते थे, उसका मध्य उत्तर प्रदेश और पश्चिम में प्रभाव है। तीन दर्जन से अधिक सीटों पर यह जाति निर्णायक मानी जाती है। कल्याण सिंह के नेतृत्व के कारण ही यह जाति भाजपा से जुड़ी हुई है। पिछड़ों के मुद्दे उठाने में भी वे कभी पीछे नहीं रहे। जहां अन्य पिछडे नेताओं की पहचान मात्र उनकी अपनी जाति तक सीमित रही, वहीं कल्याण सिंह ने सभी पिछड़ों का दिल जीता था।
कल्याण सिंह कठोर प्रशासक साबित हुए। पहली बार उन्हें जनता पार्टी के समय रामनरेश यादव की सरकार में स्वास्थ्य मंत्री रहने का अवसर मिला था। स्वास्थ्य मंत्री के रूप में ही उन्होंने कठोर प्रशासक की पहचान बना ली थी। चिकित्सकों के तबादलों में उन्होंने कोई सिफारिश नहीं मानी थी। दशकों से एक ही जगह जमें अनेक चिकित्सकों के तबादले करके उन्होंने कठोर प्रशासन और सुशासन का संदेश दिया। मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने प्रदेश में अपराधियों के खिलाफ अभियान चलाया था। अनेक नामी अपराधी उत्तर प्रदेश छोड़कर चले गए थे। कानून व्यवस्था में सुधार हुआ था। परीक्षाओं में नकल रोकने का कानून उनके समय ही बनाया गया था।
नहीं मानी थी नेतृत्व की सलाह
कल्याण सिंह ने अपने जीवन में कभी झुककर समझौता नहीं किया। यही कारण था कि जब 1999 में वह निर्णायक मोड़ आया कि उन्हें मुख्यमंत्री पद छोड़ने को कहा गया था। उसी समय भारतीय जनता पार्टी के केन्द्रीय नेतृत्व ने उन्हें दिल्ली आने को कहा था। उन्हें केन्द्र सरकार में जगह देने का प्रस्ताव किया गया था। माना जाता है कि उन्हें सीधे केन्द्रीय गृहमंत्री बनाने का प्रस्ताव था। लेकिन, उन्होंने यह प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया और पार्टी छोड़ दी। यदि कल्याण सिंह ने यह प्रस्ताव स्वीकार किया होता तो वे देश में भाजपा चेहरे के रूप में उभरते और केन्द्रीय नेतृत्व करते। लेकिन, उन्होंने मुख्यमंत्री पद से हटाये जाने को अपना अपमान माना था और कोई भी पद लेने से इनकार कर दिया था। हालांकि भाजपा ने सभी कटुताओं को भुलाकर कल्याण सिंह को अंतिम वर्षों में यथोचित सम्मान दिया और उनके परिवार के सदस्यों को राजनीतिक रूप से सशक्त बनाने का काम किया है। उनके बेटे को लोकसभा का प्रत्याशी बनाया गया जबकि उनके पोते को विधायक बनाया और योगी आदित्यनाथ के मंत्रिमण्डल में सबसे कम उम्र के मंत्री के रूप में जगह प्रदान करके परिवार का सम्मान बरकरार रखा है। सम्पूर्ण जीवन राजनीति और सिद्धान्तों को समर्पित करने वाले कल्याण सिंह को शत्-शत् नमन।
( उप्रससे )