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बलिया का कस्बा जहां मुसलमान भी हैं सनातनी

January 15, 2026

बलिया का कस्बा जहां मुसलमान भी हैं सनातनी

स्नगरपंचायत जहां हिन्दू तो हिन्दू सात पीढियो से हजारो मुसलमान भी है सनातनी। सनातन धर्म और भगवान राम के सम्मान में नही बाजारों में बिकता है मांस, मछली, और नही कोई खाता है मांस मछली और अंडा।

संजय कुमार तिवारी

देश और दुनिया में सनातन धर्म की बढ़ती लोकप्रियता के बीच बलिया का अनोखा सनातन नगरी चितबड़ागांव नगर पंचायत जहां हिन्दू तो हिंदू मुसलमान भी सात पीढियो से सनातनी है । हिन्दू और मुसलमान भगवान राम और सनातन धर्म की आस्था में यहां मांस,मछली,और अंडा तक नही बिकता और नही यहां कोई इसका सेवन करता है यहां तक कि किसी कसाई को जमीन तक नही बेचता। नगर पंचायत के चेयरमैन ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मिलकर इस अनोखी सनातन नगरी को देश और दुनिया के पटल पर अयोध्या जैसे धार्मिक नगरी के रूप में विकसित करने का मांग किया है। तो वही मुसलमानो ने कहा वह भी सनातनी है और सनातन धर्म और भगवान की आस्था में यहां मांस, मछली, अंडा बेचना तो दूर इसका खुले तौर पर सात पीढियो से सेवन तक नही करते

बलिया मुख्यालय से लगभग 20 किलोमीटर दूर चितबड़ागांव आदर्श नगर पंचायत है जो देश और दुनिया का एक अनोखा नगर पंचायत है जो सनातन नगरी के रूप में मशहूर है। इस नगर पंचायत में यह समझना मुश्किल है कि कौन हिन्दू है और कौन मुसलमान है।जिनकी जाती भले ही अलग है मगर धर्म सिर्फ सनातन है। इस अनोखी सनातन नगरी में भगवान राम और सनातन की आस्था में डूबे लोग आज तक मांस,मछली,और अंडा तक नही खाते है इतना ही नही बल्कि यहां के बाजारों में भी नही बिकता है। नगर पंचायत के चेयरमैन अमरजीत सिंह ने कहा 52 गांव का यह नगर पंचायत पूरे देश और दुनिया का एक अनोखा नगर पंचायत है जो सनातन नगरी के रूप में मशहूर है। देश के धार्मिक स्थलों पर मांस, मछली बिकने की रोक की भी मांग उठ रही है मगर इस सनातन नगरी में हिन्दू और मुसलमान सनातन और भगवान के सम्मान में स्वेच्छा से इनकी पीढियां दर पीढ़िया इसका सेवन खुले तौर पर नही करते न ही बाजारों में बिकता है।धार्मिक नगरी अयोध्या के तर्ज पर वह खुद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी से मिलकर इस सनातन नगरी के विकास के लिए मांग किया है वही आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इस नगरी में आने का न्योता दिया है। 50 हजार आबादी वाले इस नगर पंचायत में लगभग 6 हजार मुसलमान है जो सनातनी है।

सिर पर भले ही गोल टोपी हो मगर दिल सनातनी है यह हम नही सनातन नगरी चितबड़ागांव के मुसलमानों की माने तो यह धार्मिक और सूफी संतों की नगरी है जहाँ हिन्दू तो हिन्दू मुसलमान भी सनातन धर्म के सम्मान में मांस मछली का सेवन खुले तौर पर कभी नही करते यह परंपरा उनके पूर्वजो के समय से ही चली आ रही है जहा मुसलमानो की सात पीढ़िया सनातनी है।वह सनातन धर्म के सम्मान में किसी हिन्दू भाई को ठेस न पहुंचे इसलिए वह कभी मांस, मछली नही खाते और न ही आज़ाद भारत मे यहां के बाजारों में कभी बिका है यह तक कि किसी कसाई को यहां बसने के जमीन तक नही दी जाती है।

साम्राज्यवाद के विरुद्ध खड़ा होता ईरान

ईरान, ट्रंप और प्रतिरोध की राजनीति

सत्यवान सौरभ, लेखक, स्वतंत्र पत्रकार

डॉ. सत्यवान सौरभ
अंतरराष्ट्रीय राजनीति में कुछ संघर्ष केवल सीमाओं या संसाधनों तक सीमित नहीं होते, वे विचारधाराओं, सत्ता-संतुलन और नैतिकता की भी परीक्षा लेते हैं। ईरान और अमेरिका के बीच दशकों से चला आ रहा टकराव ऐसा ही एक संघर्ष है, जो समय-समय पर नए रूपों में सामने आता रहा है। डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति कार्यकाल के दौरान यह टकराव जिस तीव्रता और आक्रामकता के साथ उभरा, उसने वैश्विक राजनीति को एक बार फिर शीतयुद्धोत्तर दौर की अस्थिरता की याद दिला दी।
1979 की इस्लामी क्रांति के बाद से ही ईरान अमेरिका की रणनीतिक और वैचारिक राजनीति का लक्ष्य रहा है। अमेरिका ने ईरान को केवल एक राष्ट्र-राज्य के रूप में नहीं, बल्कि एक वैकल्पिक राजनीतिक मॉडल के रूप में देखा—ऐसा मॉडल जो पश्चिमी प्रभुत्व, इज़राइल-केन्द्रित पश्चिम एशिया नीति और अमेरिकी साम्राज्यवादी सोच को चुनौती देता है। यही कारण है कि ईरान पर आर्थिक प्रतिबंध, कूटनीतिक अलगाव और सैन्य दबाव लंबे समय से अमेरिकी विदेश नीति का हिस्सा रहे हैं।
डोनाल्ड ट्रंप के शासनकाल में यह नीति और अधिक कठोर, असंवेदनशील और टकरावपूर्ण हो गई। 2015 में ईरान और विश्व शक्तियों के बीच हुए परमाणु समझौते (JCPOA) से अमेरिका का एकतरफा हटना न केवल कूटनीतिक असंतुलन का उदाहरण था, बल्कि यह भी दर्शाता था कि ट्रंप प्रशासन अंतरराष्ट्रीय सहमति और बहुपक्षीयता को किस हद तक नज़रअंदाज़ करने को तैयार था। इसके बाद ईरान पर “अधिकतम दबाव नीति” लागू की गई, जिसका उद्देश्य ईरानी अर्थव्यवस्था को घुटनों पर लाना और शासन को आंतरिक विद्रोह की ओर धकेलना था।
लेकिन इतिहास साक्षी है कि दबाव हमेशा झुकाव पैदा नहीं करता। कई बार वह प्रतिरोध को जन्म देता है। ईरान के मामले में भी यही हुआ। आर्थिक कठिनाइयों, प्रतिबंधों और अंतरराष्ट्रीय अलगाव के बावजूद ईरान ने अपने राजनीतिक अस्तित्व, संप्रभुता और वैचारिक पहचान को बनाए रखा। यहाँ यह समझना ज़रूरी है कि ईरान का विरोध केवल अमेरिका की नीतियों से नहीं है, बल्कि उस वैश्विक व्यवस्था से है जिसमें कुछ गिने-चुने देश स्वयं को न्यायाधीश और शेष दुनिया को अभियुक्त मान लेते हैं।
“जैसी करनी वैसी भरनी” का सिद्धांत केवल नैतिक कहावत नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में भी गहराई से लागू होता है। पश्चिम एशिया में दशकों तक किए गए अमेरिकी हस्तक्षेप—इराक, अफगानिस्तान, लीबिया और सीरिया—ने क्षेत्र को स्थिरता नहीं, बल्कि अराजकता दी। लोकतंत्र के नाम पर सत्ता परिवर्तन, मानवाधिकारों के नाम पर सैन्य आक्रमण और आतंकवाद के विरुद्ध युद्ध के नाम पर निर्दोष नागरिकों की हत्या—इन सबने अमेरिका की नैतिक साख को गहरा नुकसान पहुँचाया। ऐसे में जब ईरान अमेरिकी प्रभुत्व को चुनौती देता है, तो वह केवल अपनी रक्षा नहीं कर रहा, बल्कि उस व्यवस्था पर प्रश्नचिह्न लगा रहा है, जो ताकत को ही न्याय मानती है।
ट्रंप की विदेश नीति का एक और खतरनाक पहलू उसका व्यक्तिवादी और आवेगपूर्ण स्वभाव था। कूटनीति संवाद और धैर्य से चलती है, जबकि ट्रंप की राजनीति ट्वीट, धमकी और शक्ति-प्रदर्शन पर आधारित थी। ईरानी जनरल क़ासिम सुलेमानी की हत्या इसी मानसिकता का परिणाम थी। यह घटना न केवल अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन थी, बल्कि इसने पूरे पश्चिम एशिया को युद्ध के मुहाने पर खड़ा कर दिया। इसके बाद ईरान की प्रतिक्रिया ने यह स्पष्ट कर दिया कि अब वह केवल सहने की नीति पर नहीं चल रहा।
ईरान की राजनीति को अक्सर पश्चिमी मीडिया में कट्टर, दमनकारी और पिछड़ा बताकर प्रस्तुत किया जाता है। लेकिन यह चित्रण अधूरा और एकांगी है। ईरान की जनता ने बार-बार यह साबित किया है कि वे बाहरी हस्तक्षेप को स्वीकार नहीं करेंगे, चाहे वह कितनी भी आकर्षक शब्दावली में क्यों न लपेटा गया हो। ईरान में सरकार की आलोचना होती है, विरोध होते हैं, लेकिन जब बात राष्ट्रीय संप्रभुता की आती है, तो जनता और सत्ता एकजुट दिखाई देते हैं। यही वह तत्व है जिसे पश्चिमी रणनीतिकार अक्सर समझने में चूक जाते हैं।
भारत जैसे देशों के लिए यह पूरा परिदृश्य एक गंभीर चेतावनी भी है और अवसर भी। ईरान भारत का पारंपरिक मित्र रहा है—ऊर्जा सुरक्षा, क्षेत्रीय संपर्क (चाबहार बंदरगाह) और मध्य एशिया तक पहुँच के लिहाज़ से ईरान का महत्व असंदिग्ध है। लेकिन अमेरिका के दबाव में भारत का ईरान से दूरी बनाना उसकी स्वतंत्र विदेश नीति पर प्रश्न खड़े करता है। किसी भी संप्रभु राष्ट्र के लिए यह आवश्यक है कि वह अपने राष्ट्रीय हितों को किसी तीसरे देश की नाराज़गी के डर से गिरवी न रखे।
आज वैश्विक राजनीति एक संक्रमण काल से गुजर रही है। एकध्रुवीय विश्व व्यवस्था की पकड़ ढीली पड़ रही है और बहुध्रुवीयता का उदय हो रहा है। ऐसे में ईरान जैसे देश, जो लंबे समय से दबाव और प्रतिबंधों के बीच खड़े रहे हैं, नए शक्ति-संतुलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। रूस-चीन-ईरान के बढ़ते समीकरण इस बदलाव के संकेत हैं। यह स्पष्ट होता जा रहा है कि अब दुनिया केवल वाशिंगटन के इशारों पर नहीं चलेगी।
अंततः प्रश्न यह नहीं है कि ईरान सही है या अमेरिका गलत। वास्तविक प्रश्न यह है कि क्या वैश्विक राजनीति में शक्ति ही न्याय का एकमात्र पैमाना होगी, या फिर अंतरराष्ट्रीय कानून, संप्रभुता और समानता के सिद्धांतों को वास्तविक सम्मान मिलेगा। यदि बड़े राष्ट्र अपनी करनी से दुनिया को डराते रहेंगे, तो भरनी के रूप में उन्हें अस्थिरता, अविश्वास और प्रतिरोध ही मिलेगा।
ईरान और ट्रंप के दौर की अमेरिकी राजनीति हमें यही सिखाती है कि दमन से स्थायित्व नहीं आता, और धमकी से सम्मान नहीं मिलता। इतिहास अंततः उसी का पक्ष लेता है जो अपनी संप्रभुता, आत्मसम्मान और जनता की चेतना के साथ खड़ा रहता है। और शायद यही “जैसी करनी वैसी भरनी” का सबसे बड़ा राजनीतिक अर्थ है।

January 13, 2026

मकर संक्रांति: पतंगबाज़ी, आनंद, संस्कृति और चेतना

लेखक, स्वतंत्र पत्रकार

— डॉ. सत्यवान सौरभ
मकर संक्रांति का पर्व भारतीय संस्कृति में केवल एक तिथि नहीं, बल्कि ऋतु परिवर्तन, सामाजिक सहभागिता और लोकजीवन की जीवंत अभिव्यक्ति है। यह वह समय है जब सूर्य दक्षिणायन से उत्तरायण की ओर अग्रसर होता है और प्रकृति के साथ-साथ मानव जीवन में भी नई ऊर्जा का संचार होता है। इस पर्व से जुड़ी पतंगबाज़ी की परंपरा सदियों से चली आ रही है, जिसने समय के साथ स्वयं को केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं रखा, बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक और स्वास्थ्य संबंधी आयामों को भी अपने भीतर समाहित किया है। आज पतंग उड़ाना सिर्फ़ छतों पर खड़े होकर डोर खींचने का खेल नहीं, बल्कि सामूहिक उत्सव, मानसिक प्रसन्नता और शारीरिक सक्रियता का प्रतीक बन चुका है।
पतंग उड़ाने की परंपरा भारत में अत्यंत प्राचीन मानी जाती है। ऐतिहासिक संदर्भों और लोककथाओं में इसके उल्लेख मिलते हैं। कभी यह राजदरबारों में कौशल और रणनीति का प्रतीक रही, तो समय के साथ आम जनजीवन में रच-बस गई। मकर संक्रांति, बसंत पंचमी और अन्य पर्वों पर आसमान का रंग-बिरंगी पतंगों से भर जाना, भारतीय समाज की सामूहिक चेतना और उत्सवधर्मिता को दर्शाता है। हरियाणा, राजस्थान, गुजरात, उत्तर प्रदेश और दिल्ली जैसे राज्यों में यह पर्व केवल परंपरा नहीं, बल्कि एक बड़े सामाजिक आयोजन का रूप ले लेता है।
पतंगबाज़ी का सबसे सुंदर पक्ष उसका सामाजिक स्वरूप है। यह लोगों को घरों से बाहर निकालकर एक-दूसरे से जोड़ती है। छतों के बीच संवाद, बच्चों की खिलखिलाहट, युवाओं की प्रतिस्पर्धा और बुज़ुर्गों की स्मृतियों से उपजी मुस्कान—ये सभी दृश्य इस पर्व को जीवंत बनाते हैं। “वो काटा… वो मारा” की गूंज केवल खेल का उत्साह नहीं, बल्कि सामूहिक सहभागिता की आवाज़ होती है। आज के समय में, जब सामाजिक संवाद सिमटता जा रहा है, ऐसे पर्व मानवीय रिश्तों को सहेजने का अवसर प्रदान करते हैं।
मकर संक्रांति के अवसर पर आयोजित पतंग महोत्सवों और सामूहिक आयोजनों ने इस परंपरा को नए आयाम दिए हैं। कई स्थानों पर स्थानीय प्रशासन, सामाजिक संगठन और स्वयंसेवी संस्थाएँ मिलकर ऐसे कार्यक्रम आयोजित करती हैं, जिनका उद्देश्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि सांस्कृतिक संरक्षण और सामाजिक समरसता को बढ़ावा देना भी होता है। इन आयोजनों में महिलाएँ, बच्चे और बुज़ुर्ग समान रूप से भाग लेते हैं, जिससे यह पर्व किसी एक वर्ग तक सीमित न रहकर समाज के हर हिस्से का उत्सव बन जाता है।
अक्सर पतंगबाज़ी को केवल मौसमी खेल समझ लिया जाता है, लेकिन इसके स्वास्थ्य संबंधी लाभ भी कम नहीं हैं। पतंग उड़ाते समय शरीर के कई अंग सक्रिय रहते हैं। हाथों, कंधों और आँखों का समन्वय होता है, जिससे शारीरिक सक्रियता बनी रहती है। खुले वातावरण में समय बिताने से शरीर को सूर्य की ऊर्जा मिलती है और मानसिक थकान कम होती है। चिकित्सकों और मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि ऐसे सामूहिक और आनंददायक आयोजन तनाव को कम करने में सहायक होते हैं।
मानसिक स्वास्थ्य की दृष्टि से भी पतंग उड़ाना अत्यंत उपयोगी है। खुले आसमान में रंग-बिरंगी पतंगों को उड़ते देखना मन को प्रसन्नता और शांति देता है। यह व्यक्ति को वर्तमान क्षण से जोड़ता है और एक प्रकार के सहज ध्यान का अनुभव कराता है। आज के तेज़ रफ्तार और तनावपूर्ण जीवन में ऐसे अनुभव मानसिक संतुलन बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
बच्चों के लिए पतंगबाज़ी केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि सीखने की प्रक्रिया भी है। इससे उनमें धैर्य, संतुलन, समन्वय और प्रतिस्पर्धा की भावना विकसित होती है। हवा की दिशा को समझना, डोर का सही तनाव बनाए रखना और सही समय पर निर्णय लेना—ये सभी कौशल बच्चों की निर्णय क्षमता को मजबूत करते हैं। साथ ही, जब यह गतिविधि परिवार के साथ मिलकर की जाती है, तो बच्चों में सामाजिक मूल्य और सांस्कृतिक जुड़ाव भी गहराता है।
हालाँकि, जहाँ पतंगबाज़ी आनंद और उत्साह का पर्व है, वहीं इससे जुड़ी सुरक्षा चुनौतियाँ भी सामने आती हैं। बीते वर्षों में चाइनीज़ मांझा और नायलॉन डोर के प्रयोग से कई गंभीर दुर्घटनाएँ हुई हैं। यह न केवल मनुष्यों के लिए, बल्कि पक्षियों और अन्य जीव-जंतुओं के लिए भी घातक सिद्ध हुआ है। सड़क दुर्घटनाएँ, गले में कट लगने की घटनाएँ और पक्षियों की मौत—ये सभी इस परंपरा के विकृत स्वरूप की ओर संकेत करते हैं।
सरकार और प्रशासन द्वारा इस दिशा में नियम बनाए गए हैं, लेकिन केवल नियम पर्याप्त नहीं हैं। समाज में जागरूकता फैलाना और जिम्मेदारी का भाव विकसित करना अत्यंत आवश्यक है। सूती डोर का उपयोग, खुले और सुरक्षित स्थानों का चयन, बच्चों की निगरानी और समय-सीमा का ध्यान—ये सभी कदम पतंगबाज़ी को सुरक्षित बना सकते हैं। यह ज़रूरी है कि उत्सव की खुशी किसी के लिए दुख का कारण न बने।
पर्यावरणीय दृष्टि से भी पतंगबाज़ी पर पुनर्विचार की आवश्यकता है। पतंगों के अवशेष पेड़ों, बिजली के तारों और सड़कों पर फँसकर पर्यावरण के लिए समस्या बन जाते हैं। प्लास्टिक और नायलॉन से बनी पतंगें लंबे समय तक नष्ट नहीं होतीं और जीव-जंतुओं के लिए खतरा पैदा करती हैं। ऐसे में पर्यावरण-अनुकूल पतंगों और प्राकृतिक रंगों के उपयोग को बढ़ावा देना समय की माँग है।
कई सामाजिक संगठन और स्वयंसेवी समूह इस दिशा में सकारात्मक प्रयास कर रहे हैं। वे बच्चों और युवाओं को सुरक्षित और पर्यावरण-संवेदनशील पतंगबाज़ी के लिए प्रेरित कर रहे हैं। स्कूलों और सामाजिक मंचों पर जागरूकता अभियान चलाए जा रहे हैं, ताकि परंपरा और प्रकृति के बीच संतुलन बना रहे।
बदलते समय के साथ पतंगबाज़ी का स्वरूप भी बदल रहा है। अब यह केवल छतों तक सीमित नहीं रही। सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म ने इसे एक वैश्विक पहचान दी है। पतंग महोत्सवों की तस्वीरें और वीडियो दुनिया भर में साझा किए जा रहे हैं। विदेशों में बसे भारतीय समुदाय भी मकर संक्रांति के अवसर पर पतंग उत्सव आयोजित कर अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़े रहते हैं।
यह परिवर्तन दर्शाता है कि परंपराएँ स्थिर नहीं होतीं, वे समय के साथ स्वयं को ढालती हैं। पतंगबाज़ी भी इसी परिवर्तन का उदाहरण है, जहाँ परंपरा, मनोरंजन, स्वास्थ्य और आधुनिकता एक साथ उड़ान भरते हैं। यह पर्व हमें सिखाता है कि आनंद और जिम्मेदारी एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं।
अंततः, मकर संक्रांति और उससे जुड़ी पतंगबाज़ी केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि जीवन को उत्सव की तरह देखने का दृष्टिकोण है। यह हमें सामूहिकता, संतुलन और आनंद का महत्व समझाती है। जब हम परंपरा को समझदारी और जिम्मेदारी के साथ अपनाते हैं, तो वह अतीत की स्मृति भर नहीं रहती, बल्कि वर्तमान और भविष्य की प्रेरणा बन जाती है। आसमान में उड़ती पतंगें हमें यही संदेश देती हैं कि सीमाएँ केवल ज़मीन पर होती हैं, सपनों के लिए आकाश हमेशा खुला रहता है—बस डोर थामने का हुनर और संतुलन बनाए रखने की समझ होनी चाहिए।
  (डॉ. सत्यवान सौरभ, पीएचडी (राजनीति विज्ञान), कवि एवं सामाजिक चिंतक हैं।)
— डॉ. सत्यवान सौरभ
(पी-एच.डी., राजनीति विज्ञान | कवि, लेखक एवं सामाजिक चिंतक)
पत्राचार पता:
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बरवा, हिसार–भिवानी (हरियाणा) – 127045
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Dr. Satywan Saurabh
Research Scholar in Political Science, Delhi University
333,Pari Vatika, Kaushalya Bhawan,
Barwa, Hisar-Bhiwani (Haryana)-127045
Contact- 94665-26148, 01255281381

January 11, 2026

युवा आदर्श : स्वामी विवेकानंद

12 जनवरी विशेष:
मृत्युंजय दीक्षित
अध्यात्मिक शक्तिपुंज, युवा आदर्श तथा प्रेरक स्वामी विवेकानंद का जन्म कलकत्ता के दत्त परिवार में 12 जनवरी 1863 ईसवी को हुआ था। स्वामी विवेकानंद के बचपन का नाम नरेंद्र नाथ था। स्वामी विवेकानंद के पिता विश्वनाथ दत्त कई गुणों से विभूषित थे। वे अंग्रेजी एवं फारसी भाषाओं में दक्ष थे। स्वामी जी के पिता संगीतप्रेमी भी थे अतः उनकी इच्छा थी कि उनका पुत्र नरेंद्रनाथ भी संगीत की शिक्षा ग्रहण करे। स्वामी विवेकानंद की माता बहुत ही गरिमायी व धार्मिक परंपरा का पालन करने वाली महिला थीं। उन्हें देखकर लगता था कि मानों किसी राजवंश की हों।
बालक नरेंद्र नाथ बचपन में बहुत शरारती थे किन्तु उनमें कोई अशुभ लक्षण नहीं थे। सत्यवादिता उनके जीवन का मेरुदण्ड थी। वे दिन में खेलों में मगन रहते थे और रात्रि में ध्यान लगाने लगे थे। ध्यान के दौरान उन्हें अद्भुत दर्शन प्राप्त होने लगे थे। समय के साथ उनके व्यवहार में परिवर्तन आया और वे बौद्धिक कार्यो को प्राथमिकता देने लगे। पुस्तकों का अध्ययन आरम्भ किया और नियमित रूप से समाचार पत्र और पत्रिकाओं का अध्ययन करने लगे। सार्वजनिक भाषणों में उपस्थित रहने लगे तथा उन भाषणों की समीक्षा करने लगे। वे जो भी सुनते थे उसे अपने मित्रों के बीच वैसा ही सुनाकर सबको आश्चर्यचकित कर देते थे। उनकी पढ़ने की गति भी बहुत तीव्र थी, वे जो भी पढ़ाई करते उन्हें अक्षरशः याद हो जाया करता था। पिता विश्वनाथ ने अपने पुत्र की विद्वता को अपनी ओर खींचने का प्रयास प्रारम्भ किया। वे उसके साथ घंटों ऐसे विषयों पर चर्चा करते जिनमें विचारों की गहराई, सूक्ष्मता और स्वस्थता होती।
बालक नरेंद्र ने ज्ञान के क्षेत्र में बहुत अधिक उन्नति कर ली थी। उन्होने तत्कालीन एंट्रेस की कक्षा तक पढ़ाई के दौरान ही अंग्रेजी और बांग्ला साहित्य के सभी ग्रंथों का अध्ययन कर लिया था। उन्होनें सम्पूर्ण भारतीय इतिहास व हिंदू धर्म का भी गहन अध्ययन कर लिया था। कालेज की पढ़ाई के दौरान सभी शिक्षक उनकी विद्वता को देखकर आश्चर्यचकित हो गये थे। उन्होंने अपने कालेज जीवन के प्रथम दो वर्षों में ही पाश्चात्य तर्कशास्त्र के सभी ग्रंथों का गहन अध्ययन कर लिया था। इन सबके बीच नरेंद्र का दूसरा पक्ष भी था। उनमें आमोद- प्रमोद करने की कला थी ,वे समाजिक वर्गो के प्राण थे। वे मधुर संगीतकार भी थे। सभी के साथ मधुर व्यवहार करते थे। उनके बिना कोई भी आयोजन पूरा नहीं होता था। उनके मन में सत्य को जानने की तीव्र आकांक्षा पनप रही थी।
वर्ष 1881 में नरेंद्र नाथ पहली बार रामकृष्ण परमहंस के सम्पर्क में आये। रामकृष्ण परमहंस पहले ही नरेंद्र को अपना मनोवांछित शिष्य मान चुके थे। प्रारम्भ में नरेन्द्र परमहंस को ईश्वरवादी पुरुष के रूप में मानने को तैयार न थे पर धीरे- धीरे विश्वास जमता गया। रामकृष्ण जी समझ गये थे कि नरेंद्र में एक विशुद्ध चित्त साधक की आत्मा निवास कर रही है अतः उन्होंने नरेन्द्र पर अपने प्रेम की वर्षा करके उन्हें उच्चतम आध्यात्मिक अनुभूति के पथ में परिचालित कर दिया। 1884 में बी. ए. की परीक्षा के दौरान नरेन्द्र के परिवार पर संकट आया, उनके पिता का देहावसान हो गया ।1885 में ही रामकृष्ण को गले का कैंसर हुआ जिसके बाद रामकृष्ण ने उन्हें संयास की दीक्षा दी और उनका नाम स्वामी विवेकानंद हो गया।1886 में स्वामी रामकृष्ण ने महासमाधि ली । वे स्वामी विवेकांनद को ही अपना उत्तराधिकारी घोषित कर गये। 1888 के पहले भाग में स्वामी विवेकानंद मठ से बाहर निकले और तीर्थाटन के लिये निकल पड़े। काशी में उन्होने तैलंगस्वामी तथा भास्करानंद जी के दर्शन किये। वे सभी तीर्थों का भ्रमण करते हुए गोरखपुर पहुंचे। यात्रा में उन्होंने अनुभव किया आम जनता में धर्म के प्रति अनुराग की कमी नहीं है। गोरखपुर में स्वामी जी को पवहारी बाबा का सानिध्य प्राप्त हुआ। फिर वे सभी तीर्थो, नगरों आदि का भ्रमण करते हुए कन्याकुमारी पहुंचे। यहां श्री मंदिर के पास ध्यान लगाने के बाद उन्हें भारतमाता के भावरूप में दर्शन हुए और उसी दिन से उन्होंने भारतमाता के गौरव को स्थापित करने का निर्णय लिया।
स्वामी जी ने 11 सितम्बर 1863 को अमेरिका के शिकागो में आयोजित धर्मसभा में हिंदुत्व की महानता को प्रतिस्थापित करके पूरे विश्व को चौंका दिया। उनके व्याख्यानों को सुनकर पूरा अमेरिका ही उनकी प्रशंसा से मुखरित हो उठा। न्यूयार्क में उन्होंने ज्ञानयोग व राजयोग पर कई व्याख्यान दिये। उनसे प्रभावित होकर हजारों अमेरिकी उनके शिष्य बन गये। उनके लोकप्रिय शिष्यों में भगिनी निवेदिता का नाम भी शामिल है। स्वामी जी ने विदेशों में हिंदू धर्म की पताका फहराने के बाद भारत वापस लौटे।
स्वामी विवेकानंद हमें अपनी आध्यात्मिक शक्ति में विश्वास रखने के लिए प्रेरित करते हैं।वे राष्ट्र निर्माण से पहले मनुष्य निर्माण पर बल देते हैं अतः देश की वर्तमान राजनैतिक एवं सामाजिक समस्याओं के समाधान के लिए देश के युवा वर्ग को स्वामी विवेकानंद के जीवन एवं साहित्य का गहन अध्ययन करना चाहिये। युवा पीढ़ी स्वामी विवेकानंद के विचारों से अवश्य ही लाभान्वित होगी। स्वामी विवेकानंद युवाओं से कहते थे कि बल ही जीवन है और दुर्बलता मृत्यु। युवा वर्ग स्वामी जी के वचनों का अध्ययन कर उनकी उद्देष्य के प्रति निष्ठा, निर्भीकता एवं दीन दुखियों के प्रति गहन प्रेम और चिंता से अत्यंत प्रभावित हुआ है। युवाओं के लिए स्वामी विवेकानंद के अतिरिक्त अन्य कोई अच्छ मित्र, दार्शनिक एवं मार्गदर्शक नहीं हो सकता।
प्रेषकः- मृत्युंजय दीक्षित
फोन नं. -09198571540

January 9, 2026

यज्ञ आवश्यक है

यज्ञ भारतीय संस्कृति का आदि प्रतीक है हमारे धर्म में जितनी महानता यज्ञ को दी गई हैं उतनी और किसी को नहीं दी गई। हमारा कोई भी शुभ-अशुभ धर्म कृत्य यज्ञ के बिना पूर्ण नहीं होता। जन्म से लेकर अन्त्येष्टि तक 16 संस्कार होते हैं इनमें अग्निहोत्र आवश्यक है। जब बालक का जन्म होता है तो उसकी रक्षार्थ सूतक निवृत्ति तक घरों में अखण्ड अग्नि स्थापित रखी जाती है। नामकरण, यज्ञोपवीत, विवाह आदि संस्कारों में भी हवन अवश्य होता है। अन्त में जब शरीर छूटता है तो उसे अग्नि को ही सौंपते हैं। अब लोग मृत्यु के समय चिता जलाकर यों ही शव को भस्म कर देते हैं शास्त्रों में देखा जाय, तो वह भी एक यज्ञ हैं। इसमें वेद मन्त्रों से विधिपूर्वक आहुतियाँ चढ़ाई जाती हैं और शरीर को यज्ञ Yajya भगवान को अर्पण किया जाता है।

सभी साधनाओं में हवन Havan अनिवार्य है। जितने भी पाठ, पुरश्चरण, जप, साधन किये जाते हैं, वे चाहें वेदोक्त हों चाहे तान्त्रिक, हवन उनमें किसी न किसी रूप में अवश्य करना पड़ेगा। गायत्री उपासना में भी हवन आवश्यक है। अनुष्ठान या पुरश्चरण Purascharan में जप से दसवाँ भाग हवन करने का विधान है। परिस्थितिवश दसवाँ भाग आहुतियाँ न दी जा सके तो शताँश (सौ वाँ भाग) आवश्यक है। गायत्री को माता और यज्ञ को पिता माना गया है। इन्हीं दोनों के संयोग से मनुष्य का आध्यात्मिक जन्म होता हैं जिसे ‘द्विजत्व’ कहते हैं। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य को द्विज कहते हैं। द्विज का अर्थ है दूसरा जन्म। जैसे अपने शरीर को जन्म देने वाले माता-पिता की सेवा-पूजन करना मनुष्य का नित्य कर्त्तव्य है उसी प्रकार गायत्री Gayatri माता और यज्ञ पिता की पूजा भी प्रत्येक द्विज का आवश्यक धर्म कर्त्तव्य है।

यज्ञ किसी भी प्रकार घाटे का सौदा नहीं हैं। साधारण रीति से किये हुए हवन में जो धन व्यय होता है वह एक प्रकार से देवताओं की बैंक में जमा हो जाता है और वह सन्तोषजनक ब्याज समेत लौटकर अपने को बड़ी महत्वपूर्ण आवश्यकता के समय पर वापिस मिलता हैं। विधिपूर्वक, शास्त्रीय पद्धति एवं विशिष्ट उपचारों एवं विधानों के साथ किये हुए हवन तो ओर भी महत्वपूर्ण हैं। ऐसे यज्ञ एक प्रकार के दिव्य अस्त्र हैं। दैवी सहायताएं प्राप्त करने के अचूक उपचार हैं। यज्ञ समस्त ऋद्धि-सिद्धियों का पिता है। यज्ञ को वेदों ने ‘कामधुक्’ कहा है वह मनुष्यों के अभावों का पूरा करने वाला और बाधाओं को दूर करने वाला है।

यज्ञ एक महान विद्या है। पांचों तत्वों का यज्ञ में एक वैज्ञानिक संमिश्रण होता है जिससे एक प्रचण्ड दुर्वर्ष शक्ति का आविर्भाव होता है। यज्ञ की इस प्रचण्ड शक्ति को ‘द्वि नासिक , सप्त जिह्वा, उत्तर मुख, कोटि द्वादश मूर्त्या, द्विपञ्चशत्कला युतम’ आदि विशेषणों युक्त कहा गया है। इस रहस्यपूर्ण संकेतों में यह बताया गया है कि यज्ञाग्नि की मूर्धा भौतिक और आध्यात्मिक दोनों हैं। इससे दोनों क्षेत्र सफल बनाये जा सकते हैं। स्थूल और सूक्ष्म प्रकृति यज्ञ की नासिका है उस पर अधिकार प्राप्त किया जा सकता है, सातों प्रकार की संपदाएं यज्ञाग्नि के हाथ हैं, वाममार्ग और दक्षिण मार्ग ये दो मुख हैं। हवा सातों लोक जिह्वाएँ हैं, इन सब लोकों में जो कुछ भी विशेषताएं हैं वे यज्ञाग्नि के मुख में मौजूद हैं। उत्तर ध्रुव का चुम्बकत्व केन्द्र अग्नि मुख है। यज्ञ की 52 कलाएं ऐसी हैं जिनमें से कुछ को प्राप्त करके ही रावण इतना शक्तिशाली हो गया था। यदि यह सभी कलाएं उपलब्ध हो जायें तो मनुष्य साक्षात् अग्नि रूप हो सकता है और विश्व के सभी पदार्थ उसके करतलगत हो सकते हैं। यज्ञ की महिमा अनन्त है। उसका थोड़ा आयोजन भी फलदायक होता है। गायत्री उपासकों के लिए तो यह पिता तुल्य पूजनीय है।

✍️*पं श्रीराम शर्मा आचार्य* ✍️ अखण्ड ज्योति 1954

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