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मर्यादा की पुनर्प्रतिष्ठा की वर्षगांठ

December 31, 2025

मर्यादा की पुनर्प्रतिष्ठा की वर्षगांठ

लेखकः  प्रणय विक्रम सिंह
आज समय अपने सौभाग्य पर आह्लादित है। आज… भारत की चेतना एक शिखर पर ठहरकर अपने इतिहास को, अपनी मर्यादा को नमन कर रही है।
यह वही मर्यादा है जिसे वाल्मीकि ने राजा के नहीं, मनुष्य राम के चरित्र में देखा। और जिसे तुलसी ने भक्ति नहीं, लोक-मंगल का आधार कहा।
आज प्रभु श्री रामलला के नूतन विग्रह की प्राण-प्रतिष्ठा की द्वितीय वर्षगांठ है।
यह केवल एक वर्ष का पूरा होना नहीं, यह उस संघर्ष का विराम है, जिसे तीन पीढ़ियों ने *’रामकथा’* की तरह जिया।
श्री राम जन्मभूमि मंदिर में श्रीरामलला का विराजमान होना किसी विजय का घोष नहीं, यह सभ्यता का संतुलन है।यह शोर नहीं, यह शांति है।
हमारी दर्जनों पीढ़ियां जिन्होंने प्रश्न नहीं छोड़े, श्रद्धा छोड़ी नहीं। पूज्य साधु-संत जिन्होंने समय से तेज़ कुछ नहीं चाहा और 140 करोड़ देशवासी, जिन्होंने विश्वास को कभी थकने नहीं दिया।
आज…उन सबकी साधना साकार खड़ी है। आज हर रामभक्त के मन में न कोई आक्रोश है, न कोई प्रतिशोध। आज वहां केवल संतोष है.. गहरा, शांत और स्थायी।
यह क्षण बताता है कि सभ्यताएं
शोर से नहीं, संयम से टिकती हैं।यह क्षण बताता है कि धैर्य इतिहास का सबसे स्थायी शिल्पकार है।
क्योंकि आज राम लौटे नहीं हैं…
आज राम प्रतिष्ठित हुए हैं
हमारी संस्कृति में,
हमारी चेतना में,
हमारे संविधान में,
और हमारे भविष्य में।
जब राम प्रतिष्ठित होते हैं,
तो राष्ट्र स्थिर होता है।
यह मंदिर अतीत का स्मारक नहीं, यह भविष्य की नैतिक दिशा है। यह याद दिलाता है कि भारत अपनी आस्था को कानून से और अपने कानून को करुणा से जोड़ना जानता है।
यह केवल
एक वर्षगांठ नहीं
यह उस भारत का साक्ष्य है
जो प्रतीक्षा करना जानता है,
सत्य पर स्थिर रहना जानता है,
और सभ्यता को
आक्रोश नहीं,
राम देता है।
*सियावर रामचन्द्र की जय🚩*