मेट्रो शोर ज्यादा करती है.. मेट्रो के टेंडर में अफसरों और ठेकेदारों ने मिलीभगत कर खूब वारे न्यारे किये..
लखनऊ। सीएजी ने अमौसी से मुंशी पुलिया तक बने लखनऊ मेट्रो कॉरिडोर के डीपीआर से लेकर टेंडर प्रक्रिया, निर्माण कार्य, खरीद की प्रक्रिया, सुरक्षा के मानक और संचालन के तरीकों पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं.. सीएजी रिपोर्ट के मुताबिक 6,928 करोड़ रुपए लागत वाले इस प्रोजेक्ट में मेट्रो के अफसरों ने संबंधित विभागों और सक्षम व्यक्तियों की अनुमति नहीं ली.. निर्धारित प्रक्रिया का पालन नहीं किया.. टेंडर ने मनमाने फैसले लिए.. यहां तक की दस्तावेजों की जांच भी नहीं कराई..
मेट्रो के लिए पटरी बिछाने का ठेका मेसर्स कालिंदी रेल निर्माण लिमिटेड को मिला था. आईआईटी कानपुर से पटरियों की जांच कराई गई तो खुलासा हुआ कि पटरियों की कठोरता भारतीय रेलवे के निर्धारित मानकों से कम थी.. इससे न सिर्फ पटरियों बल्कि ट्रेन के पहियों के जल्दी घिसने या टूटने का खतरा बना हुआ है.
सीएजी रिपोर्ट के मुताबिक मेट्रो के लिए 24 फर्मों ने दिलचस्पी दिखाई थी जिसमें से 8 फर्म टेंडर प्रक्रिया में शामिल हुईं.. इसमें से 5 फर्म लार्सन एंड टुब्रो लिमिटेड, एफकांस इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड, गैमन इंडिया लिमिटेड, सिंपलेक्स इंफ्रास्ट्रक्चर लिमिटेड और पीएलएल सीआर 19 बी ने टेक्निकल बिड में क्वालीफाई किया. फाइनेंसियल बिड में मेसर्स गैमन इंडिया लिमिटेड को फाइनेंसियल बिड से बाहर कर दिया गया.. बाकी जो चार फर्म फाइनेंशियल बिड में शामिल हुईं, उसमें मेसर्स लार्सन एंड टुब्रो के साथ एग्रीमेंट कर लिया गया.. ऐसा क्यों किया गया!! इसका जवाब किसी के पास नहीं है..
