Posted on: 03.02.2026 Tuesday, Time : 05.48, by Anuj Mishra, UP Samachar Sewa Correspondent Etah
एटा 03 फरवरी (उप्रससे)। जनपद के वीरांगना अवंतीबाई लोधी स्वशासी राज्य चिकित्सा महाविद्यालय में डाक्टरों को दिखाने के लिए बीमार हजारों लोग रोजाना पर्चा बनवाने की जंग लड़ते हुए दिखाई देते हैं। लेकिन सबकुछ जानते और देखते हुए भी मेडिकल कालेज प्रशासन मूकदर्शक बना हुआ है। क्योंकि मरीजों को पंजीकरण की लाइन में उलझाए रखना मेडिकल कालेज के प्रिंसिपल की सोची समझी नीति है। प्रतिदिन बहुत से मरीज जब तक पर्चा बनवा पाते हैं तब तक एक बज जाता है और वह डाक्टर को दिखा पाते हैं तब तक फार्मासिस्ट दो बजे दवा वितरण बंद कर चला जाता है।
मेडिकल कॉलेज में प्रतिदिन मरीजों को पंजीकरण (पर्चा) की लाइन में इसलिए उलझाकर रखा जाता है ताकि डाक्टरों के सामने मरीजों की भीड़ इकट्ठी न होने पाये, इसलिए सिर्फ एटा मेडिकल कालेज में पर्चा बनवाने के लिए आधार कार्ड और मोबाइल लाना जरूरी कर दिया गया है। पर्चा बनाने वाला पहले आधार कार्ड मांगता है उसके बाद मोबाइल पर ओटीपी भेजता है। ओटीपी भेजने, आने और बताने में दस मिनट एक पर्चा पर लगना साधारण सी बात है। प्रतिदिन हजारों मरीजों की भीड़ के बीच एक पर्चा पर दस मिनट लगेंगे तो दो से तीन हजार मरीजों को समय से आसानी पूर्वक पर्चा कैसे मिल सकेगा? कभी कभी कुछ लोग दूसरे लोगों का पर्चा बनवाने पहुंच जाते हैं। मरीज घर (गांव) से चला भी नहीं है और परिचित पर्चा बनवा रहे होते हैं। पर्चा पर मरीज का मोबाइल नंबर डलवाते हैं, गांव में किसी कारणवश ओटीपी नंबर नहीं पहुंचता है अथवा नेटवर्क की कमी के कारण मोबाइल से बात नहीं होती है तब तक पर्चा (पंजीकरण) की लाइन रूकी रहती है। ऐसे एक व्यक्ति के कारण सैकड़ों व्यक्ति बेबस होकर लाइन में खड़े रहते हैं। क्या कसूर है इन बेबस मरीजों का जिन्हें आधार कार्ड और ओटीपी नंबर के नाम पर उलझाकर उनकी गरीबी का फायदा मेडिकल कालेज का प्रशासन उठा रहा है?
जवाहरलाल मेडिकल कालेज अलीगढ़, एस एन मेडिकल कालेज आगरा, गुरु तेग बहादुर हास्पीटल (जीटीबी) दिल्ली आदि में कहीं भी पर्चा बनवाने के लिए आधार कार्ड और ओटीपी की जरूरत नहीं होती है तो एटा मेडिकल कालेज के प्रिंसिपल ही क्यों “तीन लोक से मथुरा न्यारी” वाली कहावत चरितार्थ कर रहे हैं। कहीं उनका मकसद इलाज के लिए प्रतिदिन आने वाले हजारों मरीजों को परेशान कर मेडिकल कालेज आने से रोकना तो नहीं है?
इतना ही नहीं, एटा मेडिकल कालेज में तीन दिन की दवा का नियम भी सभी मेडिकल कालेजों से अलग है। एस एन मेडिकल कालेज सहित आस पास के जनपदों में मरीज को 7 दिन की दवा डाक्टर द्वारा लिखी जाती है, कभी कभी ज्यादा चलने वाली दवा को 15 दिन तक के लिए भी लिखते हैं, लेकिन एटा मेडिकल कालेज में डाक्टरों को 3 दिन की ही दवा लिखने का निर्देश दिया गया है जिससे मेडिकल कालेज में मरीजों की संख्या कम नहीं हो पा रही है। कोई भी डाक्टर चाहकर भी 3 दिन से अधिक की दवा नहीं लिख रहे हैं।
आखिर मेडिकल कालेज के प्रिंसिपल की इस मनमानी के पीछे मंशा क्या है? सरकार जब मरीजों को सहज उपचार सुलभ कराना चाहती है तो फिर मेडिकल कालेज प्रशासन सरकार की सुविधा को असुविधा बनाने में क्यों लगा हुआ है। पर्चा बनाना अति सरल किया जाना चाहिए ताकि वरिष्ठ महिला और पुरुष को लाइन में घंटों खड़े नहीं रहना पड़े।

