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कस्तूरबा गांधी बालिक विद्यालयों की छात्राओं को ताजमहल एवं फतेहपुर सीकरी विजिट को रवाना

February 24, 2026

कस्तूरबा गांधी बालिक विद्यालयों की छात्राओं को ताजमहल एवं फतेहपुर सीकरी विजिट को रवाना

जिलाधिकारी चंद्र प्रकाश सिंह ने बस को हरी झंडी दिखाकर आगरा किया रवाना
मथुरा । महानिदेशक, स्कूल शिक्षा एवं राज्य परियोजना निदेशक (स०शि०), उ०प्र०. लखनऊ के निर्देशों के क्रम में कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालयों में अध्ययनरत् बालिकाओं का पाठ्यपुस्तकों में पढ़ाये गये इतिहास और विज्ञान के सिद्धांतों आदि के प्रति जिज्ञासा के उद्देश्य से सोमवार को जिलाधिकारी चंद्र प्रकाश सिंह  के नेतृत्व में कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालयों/ के०जी०बी०वी० के 400 बालिकाओं और स्टॉफ (नौहझील, मांट, राया तथा बल्देव) का एक्सपोजर विजिट ताजमहल एवं फतेहपुर सीकरी, आगरा हेतु भेजा गया। जिलाधिकारी चंद्र प्रकाश सिंह ने बस को हरी झंडी दिखाकर आगरा को रवाना किया।

मुरादाबाद में प्लाँट की महिला चौकीदार की गोली मारकर हत्या

Moradabad Samachar

मुरादाबाद समाचार

मुरादाबाद में मझोला क्षेत्र में देर शाम की घटना, प्लाँट पर कब्जे का विवाद बना हत्या की वजह

Post on 24.2.26
Tuesday, Time 7.00 AM
Moradabad, Rajesh Bhatia
मुरादाबाद, 24 फरवरी(उप्र समाचार सेवा)।
शहरी क्षेत्र मझोला थाने के पास एक प्लाँट की महिला चौकीदार नन्हीं (55) की गोली मारकर हत्या कर दी गई। एक हमलावर को मौके पर पकड़ लिया गया। हत्या की वजह प्लाँट पर कब्जे का विवाद है।पुलिस की शुरुआती जांच में पता चला कि विवाद का मामला अदालत में विचाराधीन है।
सिविल लाइंस में जिगर कालोनी निवासी पेट्रोल पंप संचालक अरमान का मझोला थाने के पास समृद्धि विहार में प्लाँट है। जिले के कुंदरकी के ऊंचाकानी गांव की नन्हीं इस प्लॉट की पन्द्रह साल से चौकीदारी कर रही थी। महिला के पति अब्दुल हमीद की पहले ही मौत हो चुकी है। महिला के बेटे महबूब और याकूब और दो बेटियां अरमाना व गुलशन हैं।अरमाना व याकूब गांव में और
महबूब अपनी पत्नी नजराना बेटे मो. आशिक के साथ मां के साथ इसी प्लॉट में दूसरी साइड में झोपड़ी बनाकर रहते हैं।गुलशन भी बेटी सायरीन और बेटे हसन को लेकर मां के साथ रह रहे हैं।
सोमवार की शाम सात बजे दो लोग प्लाँट पर पहुंचे। इस दौरान एक बदमाश ने पिस्टल से महिला की की गोली मारकर हत्या कर दी। इस बीच महबूब ने हमलावरों का पीछा किया। और एक बदमाश को पकड़ लिया गया।
घटना की खबर पाकर मौके पर पहुंची पुलिस ने हमलावर को अपने साथ ले गई। एसपी सिटी कुमार रणविजय सिंह का कहना है कि मामले की रिपोर्ट दर्ज की जा रही है।
पुलिस के अनुसार मामला प्लाँट के कब्जे के विवाद से जुड़ा है। पुलिस पकड़ में आए पूछताछ में सूचनाओं के आधार पर दबिश दे रही है।

झारखंड में एयर एम्बुलेंस दुर्घटना में 7 की मृत्यु

Posted on 24.92.2026 Tuesday Time 07.30 AM, Chatra, Jharkhand

चतरा, झारखंड 24 फरवरी। रांची से दिल्ली जा रही एयरएंबुलेंस के बीती शाम दुर्घटनाग्रस्त होने से मरीज, डाक्टर समेत 7 लोगों की मृत्यु हो गई। चालक दल के दोनों सदस्यों का भी निधन हो गया।

जानकारी के अनुसार शाम 7 बजे रांची से एक मरीज संजय कुमार (41) को लेकर एयर एम्बुलेंस दिली के लिए रवाना हुई थी। मरीज 65 प्रतिशत तक झुलस गया था। उसके साथ तीमारदार उसके साथ अर्चना देवी और ध्रुव कुमार भी थे। एम्बुलेंस में डॉ विकास कुमार गुप्ता, मेडिकल सहायक सचिन कुमार मिश्रा थे। इसके साथ ही चालक कैप्टन विवेक विकास भगत, सह चालक कैप्टन स्वराजदीप सिंह थे। दुर्घटना में सभी की मृत्यु हो गई।

Air Ambulance crashed in Jharkhand’s Chatra district, 7 died

शादी की बदलती तस्वीर: दिखावे, अहंकार और टूटते रिश्ते

Freelance writer

– डॉ० प्रियंका सौरभ
भारतीय समाज में शादी केवल दो व्यक्तियों का संबंध नहीं रही है, बल्कि इसे हमेशा से परिवार, समाज और संस्कारों से जुड़ी एक पवित्र संस्था माना गया है। विवाह को जीवनभर का साथ, सुख-दुख में एक-दूसरे का संबल और सामाजिक स्थिरता की आधारशिला समझा जाता रहा है। लेकिन बीते कुछ वर्षों में इस संस्था की तस्वीर तेजी से बदली है। आज शादी का मतलब साथ निभाने का संकल्प कम और सामाजिक प्रदर्शन अधिक होता जा रहा है। परिणामस्वरूप रिश्ते कमजोर हो रहे हैं और तलाक या अलगाव के मामले लगातार बढ़ते जा रहे हैं।
आज यह एक कड़वी सच्चाई है कि लोग शादी पर 20–25 लाख रुपये या उससे भी अधिक खर्च कर रहे हैं, लेकिन उसी शादी के कुछ महीनों या दिनों तक चलने की कोई गारंटी नहीं रह गई है। आंकड़े बताते हैं कि शहरी क्षेत्रों में लगभग 40 से 50 प्रतिशत वैवाहिक रिश्ते टूटने की कगार पर हैं या पहले ही टूट चुके हैं। यह केवल व्यक्तिगत विफलता नहीं, बल्कि एक गहरी सामाजिक समस्या का संकेत है, जिसे नज़रअंदाज़ करना आने वाले समय में भारी पड़ सकता है।
इस संकट का सबसे बड़ा कारण है दिखावे की संस्कृति। शादी अब एक निजी निर्णय नहीं, बल्कि एक भव्य इवेंट बन चुकी है, जिसमें होटल, डेस्टिनेशन वेडिंग, महंगे कपड़े, फोटोशूट और सोशल मीडिया पोस्ट सबसे अहम हो गए हैं। लोग यह सोचने में अधिक समय लगाते हैं कि मेहमान क्या कहेंगे, रिश्तेदार कितने प्रभावित होंगे और इंस्टाग्राम पर तस्वीरें कैसी दिखेंगी। लेकिन यह सोचने का समय नहीं निकालते कि जिस इंसान के साथ पूरी ज़िंदगी बितानी है, उसके विचार, स्वभाव, सहनशीलता और जीवन के प्रति दृष्टिकोण क्या हैं।
सोशल मीडिया ने इस समस्या को और गंभीर बना दिया है। हर व्यक्ति खुद को बेहतर दिखाने की कोशिश में अपनी वास्तविकता छिपा रहा है। शादी से पहले बनाई गई यह “परफेक्ट इमेज” शादी के बाद धीरे-धीरे टूटती है और जब सच्चाई सामने आती है, तब निराशा, टकराव और असंतोष जन्म लेता है। लोग समझ पाते हैं कि वे जिस इंसान से शादी कर बैठे हैं, वह वैसा नहीं है जैसा उन्होंने कल्पना की थी।
दूसरा बड़ा कारण है धैर्य की कमी और अहंकार की अधिकता। आज के समय में लोगों का पेशेंस लेवल लगभग शून्य पर आ गया है, जबकि ईगो का स्तर सौ पर पहुंच चुका है। छोटी-छोटी बातों पर रिश्तों में दरार आ जाती है। संवाद करने, समझाने और समझने की जगह लोग तुरंत निष्कर्ष निकाल लेते हैं कि यह रिश्ता काम नहीं करेगा। “मैं क्यों समझौता करूँ?” और “मेरी खुशी सबसे ऊपर है” जैसी सोच रिश्तों को खोखला कर रही है।
पहले रिश्तों में समस्याएं आती थीं, लेकिन उन्हें सुलझाने की कोशिश की जाती थी। आज समस्याएं आते ही लोग अलग होने को सबसे आसान समाधान मान लेते हैं। रिश्तों को निभाने की जगह उन्हें बदल देने की मानसिकता बढ़ती जा रही है। यह उपभोक्तावादी सोच केवल वस्तुओं तक सीमित नहीं रही, बल्कि अब रिश्तों में भी प्रवेश कर चुकी है।
एक और महत्वपूर्ण कारण है संयुक्त परिवार प्रणाली का टूटना और एकल परिवारों का बढ़ना। संयुक्त परिवारों में बच्चे बचपन से ही बड़ों को देखकर सहनशीलता, त्याग, जिम्मेदारी और रिश्तों को निभाने की कला सीखते थे। मतभेद होते थे, लेकिन उन्हें बातचीत और समझदारी से सुलझाया जाता था। आज एकल परिवारों में पले-बढ़े बच्चों को यह व्यवहारिक प्रशिक्षण बहुत कम मिल पाता है।
इसका मतलब यह नहीं कि एकल परिवार गलत हैं, लेकिन यह सच है कि उनमें सामूहिक जीवन का अनुभव सीमित होता है। परिणामस्वरूप जब युवा शादी के बाद नए रिश्तों और नई जिम्मेदारियों का सामना करते हैं, तो वे मानसिक रूप से उसके लिए तैयार नहीं होते। थोड़ी-सी असहमति भी उन्हें असहनीय लगने लगती है।
इसके साथ-साथ आर्थिक स्वतंत्रता और बदलती सामाजिक भूमिका भी रिश्तों पर असर डाल रही है। आज महिलाएं आत्मनिर्भर हैं, जो एक सकारात्मक बदलाव है, लेकिन इसके साथ ही अपेक्षाओं का टकराव भी बढ़ा है। दोनों पक्ष अपनी-अपनी स्वतंत्रता और अधिकारों को लेकर अधिक सजग हैं, जो सही भी है, लेकिन जब यह आपसी सम्मान और संवाद के बिना होता है, तब टकराव की स्थिति बन जाती है। बराबरी का अर्थ सहयोग होना चाहिए, न कि प्रतिस्पर्धा।
एक चिंताजनक पहलू यह भी है कि आज की पीढ़ी लंबे समय तक किसी एक निर्णय पर टिके रहने से डरती है। करियर हो, शहर हो या रिश्ता—हर जगह “अगर बेहतर विकल्प मिल जाए” वाली सोच हावी है। यही सोच शादी जैसे स्थायी संबंध को अस्थिर बना रही है। जब हर समय यह भावना बनी रहे कि इससे बेहतर कुछ और मिल सकता है, तो किसी भी रिश्ते में संतोष और स्थिरता संभव नहीं रह जाती।
इन सभी कारणों के चलते यह आशंका बढ़ रही है कि आने वाले समय में लोग शादी जैसी संस्था से ही दूरी बनाने लगेंगे। कुछ लोग पहले ही विवाह को बोझ या जोखिम के रूप में देखने लगे हैं। यदि यह प्रवृत्ति यूँ ही बढ़ती रही, तो इसका असर केवल व्यक्तिगत जीवन तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि सामाजिक ढांचे पर भी पड़ेगा। परिवार, जो समाज की सबसे छोटी इकाई है, यदि कमजोर होगा तो समाज की स्थिरता भी खतरे में पड़ जाएगी।
हालांकि, यह कहना गलत होगा कि समस्या का कोई समाधान नहीं है। असल समस्या शादी में नहीं, बल्कि शादी के प्रति हमारी सोच और प्राथमिकताओं में है। जरूरत है दिखावे और फिजूलखर्ची को कम कर, आपसी समझ, संवाद और भावनात्मक जुड़ाव को प्राथमिकता देने की। शादी से पहले एक-दूसरे को समय देना, खुलकर बातचीत करना और अपेक्षाओं को स्पष्ट रखना बेहद जरूरी है।
इसके साथ ही समाज और परिवारों को भी यह समझना होगा कि शादी केवल रस्मों और परंपराओं का पालन नहीं, बल्कि दो व्यक्तियों को मानसिक रूप से जोड़ने की प्रक्रिया है। युवाओं को यह सिखाने की आवश्यकता है कि रिश्ते परफेक्ट नहीं होते, उन्हें धैर्य, सम्मान और समझदारी से मजबूत बनाया जाता है।
अंततः यह समय आत्ममंथन का है। यदि हम आज भी केवल दिखावे, अहंकार और जल्दबाजी को ही प्राथमिकता देते रहे, तो आने वाली पीढ़ियों के लिए रिश्ते केवल अस्थायी समझौते बनकर रह जाएंगे। लेकिन यदि हम समय रहते अपनी सोच बदले, तो शादी जैसी संस्था को फिर से विश्वास, स्थिरता और सम्मान का आधार बनाया जा सकता है। समाज का भविष्य इसी संतुलन पर निर्भर करता है।
 (डॉ. प्रियंका सौरभ, पीएचडी (राजनीति विज्ञान), कवयित्री एवं सामाजिक चिंतक हैं।)

AI के दौर में ‘विरासत’ और ‘विकास’ का संतुलन अनिवार्य: अर्जुन राम मेघवाल    

अंतर्राष्ट्रीय कार्यशाला में उत्तर प्रदेश के शिक्षाविदो ने किया प्रतिभाग    

नई दिल्ली , 23 फरवरी | डॉ. अंबेडकर इंटरनेशनल सेंटर दिल्ली में आयोजित दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी “डिजिटल समाज और मानवीय मूल्य: एआई युग में एकात्म मानव दर्शन का पुनरुद्धार” का रविवार को समापन हुआ। इस अवसर पर भारत की सभ्यतागत विकास तथा सांस्कृतिक विरासत और आधुनिक तकनीक के बीच समन्वय स्थापित करने का आह्वान किया। 800 से अधिक शोधकर्ताओं और शिक्षाविदों की उपस्थिति में भारत ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस Artificial intelligence के क्षेत्र में नैतिक मानकों को तय करने वाले वैश्विक मार्गदर्शक के रूप में अपनी भूमिका स्पष्ट की।

समापन सत्र का शुभारंभ दीप प्रज्वलन और सरस्वती वंदना के साथ हुआ। प्रो. हेम चंद जैन, प्राचार्य, दीनदयाल उपाध्याय कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय ने दो दिवसीय कार्यशाला की रिपोर्ट प्रस्तुत की और कार्यक्रम का संचालन प्रो. शैलेश मिश्रा ने किया।

मानव-केंद्रित हो डिजिटल क्रांति (more…)

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