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मुरादाबादः जाट आरक्षण मामले में 38 आंदोलनकारी बरी 

January 28, 2026

मुरादाबादः जाट आरक्षण मामले में 38 आंदोलनकारी बरी 

Amroha Jat Reservation case

अमरोहा के जाट आरक्षण आंदोलन से बरी हुए आंदोलनकारी मुरादाबाद जिला न्यायालय परिसर में

  • अमरोहा में 2011 में काफूरपुर में रेल ट्रैक पर चला 19 दिन धरना, इस दौरान बंद रहा मुरादाबाद दिल्ली रेल मार्ग
  • जाट आरक्षण समिति के अध्यक्ष यशपाल सिंह, सपा विधायक समरपाल सिंह समेत प्रमुख नेताओं को राहत
Posted on : 28.01.2026, Wednesday Time: 08:14 PM,  Source:  Rajesh Bhatia
मुरादाबाद,28 जनवरी (उप्र समाचार सेवा)। अमरोहा में रेलवे ट्रैक जाम के मामले में सभी आरोपियों को राहत मिली है। 15 साल पुराने केस में 38 आंदोलनकारी बरी हो गए। इनमें केंद्रीय जाट आरक्षण समिति समेत के अध्यक्ष चौ यशपाल सिंह, सपा विधायक समरपाल सिंह, काफूरपुर में किसान आदर्श विद्यालय में आंदोलन के आयोजक भगत सिंह उर्फ बाँबी समेत सभी प्रमुख नेता है।
बुधवार को मुरादाबाद में एमपी एमएलए की स्पेशल कोर्ट एसीजेएम एमपी सिंह ने आंदोलनकारियो को दोष मुक्त करार दिया। रेलवे पुलिस ने रेल मार्ग बाधित में 53 लोगों के खिलाफ विभिन्न धाराओं में मुकदमा दर्ज किया था।
2011 में बसपा सरकार में जाटों ने केंद्र में आरक्षण के लिए विरोध जताया। जाट संघर्ष समिति ने एक स्वर में विरोध जताते हुए काफूरपुर रेलवे स्टेशन पर धरना प्रदर्शन शुरू किया। मुरादाबाद दिल्ली रूट बाधित रहा। अमरोहा जिले में काफूरपुर रेलवे स्टेशन पर किसान और जाट समुदाय के प्रदर्शन को लेकर आरपीएफ ने मुकदमा दर्ज किया।  गजरौला में थाना जीआरपी में 11 मार्च, 2011 तत्कालीन स्टेशन अधीक्षक सरदार सिंह ने रिपोर्ट दर्ज कराई।  काफूरपुर में 4 से 22 मार्च के बीच हुए प्रदर्शन से  मुरादाबाद से दिल्ली के बीच रेल मार्ग पूरी तरह से बाधित रहा। किसानों ने ट्रैक पर टैंट लगा दिए और पशुओं को बांध दिया।
इस मामले की सुनवाई पहले गजरौला में रेलवे कोर्ट में चलीं। पर इस बीच आरोपी समरपाल सिंह के नौगांवा से विधायक चुने जाने से केस की सुनवाई एमपी एमएलए स्पेशल कोर्ट में शुरु हुईं।

मुरादाबाद कोर्ट में तीन साल से चल रही सुनवाई, आठ ने दी गवाही 

केस में आरोपी समरपाल सिंह के विधायक बनने के बाद केस यहां अदालत में स्थानांतरित हो गया। मुरादाबाद कोर्ट में सुनवाई तीन साल चलीं।  केस में आठ गवाहों ने कोर्ट में बयान दर्ज कराएं। लंबी सुनवाई और बयान पर बहस के बाद अदालत ने फैसले का निर्णय लिया। 20 जनवरी को जाट आंदोलन में सुनवाई हुई। बुधवार को एमपी-एमएलए स्पेशल कोर्ट एसीजेएम प्रथम एमपी सिंह ने सुनवाई के बाद सभी आरोपियों को दोष मुक्त करार दिया।
विशेष लोक अभियोजक मोहनलाल विश्नोई ने बताया कि काफूरपुर में रेलवे ट्रैक बाधित के मामले में अदालत ने सभी को दोष मुक्त करार दिया। आरोपियों के खिलाफ साक्ष्य साबित नहीं हो सकें। इनमें 12 आरोपियों का सुनवाई के दौरान निधन हो गया जबकि तीन हाजिर नहीं हुए। हालांकि अदालती आदेश नहीं मिला है।
दोष मुक्त नेताओं में आरक्षण समिति के अध्यक्ष चौ यशपाल सिंह, सपा विधायक समरपाल सिंह, किसान नेता भगत सिंह, अमरोहा में अधिवक्ता शैलेंद्र सीनू, बाबू सिंह, नरेंद्र सिंह, अरुण सिंह, अरविंद,विजय पाल सिंह, राजेश सिंह, राजेश अग्रवाल, महेंद्र सिंह, मुकेश चौधरी, राजपाल राजू, सत्यपाल सिंह, कविता चौधरी आदि।

गो रक्षा का संकल्प

सम्पादकीय
सर्वेश कुमार सिंह
First Publised on : 06 November 2016 Time: 22:11   Tags: Editorial, Sarvesh Kumar Singh
सात नवम्बर को ही इस साल •ाी गोपाष्टमी है। यह गो रक्षा के संकल्प का दिन है। इस दिन पचास साल पहले भी गोपाष्टमी थी। गाय के प्राणों की रक्षा के लिए इस दिन दिल्ली में संसद •ावन पर विशाल प्रदर्शन हुआ था। एक लाख से अधिक एकत्रित हुए संतों पर तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने गोली चलवा दी थी। अनेकों साधू और गो भक्त मारे गए थे। स्वतंत्र भारत के इतिहास में यह संत शक्ति का अभी तक का सबसे बड़ा प्रदर्शन था। देश भर के साधू पुरी के शंकराचार्य निरंजनदेव तीर्थ और प्रभुदत्त ब्रह्मचारी, स्वामी करपात्री जी तथा सुशील मुनि के नेतृत्व में सात नवम्बर को संसद भवन पर एकत्रित हुए थे। संत समाज ने मांग की थी कि गो हत्या निषेध के लिए केन्द्रीय कानून बनाया जाए। संतों के बलिदान के पचास पूरे होने के बाद भी यह मांग ज्यों की त्यों बरकरार है। बल्कि गो हत्या पहले की तुलना में और अधिक बढ़ गई है। यांत्रिक कत्लखाने खोलकर निरीह गो वंश की हत्या की जा रही है। दस राज्यों में गो हत्या रोकने के लिए कोई कानून नहीं है। कुछ राज्यों ने पूर्ण तो कुछ ने आशिंक रूप से गो हत्या पर प्रतिबंध लगा है। केन्द्र सरकार को संविधान की भावना के अनुरूप केन्द्रीय कानून बनाकर देशभर में गो हत्या रोकनी चाहिए। संविधान का अनुच्छेद-48 स्पष्ट कहता है कि गो हत्या निषेध के उपाय किये जाएं। अनुच्छेद में कहा गया है ‘राज्य कृषि और पशुपालन को आधुनिक और वैज्ञानिक प्रणालियों से संगठित करने का प्रयास करेगा और विशिष्टत: गायों और बछड़ों तथा अन्य दुधारु और वाहक पशुओं की नस्लों के परीरक्षण और सुधार के लिए और उनकी हत्या का प्रतिषेध करने के लिए कदम उठाएगा।’ गो हत्या रोकने के लिए केन्द्रीय कानून बनाने के अलावा यह भी आवश्यक है कि देश से गो मांस का निर्यात पूर्णत: प्रतिबंधित किया जाए, सामूदायिक चारागाह का विकास हो तथा इनसे अवैध कब्जे हटाए जाएं। राष्ट्रीय चारा नीति बने और कृषि नीति में पशुधन के समुचित संरक्षण के प्रावधान जोड़े जाएं। विदेश से आने वाले दूध पाउडर, बटर आयल के आयात पर रोक लगाई जाए। गो पालन पर किसानों को अनुदान प्रदान किया जाए। यह अनुदान किसानों को भारत सरकार द्वारा हाल ही में लगाए गए किसान सेस टैक्स से दिया जा सकता है। केन्द्र की वर्तमान भाजपा सरकार के पास स्पष्ट बहुमत है। वह यह काम कर सकती है। यदि केन्द्र सरकार संतों के बलिदान के पचास साल पूरे होने के अवसर पर गो हत्या निषेध का केन्द्रीय कानून बनाती है तो यह बलिदानी संतों को सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
Sarvesh Kumar Singh Senior Journalist, Lucknow Uttar Pradesh

Sarvesh Kumar Singh
Senior Journalist, Lucknow Uttar Pradesh

सर्वेश कुमार सिंह, स्वतंत्र पत्रकार

एटा में बारिश से किसानों की फसलें बर्बाद, जनजीवन अस्त-व्यस्त

 

एटा 28 जनवरी उप्रससे। जनपद में रुक-रुक कर हो रही लगातार बारिश ने सामान्य जनजीवन को अस्त-व्यस्त कर दिया है। ग्रामीण और किसान इस बेमौसम बरसात से खासी दिक्कतों का सामना कर रहे हैं।

बारिश के कारण किसानों की फसलों को भारी नुकसान पहुंचा है। आलू की फसलें खराब हो गई हैं, जबकि पकी हुई सरसों और तंबाकू की फसलें भी बुरी तरह प्रभावित हो गईं हैं।

गांव तिसोरी निवासी किसान सुजल मिश्रा ने बताया कि उनकी आलू और गेहूं की फसल को इस बारिश से काफी क्षति हुई है। वहीं किसान आयुष मिश्रा ने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि लगातार बारिश में भीगने से उनके मवेशी, जैसे गाय और भैंस, बीमार पड़ सकते हैं।

हिमांशु मिश्रा ने बताया कि 18,19 घंटे से हो रही बारिश और लगातार खराब मौसम के कारण लोगों में चिंता बढ़ गई है। बे मौसम बारिश ने किसानों की फसलों को काफी प्रभावित कर दिया है। काफी छोटे किसान ऐसे हैं जो अपनी लागात भी नहीं निकाल सकते।

यूजीसी के समता संवर्धन विनियम-2026 से उभरता विरोध

UGC Regulations 2026

यूजीसी ने जारी किए नए नियम

Posted on : 28.01.2026, Wednesday Time: 03:26 PM, Writer Source:  Prof. Subhash Thaledi, Dehradun
– प्रो. (डॉ.) सुभाष चंद्र थलेडी
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) द्वारा उच्च शिक्षा संस्थानों में समता के संवर्धन हेतु बनाए गए विनियम-2026 ने देशभर में सामान्य वर्ग के छात्रों और अभिभावकों के बीच एक नई और तीखी बहस को जन्म दे दिया है। 13 जनवरी 2026 को अधिसूचित ये नियम 15 जनवरी से लागू भी कर दिए गए। यूजीसी का दावा है कि इन विनियमों का उद्देश्य विश्वविद्यालय परिसरों में भेदभाव का उन्मूलन कर सभी छात्रों को समान अवसर उपलब्ध कराना है। किंतु इनके लागू होते ही सामान्य श्रेणी के छात्रों में असंतोष खुलकर सामने आने लगा है और कई राज्यों में संगठित विरोध के स्वर भी सुनाई दे रहे हैं। इस पूरे विनियम की वैधानिक पृष्ठभूमि में सुप्रीम कोर्ट की भूमिका महत्वपूर्ण रही है। सितंबर 2025 में न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमल्या बागची की पीठ ने उच्च शिक्षा संस्थानों में जातिगत उत्पीड़न और भेदभाव रोकने के लिए प्रभावी नियम बनाने का निर्देश यूजीसी को दिया था। यह आदेश 2019 में दायर उस जनहित याचिका पर आया था, जिसे रोहित वेमुला और पायल ताडवी की माताओं ने दाखिल किया था। याचिका में 2012 के यूजीसी विनियमों के सख्त अनुपालन और ठोस उपायों की मांग की गई थी। इसी न्यायिक निर्देश के आलोक में यूजीसी ने 2012 के पुराने नियमों को निरस्त कर 2026 के नए समता विनियम लागू किए। इनके औचित्य को राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 से भी जोड़ा गया है, जो समता और समावेशन को शैक्षिक नीति की आधारशिला मानती है। विनियमों की प्रस्तावना में धर्म, जाति, लिंग, जन्मस्थान और दिव्यांगता के आधार पर किसी भी प्रकार के भेदभाव के उन्मूलन की बात कही गई है। उद्देश्य के स्तर पर यह सर्वथा स्वीकार्य और आवश्यक है, किंतु समस्या तब उभरती है जब उद्देश्य और परिभाषाओं को साथ रखकर देखा जाता है।
यूजीसी के इस विनियम में जाति-आधारित भेदभाव की परिभाषा को केवल अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग तक सीमित कर दिया गया है। इससे यह संकेत मिलता है कि यह नियामक ढांचा मुख्यतः इन्हीं वर्गों के संरक्षण पर केंद्रित है। यही बिंदु सामान्य श्रेणी के छात्रों में असुरक्षा और भय की भावना को जन्म देता है। आलोचकों का तर्क है कि अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 पहले से ही लागू है। ऐसे में एक अतिरिक्त विनियम, जिसमें झूठी या दुर्भावनापूर्ण शिकायतों के लिए कोई स्पष्ट दंडात्मक प्रावधान नहीं है, एकतरफा व्यवस्था का रूप ले सकता है। सामान्य वर्ग के छात्रों का कहना है कि इससे वे स्वतः ही संदेह के दायरे में आ जाते हैं। मेरठ में मीडिया शिक्षा प्राप्त कर रहे विद्यार्थी नितेश तिवारी और टीना सोम का मानना है कि नई पीढ़ी में जातिगत भावनाएं पहले से ही कमजोर पड़ चुकी हैं, लेकिन ऐसे विनियम नई पीढ़ी को फिर से जातिवादी ढांचे में बाँध सकते हैं। इन विनियमों के तहत प्रत्येक उच्च शिक्षा संस्थान में समान अवसर केंद्र (ईओसी) और समता समिति का गठन अनिवार्य किया गया है। समितियों में अनुसूचित जाति, जनजाति, ओबीसी, दिव्यांग और महिलाओं का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया गया है, किंतु सामान्य श्रेणी के प्रतिनिधित्व को अनिवार्य नहीं बनाया गया। यही वह बिंदु है जिस पर आपत्ति सबसे अधिक मुखर है। सामान्य वर्ग के छात्रों का सवाल है कि जब निर्णय-निर्माण की प्रक्रिया में उनकी भागीदारी सुनिश्चित नहीं है, तो निष्पक्षता की गारंटी कैसे दी जा सकती है। विनियमों में सचल समता स्क्वॉड और 24×7 समता हेल्पलाइन की व्यवस्था भी की गई है। किंतु सामान्य श्रेणी के छात्रों के बीच इसे लेकर भी गहरी चिंता है। गोपनीय शिकायत और त्वरित कार्रवाई के प्रावधान उन्हें सुरक्षा से अधिक भय का वातावरण पैदा करने वाले प्रतीत होते हैं। मात्र एक आरोप से किसी छात्र या शिक्षक की शैक्षणिक और सामाजिक छवि को गंभीर क्षति पहुँच सकती है, भले ही बाद में आरोप निराधार सिद्ध हो जाए। झूठी शिकायतों से निपटने की स्पष्ट व्यवस्था का अभाव इस चिंता को और गहरा करता है।
इस विनियम को लेकर सामान्य वर्ग के छात्रों की आपत्ति मूलतः ‘समता’ की व्याख्या और उसके व्यावहारिक प्रभाव को लेकर है। उनका सवाल है कि ये विनियम वास्तव में सभी के लिए बराबरी सुनिश्चित नहीं करते हैं जिससे शैक्षिक संस्थानों में नए प्रकार के असंतुलन हो जायेगा। सामान्य वर्ग के छात्रों को आशंका है कि भविष्य में शैक्षणिक मूल्यांकन, छात्रावास आवंटन और अनुशासनात्मक कार्रवाइयों जैसे मामलों को भी जातिगत दृष्टि से देखा जाएगा। इससे शिक्षक-छात्र संबंधों में अविश्वास बढ़ सकता है और विश्वविद्यालयों का शैक्षणिक वातावरण प्रभावित हो सकता है।
कुछ शिक्षकों की चिंता शैक्षणिक गुणवत्ता और अकादमिक स्वतंत्रता को लेकर भी है। उनका मानना है कि विश्वविद्यालयों का मूल उद्देश्य ज्ञान, शोध और आलोचनात्मक चिंतन का विकास है। यदि प्रत्येक निर्णय पर निगरानी और दंड का दबाव रहेगा, तो संस्थागत स्वायत्तता प्रभावित होगी। इन नियमों का पालन न करने वाले शैक्षिक संस्थानों की डिग्री कार्यक्रम रोकने या मान्यता समाप्त करने जैसे प्रावधानों को वे प्रशासनिक नियंत्रण के विस्तार के रूप में देखते हैं। वैसे भी संकाय सदस्य पहले से ही अध्यापन-अध्ययन के अतिरिक्त अनेक समितियों के दायित्वों से बोझिल हैं।
यह भी चिंता का विषय है कि आजादी के 78 सालों के बाद भी इस प्रकार के जातिवादी चयनित विनियम बनाने की जरूरत बन रही है। इससे साफ जाहिर होता है कि इन 78 सालों में देश का इस दिशा में कोई विकास नहीं हुआ है। दूसरी ओर हम 2047 तक विकसित भारत का सपना देख रहे हैं। दरअसल यह विनियम शैक्षिक संस्थानों में सभी वर्ग के लिए बनाये जाते तो इसका स्वागत योग्य था। शैक्षिक संस्थानों में आज छात्रों के बीच सबसे अधिक भेदभाव क्षेत्रवाद को लेकर सामने आता है। जातिवादी सोच शैक्षिक संस्थानों से दूर हो रही है लेकिन इस प्रकार के नियमों से जातिवादी भावनाएं प्रबल होना स्वाभाविक है।
कानून विशेषज्ञों का भी कहना है कि यह विनियम ‘चयनित संरक्षण’ की अवधारणा को बढ़ावा देता है। एससी/एसटी कानूनों के दुरुपयोग की बहुत सारी शिकायतें पहले से ही न्यायालयों के सामने आती रही हैं। ऐसे में सामान्य वर्ग के छात्र अपने भविष्य और करियर को लेकर सशंकित हैं। उनका यह भी तर्क है कि यह विनियम संविधान में निहित समानता के अधिकार- अनुच्छेद 14 और 16- की भावना के प्रतिकूल है। इन्हीं आधारों पर कुछ कानूनविदों ने इस विनियम को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती भी दी है। उल्लेखनीय है कि 2012 के यूजीसी समता विनियमों में अन्य पिछड़ा वर्ग शामिल नहीं था, जिसे 2026 में जोड़ा गया है। इससे भी विरोध के स्वर और प्रखर हुए हैं। साथ ही, विनियमों के उल्लंघन पर संस्थानों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई का प्रावधान चिंता को और बढ़ाता है।
सोशल मीडिया पर इन नियमों को लेकर तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं और इससे जुड़े हैशटैग ट्रेंड कर रहे हैं। उत्तर प्रदेश में बरेली के एक वरिष्ठ पीसीएस अधिकारी अलंकार अग्निहोत्री द्वारा विरोधस्वरूप इस्तीफे की खबर ने बहस को और तेज कर दिया है। बढ़ते विरोध के बीच केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने कहा है कि इन विनियमों से किसी के साथ भेदभाव नहीं होने दिया जाएगा। किंतु जब नियम पहले ही लागू हो चुके हों, तो मौखिक आश्वासन पर्याप्त नहीं माने जा सकते।
 कुल मिलाकर, यूजीसी के समता विनियम-2026 उच्च शिक्षा के भविष्य को गहराई से प्रभावित करने वाले हैं। यदि इन्हें केवल कानूनी सख्ती के साथ लागू किया गया, तो असंतोष और बढ़ सकता है। समावेशन तभी टिकाऊ होगा, जब विनियम वास्तव में सभी के लिए संतुलित और न्यायपूर्ण हों। अब असली परीक्षा नीति-निर्माताओं की है कि क्या वे संतुलन की दिशा में कदम उठाएंगे या यह बहस और अधिक टकराव की ओर बढ़ेगी?
Prof. (Dr) Subhash Thaledi

डा. सुभाष थलेड़ी

(लेखक सामयिक विषयों के स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)
#UGCRules

एक कौम, एक वतन: हिंदुस्तान — राष्ट्र प्रथम की भावना से ही बनेगा समरस भारत: डा० इंद्रेश कुमार

इंद्रेश कुमार,

राष्ट्रीय मुस्लिम मंच के कार्यक्रम में आरएसएस के वरिष्ठ प्रचारक इंद्रेश कुमार

लखनऊ।  इरम कॉलेज लखनऊ मुस्लिम राष्ट्रीय मंच हिन्दुस्तानी फर्स्ट और हिंदुस्तानी बेस्ट के तत्वाधान में “एक कौम, एक वतन: हिंदुस्तान” विषय पर आयोजित भव्य कार्यक्रम में देश की एकता, अखंडता और आपसी सौहार्द का सशक्त संदेश दिया गया। कार्यक्रम में विभिन्न क्षेत्रों से आए वक्ताओं ने धर्म, जाति और समुदाय से ऊपर उठकर राष्ट्र प्रथम की भावना को जीवन में उतारने का आह्वान किया।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य डॉ. इंद्रेश जी ने अपने ओजस्वी संबोधन में कुरान पाक का उल्लेख करते हुए कहा कि “माँ के कदमों में जन्नत है” और यही संस्कार भारतीय संस्कृति की आत्मा है। उन्होंने कहा कि हम दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में रहते हैं और हमें इस लोकतांत्रिक परंपरा को और मजबूत करना है। डॉ. इंद्रेश जी ने नेताजी सुभाष चंद्र बोस का स्मरण करते हुए कहा कि उनके नारे ने अंग्रेजों को भारत छोड़ने पर मजबूर किया। बसंत पंचमी के महत्व पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने इसे ज्ञान और शिक्षा की देवी का पर्व बताया।
उन्होंने कहा कि कभी-कभी हम अपनी कट्टरता को ही सर्वश्रेष्ठ मानने लगते हैं, लेकिन यह सोच देश को जोड़ने में सहायक नहीं हो सकती। “सारे जहाँ से अच्छा हिंदुस्तान हमारा” केवल हिंदुस्तान के लिए गाया गया है, किसी अन्य देश के लिए नहीं। पैग़म्बर मोहम्मद साहब के संदर्भ में उन्होंने कहा कि गाय का दूध शिफा है और उसके संरक्षण की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि यदि समाज में संवेदनशीलता और संयम आए तो दंगों जैसी स्थितियाँ स्वतः समाप्त हो सकती हैं। इस अवसर पर उन्होंने उपस्थित लोगों को गौ-माता की सुरक्षा की शपथ भी दिलाई।
डॉ. इंद्रेश जी ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि “हम किसी भी जाति, धर्म या समुदाय से हों, सबसे पहले भारतीय हैं। नेशन प्रथम होना चाहिए। हम एक वतन, एक कौम — हिंदुस्तान हैं और इस विचार को गली-गली, मोहल्ले-मोहल्ले तक पहुँचाना होगा।” उन्होंने भारत की सर्वधर्म समभाव की परंपरा का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत ने ही पहली मस्जिद और पहला चर्च बनवाकर दिया, यही हमारी सांस्कृतिक पहचान है। उन्होंने प्रदेश को स्वच्छ, सुरक्षित और दंगा-मुक्त बनाने का सामूहिक संकल्प लेने का आह्वान किया।
इससे पूर्व सोशल एक्टिविस्ट शालिनी अली ने कहा कि हम चाहे किसी भी धर्म के हों, हमारी पहली पहचान भारतीय होने की है। जामिया हमदर्द विश्वविद्यालय, नई दिल्ली के रजिस्ट्रार कर्नल ताहिर मुस्तफा ने कहा कि सपने वो नहीं जो हम सोते हुए देखते हैं, बल्कि वो हैं जो हमें सोने नहीं देते, और विकसित भारत के लिए काम करने वाला हर व्यक्ति एक फौजी है। डा. भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. मित्तल जी ने युवा शक्ति को शिक्षित, संस्कारयुक्त और कौशलयुक्त बनाने पर बल दिया तथा पर्यावरण संरक्षण को श्रेष्ठ भारत की अनिवार्य शर्त बताया। अल्पसंख्यक शिक्षा आयोग भारत सरकार के कार्यकारी अध्यक्ष डॉ. शाहिद अख्तर ने कहा कि हमारी पहचान एक हिंदुस्तानी के नाते होनी चाहिए और देश के लिए कुर्बानी देने की भावना सदैव जीवित रहनी चाहिए। विशिष्ट अतिथि उत्तर प्रदेश राज्य मंत्री दानिश आज़ाद अंसारी ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा लिए गए विकसित भारत के संकल्प को पूरा करना हम सबकी जिम्मेदारी है।
कार्यक्रम का सफल संचालन सैयद रज़ा हुसैन ने किया।
इस अवसर पर कॉलेज के ट्रस्टी ख़्वाजा फैज़ी, दयालु महाराज, डॉ. शौकत खान, आलोक चतुर्वेदी, ठाकुर राजा रईस, मज़हिर खान, डॉ. शाहिद सईद, शाहनवाज़, डॉ. ताहिर शाह, डॉ. अली ज़फर, आफ़ताब मिर्ज़ा, शेर खान, याक़ूब अली, अशफ़ाक सिद्दीकी सहित बड़ी संख्या में गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे।

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