एटा 25 फरवरी उप्रससे। भारत में होली एक लोकपर्व है जिसका वर्तमान स्वरूप पौराणिक कथाओं विशेषकर प्रह्लाद-होलिका प्रसंग और वसंतोत्सव की परम्परा से जुड़ा है। जैमिनी रचित पूर्व मीमांसा सूत्र और उनसे सम्बन्धित काठक गृह्य सूत्र में होली ( होलिका ) का उल्लेख एक प्राचीन हिन्दू त्यौहार के रूप में मिलता है जो ईसा पूर्व से मनाया जा रहा है। यह सूत्र बताते हैं कि होली विवाहित महिलाओं द्वारा अपने परिवार की सुख समृद्धि के लिए की जाने वाली एक पूजा थी जो पूर्णमासी को मनाई जाती थी। प्राचीन उत्सव के रूप में इसको मान्यता प्राप्त है, ईसा पूर्व ग्रंथों में भी इसका उल्लेख मिलता है। वैदिक साहित्य में वसंतोत्सव की भावना, अग्नि की पवित्रता, ऋतु परिवर्तन का उत्सव तथा सामूहिक मंगल कामना के आधार पर होली का सांस्कृतिक बीज रूपांतरण वैदिक परम्परा में निहित है, जिसका वर्तमान स्वरूप कालांतर में पौराणिक और लोक परम्पराओं के साथ विकसित हुआ।
होली का इतिहास कई पौराणिक कथाओं और सांस्कृतिक परम्पराओं से जुड़ा है। राधा-कृष्ण की प्रेमलीला, हिरण्यकशिपु और प्रह्लाद( बुराई पर अच्छाई की जीत ), कामदेव की कथा (शिव के ध्यान को भंग करने के लिए कामदेव ने पुष्प वाण चलाया जिससे क्रोधित होकर शिव ने कामदेव को भस्म कर दिया, बाद में रति की प्रार्थना पर शिव ने उन्हें पुनर्जीवित किया) कामदेव के पुनर्जीवन को कुछ क्षेत्रों में होली के रूप में मनाते हैं। होली को प्राचीन ग्रंथों में ‘ वसंतोत्सव ‘ कहा गया है और यह फाल्गुन मास में मनाया जाता है इसलिए इसे फाग भी कहते हैं। यह ऋतु परिवर्तन और नई फसल के स्वागत का उत्सव भी है जिसमें किसान अग्नि को अन्न समर्पित करते हैं।
मान्यता है कि इस उत्सव की शुरुआत झाँसी मुख्यालय से करीब सत्तर कि०मी० दूर ‘एरच’ कस्बा से हुई है तो कुछ लोगों का मानना है कि हरदोई से हुई जिसका उल्लेख गजेटियर्स में भी मिलता है। बहरहाल इस पर्व को मनाने की पृष्ठभूमि में मुख्य कथा हिरण्यकशिपु और प्रह्लाद की है। हिरण्यकशिपु नामक असुर राजा अपने पुत्र प्रह्लाद से घृणा करता था क्योंकि प्रह्लाद भगवान विष्णु का भक्त था। उसने अपनी बहन होलिका (जिसे आग से न जलने का वरदान था) को प्रह्लाद को गोद में लेकर आग में बैठने का आदेश दिया परिणामस्वरूप होलिका जल गई लेकिन प्रह्लाद बच गया। यह बुराई पर अच्छाई का प्रतीक है जिसे होलिका दहन के रूप में मनाया जाता है। असुर राजा हिरण्यकशिपु की बहन और प्रह्लाद की मौसी होलिका से ही ‘ होली ‘ शब्द की व्युत्पत्ति हुई है। इस कथा में एक प्रतीकात्मक संदेश भी निहित है। हिरण्यकशिपु का अर्थ है– हिरण्य (सोना) और कशिपु (पलंग) अर्थात स्वर्ण पलंग वाला। हिरण्यकशिपु एक ऐसा राजा था जो अपार धन- सम्पत्ति में डूबा हुआ था जिसके कारण वह सर्वोच्च शक्ति के रूप में सभी से अधीनता की माँग करता था। प्रह्लाद का अर्थ है– जो स्वाभाविक रूप से सुख और शान्ति का भाव उत्पन्न करता है। यह शब्द ‘ आह्वाद ‘ से आया है जो पुनरुत्थान, ताजगी, आनंद को दर्शाता है। नरसिम्हा द्वारा हिरण्यकशिपु बध से यही शिक्षा प्राप्त होती है कि मनुष्य को अहंकार नहीं करनी चाहिए, अनैतिक जीवनशैली हिंसक अंत की ओर ले जाती है। होलिका दहन की परम्परा इसी कारण से हुई होगी जो दुर्भावना के सामूहिक दहन का प्रतीक बन गया। होलिका दहन केवल धार्मिक अनुष्ठान ही नहीं बल्कि सामाजिक समरसता का प्रतीक है। लकड़ियों को एकत्र करके सामूहिक रूप से अग्नि प्रज्वलित करके परिक्रमा लगाना, यह सामूहिकता प्राचीन यज्ञ संस्कृति को जीवंत करती है। यह अनुष्ठान ईर्ष्या, द्वेष व अहंकार के दहन का प्रतीक भी माना जाता है।
होली पर एक-दूसरे के गालों पर रंग, गुलाल,अबीर लगाने की परम्परा है। इसकी पृष्ठभूमि में कथा अनुसार- भगवान विष्णु के अवतार श्रीकृष्ण को ग्वालिन राधा से प्रेम हो गया था लेकिन उन्हें इस बात का दु:ख था कि उनकी त्वचा गहरे नीले रंग की है जबकि राधा की त्वचा गोरी। इस दु:ख को दूर करने के लिए उन्होंने खेलते हुए शरारत में राधा के चेहरे पर रंग लगा दिया। माना जाता है कि रंगीन पानी एवं रंग लगाने की परम्परा यहीं से प्रारम्भ हुई। वस्तुत: रंग आनंद ही नहीं देते अपितु हमारे जीवन का आधार भी होते हैं। भारतीय संस्कृति में रंगों का विशेष महत्व रहा है। होली जैसे उत्सव में रंग- प्रेम, सौहार्द और समानता का संदेश देते हैं। रंग मानव की भावनाओं का प्रतीक भी हैं। लाल रंग यदि प्रेम और उत्साह का प्रतीक है तो सफेद शांति और पवित्रता का द्योतक है। हरा रंग समृद्धि और विकास का संकेत देता है तो नीला रंग विश्वास और स्थिरता को दर्शाता है। अत: कहा जा सकता है कि रंग जीवन के प्राण हैं, रंग ही जीवन को ऊर्जा, आनंद के साथ ही साथ जीवन को अर्थ प्रदान करते हैं। जब हमारे विचार सकारात्मक व रंगीन होंगे तभी हमारा जीवन आनंदमय बनेगा। इस प्रकार लोक जीवन से जुड़ा होली का पर्व केवल रंगों का ही नहीं अपितु प्रेम, सद्भाव, एकता,भाईचारे एवं सामाजिक समरसता का प्रतीक है।

