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चुनावी सहानुभूति

March 8, 2026

चुनावी सहानुभूति

Posted on 08.03.2026 Sunday Time 08.06 PM, Editorial By Sarvesh Kumar Singh

बसपा सुप्रीमो बहन मायावती की याद अखिलेश यादव जी को फिर से आई है। आखिर अचानक क्यों आई याद सपा प्रमुख को? और सिर्फ मायावती जी की ही याद नहीं आई, उन्होंने नीतीश कुमार जी को भी याद किया है।

नीतीश कुमार जी का जो राजनीतिक परिदृश्य में परिवर्तन सामने आ रहा है, उसको लेकर भी उन्होंने टिप्पणी की है और उनसे सहानुभूति जताई है। कल समाजवादी पार्टी कार्यालय में एक पत्रकार वार्ता थी, जिसमें अखिलेश यादव जी के साथ उनके चाचा शिवपाल यादव जी, लाल बिहारी यादव और राजेंद्र चौधरी भी मौजूद थे।

इस पत्रकार वार्ता की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अखिलेश जी ने अनायास कहा कि— “हम सपा-बसपा गठबंधन के दौर में मायावती जी को प्रधानमंत्री बनाना चाहते थे।” उनको प्रधानमंत्री बनाने के लिए ही एक तरह से गठबंधन हुआ था। यह बात 2019 की है।

लोकसभा चुनाव  2019 में सपा और बसपा ने आपसी दूरियों को कम करते हुए गठबंधन किया था। उन्होंने सपना देखा था कि मायावती जी को वो प्रधानमंत्री बनाएंगे। हालांकि गठबंधन की हार हुई, बसपा को कुछ सीटें मिलीं लेकिन सपा को अपेक्षा के अनुरूप सीटें नहीं मिलीं और मोदी जी फिर प्रधानमंत्री बने।

दूसरी महत्वपूर्ण बात उन्होंने नीतीश कुमार जी के राजनीतिक परिवर्तन पर कही। राज्यसभा के चुनाव हो रहे हैं और चर्चा है कि नीतीश कुमार जी मुख्यमंत्री पद से त्यागपत्र देंगे और राज्यसभा जाएंगे।

इस पर अखिलेश जी ने कहा— “हम तो उनको प्रधानमंत्री बनाना चाहते थे।” यानी इंडिया गठबंधन की योजना नीतीश जी को प्रधानमंत्री बनाने की थी, लेकिन वो नहीं माने। वो तो राज्यसभा पर अटक कर रह गए।

क्या यह सहानुभूति अनायास है या चुनावी रणनीति का हिस्सा? 2027 का चुनाव नजदीक है और अब लगभग एक वर्ष से थोड़ा कम समय बचा है। उत्तर प्रदेश की राजनीति में सामाजिक और जातीय समीकरण (सोशल इंजीनियरिंग) सबसे प्रमुख है।

2024 के चुनाव में अखिलेश जी के ‘PDA’ ने असर दिखाया। यादवों के बाद दूसरा प्रमुख मत प्रतिशत कुर्मी (पटेल) वोट का है। इसका रुख सपा के प्रति ज्यादा रहा। यही वजह है कि सपा के 7 कुर्मी सांसद जीते, जबकि भाजपा के 4।

भाजपा ने भी कुर्मी नेता पंकज चौधरी को जिम्मेदारी देकर अपनी रणनीति मजबूत की है। उधर सपा की नजर भी इसी वोट बैंक पर है। इसीलिए उन्होंने नीतीश जी का नाम लिया और सहानुभूति जताई क्योंकि नीतीश जी भी इसी समाज से आते हैं।

मायावती जी का नाम लेने के पीछे भी यही रणनीति है कि दलित और पिछड़ा वोट उनके साथ जुड़ जाए। 2024 में दलित वोट का कुछ हिस्सा कांग्रेस और सपा की ओर गया था। अखिलेश जी 2019 के गठबंधन का उल्लेख इसीलिए कर रहे हैं ताकि दलित समाज में संदेश जाए।

हालांकि, अखिलेश जी ने अब यह खुलासा किया है, लेकिन अगर यह बात इंडिया गठबंधन ने सार्वजनिक रूप से कही होती तो स्थिति अलग होती। उस समय कांग्रेस तो सिर्फ राहुल गांधी के नाम पर अड़ी हुई थी।

देखते हैं राजनीति किस करवट बैठती है।