Web News

www.upwebnews.com

मकर संक्रांति: पतंगबाज़ी, आनंद, संस्कृति और चेतना

January 13, 2026

मकर संक्रांति: पतंगबाज़ी, आनंद, संस्कृति और चेतना

लेखक, स्वतंत्र पत्रकार

— डॉ. सत्यवान सौरभ
मकर संक्रांति का पर्व भारतीय संस्कृति में केवल एक तिथि नहीं, बल्कि ऋतु परिवर्तन, सामाजिक सहभागिता और लोकजीवन की जीवंत अभिव्यक्ति है। यह वह समय है जब सूर्य दक्षिणायन से उत्तरायण की ओर अग्रसर होता है और प्रकृति के साथ-साथ मानव जीवन में भी नई ऊर्जा का संचार होता है। इस पर्व से जुड़ी पतंगबाज़ी की परंपरा सदियों से चली आ रही है, जिसने समय के साथ स्वयं को केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं रखा, बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक और स्वास्थ्य संबंधी आयामों को भी अपने भीतर समाहित किया है। आज पतंग उड़ाना सिर्फ़ छतों पर खड़े होकर डोर खींचने का खेल नहीं, बल्कि सामूहिक उत्सव, मानसिक प्रसन्नता और शारीरिक सक्रियता का प्रतीक बन चुका है।
पतंग उड़ाने की परंपरा भारत में अत्यंत प्राचीन मानी जाती है। ऐतिहासिक संदर्भों और लोककथाओं में इसके उल्लेख मिलते हैं। कभी यह राजदरबारों में कौशल और रणनीति का प्रतीक रही, तो समय के साथ आम जनजीवन में रच-बस गई। मकर संक्रांति, बसंत पंचमी और अन्य पर्वों पर आसमान का रंग-बिरंगी पतंगों से भर जाना, भारतीय समाज की सामूहिक चेतना और उत्सवधर्मिता को दर्शाता है। हरियाणा, राजस्थान, गुजरात, उत्तर प्रदेश और दिल्ली जैसे राज्यों में यह पर्व केवल परंपरा नहीं, बल्कि एक बड़े सामाजिक आयोजन का रूप ले लेता है।
पतंगबाज़ी का सबसे सुंदर पक्ष उसका सामाजिक स्वरूप है। यह लोगों को घरों से बाहर निकालकर एक-दूसरे से जोड़ती है। छतों के बीच संवाद, बच्चों की खिलखिलाहट, युवाओं की प्रतिस्पर्धा और बुज़ुर्गों की स्मृतियों से उपजी मुस्कान—ये सभी दृश्य इस पर्व को जीवंत बनाते हैं। “वो काटा… वो मारा” की गूंज केवल खेल का उत्साह नहीं, बल्कि सामूहिक सहभागिता की आवाज़ होती है। आज के समय में, जब सामाजिक संवाद सिमटता जा रहा है, ऐसे पर्व मानवीय रिश्तों को सहेजने का अवसर प्रदान करते हैं।
मकर संक्रांति के अवसर पर आयोजित पतंग महोत्सवों और सामूहिक आयोजनों ने इस परंपरा को नए आयाम दिए हैं। कई स्थानों पर स्थानीय प्रशासन, सामाजिक संगठन और स्वयंसेवी संस्थाएँ मिलकर ऐसे कार्यक्रम आयोजित करती हैं, जिनका उद्देश्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि सांस्कृतिक संरक्षण और सामाजिक समरसता को बढ़ावा देना भी होता है। इन आयोजनों में महिलाएँ, बच्चे और बुज़ुर्ग समान रूप से भाग लेते हैं, जिससे यह पर्व किसी एक वर्ग तक सीमित न रहकर समाज के हर हिस्से का उत्सव बन जाता है।
अक्सर पतंगबाज़ी को केवल मौसमी खेल समझ लिया जाता है, लेकिन इसके स्वास्थ्य संबंधी लाभ भी कम नहीं हैं। पतंग उड़ाते समय शरीर के कई अंग सक्रिय रहते हैं। हाथों, कंधों और आँखों का समन्वय होता है, जिससे शारीरिक सक्रियता बनी रहती है। खुले वातावरण में समय बिताने से शरीर को सूर्य की ऊर्जा मिलती है और मानसिक थकान कम होती है। चिकित्सकों और मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि ऐसे सामूहिक और आनंददायक आयोजन तनाव को कम करने में सहायक होते हैं।
मानसिक स्वास्थ्य की दृष्टि से भी पतंग उड़ाना अत्यंत उपयोगी है। खुले आसमान में रंग-बिरंगी पतंगों को उड़ते देखना मन को प्रसन्नता और शांति देता है। यह व्यक्ति को वर्तमान क्षण से जोड़ता है और एक प्रकार के सहज ध्यान का अनुभव कराता है। आज के तेज़ रफ्तार और तनावपूर्ण जीवन में ऐसे अनुभव मानसिक संतुलन बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
बच्चों के लिए पतंगबाज़ी केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि सीखने की प्रक्रिया भी है। इससे उनमें धैर्य, संतुलन, समन्वय और प्रतिस्पर्धा की भावना विकसित होती है। हवा की दिशा को समझना, डोर का सही तनाव बनाए रखना और सही समय पर निर्णय लेना—ये सभी कौशल बच्चों की निर्णय क्षमता को मजबूत करते हैं। साथ ही, जब यह गतिविधि परिवार के साथ मिलकर की जाती है, तो बच्चों में सामाजिक मूल्य और सांस्कृतिक जुड़ाव भी गहराता है।
हालाँकि, जहाँ पतंगबाज़ी आनंद और उत्साह का पर्व है, वहीं इससे जुड़ी सुरक्षा चुनौतियाँ भी सामने आती हैं। बीते वर्षों में चाइनीज़ मांझा और नायलॉन डोर के प्रयोग से कई गंभीर दुर्घटनाएँ हुई हैं। यह न केवल मनुष्यों के लिए, बल्कि पक्षियों और अन्य जीव-जंतुओं के लिए भी घातक सिद्ध हुआ है। सड़क दुर्घटनाएँ, गले में कट लगने की घटनाएँ और पक्षियों की मौत—ये सभी इस परंपरा के विकृत स्वरूप की ओर संकेत करते हैं।
सरकार और प्रशासन द्वारा इस दिशा में नियम बनाए गए हैं, लेकिन केवल नियम पर्याप्त नहीं हैं। समाज में जागरूकता फैलाना और जिम्मेदारी का भाव विकसित करना अत्यंत आवश्यक है। सूती डोर का उपयोग, खुले और सुरक्षित स्थानों का चयन, बच्चों की निगरानी और समय-सीमा का ध्यान—ये सभी कदम पतंगबाज़ी को सुरक्षित बना सकते हैं। यह ज़रूरी है कि उत्सव की खुशी किसी के लिए दुख का कारण न बने।
पर्यावरणीय दृष्टि से भी पतंगबाज़ी पर पुनर्विचार की आवश्यकता है। पतंगों के अवशेष पेड़ों, बिजली के तारों और सड़कों पर फँसकर पर्यावरण के लिए समस्या बन जाते हैं। प्लास्टिक और नायलॉन से बनी पतंगें लंबे समय तक नष्ट नहीं होतीं और जीव-जंतुओं के लिए खतरा पैदा करती हैं। ऐसे में पर्यावरण-अनुकूल पतंगों और प्राकृतिक रंगों के उपयोग को बढ़ावा देना समय की माँग है।
कई सामाजिक संगठन और स्वयंसेवी समूह इस दिशा में सकारात्मक प्रयास कर रहे हैं। वे बच्चों और युवाओं को सुरक्षित और पर्यावरण-संवेदनशील पतंगबाज़ी के लिए प्रेरित कर रहे हैं। स्कूलों और सामाजिक मंचों पर जागरूकता अभियान चलाए जा रहे हैं, ताकि परंपरा और प्रकृति के बीच संतुलन बना रहे।
बदलते समय के साथ पतंगबाज़ी का स्वरूप भी बदल रहा है। अब यह केवल छतों तक सीमित नहीं रही। सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म ने इसे एक वैश्विक पहचान दी है। पतंग महोत्सवों की तस्वीरें और वीडियो दुनिया भर में साझा किए जा रहे हैं। विदेशों में बसे भारतीय समुदाय भी मकर संक्रांति के अवसर पर पतंग उत्सव आयोजित कर अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़े रहते हैं।
यह परिवर्तन दर्शाता है कि परंपराएँ स्थिर नहीं होतीं, वे समय के साथ स्वयं को ढालती हैं। पतंगबाज़ी भी इसी परिवर्तन का उदाहरण है, जहाँ परंपरा, मनोरंजन, स्वास्थ्य और आधुनिकता एक साथ उड़ान भरते हैं। यह पर्व हमें सिखाता है कि आनंद और जिम्मेदारी एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं।
अंततः, मकर संक्रांति और उससे जुड़ी पतंगबाज़ी केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि जीवन को उत्सव की तरह देखने का दृष्टिकोण है। यह हमें सामूहिकता, संतुलन और आनंद का महत्व समझाती है। जब हम परंपरा को समझदारी और जिम्मेदारी के साथ अपनाते हैं, तो वह अतीत की स्मृति भर नहीं रहती, बल्कि वर्तमान और भविष्य की प्रेरणा बन जाती है। आसमान में उड़ती पतंगें हमें यही संदेश देती हैं कि सीमाएँ केवल ज़मीन पर होती हैं, सपनों के लिए आकाश हमेशा खुला रहता है—बस डोर थामने का हुनर और संतुलन बनाए रखने की समझ होनी चाहिए।
  (डॉ. सत्यवान सौरभ, पीएचडी (राजनीति विज्ञान), कवि एवं सामाजिक चिंतक हैं।)
— डॉ. सत्यवान सौरभ
(पी-एच.डी., राजनीति विज्ञान | कवि, लेखक एवं सामाजिक चिंतक)
पत्राचार पता:
333, परी वाटिका, कौशल्या भवन,
बरवा, हिसार–भिवानी (हरियाणा) – 127045
(मो.) 01255-281381 (वार्ता)
(मो.) 94665-26148 (वार्ता+वाट्स एप)
———————————————————–
Dr. Satywan Saurabh
Research Scholar in Political Science, Delhi University
333,Pari Vatika, Kaushalya Bhawan,
Barwa, Hisar-Bhiwani (Haryana)-127045
Contact- 94665-26148, 01255281381