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हिमालयी महाकुंभ
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उत्तराखंड
की नंदा राजजात यात्रा अब अगले साल होगी !
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भूपत सिंह बिष्ट
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Tags: Nanda Rajjat yatra, Lord karjon
Trail, Bedni Bugyal, Roopkund, Trishul
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river, village Band, BJP MLA Ajai Bhatt,
Dhari Devi Mndir shifting, Bdhand area
in Chamouly, Raj Rajeshvory Devi, Jagar, |
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Publised
on : 22 Aug 2013, Time: 23:35
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29
अगस्त से प्रस्तावित श्री नंदा राजजात
यात्रा का कार्यक्रम अब अगले साल के लिये
टाल दिया गया है। नंदाराजजात समिति के
अध्यक्ष डा0 राकेश कुंवर की इस घोशणा के
बाद उत्तराखंड राज्य की पतली हालात और
बेबस सरकार की मजबूरी जग - जाहिर हुई है।
पर्यटन मंत्री अमृता रावत निरंतर इस यात्रा
को टालने की गुजारिश आयोजन समिति से कर रही
थी।
मान्यताओं के अनुसार नंदा राजजात का आयोजन
हजार साल पुराना है। प्रत्येक बारह साल के
अंतराल से आयोजित होने वाली इस यात्रा का
पिछला आयोजन 2000 और उससे पहले 1987 में
हुआ था। उत्तराखंड राज्य बनने के बाद पहली
बार आयोजित होने वाले इस हिमालयी महाकुंभ
में गढ़वाल और कुमायूं की सांस्कृतिक एकता
की झलक है।
दूसरी ओर सरकार का मुखिया या दल की बागडोर
संभालने के लिये गढ़वाल और कुमायूं के
नेताओं के बीच संघर्ष सभी दलों में नज़र आता
है। नंदा राजजात जैसे आयोजनों से आम
जनमानस के बीच दोनों मंडलों की दूरी कम हो
सकती है। 16 - 17 जून को आयी जल आपदा से
उत्तराखंड का ना उभर पाना नेताऔर
प्रशासनिक अधिकारियों की कार्यकुशलता पर
संदेह पैदा करता है ।
इस यात्रा में शामिल होने का इंतजार पिछले
12 सालों से हजारों प्रवासी उत्तराखंडियों
और सभी प्रातों के हिमालय प्रेमियों को
था। लार्ड कर्ज़न ट्रेल के नाम से विश्व
विख्यात इस परिपथ पर बेदनी बुग्याल और
रुपकुंड जैसे अंतरराश्ट्रीय पर्यटन स्थल
हैं। चार सींग वाले भेड़ के नेतृत्व में
होने वाली नंदा राजजात मां नंदा देवी को
मायके से ससुराल भेजने की परंपरा है और यह
यात्रा 17 हजार फिट की दुर्गम चढ़ाई के बाद
हिमालय के त्रिशूल पर्वत के आधार पर स्थित
ग्लेशियर में समाप्त होती है।
राकेश कुंवर ने जानकारी दी कि तय मुहूर्त
के बाद यात्रा स्थगन का अप्रिय निर्णय सबकी
सलाह से लिया गया है। इस निणर्य में कुमायूं
राजजात और यात्रा पड़ाव की व्यवस्था से जुड़े
सहयोगियों की राय एकमत थी। सरकार
क्षतिग्रस्त राजमार्गों को नही खोल पायी
है। विषेशकर पिंडर नदी पर मार्ग और पुल
ध्वस्त हुए हैं। अंतिम गांव बाण के आगे जहां
यात्रा निर्जन पड़ावों से गुजरती है, वहां
पुल और मार्ग बह गये हैं। नंदा राजजात में
शामिल होने वाली प्रमुख दशमद्वार और दशोली
की डोलियों के पड़ाव में अति वृष्टि
से दर्जनों भवनों को हानि हुई है ।
उत्तराखंड राज्य के नेता प्रतिपक्ष और
भाजपा विधायक अजय भट्ट नंदा राजजात टालने
के पक्ष में नही है। सरकार के प्रभाव में
आकर सदियों पुरानी परपंरा को तोड़ना देवभूमि
के लिये दुर्भाग्य जनक हो सकता है। पहले
ही धारी देवी मंदिर का विस्थापन, केदारनाथ
धाम के कपाट खोलने में मुहूर्त की अनदेखी
और जून माह में केदारनाथ धाम की पूजा को
बाधित करने वाले आंदोलनों से राज्य को भारी
दैवीय आपदा का शिकार होना पड़ा है।
नंदा राजजातः एक परिचय !
श्री
नंदा राजजात 280 किमी लम्बी 19 पड़ावों के
बीच 17 हजार फिट की दुर्गम चढ़ाई वाली
विश्व की प्रमुख पद यात्रा है जो
उत्तराखंड राज्य के बधाण क्षेत्र चमोली
जनपद में स्थित त्रिशूल पर्वत शिखर के
आधार शिविर पर संपन्न होती है। उत्तराखंड
के दोनों मंडल गढ़वाल और कुमायूं में एक सी
मान्यता के अनुसार मां नंदा देवी के साथ
बहिन और बेटी के पवित्र रिश्ते को निभाते
हुए मायके से ससुराल विदायी का संकल्प है
- नंदा राजजात।
नंदा देवी को राज राजेश्वरी भी कहते है।
गढ़वाल और कुमायूं के राजाओं की इष्ट देवी
होने के कारण नंदा देवी को राज राजेश्वरी
और यात्रा को नंदा राजजात का संबोधन मिला।
आज नंदा देवी पूरे उत्तराखंड की अराध्य
इष्ट देवी है। नंदा देवी की स्तुति में
गाये जाने वाले जागर और गीत उत्तराखंड की
सांस्कृतिक एकता का अनुपम उदाहरण है।
गढ़वाल व कुमायूं मंडल में नंदा देवी के सभी
सिद्धपीठ इस राजजात में अपनी उपस्थिति
दर्ज़ कराते हैं। डोली और छतौली में नंदा
देवी की प्राण प्रतिष्ठा कर राजजात में
इन्हें शामिल किया जाता है। छतौली भोज
पत्रों से बनायी जाने वाली मजबूत छतरी है
जिस पर बारिश और बर्फ का असर नही होता है।
राजजात की अगुवायी एक चार सींग वाला भेड़
करता है। मान्यता है कि नंदा देवी के इस
प्रतिनिधि को कैलाश का रास्ता मालूम होता
है। पूजा - अर्चना के बाद श्रृंगार और नंदा
देवी को दिये जाने वाले उपहार इसी भेड़ के
माध्यम से अर्पित होते हैं।
उत्तराखंड के राजा नंदा राजजात के आयोजन
से अपने राज्य की खुशहाली, आपदा से बचाव
और दैवीय वरदान की कामना करते थे। राजजात
मार्ग पर पूजनीय प्रतिमायें दसवीं सदी से
पहले की बतायी जाती हैं। 15 हजार फिट पर
मौजूद रुपकुंड में नर कंकालों की उपस्थिति
रहस्य भरी है। ज्यूरागली 17 हजार फिट की
ऊंचाई को पारकर दूसरी ओर तीव्र ढलान पर
सीला समुद्र और होमकुंड समुद्र तल से 13
हजार फिट पर हैं। होमकुंड में हवन - आहुति
देकर भेड़ को त्रिशूल पर्वत पर छोड़ देते
हैं। राजजात अब लाटा खोपड़ी, सितेल होते
हुए घाट और फिर बद्रीनाथधाम मार्ग पर
नंदप्रयाग लौटती है।

नंदा राजजात का आयोजन 12 सालों के बाद होता
है। किंतु दुर्गम यात्रा होने के कारण इस
की निरंतरता के लिखित प्रमाण नही है। 1987
में सुरेंद्र सिंह पांगती आईएएस ने इस
यात्रा को व्यवस्थित करने का प्रयास किया।
इसके बाद 2000 में राजजात का आयोजन हुआ
था। इस यात्रा में परम्पराओं को तोड़कर
महिलायें भी शामिल हुई। बेदनी बुग्याल से
आगे राजजात में महिलाओं की भागीदारी को
निषिद्ध बताया जाता है। अंतिम गांव बाण के
बाद आवास, संचार और चिकित्सा की कोई
सुविधायें उपलब्ध नही है। अगले चार पड़ाव
और 70 किमी की पैदल यात्रा में मां नंदा
देवी का आशीर्वाद रहना परम आवश्यक
है।
12 साल बाद होने वाली यात्रा का आयोजन 13
वें साल में होने का कारण राकेश कुंवर (राजजात
समिति के अध्यक्ष हैं ) कहते हैं कि हिंदु
मान्यताओं के अनुसार पंचांग दोष लगने के
कारण ऐसा होता है। राजजात का मुहूर्त बसंत
पचंमी को पूरे विधि विधान से तय किया जाता
है। यात्रा का प्रारंभ नंदा अष्टमी को होता
है। नंदा राजजात समिति के अध्यक्ष डा0
राकेश कुंवर केंद्रीय विश्व विद्यालय
श्रीनगर गढ़वाल में मिलेट्री सांइस के
प्रोफेसर हैं।

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News
source: U.P.Samachar Sewa |
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upsamacharsewa@gmail.com
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