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  Agriculture  
 
Bio-Tech: बेकार आलू से बन सकता है अल्कोहल

Tags: Faculty of Engineering & Technology, R.B.S. Technical campus Bichpuri

Publised on : 08April 2012, Time: 23:11

Agra, 08 April 2012, UP  Samachar Sewa, Web News LIVE.  आगरा। बायो टेक्नोलाजी के सही प्रयोग से अब किसानों की माली हालत सुधर सकती है। यूपी में अदिक उत्पादन के बावजूद अच्छी आय नहीं देने वाला आलू अब किसानों की तकदीर बदल सकता है। यह जानकारी यहां आयोजित एक सेमिनार में दी गई। सेमिनार में आईटी के स्टूडेंट्स ने रिसर्ज पेपर प्रस्तुत करके बताया कि बेकार आलू से अल्कोहल बनाया जा सकता है। ज्ञातब्य है कि आलू की उचित कीमत नहीं मिलने पर अक्सर प्रदेश के किसान खेतों में आलू को फेंक कर सड़ा देते हैं। इससे उनके श्रम और लागत दोनों की हानि होती है। Faculty of Engineering & Technology, R.B.S. Technical campus Bichpuri में आयोजित उक्त सेमिनार में किसानों को नई राह दिखाई गई। सेमिनार का आयोजन Newer Horizons & Innovation in bio technology and bio science विषय पर आधारित था। सेमिनार मं खाद्य प्रसंस्करण में एंजाइम के उपयोग, सूक्ष्म जीवों का प्रयोग, टी.बी का नया टीका विकसित करने, नैनो बायोटेक्नोलाजी का उपोयग मिट्टी से एंजाइम बनाने के शोध पत्र प्रस्तुत किये गए। इसके साथ ही अच्छे और बेकार दोनों प्रकार के आलू से अल्कोहल का निर्माण करने संबंधी शोध पत्र प्रस्तुत हुए। आयोजन सचिव डा. बीके श्रीवास्तव ने बताया कि संगोष्ठी में 53 शोध पत्र पढ़े गए और 115 शोध पत्र पोस्टर के माध्यम से प्रस्तुत किए गए।संगोष्ठी के समापन पर संस्थान के निदेशक डा. अखंड प्रताप सिंह ने कार्यकारी सदस्यों को स्मृति चिन्ह भेंटकर सम्मानित किया।

खेती की जमीन की बिक्री पर इनकम टैक्स नहीं
-सुभाष लखोटिया-
Publised on : 29  January  2012       Time  23:24

आयकर कानून के अंतर्गत किसी भी कैपिटल एसेट की बिक्री से हुए पूंजीगत लाभ पर कर का भुगतान करना पड़ता है। हालांकि कुछ निश्चित तथ्यों और परिस्थितियों के तहत देश में कृषि भूमि को कैपिटल एसेट नहीं माना जाता है। आयकर कानून की धारा 2(14) में इसका विस्तार से उल्लेख किया गया है। इसके तहत यदि ऐसी कोई वस्तु जिसकी बिक्री की गई है और उसकी गणना कैपिटल एसेट के रूप में नहीं की गई है, तो बिक्री से हुआ लाभ आयकर के दायरे में नहीं आएगा।

दीर्घ अवधि का पूंजीगत लाभ शून्य
सीआईटी बनाम लाल सिंह व अन्य (325 आईटीआर 588) मामले में आकलन वर्ष 1996-97 के संदर्भ में वित्त वर्ष 1995-96 के दौरान स्व. पुष्पा देवी पत्नी जगलाल ने फैजिलपुर गांव स्थित अपनी कृषि भूमि 89,75,000 रुपये में बेची। उनकी मौत के बाद आयकर विभाग ने धारा 148 के तहत उनके वारिसों को नोटिस भेजा। जवाब में वारिसों द्वारा कुल 37,000 रुपये कर योग्य आय पर रिटर्न दाखिल किया गया। रिटर्न में दीर्घ अवधि का पूंजीगत लाभ शून्य दिखाया गया।

सीमा से आठ किमी दायरे से बाहर
इसमें दावा किया गया कि करदाता ने कृषि भूमि की खरीद-बिक्री की है और यह आयकर कानून की धारा 2(14)(3) के तहत कैपिटल एसेट की श्रेणी में नहीं है। इसके पक्ष में करदाता ने तहसीलदार का प्रमाणपत्र प्रस्तुत किया। इसमें कहा गया कि संबंधित व्यक्ति की जमीन नगर पालिका की सीमा से आठ किमी दायरे से बाहर है। आयकर अधिकारी ने इस रिपोर्ट को मानने से इनकार कर दिया और अपने निरीक्षक की रिपोर्ट को संज्ञान में लेते हुए 86,65,900 रुपये पर पूंजीगत लाभ की गणना के आदेश दिए। मामला आयकर कमिश्नर (अपील) के समक्ष गया।

सीआईटी (अपील) के निर्णय को उचित ठहराया
कमिश्नर ने कहा कि यदि कर आकलन अधिकारी तहसीलदार की रिपोर्ट को नहीं मानते हैं तो कुछ पुख्ता कारण रखने चाहिए और तहसीलदार के ऊपर के अधिकारियों को इसकी पैमाइश के लिए कहना चाहिए था। इनकम टैक्स अपीलेट ट्रिब्यूनल ने भी सीआईटी (अपील) के निर्णय को उचित ठहराया। मामला पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट में गया। कोर्ट ने तहसीलदार की रिपोर्ट को सही माना और कहा कि करदाता की जमीन नगरपालिका की सीमा से बाहर है और उसकी बिक्री से प्राप्त राशि को पूंजीगत लाभ के रूप में नहीं माना जाए।

(साभारः अमर उजाला डाट काम)

चीनी मिलों की बिक्री से 6 सौ करोड़ का सरकारी नुकसान
सीएजी रिपोर्ट में पोंटी चढ्ढा को मिलें बेचने के गोरखधंधे का खुलासा
-जे.पी.सिंह-
Publised on : 29  January  2012       Time  23:24

इलाहाबाद। भारत के नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक(सीएजी)की रिपोर्ट में कहा गया है कि जिन 35 चीनी मिलों को बसपा सरकार ने औने-पौने दामों में बेचकर सरकारी खजाने को हजारों करोड़ का चूना लगाया, उनकी मूल्यांकन प्रक्रिया अत्यंत त्रुटिपूर्ण थी। यह मूल्यांकन प्रक्रिया विभिन्न चीनी मिलों की संपत्तियों को भी चीनी मिलों के साथ खरीदारों को भारी एवं अनुचित लाभ देने के उद्देश्य से बनाई गई थी। दरअसल यह सारा खेल मायावती सरकार के चहेते शराब माफिया पोंटी चड्ढा ग्रुप को लाभ पहुंचाने के लिए खेला गया। यहां तक कि कर काटने के बाद भी फायदे में चल रही तीन चीनी मिलों बिजनौर, बुलंदशहर एवं चांदपुर को बेच दिया गया।

सीएजी की रिपोर्ट के अनुसार उत्तर प्रदेश सरकार ने चीनी मिलों की बिक्री में केन्द्र सरकार द्वारा निर्धारित विनिवेश नीति का उल्लंघन किया। चीनी मिलों की भूमि के अलावा संयंत्र, मशीनरी व फैक्ट्री के भवनों, चीनी गोदामों के साथ रिहायशी आवासों और अन्य अचल संपत्तियों के मूल्यांकन में भारी धांधली की गई। मूल्यांकन में बिना कारण बताए भूमि के मूल्य में और भवनों में 25 प्रतिशत की छूट दी गई। सर्किल रेट को अनदेखा करने के कारण स्टांप ड्यूटी में चोरी से 600 करोड़ से अधिक की क्षति हुई।

जरवलरोड, सहारनपुर एवं सिसवां बाजार चीनी मिलों ने 2008-09 में तथा खड्डा चीनी मिल ने वर्ष 2009-10 में लाभ अर्जित किया था लेकिन इन्हें भी बेच दिया गया। इसके बावजूद संयंत्र चीनी मिलों की मशीनरी और संयंत्रों का स्क्रैप के रूप में मूल्यांकन किया गया। यह भी नहीं बताया गया कि इन चीनी मिलों के संयंत्र एवं मशीनरी को किस आधार पर स्क्रैप मानकर मूल्यांकन किया गया। दस चीनी मिलों की अनुमानित कीमत के बदले इनके संयंत्र और मशीनरी को स्क्रैप में रूप में मूल्यांकन करने से 82.08 करोड़ की क्षति हुई।

अमरोहा की चीनी मिल जिसकी प्रतिदिन उत्पादन क्षमता 3000 टन की है, वह वेब लिमिटेड को 17.10 करोड़ में बेची गई जबकि उस मील के अंदर रखी चीनी व शीरा का मूल्य ही 13.64 करोड़ का था। इस तरह 30.4 एकड़ जमीन तथा चल-अचल सम्पत्ति का निर्धारण केवल 4.07 करोड़ रुपए ही आंका गया। अमरोहा चीनी मिल शहर में स्थित है, उसका क्षेत्रफल 76 एकड़ है जिसमें 4 बड़े बंगले, 6 कालोनियां और 20 अन्य क्वाटर्स हैं। डीएम सर्किल रेट के अनुसार केवल जमीन का दाम 250 करोड़ रुपया है।

जनपद बिजनौर की चीनी मिल जो 84 एकड़ क्षेत्रफल में है, उसको पीबीएस फूड्स लिमिटेड को मात्र 101 करोड़ में बेच दिया गया। चीनी मिल के अंदर रखे सामान की कीमत ही 71.38 करोड़ रुपए आंकी गई थी। इसका मतलब जमीन और बाकी शेष चीजों का दाम 10.5 करोड़ ही लगाया गया। जनपद बहराइच के जरवल रोड स्थित चीनी मिल जो 94 एकड़ क्षेत्रफल में फैली है, जो इंडियन पोटास लिमिटेड को मात्र 26.95 करोड़ रुपए में बेच दी गई। मिल के अंदर रखी चीनी और शीरा का दाम ही केवल 32.05 करोड़ रुपए निकलता। इसका मतलब यह हुआ कि जमीन और बाकी शेष कीमती सामान आदि और 5.0 करोड़ रुपया लगभग मुफ्त उपहार स्वरूप दे दिया गया। बरेली, देवरिया, बाराबंकी, हरदोई की बंद पड़ी चीनी मिलें भी औने-पौने दामों में बेच दी गईं।

चीनी निगम की बिड़वी चीनी मिल 35 करोड़ में बेच दी गई, जबकि इसकी अनुमानित कीमत 503 करोड़ थी। इसी तरह कुशीनगर को खड्डा इकाई को 22 करोड़ में बेचा गया, जबकि अनुमानित कीमत 175 करोड़ थी। बुलंदशहर की चीनी मिल 29 करोड़ में बेची गई, जबकि इसकी अनुमानित कीमत 175 करोड़ थी। इसी तरह रोहनकला, सरवती तंडा, सिसवा बाजार, चांदपुर और मेरठ की चीनी मिलें औने-पौने दामों में बेच दी गई हैं। नेकपुर की चीनी मिल को 14 करोड़ में बेचा गया, जबकि सर्किल दर के अनुसार इसकी कीमत 145 करोड़ है। इसमें स्क्रैप ही 50 करोड़ का था। लगभब 41 एकड़ क्षेत्र में फैली घुगली चीनी मिल की कीमत 100 करोड़ से ज्यादा है, इसे मात्र पौने चार करोड़ में बेचा गया। (साभारः डीएनए)

बायोफर्टिलाइजर से सुधर रही है कृषि भूमिः डा.ब्रह्मचारी
एनबीआरआई की योजना से सुधऱेगी किसानों की हालत
Publised on : 11 November  2011       Time 22:40 

Lucknow, 11  November 2011 (U.P.Samachar Sewa) लखनऊ, 11 नवंबर।(उप्रससे)। वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद् (सीएसआईआर) के के महानिदेशक डा. समीर ब्रह्मचारी ने कहा है कि बायोफर्टिलाइजर के उपयोग से कृषि भूमि में सुधार हो रहा है। इस कार्यक्रम को आगे भी रखा जाएगा। डा.ब्रह्मचारी आज यहां राष्ट्रीय वनस्पति अनुसंधान संस्थान (एनबीआरआई) द्वारा तैयार संरक्षणशाला के उद्घाटन अवसर पर विचार व्यक्त कर रहे थे। उन्होंने कहा कि यह संरक्षणशाला शोधार्थियों व विद्यार्थियों के उपयोगी साबित होगी। उन्होंने आगे कहा कि डा.सी.एस.नौटियाल ने 12 वीं पंचवर्षीय योजना के तहत कृषि भूमि के लिये जो योजना तैयार की है। उससे लघु एवं सीमांत किसानों के सामाजिक, आर्थिक स्तर को ऊंचा उठाने मे मदद मिलेगी। इस अवसर पर एनबीआरआई के निदेशक डा.सी.एस.नौटियाल भी मौजूद थे।

सीएसआईआर महानिदेशक ने आगे कहा कि हम इस मामले में धनी हैं कि हमारे पास एनबीआरआई जैसा संस्थान और उद्यान है। कार्यक्रम में संरक्षणशाला के बारे में जानकारी देते हुए डा.ए.के.गोयल ने बताया कि यहां साइकेड की बहुमूल्य प्रजातियां संरक्षित की गई हैं। जिनका अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर व्यापार प्रतिबंधित है।

अब मुरादाबाद के किसानों को उजाडने की तैयारी
Tags: Moradabad Farmers, MDA, Agriculture land acqisition in Pakbara village of district Moradabad
Publised on : 2011:06:14       Time 09:43                     Update on  2011:06:14      Time 09:43

-मायावती सरकार ने जारी की 5 सौ एकड़ उपजाऊ भूमि के अधिग्रहण के लिए अधिसूचना
- प्रभावित होंगे एक हजार किसान परिवार, अधिकांश लघु और सीमांत किसान
- नया मुरादाबाद का पहला फेस विकसित नहीं दूसरे के लिए अधिग्रहण
मुरादाबाद, 14 जून। (उ.प्र.समाचार सेवा ब्यूरो)। भूमि अधिग्रहण और किसान उत्पीड़न को लेकर आलोचना झेल रही मायावती सरकार ने अब यहां की खेती पर ग्रहण लगा दिया है। खेती किसानी की चिंता किये बगैर सरकार के निर्देश पर मुरादाबाद विकास प्राधिकरण ने जिले के किसानों को तबाह करने की तैयारी कर ली है। प्राधिकरण जिले की सदर तहसील में 500 एकड़ कृषि भूमि अधिग्रहण करने जा रह  है। किसानों से सहमति लिये बगैर शासन ने धारा चार की कार्रवाई करके अधिसूचना जारी कर दी है। इससे जिले के किसानों में आक्रोश है। किसान अधिग्रहण के खिलाफ बड़े आन्दोलन की तैयारी कर रहे हैं।
मुरादाबाद विकास प्राधिकरण ने नया मुरादाबाद योजना के फेज दो के लिए सदर तहसील की ग्राम सभा पाकबड़ा की 497.10 एकड़ खेती की जमीन अधिग्रहण करने के लिए शासन को गुपचुप तरीके से प्रस्ताव भेज दिया था। इस प्रस्ताव को भेजने से पहले न तो किसानों से सहमति ली गई और न ही कोई सार्वजनिक सूचना जारी की गई। इस प्रस्ताव के आधार पर उ.प्र.सरकार के आवास एवं शहरी नियोजन अनुभाग-3 ने विज्ञप्ति संख्या 5529 8-3-2010-35 एल.ए. 2010 दिनांक 18 जनवरी 2011 का विज्ञापन 5 जून 2011 को अमर उजाला के मुरादाबाद संस्करण में प्रकाशित करा दिया है। इस विज्ञापन के अनुसार ग्राम सभा पाकबड़ा की समस्त कृषि भूमि का अधिग्रहण किया गया है। शासन ने अपनी विज्ञप्ति में उल्लेख किया है कि शहर के सुनियोजित आवासीय विकास योजना के लिए भूमि अधिग्रहीत की जा रही है। कृषि भूमि का अधिग्रहण भूमि अर्जन अधिनियम 1894 की धारा -4 की उपधारा (1) के अधीन किया गया है। इस अधिग्रहण से ग्राम सभा के करीब एक हजार किसान परिवार प्रभावित हो रहे हैं।
अधिग्रहण के संबंध में मुरादाबाद विकास प्राधिकरण और आवास एंव शहरी नियोजन विभाग ने गलत तथ्य प्रस्तुत किये हैं। इनका कहना है कि मुरादाबाद में आवासीय योजना के लिए भूमि की आवश्यकता है। जबकि नया मुरादाबाद योजना के पहले चरण के लिए अधिग्रहीत की गई करीब पांच सौ एकड़ जमीन अभी तक न तो विकसित की गई है और न ही इस पर आवास बने हैं। पूरा नया मुरादाबाद खाली पड़ा है। कई सेक्टर ऐसे हैं जिनका अभी तक एमडीए विक्रय भी नहीं कर सका है। हां इतना अवश्य है कि एमडीए ने कुछ दिल्ली के नामचीन बिल्डर्स को इस योजना की प्राइम लैंड बेच दी, जोकि दिल्ली रोड पर थी। किसानों की जमीन बिल्डस को बेचकर प्राधिकरण भारी मुनापा कमाया। इस पर बिल्डर्स फ्लैट बनाकर मोटी कमाई करने की तैयारी मै है। बस्तुत: मुरादाबाद में लोगों की आवश्यकता उतनी नहीं है जितना प्राधिकरण प्रचारित करता है। यहां लोग आवासीय योजनाओं में धन इंवेस्ट करने के लिए प्लाट लेकर डाल रहे हैं। यदि वास्तव में आवासों की आवश्यकता होती तो अभी तक नया मुरादाबाद आबाद हो जना चाहिए था। एमडीए किसानों से 200 रूपये मीटर जमीन लेकर छह हजार रूपये मीटर बेच कर मुनाफा कमा रहा है। नया मुरादाबाद मे प्राधकरण अभी तक अपनी जमीन बेच भी नहीं सका है कई सेक्टर अभी तक विक्रय का इंतजार कर रहे हैं। ऐसे में यह कहना बेमानी है कि मुरादाबाद में आवासीय प्रयोजन के लिए पांच सौ एकड़ और भूमि की आवश्यकता है।
यहां यही हाल आवास एवं विकास परिषद् की योजनाओं का है। दिल्ली रोड पर ही आवास विकास की बुद्दि विहार फेज दो और तीन के लिए भी भूमि अधिग्रहीत की गई है। यह जमीन भी अभी तक आवासीय प्रयोजन के लिए आबंटित नहीं हो सकी है। इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि मुरादाबाद में अभी नया मुरादाबाद योजना दो के लिए भूमि अ्धिक्हण की आवश्यकता नहीं थी। लेकिन एमडीए ने हठधर्मी का परिचय देते हुए अधिग्रहण की कार्रवाई शुरु करा दी है। इससे स्थानीय किसानों मे ंआक्रोश पनप रहा है। संघर्ष समिति बनाकर किसान आन्दोलन की तैयारी कर रहे हैं। वे किसी भी कीमत पर अपनी जमीन देने को तैयार नहीं है। जमीन अधिग्रण की कार्रवाई बलपूर्वक किये जाने पर यहां भी उग्र संषर्ष की आशंका है। हालांकि जिला प्रशासन और प्राधिकरण के अधिकारी किसानों के आक्रोश से बेखबर हैं।
अधिग्रहण उस जमीन का किया जा रहा है जोकि अत्यधिक उपजाऊ है। इसमे किसान तीन फसलें लेते हैं। अधिकांश किसान लघु और सीमांत जोत के हैं। यह समस्त कृषि भूमि सब्जी पट्टी है। यहां सब्जियों का उत्पादन होता है जिससे मुरादाबाद नगर की सब्जी की आवश्यकता की पूर्ति होती है। इस भूमि के अधिग्रहीत होने से करीब एक हजार किसान परिवार भूमिहीन हो जाएंगे। इनके सामने रोजी रोटी का संकट खड़ा हो जाएगा। लेकिन मुरादाबाद विकास प्राधिकरण ने जमीन अधिग्रहण के लिए प्रस्ताव तैयार करने से पहले इस तथ्य को कतई भी ध्यान में नहीं रखा कि छोटे किसान परिवार कहां जाएंगे। प्रभावित होने वाले किसान पारिवारों में बहुतायत सैनी जाति की है। विधान सभा में इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व भी सैनी जाति का व्यक्ति ही करता है। यहां से गत चुनाव में सत्तारूढ़ बसपा ने जीत दर्ज की थी।
कृषि अधिग्रहण उसी केन्द्रीय भूमि अधिग्रहण कानून 1894 के तहत किया जा रहा है जिसे केन्द्र सरकार संशोधित करने जा रही है। केन्द्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय ने अभी हाल में जारी एक वक्तव्य में स्पष्ट किया है कि संसद के मानसून सत्र में नया भूमि अधिग्रहण एवं पुनर्वास अधिनियम पारित कराया जाएगा। लेकिन प्रदेश सरकार ने इस अधिनियम के संशोधन का भी इंतजार नहीं किया और पुराने उसी कानून से अधिग्रहण के लिए अधिसूचना जारी कर दी जिसमें तमाम खामियां हैं। इस कानून की खामियों को लेकर ही जगह-जगह अधिग्रहण से जुडे विवाद और संघर्ष हो रहे हैं। लेकिन प्रदेश सरकार किसी भी घटना से सबक लेने को तेयार नहीं है।

summary: Moradabad Devlopment Aauthority (MDA) is going to start acqisition of 500 acare agriculture land in Pakbara village situated on Delhi-Lucknow National Highway NH 24, Farmer reddy to agitation

 
 
   
 
 
                               
 
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