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सुप्रीम कोर्ट जाना भाजपा की दूसरी बडी भूल होगी
केंद्र की किरकिरी: उत्तराखण्ड में राष्ट्रपति शासन निरस्त
उत्तराखण्ड संकट: भूपत सिंह बिष्ट का विश्लेषण
Publised on : 21 April 2016,  Last updated Time 23:19
देहरादून. नैनीताल हाइकोर्ट ने राष्ट्रपति शासन निरस्त कर हरीश रावत को फिर से बहुमत साबित करने का अवसर दिया !
उत्तराखंड हाईकोर्ट की खंडपीठ के निर्णय ने राष्ट्रपति शासन को असंवैधानिक करार देते हुए हरीश रावत सरकार को 29 अप्रैल को विधानसभा में अपना बहुमत साबित करने का अवसर दिया है । मुख्य न्यायाधीश केएम जोसेफ और न्यायाधीश वीके बिष्ट की खंडपीठ ने रिकार्ड समय में लोकतंत्र की बहाली वाले इस मामले की सुनवाई पूरी करके इतिहास रच दिया है।
यह निर्णय केंद्र सरकार के खिलाफ एक कड़ी नज़ीर के रुप में याद किया जायेगा - जहां कोर्ट ने केंद्र सरकार को लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गयी सरकार को धारा 356 का प्रयोग करके अपदस्त करने के निर्णय को अवैध करार दिया। बहस के दौरान जहां केंद्र सरकार के वकील यह तर्क देते रहे कि राष्ट्रपति के निर्णय को चुनौती देने के लिये हाईकोर्ट सक्षम नही है। वहीं कोर्ट ने राष्ट्रपति के फैसले का कानूनी मूल्यांकन उच्च न्यायालय के दायरे में माना और केंद्र सरकार के वकीलों की टिप्पणी पर यह प्रतिक्रिया जाहिर भी की कि राष्ट्रपति कोई राजा नही है कि उन के फैसलों को लोकतंत्र में चुनौती ना दी जा सके और सरकार के फैसलों को संविधान की कसौटी में आंकना उच्च न्यायालयों का महति दायित्व है।
खंडपीठ ने अपनी सुनवायी में यह भी स्पष्ट कर दिया कि केंद्र सरकार को लोकतांत्रिक सरकार को अपदस्त करने से पहले पूरी परिस्थितियों का अघ्ययन करने के लिये सभी परिस्थितियों का भली भांति आंकलन करना चाहिये। उल्लेखनीय है कि राज्यपाल ने हरीश रावत सरकार को 28 मार्च को अपना बहुमत साबित करने के लिये समय दिया था और केंद्र सरकार ने चौबीस घंटे पहले सरकार को अपदस्त कर राष्ट्रपति साशन लागू कर दिया था। कांग्रेस की ओर से वरीष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल और अभिषेक मनु सिंघवी ने दलील दी और केंद्र सरकार की ओर से अटार्नी जनरल मुकुल रोहतगी और हरीश साल्वे ने तर्क पेश किये थे।
भाजपाशासित कंेद्र सरकार अब कांग्रेस के बागी विधायकों के पक्ष में सुप्रीम कोर्ट का रुख करने जा रही है जो एक और भूल साबित हो सकती है। अगर यह मामला सुप्रीम कोर्ट में कुछ समय और खिंच गया तो उत्तराखंड की कांग्रेस सरकार को अपनी असफलता ढकने का और समय मिल जायेगा। जहां 2017 में होने वाले चुनाव में हरीश रावत के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार अपने बोझ से ही ढह रही थी। वहीं अब भाजपा का कांग्रेस के बागी और दागी विधायकों के पक्ष में खड़े होना कुछ नेताओं द्वारा अपने हाईकमान को गुमराह करने वाली सलाह के रुप में देखा जा रहा है। अगर आज भगत सिंह कोशियारी नई सरकार का नेतृत्व करते हैं तो पिछली सरकार की सारी नाकामियां इस चुनावी साल में भाजपा को भुगतनी पड़ सकती हैं।
अगर बागी विधायकों की सदस्यता निरस्त होती है और इन नौ सीटों पर पुनः चुनाव होते हैं तो भाजपा को हरीश रावत की शक्ति जांचने का एक अवसर 2017 के चुनाव से मिलने वाला है और भाजपा संगठन को इस चुनौती को स्वीकार करके जनता के बीच में कांग्रेस की फूट को भुनाना चाहिये ना कि बागी और दागी कांग्रेसी नेताओं की पैरोकारी कर के अपनी छवि खराब करनी चाहिये। फिलहाल जो भाजपा और कांग्रेस की जन रैलियां प्रदेश में चल रही हैं उसमें हरीश रावत सहानुभूति बटोरते नज़र आते हैं।

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News source: UP Samachar Sewa

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