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कौशाम्बी
30
मार्च।
देश
की
सभी
लोकसभा
सीटो
के
साथ
कौशाम्बी
की
सीट
पर
चुनाव
का
घमासान
शुरू
हो
चुका
है
,
पर
कौशाम्बी
की
लोकसभा
सीट
में
महिलाओ
को
प्रतिनिधित्व
न
दिए
जाने
से
कौशाम्बी
की
आधी
आबादी
अब
इस
लोकसभा
चुनाव
में
बड़ी
राजनैतिक
पार्टियो
से
अपने
बीच
महिला
उम्मीदवार
उतारने
की
मांग
कर
रही
है
।
समाजसेवा
में
लगी
महिला
नेता
भी
महिलाओ
की
आवाज
उठाने
के
लिए
कमर
कस
कर
तैयार
खड़ी
है
।
कौशाम्बी
की
महिलाओ
ने
लोकसभा
चुनाव
में
इस
बार
प्रण
किया
है
कि
यदि
इस
लोकसभा
सीट
में
महिला
हितो
की
उपेक्षा
वह
कतई
बर्दास्त
नहीं
करेगी
,
और
अपने
बीच
की
महिला
उम्मीदवार
को
वह
खुद
समर्थन
देकर
महिला
नेता
को
ही
चुनाव
में
अपना
बहुमूल्य
वोट
देगी
।
कौशाम्बी
की
महिलाओ
का
यह
साहस
देख
बड़ी
राजनैतिक
पार्टियो
के
उम्मीदवारो
के
पसीने
छूट
रहे
है।
कौशाम्बी
जिले
में
यह
खँडहर
नुमा
इमारत
में
कभी
रहने
वाली
एक
महिला
ने
अग्रेजी
शासन
की
जड़े
हिलाकर
कौशाम्बी
की
महिला
शक्ति
का
लोहा
पूरे
देश
में
मनवाया
,
लेकिन
समय
के
थपेड़ो
के
साथ
ही
लगातार
उपेक्षा
के
दीमक
ने
आजादी
की
वीरांगना
दुर्गा
भाभी
के
आशियाने
की
तरह
यहाँ
की
महिला
शक्ति
को
भी
कमजोर
कर
दिया
।
आजाद
भारत
में
कौशाम्बी
की
इस
लोक
सभा
सीट
से
बड़ी
राजनैतिक
पार्टियो
ने
कभी
भी
महिला
शक्ति
को
लोकसभा
में
महिला
प्रतिनिधित्व
की
दावेदारी
सौपने
की
कोशिश
नहीं
की
।
कौशाम्बी
की
राजनीती
को
समझने
वाले
विश्लेषक
इस
बात
को
स्वीकार
तो
करते
है
,पर
महिला
को
लोकसभा
के
कौशाम्बी
का
प्रतिनिधित्व
न
सौपे
जाने
के
कारणो
पर
मौन
साध
लेते
है।
लोकसभा
सीट
50
यानि
कौशाम्बी
जो
पहले
चायल
लोकसभा
सीट
के
नाम
से
जाना
जाता
था
।
यह
सीट
अनुसूचित
जाति
बाहुल्य
होने
के
चलते
सुरक्षित
है
।
साल
1952
से
साल
1989
तक
इस
सीट
पर
कांग्रेस
का
कब्जा
रहा
है
।
इसके
बाद
देश
की
राजनीती
में
बदलाव
का
असर
इस
सीट
पर
दिखा
और
जनता
दल
,
भारतीय
जनता
पार्टी
और
बहुजन
समाज
पार्टी
ने
भी
इस
सीट
पर
अपनी
जीत
दर्ज
की
है
।
साल
1998
व्
2004
से
2009
के
आम
चुनाव
में
समाजवादी
पार्टी
के
उम्मीदवार
ने
अपनी
जीत
दर्ज
की
है
।
आजादी
के
बाद
से
अब
तक
कौशाम्बी
की
इस
सीट
पर
किसी
भी
राजनैतिक
पार्टी
ने
किसी
भी
महिला
उम्मीदवार
को
लोक
सभा
में
कौशाम्बी
की
जनता
के
प्रतिनिधित्व
की
जिम्मेवारी
नहीं
सौपी
।
बदलते
समय
ने
कौशाम्बी
की
महिलाओ
को
अब
अपने
अधिकारो
के
प्रति
सजक
होने
के
साथ
जागरूक
भी
किया
है
।
महिला
अधिकारो
के
लिए
लगातार
संघर्ष
करने
वाली
महिलानेताओ
के
साथ
कौशाम्बी
की
युवा
महिलाओ
ने
भी
एक
सुर
में
अपने
बीच
की
महिला
को
अपना
प्रतिनिधित्व
सौपने
का
मन
बनाया
है
और
पुरुष
उम्मीदवारो
के
स्थान
पर
महिला
उम्मीदवार
को
वोट
देने
की
बात
है
।
महिलाओ
का
कहना
है
कि
पुरुष
उम्मीदवार
के
अपेक्षा
महिला
उम्मीदवार
उनके
दुःख
दर्द
को
बखूबी
समझती
है
।
आम
महिला-
सरिता
देवी,
शहनाज
परवीन
आम
घर
में
चूल्हा
चैका
सभालने
से
लेकर
हर
फिल्ड
में
अपने
हुनर
का
लोहा
मनवा
चुकी
महिला
शक्ति
।
अब
कौशाम्बी
में
भी
अपना
अधिकार
लेने
के
लिए
समय
समय
पर
पुरुषो
के
साथ
कन्धे
से
कन्धा
मिला
कर
खड़ी
दिखाई
पड़ती
है
सभी
बड़ी
राजनैतिक
पार्टियो
के
जनसभाओ
और
प्रदर्शनों
में
महिलाओ
की
संख्या
किसी
भी
मायने
में
पुरुषो
से
कम
नहीं
है
।
बात
अगर
जनसँख्या
की
,
की
जाय
तो
यहाँ
पर
भी
कौशाम्बी
में
महिलाये
पुरुषो
से
कम
पड़ती
।
आकड़ो
के
आधार
पर
जिले
में
894790
पुरुषो
में
809784
महिला
है
।
कौशाम्बी
संसदीय
सीट
के
वोटरो
के
आकड़ो
पर
नजर
डाले
तो
कौशाम्बी
की
आधी
आबादी
की
संख्या
16
लाख
वोटरो
में
7
लाख
के
करीब
है
जिसमे
पुरुष
वोटर
8
लाख
के
करीब
है
।
जनसँख्या
और
वोटरो
के
आकड़ो
में
अपना
दम
जोर
शोर
से
दिखने
वाली
महिला
शक्ति
अब
अपने
लिए
राजनैतिक
प्रतिनिधित्व
का
मुकाम
हासिल
करना
चाहती
है
।
महिला
को
उनका
अधिकार
दिलाने
के
लिए
कौशाम्बी
में
सालो
से
संघर्ष
कर
रही
महिला
नेताओ
का
आरोप
है
कि
देश
की
सत्ता
में
काबिज
कांग्रेस
की
सर्वे
सर्वा
भी
एक
महिला
है
पर
वह
अपनी
पार्टी
में
ही
महिलाओ
को
तैतीस
फीसदी
अधिकारी
नहीं
दे
रही
है
।
इतना
ही
नहीं
दिल्ली
की
कुर्सी
का
सपना
सजोये
भारतीय
जनता
पार्टी
भी
महिलाओ
को
राजनीती
में
उचित
स्थान
नहीं
दे
रही
है
।
महिला
नेता
बीना
रानी,
नेता
पूनम
संत
कौशाम्बी
लोकसभा
सीट
के
भौगोलिक
परिवेश
और
लोगो
की
आर्थिक
हालत
यहाँ
की
कृषि
व्यवस्था
पर
निर्भर
करती
है
।
ऐसे
में
बड़ी
राजनैतिक
पार्टियो
में
कांग्रेस
,
भाजपा
,
सपा
और
बसपा
ने
अपने
उम्मीदवारो
के
रूप
में
पुरुषो
पर
ही
अपना
भरोषा
जताया
है
।
कांग्रेस
से
महेन्द्र
गौतम
,
भाजपा
से
विनोद
सोनकर
,
सपा
से
शैलेन्द्र
कुमार
,
और
बसपा
ने
सुरेश
पासी
को
उम्मीदवार
बनाया
है
।
अब
कौशाम्बी
के
महिलाओ
की
जागरूकता
और
अपने
महिला
साथी
को
ही
अपना
वोट
देने
की
बात
से
बड़ी
पार्टियो
के
सभी
उम्मीदवारो
के
लिए
जीत
का
सपना
बिना
महिला
वोटरो
के
सहयोग
के
कैसे
पूरा
होगा
यह
देखना
बेहद
दिलचस्प
होगा। |