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Sarvesh Kumar Singh Editorial

पीसीएस का इस्तीफा: यूजीसी के विरोध की राजनीति

सर्वेश कुमार सिंह

Posted on: 26.01.2026,

विश्विद्यालय अनुदान आयोग की अधिसूचना दिनांक 13 जनवरी 2026 ने सवर्ण समाज को आंदोलित कर दिया है। अधिसूचना के कई अंश से सवर्ण समाज की असहमति है। माना जा रहा है कि इससे दलित और पिछड़े समाज के छात्रों, छात्राओं को संरक्षण के नाम पर असीमित शक्तियां मिलेंगी।

जब से इस संशोधित बिल का गजट नोटिफिकेशन हुआ है। तभी से सवर्ण समाज में आक्रोश है। खासकर ब्राह्मण समाज में। लेकिन इसके साथ ही केंद्र और राज्य में विपक्षी दलों ने इसे एक अवसर के रूप में देखा है। ये दल जो नीतियों और समीकरणों के आधार पर बीजेपी को हर नहीं पा रहे हैं, अब उन्हें लगता है कि सवर्ण वोट थोक में बीजेपी से नाराज होकर उनके पास आ जाएगा। प्रदेश के ब्राह्मण वर्ग पर कांग्रेस, सपा और बसपा तीनों की निगाह है।

स्वयं प्रेरणा से कई जगह ब्राह्मण, क्षत्रिय संगठनों ने विरोध प्रदर्शन किया है। लेकिन ताजा प्रकरण ने इस मुद्दे पर देश का ध्यान खींचा है। यह बरेली के नगर मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री के पद से इस्तीफे का है। उन्होंने यूजीसी के नियमों के विरोध और माघ मेला में शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद के अपमान से क्षुब्ध होकर इस्तीफा दिया है।

सिटी मजिस्ट्रेट के इस्तीफे ने न केवल देश का ध्यान खींचा बल्कि शासन प्रशासन में हड़कंप मच दिया है। वे यकायक ब्राह्मण समाज के चहते हो गए। उनके इस्तीफे के बाद ब्राह्मण नेताओं का जुटान भी उनके इर्द गिर्द और आवास पर होने लगा।

पीसीएस अग्निहोत्री का आक्रोश तो समझ में आता है जो स्वाभाविक है। लेकिन उनके इस्तीफे के समय, उसकी भाषा, आरोप और राजनीतिक शब्दावली कई सवाल भी खड़े करती है। इससे ऐसा लगता है कि इस्तीफे के पीछे राजनीति और राजनीति करने की मंशा छिपी है।

सबसे पहला सवाल ये है कि उन्होंने इस्तीफे के गणतंत्र दिवस को ही क्यों चुना। शायद इसलिए कि इस्तीफे का प्रभाव अधिक दिखे, क्योंकि राष्ट्रीय पर्व पर एक अफसर त्यागपत्र दे रहा है। दूसरा सवाल ये है कि अग्निहोत्री ने इस्तीफे में भारतीय जनता पार्टी को विदेशी जनता पार्टी लिखा है। यानि कि स्पष्ट है भाजपा विरोध को प्रकट करना और ब्राह्मणों में भाजपा के प्रति आक्रोश को बढ़ाना है। अन्यथा तो एक प्रशानिक अधिकारी की कार्यशैली और शब्दावली दलीय सोच और निष्ठा से ऊपर होती है।

तीसरा सवाल है कि इस्तीफा यूजीसी के नियमों के विरोध में है तो नियमों को रद्द करने की मांग होनी चाहिए। शंकराचार्य के सम्मान बहाली की मांग होनी चाहिए। ये सब न होकर इस्तीफे में भाजपा के राजनीतिक विकल्प की बात कही गई है। यानि विशुद्ध राजनीतिक इस्तीफा है। हो सकता है इन तीनों बिंदुओं के निर्धारण में कोई राजनीतिक दिमाग काम कर रहा हो।

डीएम को इस्तीफे की कॉपी देने जाने के बाद मीडिया से राजनीति में जाने की बात कहना और समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता से बात करना राजनीतिक संकेत हैं। इस्तीफे से अलंकार अग्निहोत्री चर्चित तो गए हैं लेकिन उनकी दिशा क्या होगी अभी ये तय होना बाकी है।