
श्रीधर अग्निहोत्री
लखनऊ। सियासत के मैदान में जबतक कोई
नहीं उतरता है उसे सियासत बुरी लगती है लेकिन जब इसको
करीब से देखने का मौका मिलता है तो वही सियासत बेहतर
दिखने लगती है। अब ब्यरोक्रेट्स को ही लीजिए, कभी
राजनेताओं के मातहत रहे यह अधिकारी रिटायरमेंट के
बाद इस क्षेत्र में उतरे तो उनमें से कई तो सफल रहे
तो कई ऐसे भी रहे इसकी रपटीली राहों पर चल नहीं पाए
और वह राह से बाहर हो गए।
पीएल पुनिया
मायावती एवं मुलायम सरकार में प्रमुख सचिव रहे पीएल
पुनिया राज्यसभा सदस्य हैं। इससे पहले वह कांग्रेस
के टिकट पर बाराबंकी से लोकसभा का चुनाव भी जीत चुके
हैं।
रामबहादुर
यूपी सरकार के एक और आईएएस अधिकारी रहे रामबहादुर इस
बार लखनऊ में मोहनलालगंज विधानसभा सीट से बसपा के
टिकट पर चुनाव लड़ रहे है। उन्हें मायावती का काफी
नजदीकी अफसर माना जाता था।
बाबा हरदेव सिंह
यूपी पीसीएस एसोसिएषन के अध्यक्ष रहे हरदेव सिंह ने
रिटायरमेंट के बाद राजनीति में प्रवेष किया। उन्होंने
राष्ट्रीय लोकदल ज्वाइन किया। बाद में प्रदेष
अध्यक्ष भी बने तथा पिछला विधानसभा चुनाव भी लड़े
लेकिन वह चुनाव हार गए।
आरपी षुक्ला
यूपी षासन में गृहसचिव रहे आरपी षुक्ला ने भी
रिटायरमेंट के बाद राजनीति के क्षेत्र में कदम रखा
और राष्ट्रीय लोकदल की सदस्यता ग्रहण की तो पार्टी
अध्यक्ष चै अजित सिंह ने उनको राष्ट्रीय महासचिव की
जिम्मेदारी दी लेकिन आरपी षुक्ला को राजनीति रास नहीं
आई और उन्होंने इससे किनारा कर लिया।
बृजलाल
पूर्व आईपीएस अधिकारी बृजलाल मायावती सरकार के समय
प्रदेष के डीजीपी थे। अपराधियों के प्रति बेहद कड़क
रवैया अपनाने वाले बृजलाल रिटायर होने के बाद भाजपा
में षामिल हो गए।
यषपाल सिंह
आईपीएस अधिकारी से रिटायर होने के बाद पूर्व डीजीपी
यषपाल सिंह को 2012 के चुनाव में राजनीति में उतरने
का षौक हुआ तो उन्होंने पूर्वी उत्तर प्रदेष में अलग
प्रभाव रखने वाली पीस पार्टी को ज्वाइन कर लिया तो
पार्टी अध्यक्ष डा अयूब ने उन्हे पार्टी प्रवक्ता बना
दिया। लेकिन चुनाव खत्म होते ही उनका राजनीति से मोह
भंग हो गया।
ओम पाठक
एक और आईएएस अधिकारी ओम पाठक भी राजनीति में आए।
उन्होंने भाजपा के षिखर पुरुष अटल विहारी वाजपेयी के
खिलाफ चुनाव भी लड़ा लेकिन चुनाव हार गए। हांलाकि बाद
में वह उसी भाजपा में षामिल हो गए जिसके विरोधी थें।
चन्द्रपाल
एक और आईएस अधिकारी चन्द्रपाल को भी राजनीति के
मैदान में उतरने का षौक सवार हुआ तो उन्होंने किसी
दल में षामिल न होकर खुद की ही पार्टी बनाना ज्यादा
बेहतर समझा लेकिन वह अपने दल को वह दिषा नहीं दे सके
जिसकी उन्हे तलाष थी।
एसआर दारापुरी
पूर्व डीजीपी एसआर दारापुरी ने समाजसेवा के साथ
राजनीति के मैदान में भी उतरने का काम किया।
उन्हांेने अपनी पार्टी भी बनाई। बाद में 2014 का
लोकसभा चुनाव भी राबर्टसगंज सीट से लडे़ लेकिन चुनाव
में उनको जनसमर्थन नहीं मिल सका।
त्रिभुवन राम
मायावती सरकार में लोकनिर्माण विभाग में प्रमुख
अभियन्ता रहे टीराम कोषुरू से ही मायावती का करीबी
माना जाता रहा है। बाद में जब मायवती ने उन्हे अजगरा
विधानसभा सीट से टिकट दिया तो पिछला चुनाव वह इस सीट
से जीतकर विधानसभा सदस्य बने। इस बार भी वह बसपा
प्रत्याषी के रूप में इसी सीट से अपनी किस्मत आजमा
रहे हैं।
बादल चटर्जी
पूर्व आईएएस अधिकारी बादल चटर्जी भी इस चुनाव में
ताल ठोंकने को तैयार हैं। वह इलाहाबाद की उत्तरी
विधानसभा सीट से निर्दलीय प्रत्याषी के रूप में ताल
ठोंकने की तैयारी कर रहे हैं। बादल चटर्जी की छवि एक
ईमानदार और कर्मठ अधिकारी की रही है। वह इलाहाबाद
में कमिष्नर भी रह चुके हैं।