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आगरा 5 जुलाई, (उप्रससे)। लोगों ने बौध्द
धर्म को स्वीकार तो किया लेकिन उसे समझने
की कोशिश नहीं की । यहीं कारण है कि बौध्द
परिवारों का निर्माण नहीं हो सका। बौध्दों
को बौध्द संस्कृति को बचाने के लिए आगे आने
की जरूरत है।
यह बात अखिल भारतीय भिक्क्षु महासंघ के
सम्मेलन मे भिक्क्षु महासंघ के राष्ट्रीय
अध्यक्ष भदन्त आनंद महाथेरा ने धम्म देशना
में कही उन्होनें कहा कि इस अधिवेशन के
माध्यम से आगरा में दलित समाज के पुरूष और
महिलाओं का संगठन तैयार कर एक बार फिर से
जनजगारण अभियान चलाया जायेगा और तभी निष्यि
पडे बौध्द विहारों को सयि किया जा सकेगा
ताकि धम्म का प्रचार और प्रसार सहीं तरीके
से हो सके। भिक्षु प्रज्ञाशील थेरो ने
बताया कि भारत को विश्व में बुध्द देश के
नाम से जाना जाता है आज भारतीय पुरातत्व
सर्वेक्षण विभाग देश के किसी भी कौने में
अगर खुदाई करता हे तो वहां बौध्द संस्कृति
के अवशेष अवश्य प्राप्त होते हैं।
भदंत ज्ञानरत्न ने कहा कि पूर्व मे आगरा
मे विभिन्न बौध्द संगठन काफी सयि थे जो
धम्म के प्रचार प्रसार में सदैव आगे रहते
थे। अब ऐसा देखने को नहीं मिलता । आज
आवश्यकता है कि हम उन खामियों का आंकलन करें
और बौध्द संस्कृति और साहित्य के प्रचार
प्रसार में अग्रणी भूमिका का निर्वाह करें।
इसी में भिक्षुओं की एक सभा भी हुई जिसमें
बौध्द भिक्षु आदर्श आचार संहिता पर खुलकर
चर्चा की गई । आज डा0 अम्बेडकर सामुदायिक
भवन छीपीटोला पर भिक्षुओं का एक खुला
अधिवेशन भी आयोजित किया गया । इसमें चौ0
रामगोपाल, करतार सिंह भारतीय, प्रेमदास
त्रिवेदी, डा0 नरायण सिंह, मीरा देवी,
कन्हैया लाल, पूरन सिंह नाहर, आर के भारती,
आदि उपस्तिथ थे।
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