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उत्तर
प्रदेश में शहरों के विस्तारीकरण से सीमाई
गांवों पर अस्तित्व का खतरा मंडरा रहा है।
आजादी के बाद से विकास की तेज रफ्तार के
नाम पर यूपी के सैकड़ों गांव शहरों में समा
चुके हैं। किन्तु यह सिलसिला अभी रुक नहीं
रहा है, बल्कि और तेजी से बढ़ रहा है। अभी
तक स्थिति यह थी कि शहरों के स्वाभाविक
विस्तार से गांव उनमें समा रहे थे। लेकिन,
अब सरकार ने योजनाबद्ध ढंग से गांवों को
शहरों में शामिल करने की योजना बनाई है।
इस योजना के अन्तर्गत करीब आधा दर्जन
महानगरों की सीमा पर बसे सैकड़ों को शीघ्र
ही नगर निगमों की सीमा में शामिल कर लिया
जाएगा। इसके लिए नगर विकास विभाग ने योजना
बना ली है।
पहले चरण में जिन शहरों की सीमा का विस्तार करने का प्रस्ताव तैयार
किया गया है। उनमें राजधानी लखनऊ, वाराणसी,
कानपुर,गाजियाबाद, शाहजहांपुर और
फिरोजाबाद हैं। इन नगरों के नगर आयुक्तों
से सीमा विस्तार और संभावित गांवों को
शामिल करने के लिए प्रस्ताव भेजने को कहा
गया है। इस प्रस्ताव की स्वीकृति के बाद
सीमा पर बसे तमाम गांवों का अस्तित्व
समाप्त हो जाएगा और ये नगर निगम के हिस्से
होंगे। सरकार का तर्क है कि नगरों की सीमा
पर कालोनियां विकसित हो रही हैं। इन
कालोनियों में मूलभूत नागरिक सुविधाएं
उपलब्ध करायी जाएंगी और सरकार इनसे गृह कर
आदि भी वसूल सकेगी। अभी स्थिति यह है कि
गांवों में विकसित हो गईं कालोनियों में
निजी बिल्डर और सोसाइटियां प्लाटिंग तो कर
देती हैं या भवन बना देती हैं।लेकिन,
जन-मल निकासी के लिए सीवर, पेयजल और
प्रकाश की व्यवस्था नहीं करती हैं। इसके
लिए कालोनीवासी सरकारों और प्रशासन पर
दवाब बनाते हैं। इसके साथ ही विकास
प्राधिकरण और आवास विकास परिषद् भी नगरीय
सीमा से बाहर गांवों की कृषि भूमि को
अधिग्रहीत करके आवासीय योजनाएं ला रहे
हैं। इस तरह जो काम निजी संस्थाएं कर रही
हैं,वही सरकारी एजेंसियां भी कर रही हैं।
जहां तक नव विकसित कालोनियों में मूलभूत सुविधाए प्रदान करने की बात
है। यह तो सही है किन्तु इसका एक दूसरा
पक्ष भी है कि क्या नगरीय सीमा के लोगों
को सुविधाओं के नाम पर गांवों को कब तक
मिटाते रहेंगे। इस तरह गांवों का शहरों
में समाना एक गंभीर खतरे की ओर भी संकेत
करता है। आखिर इसकी कोई सीमा भी होगी कि
नहीं। अभी कुछ गांवों को शामिल करेंगे।
इसके दस बीस साल बाद फिर नए गावों को
शामिल करेंगे। शहरों में जब गांव शामिल
होते हैं। नगर निगमों की विकास प्रक्रिया
में गांव प्राथमिकता पर नहीं होते। बल्कि
आवासीय योजनाएं ही होती हैं। नगर निगमों
के गांवों की सड़कें, पेयजल, सीवर पर कोई
ध्यान नहीं दिया जाता। बल्कि इसका एक असर
यह होता है कि इन ग्राम पंचायतों को सरकारी
योजनाओं में गांव होने के कारण मिलने वाली
धनराशि और सुविधाएं समाप्त हो जाती है।
नगर निगमों के गांवों का हाल मौके पर देखा
जा सकता है। दूसरा खतरा यह है कि गांवों
के शहर में समाने से कृषि भूमि घट रही है।
इससे लगातार कृषि उपज में कमी आएगी। इतना
ही नहीं गांवों में शहरों की आपूर्ति के
लिए बागवानी की जाती है। जिससे ताजा
सब्जियां शहरों को पहुंच पाती हैं। शहरों
में समाने के बाद इन गांवों में खेती नहीं
हो सकेगी। क्योकि पशु नहीं पाले जा सकेंगे।
ज्ञातव्य है कि नगर निगम सीमा में पशु
पालन पर प्रतिबंध होता है। इसका अन्य
दुष्प्रभाव दुधारु पशुओं की कमी पर आएगा।
नगर निगम में शामिल गांवों में गाय, भैंस
नहीं पाली जा सकेगी। हां, इतना और होगा कि
ग्रामीणों को भी पुराने और जर्जर घरों पर
गृह कर देना होगा।
लेकिन, हमारी सरकारें शहरीकरण की होड़ में भविष्य की चिंताओं से आंखें
मूंदे हुए हैं। सरकारें गांवों से शहरों
की ओर पलायन रोकने की बजाय गांवों को ही
शहरों में शामिल कर उनका अस्तित्व मिटाने
पर आमादा हैं। यदि सरकार चाहे तो गांवों
का अस्तित्व बरकरार रखते हुए भी उनमें
मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध करा सकती है। इसके
लिए उन्हें नगर बनाने की जरूरत नहीं है।
गांवों का स्वरूप और संस्कृति बचाकर भी
विकास हो सकता है। इस देश में गांव को
मिटाकर भारत का मूल स्वरूप नहीं बच सकेगा।
क्योंकि भारत मूलभूत ढांचा आज भी गांवों
पर ही टिका है। यदि इन चिंताओं से उत्तर
प्रदेश सरकार सचेत हो जाए तो गांव का ही
नहीं देश का हित होगा। |