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बाल सुरक्षा का प्रश्न

आज का सम्पादकीय / 15.11.2020 / सर्वेश कुमार सिंह

कानपुर के घाटमपुर क्षेत्र में दीवाली की शाम हुई छह साल की बालिका की हत्या ने समूचे समाज को झकझोर दिया है। पूरा समाज इस घटना से स्तब्ध है,आक्रोश और क्षोभ है। घटना अति निंदनीय है, अक्षम्य है लेकिन, सोचनीय भी है कि आखिर ऐसी घटनाओं को कौन और कैसे लोग अंजाम दे रहे हैं। उनके साथ कैसी सजा का प्रावधान होना चाहिए। शनिवार को जब पूरा देश दीये जलाकर लक्मीा पूज रहा था, तब किसी वहशी, विक्षिप्त और विकलांग मानसिकता के व्यक्ति ने एक छह साल की बालिका की क्रूरता के साथ हत्या कर दी। उसके शरीर पर कई जख्म किये। चेहरे को धारधार हथियार से विक्षिप्त किया। निर्वस्त्र करके उसके अंग काटे। ऐसी हत्या जो किसी प्रतिशोध में अपने शत्रु की करता है, वैसी ही जघन्यता से बालिका को मौत के घाट उतारा गया । लेकिन, क्यों किसी की बेटी को मारा गया। इसके लिए कौन जिम्मेदार हैं। हत्यारों की खोज करके शीघ्र और सख्त से सख्त सजा दी जानी चाहिए। हालांकि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने तत्काल इस घटना का संज्ञान लिया है और उस परिवार के प्रति संवेदना व्यक्त ही है, जिसकी बेटी की हत्या कर दी गई है। उन्होंने पीडित परिवार को आर्थिक सहायता की भी घोषणा की है। लेकिन, यह ना काफी है, जब तक अपराधी गिरफ्त में ना आ जाए और उसे इस अपराध की सजा ना मिले तब तक न्याय नहीं माना जाएगा। आज हमारा समाज जैसे-जैसे आधुनिकता और विकास की ओर बढ़ रहा है, वैसे-वैसे समाज में विकृतियां भी बढ़ रही हैं। इधर बालक और बालिकाओं की सुरक्षा को लेकर अनेक गंभीर प्रश्न खड़े हुए हैं। आये दिन कहीं न कहीं से बालकों के अपहरण के बाद हत्याओं और बालिकाओं के साथ नृशंसता की घटनाएं सामने आ रही हैं। बालिकाओं के साथ दुष्कर्म और फिर हत्या की घटनाओं में यकायक वृद्धि नजर आ रही है। इन घटनाओं को अंजाम देने वाला भी कोई बाहरी नहीं होता, वह समाज के भीतर का ही कोई व्यक्ति, पड़ोसी, नातेदार या निकट संबंधी ही निकलता है। इसलिए सोचनीय प्रश्न यह है कि इन घटनाओं के पीछे कौन सी और कैसी मानसिकता काम कर रही है, जो हमारे समाज को निरंकुश, क्रूर और अपराधी बना रही है। वह भी ऐसे अपराघ कर रहे हैं जो अक्षम्य और अति घृणित हैं। इस तरह समाज में आ रही विकृतियों को रोकने के लिए आधुनिक माध्यमों के साथ साथ परंपरागत मान्यताओं समाज के नियमों को भी प्रमुखता देनी होगी। हमारे समाज में बालकों और बालिकाओं के प्रति प्रचलित सकारात्मक और सुरक्षात्मक मान्यताएं रही हैं। उन्हें प्रमुखता के साथ शिक्षा और संस्कार के माध्यम से प्रचारित करना और बढ़ाना पड़ेगा। केवल कानून से इस विकृति का समाधान संभव नहीं है। ( उप्रससे )

 

 
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