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फीस प्रकरण: लॉक डाउन जैसे संकट के दौर में भी बाज़ नहीं आ रहे निजी विद्यालय!
बदायूँ , 17 मई 2020
( उत्तर प्रदेश समाचार सेवा ) > । जब पूरे देश में लॉक डाउन चल रहा हो, अधिकतर देशवासी आर्थिक तंगी से गुजर रहे हों, जहां प्रदेश सरकार के साथ अनेक सामाजिक संगठन
एक-दूसरे की मदद को हाथ बड़ा रहे हों, लेकिन वहीं दूसरी ओर देश के कुछ निजी विद्यालय किस तरह अभिवावकों को निचोड़ने में लग रहे हैं, इसका अंदाज़ा इसी बात से लग जाता है कि विद्यालय बंद होने के बाबजूद तीन माह की पूरी फीस लेंगे और मोटे कमीशन के चक्कर में प्राइवेट पब्लिशर्स की महंगी-महंगी किताबें पूरे दाम
में बेचेंगे। न तो फीस में रियायत देंगे और न ही किताबों में कमीशन छोड़ेंगे।
सूत्रों के अनुसार प्राइवेट पब्लिशर्स की किताबों में 50 से 70 प्रतिशत तक कमीशन चलता है। एक बच्चे का औसतन कोर्स 4000 से लेकर 7000 रुपये तक आता है। इस तरह एक बच्चे से कमीशन बतौर औसतन 3000 से लेकर 4000 रुपये बनता है। यदि एक विद्यालय में 1000 बच्चे हैं तो इस तरह
मात्र किताबों के कमीशन से ही तीस लाख से लेकर चालीस लाख रुपये का कमीशन मिल जाता है। इसके अलावा ड्रेस बेचने का कमीशन अलग बनता है। लेकिन अभी हम उसका जिक्र नही कर रहे हैं। इतनी बड़ी रकम से पूरे वर्ष का विद्यालय के सभी खर्चे निकल जाते हैं। किसी-किसी विद्यालय में बच्चों की संख्या 2000 से 3000 से भी अधिक
बच्चों तक है। जिससे उनका कमीशन औसतन 60 लाख रुपये से लेकर एक करोड़ रुपये तक हर वर्ष हो जाता है। यह सब काली कमाई में शामिल होता है। जिसका लेखा-जोखा नहीं रखा जाता है।
वहीं दूसरी ओर बच्चों से भारी भरकम जो त्रैमासिक फीस ली जाती है, वह रिकॉर्ड में होता है। उसी के सापेक्ष विद्यालय के सभी खर्चे तैयार किये जाते हैं। इस तरह विद्यालय के बही-खातों में घालमेल करके विद्यालय को घाटे में दिखा दिया जाता है।
क्या यह सम्भव है कि इसकी जानकारी जिला प्रशासन, शिक्षा विभाग के साथ-साथ सत्ताधारी मंत्रियों, स्थानीय सांसदों और विधायकों को न हो! लेकिन फिर भी सभी चुप्पी साधे रहते हैं। इसका सीधा मतलब है कि जो वैध-अवैध धन ये बड़े विद्यालय हम और आपसे एकत्रित करते हैं, उसकी एक मोटी रकम का चढ़ावा सत्ताधारियों की चौखट
पर चढ़ाया जाता है। बिना चढ़ावा चढ़ाए बेखौफ होकर विद्यालय संचालक अपनी मनमानी नहीं कर सकते। हर वर्ष कुछ अभिवावक आवाज़ उठाते हैं, लेकिन जांच के नाम का झुनझुने से उस आवाज़ को दबा दिया जाता है। कुछ अखबार या न्यूज़ चैनल इस मुद्दे को प्रमुखता से उठाते भी हैं, लेकिन आये दिन नई खबरों के बीच यह प्रमुख खबर दबकर
रह जाती है। |