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संकट को अवसर बनाकर भारत का उत्थान करें: ड़ा भागवत

सेवा कार्य संघ कार्य ही है, विरोधियों से भी विद्वेष न रखें

महामारी से बचाने के लिए स्वयं उदाहरण बने

U.P. Samachar Sewa |  Published on 26 April, 2020> Dr. Mohan Bhagwat

नागपुर, 26 अप्रैल, 2020 ( रविवार )। ( उत्तर प्रदेश समाचार सेवा )। कोरोना संक्रमण के काल में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की भूमिका और सेवा कार्यों पर सरसंघचालक डा मोहन भागवत ने रविवार को स्वयंसेवकों का डिजिटल माध्यम से मार्गदर्शन किया। डा. भागवत ने अक्षय तृतीया के पर्व पर स्वयंसेवकों को संबोधित करते हुए संदेश दिया कि संकट को अवसर बनाकर भारत का उत्थान करें। स्वदेशी को अपनाते हुए युगानुकूल अर्थनीति से एक नया विकास माडल खड़ा करें। उन्होंने कहा कि सेवा के जो कार्य हम कर रहे हैं,वह संघ कार्य ही है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुख्यालय में सर संघचालक डा मोहन भागवत ने कहा कि जीवन के बारे में हमारी कल्पना है कि स्वयं अच्छा बनें और दुनिया को अच्छा बनाएं यही संघ कार्य है।  उन्होंने कहा कि हम जिन सेवा कार्यों में लगे हैं। उन्हें प्रचण्ड प्रमाण करें। सेवा कार्य अपना कार्य है। सेवा कार्यों के लिए समर्पण पर डा. मोहन भागवत ने चीन गए तथागत का भी उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि हम जो कर रहे हैं, यह भी संघ कार्य ही है। इसे हम स्वार्थ की प्रेरणा से नहीं, कीर्ति के लिए नहीं कर रहे हैं। हम यह कार्य इस लिए कर रहे हैं क्योंकि यह अपना समाज है, अपना देश है। इसके लिए कार्य करना है। सेवा कार्य करते हुए आत्मीय वृत्ति का प्रतिपाद होना चाहिए। इस कार्य में निरंतर लगे रहना और श्रेय दूसरों को देना है।

डा. मोहन भागवत ने कहा कि इस कोरोना महामारी के संकट काल में हमें दूसरों को कई जानकारियां भी देनी पड़ती हैं। कोरोना से बचने के लिए जो कार्य करने हैं, वह पहले स्वयं अपनाने पड़ेंगे तब दूसरों को बताना है कि क्या करना है। इसके लिए हमे खुद ही उदाहरण बनना पडे़गा। उन्होंने कहा कि महामारी से डरना नहीं है, संतुलन बनाकर रखना है, भय से महामारी ओर संकट बढ़ता है। यह बीमारी नई है, इससे निपटने के लिए पूरी सामर्थ्य से प्रयास करना है। हमें इससे मुकाबला करने और सेवा कार्य से थकना नहीं है, और न ही ऊबना है। हमें सबके लिए प्रयास करना है। हमारी जितनी शक्ति से उससे सेवा करनी है।

सेवा सबकी करनी है

उन्होंने कहा कि हमें सेवा सबकी करनी है। इसे सामूहिकता की भावना से करना है, अपनत्व की भावना से करना है। प्रेम के साथ, उत्तम कार्य करना है। हम किसी पर उपकार नहीं कर रहे हैं। इसके लिए उन्होंने हनुमान जी के गुणो की भी याद दिलायी। कहा कि हमें हनुमान जी की तरह दक्षता और सावधानी के साथ कार्य करना है। वह सब कार्य भी करने है जो इस बीमारी से बचाव के लिए बताए गए हैं। जैसे आयुष मंत्रालय ने बताया कि काड़ा का उपयोग करना है।  हमें सामाजिक दूरी का पालन करते हुए और मास्क लगाकर ही सेवा का कार्य करना है। यह कार्य जब तक पूरा नहीं होता तब तक करते रहना है। भागवत जी ने बताया कि बिदुर नीति में कार्य की सफलता के लिए छह सूत्र दिये गए हैं। इसमें आलस्य से दूर रहना, तत्परता और शीघ्रता के साथ काम को करना। योजना बनाकर कार्य को करना आदि को भी अपनाना है।

विरोधियों से भी विद्वेष नहीं

सघ के प्रमुख ने विरोधियों की चर्चा करते हुए कहा कि हमें सेवा कार्य में उनसे भी विद्वेष या खुन्नस नहीं रखनी है। उनके साथ भी किसी तरह की दुश्मनी नहीं दिखानी है। इस देश के सभी 130 करोड़ लोग भारत माता की संतान हैं। उन्होंने कहा कि जो लोग भारत माता के टुकड़े होंगे ऐसे नारे लगाते हैं। उनसे सतर्क और सावधान तो रहना है कि वे देश को कोई नुकसान न पहुंचा सकें किन्तु उनसे किसी तरह की शत्रुता न हीं रखनी है। हमें सेवा कार्य करते हुए भय और क्रोध दोनों से मुक्त होकर कार्य करना है। इस मौके पर उन्होंने पालघर मे हुई संतों की सामूहिक हत्या पर भी दुख व्यक्त किया और उन्हें श्रद्धांजलि दी। उन्होंने चिंता व्यक्त की जो व्यक्ति समाज के कार्य मे लगे हैं, उनपर इस तरह आक्रमण हुआ यह चिंता का विषय है।

शिक्षा और व्यवसाय में विकास का स्वदेशी माडल बने

कोरोना महामारी के बाद की स्थिति पर चर्चा करते हुए सर सघचालक मोहन भागवत ने कहा कि कोरोना महामारी के बाद की स्थिति पर समग्रता से विचार करना होगा। महामारी के कारण जो अस्त व्यस्त हो गया है, उसे ठीक करने में समय लगेगा। इसके लिए दिशा देने वाले लोग चाहिए। विद्यालयों की शिक्षा की व्यवस्था कैसे होगी। सामाजिक दूसरी रखते हुए कैसे छोटी छोटी कक्षाएं चलायी जा सकती हैं। कैसे डिजिटल कक्षाएं चलें। बाजार, उद्योग, संस्थान आदि में भीड़ भाड़ नहीं हो, यह प्रयास करना होगा। हमें संस्कार और सहयोग का वातावरण निर्माण करना पड़ेगा। हमारे यहां कुटुम्ब के भी संस्कार हैं। हमें अपने कुटुम्ब में भी संस्कार का वातावरण बना कर रखना होगा।

विश्व में यह संकट पहली बार आया है। अब नए परिवेश मे सोचना होगा कि उद्योग धंधों से जुड़े जो श्रमिक और कर्मचारी चले गए,वे कैसे वापस आएंगे। अगर आएंगे भी क्या उद्योग उन्हें रोजगार दे पाएंगे। इसके लिए सभी को समझदारी दिखानी पड़ेगी। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री ने भी बताया है कि यह संकट स्वावलंबन का संदेश लेकर आया है। हमें स्व का अवलंबन बनना है। इसके लिए युगानुकूल अर्थनीति की रचना करनी पड़ेगा। आधुनिक विज्ञान के आधार पर नए विकास माडल पर विचार करना होगा। सब कुछ सरकार और शासन नहीं कर सकता है, इसलिए समाज को भी भागीदारी निभानी होगी।

डा. भागवत ने कहा कि स्वदेशी का संकल्प लेना होगा। हमें अपने यहां बनी  वस्तुओं का ही प्रयोग करना है। स्वदेशी को अपने आचरण में शामिल करना होगा। स्वदेशी का उत्पादन भी बढ़ना  पड़ेगा। इसमें भी यह ध्यान रखना होगा कि हमारा उत्पादन गुणवत्तायुक्त हो। विदेशी वस्तुओं पर आवलंबन अब समाप्त करना होगा। इस लाकडाउन के समय में वातावरण शुद्ध हो गया है। इस स्वच्छता को कैसे बनाए रखें, इसका प्रयास करना है। हमें प्लास्टिक मुक्त व्यवस्था को अपनाना है।  खेती में गो आधारित कृषि और रासायनिक खादों को कम से कम प्रयोग करना है। हमारे यहां कुटुम्ब के संस्कार हैं। यह समाज भी कुटुम्ब ही है।

नागरिक अनुशासित बनें

हमें अपने समाज में अनुशासन को बढ़ाना है। नागरिक अनुशासित रहेंगे तो संकट कम होगा। इस बीमारी में भी यह देखने में आया कि जहां लोग अनुशासित रहे वहां प्रकोप कम हुआ है। इसलिए अपने जीवन में नियमितता को अपनाएं और अनुशासित रहें। इस व्यवस्था के लिए शिक्षा नीति में परिवर्तन आवश्यक है। यह काम सरकार को करना ही होगा। संस्कार मूलक शिक्षा को अपनाना पड़ेगा। उन्होंने कहा कि यह संकट बहुत कुछ बताकर जा रहा है। हम इस संकट को अवसर बनाकर भारत का उत्थान कर सकते हैं।

 
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Last modified: 04/26/20