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विरोध नहीं, डा. फीरोज का अभिनन्दन हो

Tags: Banaras Hindu University BHU, Sanskirt Vidhya Dharm Vigyan Sankay, Dr. Feeroj Khan,   Publised on : 20.11.2019/ आज का सम्पादकीय/ सर्वेश कुमार सिंह

पं मदन मोहन मालवीय ने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना भारतीयता और हिन्दू सांस्कृतिक मूल्यों के अनुरूप शिक्षा प्रदान करने के लिए की थी। हिन्दू संस्कृति और संस्कृत भाषा  समानता का उद्घोष करती है। ऋग्वेद कहता है एकम सद्विप्रा बहुधा वदन्ति, जो सस्कृति और संस्कृत भाषा विश्व को ब्रह्म ज्ञान का यह तत्व बताती हो कि ईश्वर एक है विद्वान उसे अनेक नामों और रूप से जानते हैं, उसी के अनुयायी आज संस्कृत और संस्कृति के लिए समर्पित एक मुस्लिम परिवार के सदस्य का इसलिए विरोध कर रहे हैं कि वह काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में संस्कृत पढाएगा। जो लोग 13 दिन से बीएचयू  के संस्कृत विद्या एवं धर्म विज्ञान संकाय में सहायक प्राधाय्पाक डा. फीरोज खान की नियुक्ति का विरोध कर रहे हैं, वे हिन्दू धर्म और इसके सांस्कृतिक मूल्यो को नहीं जानते । वे सिर्फ हिन्दू और मुसलमान जानते हैं। ये ना तो हिन्दू और ना ही हिन्दू संस्कृति के हित चिंतक हैं और ना ही इस देववाणी और अनन्त ज्ञान की धरोहर संजोने वाली भाषा संस्कृत के अनुयायी हैं। ये बीएचयू परिसर में 13 दिन से सिर्फ इसलिए धरना कर रहे हैं कि आखिर बीएचयू में कैसे कोई मुसलमान संस्कृत पढ़ा सकता है। यह विचारणीय है कि जब संस्कृत का ज्ञान संकुचित नहीं है, इसी भाषा में रचित उपनिषद् बसुधैव कुटुम्बकम की बात करते हैं, तब इसके अनुयायी कैसे संकुचित हो गए। भाषा को धर्म की सीमा में नहीं बांधा जा सकता । जब हम संस्कृत की विश्वव्यापी स्वीकार्यता की बात करते हैं तो उसकी सीमाएं निर्धारित करने वाले कौन होते हैं? क्या हमारे ऋषियों ने ऐसा कोई बंधन लगाया था कि किसी विशेष संप्रदाय, जाति या धर्म के लोग ही संस्कृत पढ़ेंगे या पढ़ाएंगे। बीएचयू में डा. फीरोज खान की नियुक्ति का विरोध करने वाले मैक्समूलर को नहीं जानते। वे दारा शिकोह को भी नहीं जानते, जिसने न केवल संस्कृत की शिक्षा ग्रहण की बल्कि, उपनिषदों का स्वयं फारसी मे अनुवाद किया। महत्वपूर्ण यह भी है कि दारा शिकोह ने संस्कृत सीखने और उपनिषदों का अनुवाद करने में काशी के ही संस्कृत विद्वानों की मदद ली थी। ज्ञान पर किसी का एकाधिकार नहीं होता, इसे जितना बांटा जाता है वह उतना ही बढ़ता है। धर्म के आधार पर किसी के संस्कृत पढ़ने और पढाने का विरोध करके हम संस्कृत का नुकसान कर रहे हैं। भाषा और संस्कृति के विस्तार में पश्चिम की सोच को भी समझना चाहिए, क्या कोई अंग्रेज कभी यह कहता है कि केवल ईसाइयों को ही अंग्रेजी पढ़नी और पढानी चाहिए। अंग्रेजी आज विश्व की भाषा कैसे बन गई? धर्म के सीमा बंधन से नहीं, बल्कि मुक्त सीमाओं के कारण आज अंग्रेजी विश्व पर राज कर रही है। इसलिए संस्कृत भाषा को जब कोई पढ़ेगा तो उसे पढाने का भी अधिकार है। हमें तो इस बात पर गर्व होना चाहिए कि एक मुसलमान परिवार के सदस्य ने संस्कृत पढ़ी और और इसके बाद इसके ज्ञान को बांटने का बीडा उठाया। इस बात के लिए तो उसका अभिनन्दन होना चाहिए। इस शिक्षक की नियुक्ति पर विरोध की खबरों के बीच उसके पिता के बयान पर देश को चिंतन करना चाहिए। जयपुर के बगरू निवासी डा. फीरोज खान के पिता रमजान खान ने बड़ा ही पीड़ादायक बयान दिया है। उन्होंने कहा कि अच्छा होता मैं अपने बेटे को संस्कृत पढ़ाने की बजाय मुर्गे की दुकान खुलवा देता। यह बयान उस पिता का है जिसने स्वयं संस्कृत और हिन्दू संस्कृति से प्रेम किया। रमजान खान ने स्वयं भी संस्कृत पढ़ी,उनके पास शास्त्री की उपाधि है। वे भजन गाते हैं, कीर्तन करते हैं। उन्होंने इसे ही अपना पेशा बना लिया है। घर में भगवान श्रीकृष्ण का चित्र लगाते हैं। ऐसे संस्कृतनिष्ठ और हिन्दू संस्कृति के अनुयायी परिवार को हम तिरस्कृत कर रहे हैं। इस मानसिकता को बदलना चाहिए और उन लोगों को प्रोत्साहन देना चाहिए जो संस्कृत पढना चाहते हैं। यदि इसके बाद वह सस्कृत के प्रचार - प्रसार में भी योगदान करें तो यह भी अभिनन्दनीय होना चाहिए न कि निंदनीय।

( उप्रससे )

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