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सोयाबीन बनेगा चम्बल का सम्बल
इंदल सिंह भदौरिया
Publised on : 24 April 2016,  Last updated Time 11:35 ,Tags: Bundelkhand, Soyabeen, Indal Singh Bhadoria

बीहड़, बागी और बन्दूक के त्रिशूली आघात को सहती समूची चम्बल घाटी अब सोयाबीन की खेती से अपनी माली हालत सुधारेगी। इस सम्भावना का सूत्रपात चम्बल संभाग के मुख्यालय मुरैना में सोयाबीन अनुसंधान केन्द्र द्वारा संचालित क्रान्तिकारी कृषि योजनाओं के संचालन से हो रहा है।
संयुक्त चम्बल घाटी - राजस्थान, उ0प्र0, मध्य प्रदेश के जिलेद्ध ने सरसों उत्पादन के क्षेत्र में न केवल राष्ट्रीय अपितु अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर अपनी ख्याति का परचम लहराया है। तभी तो इस क्षेत्र में सरसों की फसल को पीले सोने के रूप में पहचाना जाता है। अन्तर्राष्ट्रीय क्षितिज पर चम्बल के इस सोने ने अपनी गरिमामयी गुणवत्ता एवं विपुल उत्पादीय क्षमता का जो प्रदर्शन किया हैए वह बेमिसाल और काबिले तारीफ है। आंकड़ों की गवाही के आधार पर यह बात खुलकर सामने आती है कि गत वर्षों में इस भू.भाग की भागीदारी से भारत दुनिया में पहले स्थान पर था।
दलहन उत्पादन के क्षेत्र में भी इस भू.भाग ने सदैव सराहनीय योगदान दिया है। चम्बल घाटी की अरहरए मटरए मसूर मूंगए और उरद की खेती दलहन उत्पादन के मानचित्र में अपना विशिष्ट स्थान रखती है। दलहनी फसलों के विपुल उत्पादन के लिए भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के सहयोग से राजमाता विजया राजे सिंधिया कृषि विश्व विद्यालय ग्वालियर में पिछले कई दशकों से शुष्क दलहन अनुसंधान परियोजना कार्यरत है। सोयाबीन वह फसल है जो दलहनी और तिलहनी फसलों में अपनी अहम भागीदारी निभाती है। म0प्र0 प्रान्त सोयाबीन के उत्पादन में राष्ट्रीय स्तर पर प्रथम स्थान रखता है। साल 2014-15 में म0प्र0 ने सोयाबीन का 47.40 लाख टन उत्पादन कर उल्लेखनीय कीर्तिमान स्थापित किया है। म0प्र0 के इंदौर एवं उज्जैन सम्भाग, मालवा, जबलपुर सम्भाग ;महाकौशल, ग्वालियर, दतिया, बुंदेलखण्ड, सोयाबीन उत्पादन के प्रमुख क्षेत्र माने जाते हैं। उ0प्र0 का बुंदेलखण्ड क्षेत्र भी सोयाबीन उत्पादन के क्षेत्र में अग्रणी भूमिका निभाता है।
संयुक्त चम्बल घाटी की उपजाऊ कछारी, पठारी, बलुवार और दोमट भूमि सोयाबीन उत्पादन के लिए अच्छी मानी जाती है। कृषि वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि चम्बल घाटी में रोगरोधी सोयाबीन की प्रजातियों की खेती की जाये तो दलहन, तिलहन उत्पादन की दिशा में पहले पायदान पर रहने वाला यह भू.भाग सोयाबीन उत्पादन के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। राजमाता विजया राजे सिंधिया कृषि विश्व विद्यालय ग्वालियर के शुष्क दलहन अनुसंधान केन्द्र के प्रभारीए प्रमुख कृषि वैज्ञानिक डा. घनश्याम सिंह रावत का मानना है कि भारतीय सोयाबीन अनुसंधान संस्थान इंदौर, कृषि महाविद्यालय सिहौर और जवाहर लाल नेहरू कृषि विश्व विद्यालय जबलपुर के कृषि वैज्ञानिकों के संयुक्त प्रयासों से डीएनए मार्कर की प्रविधि से सोयाबीन की रोगरोधी व शुष्क जीवी चार उन्नत प्रजातियां- जेएस.2034, आरवीएस.2001.4 , जेएस.2034 और एनआरसी.86 विकसित की है। ये प्रजातियां चम्बल घाटी के लिए वरदान साबित होंगी। डॉ रावत का यह भी कहना है कि सोयाबीन की इन प्रजातियों में पीला मोजेक व जड़ सड़न, चार कोल रॉट , पत्ती धब्बा रोग का प्रभाव कम होता है तथा ये प्रजातियां कम वर्षा में भी विकसित होती हैं। इन प्रजातियों का उत्पादन पूर्व प्रजातियों की तुलना में 15 प्रतिशत अधिक होता है। सोयाबीन की इन नई किस्मों में जहां वायरस का कोई असर नहीं होता वहीं इन पर अधिक बारिश व सूखे का भी प्रभाव नहीं पड़ता।
डॉ एपी श्रीवास्तव कृषि विशेषज्ञ पैक्ट ;सिंचाई विभाग का वैज्ञानिक अभिमत है कि चम्बल घाटी उत्तर प्रदेश के जनपद आगरा, इटावा तथा समीपवर्ती जालौन, औरैया में सोयाबीन की खेती का अच्छा भविष्य है। डॉ श्रीवास्तव ने बताया कि जालौन में सोयाबीन की खेती की प्रगति को देखते हुए यहां सोयाबीन उत्पाद प्लांट वेजीप्रो स्थापित किया गया था लेकिन कुछ वर्षों में कम वर्षा व कीटजनित रोगों के कारण इसकी उपज का ग्राफ गिरता गया।लेकिन डॉ श्रीवास्तव इस तथ्य से सहमत है कि यदि मुरैना स्थित सोयाबीन अनुसंधान केंद्र की पहल पर उपरोक्त रोगरोधी व उन्नत प्रजातियों की खेती उत्तर प्रदेश की चम्बल घाटी में की जाए तो निश्चय ही यह कुबेर का खजाना साबित होगी। इसी प्रकार अन्य कृषि वैज्ञानिकों का भी आंकलन है कि इन उन्नत किस्मों की सोयाबीन की खेती चम्बल घाटी में करने से यहां की उपजाऊ मिट्टी में सोयाबीन का व्यापक उत्पादन होगा जिससे चम्बल घाटी के जनमानस का जीवन स्तर ऊंचा होगा और चम्बल घाटी में खुशहाली आएगी।


(लेखक विश्व बैंक सहायतित यू0पी0डब्ल्य0एस0आर0पी0 परियोजना सिंचाई विभागए उ0प्र0 में जन संचार एवं मीडिया विशेषज्ञ हैं।)
 

इंदल सिंह भदौरिया

9412205971

News source: U.P.Samachar Sewa

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